मेरे अरमान.. मेरे सपने..


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शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

525 शिवलिंग के दर्शन"




525 शिवलिंग के दर्शन"
शिवपुरी धाम 













थेगड़ा (शिवपुरी धाम ) कोटा ( राजस्थान)
करीब 37 साल पहले जब मैं राजस्थान के इस शहर कोटा में आई थी तो यह शहर काफी पुराना और नये ज़माने के बीच झूल रहा था , मैं ठहरी इंदौर (MP) शहर की एक चंचल लड़की पर मुझे यहाँ  किसी भी तरह का कोई आदेश धोपा नहीं गया और मैं कुछ समय आराम से निकाल कर करीब 83 में बॉम्बे आ गई । मेरे आने के बाद ही इस मंदिर की स्थापना हुई । इसीकारण ये मंन्दिर देख नहीं पाई ।

कल अचानक इस मंदिर का जिक्र सुना तो रहा नहीं गया।
हम सारा परिवार 4 बजे इस मंदिर को देखने निकल पड़े ,स्टेशन रोड (हमारा घर) से एक बड़ी नगरीय सेवा (

टाटा मैजिक) से हम 9 लॉगो का झुण्ड चल पड़ा।

नयापुरा, बसस्टॉप, तालाब, नहर से होते हुए बोरखेड़ा के पास ही पुराना गाँव है थेगड़ा  जहाँ ये 525 शिवलिंग है हम पहुँच गए  ।

भीड़ अधिक तो नहीं थी पर सुनसान भी नहीं था ,कुछ लोगो की गोट (पिकनिक) चल रही थी जहाँ दाल - बाटी बन रही थी और बाटी की सोंधी - सोंधी खुशबु फिजाओं में फ़ैल रही थी । मन बाटी खाने को मचल रहा था पर दर्शन करने भी जरुरी थे हम आगे बढ़ गए।

सामने ही ढाई टन का पारद का शिवलिंग था सब उस पर जल चढ़ा रहे थे शिवलिंग के नजदीक ही एक विशाल नन्दी भी बना हुआ था । 

कुछ आगे एक बाबा जैसे नागा साधु बैठे थे सब उनके चरणस्पर्श कर रहे थे उनके पास ही हवनकुण्ड बना हुआ था जिसमें अग्नि जल रही थी ये आज के इस मंदिर के संस्थापक थे ।

उनके सामने उनके गुरु का मोम से बना तपस्या में लीन पुतला था जिसके आगे भी अग्नि प्रज्वलित थी। नमस्कार कर आगे बढे तो राईट साईड में कल्पतरु का पेड था कुछ आगे बढे तो पारस पीपल का पेड़ था जो नगण्य ही पाया जाता है  ।आगे चले तो रुद्राक्ष का पेड़ नजर आया जिसपर काफी मात्रा में हरे हरे रुद्राक्ष लगे थे ,वही गिरा एक हरा रुद्राक्ष भी मिझे मिला ।

उससे आगे बढे तो एक अनोखा दृश्य मेरे सामने था सामने त्रिशूल के आकार पर स्थापित अनेक शिवलिंग थे पास ही पानी की टँकिया थी और लोटे थे जिनमें पानी भर श्रद्धालु शिवलिंग पर चढ़ा रहे थे बहुत ही भक्तिपूर्ण मनमोहक दृश्य था...

इतने शिवलिंग देखकर मन प्रफुल्लि होना स्वाभाविक था \ काफी देर तक हम इस भक्तिपूर्ण माहौल में घूमते रहे जब अँधेरा धिर आया तो सब तृप्त हो वापसी के लिए निकल पड़े। ....







संस्थापक देवलोक वासी  गुरु जी की मोम की प्रतिमा 




रुद्राक्ष का पेड़ जो नेपाल में बहुतयात में पाए जाते है 

पीपल पारस भी बहुत विरले ही दीखता है  





कच्चा रुद्राक्ष  



















पारद के  ढाई टन के शिवलिंग 


अभी के नागाबाबा  श्री सनातन  गुरु जी   


पारस  पीपल का पेड़  


 कल्पतरु का पेड़ 


शिवलिंग के विहंगम दृश्य   




शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

मन्दसौर का पशुपतिनाथ मन्दिर


*मन्दसौर का पशुपतिनाथ मन्दिर*




पशुपतिनाथ भगवान 



आज मैँ  आपको अपने बचपन के शहर मंदसौर ( मध्य प्रदेश ) की सैर करवा रही हूँ :---

मैँ मन्दसौर 4 साल रही हूँ, जब मैँ 9th में थी तब इस शहर में मेरे पापा का ट्रांसफर हुआ था .. मेरे पापा पुलिस डिपार्टमेंट  में थे यहाँ के नई आबादी पुलिस स्टेशन पर अधीक्षक के पद पर कार्यरत थे ।  ,वही  पीछे  हमारा छोटा सा सरकारी बंगला था। .....आजकल  यहाँ पुलिस  हेड क्वार्टर बना हुआ है ।
पुलिस विभाग जिला  मन्दसोर संभाग को माल वाला संभाग कहते है क्योकि यहाँ अफीम की खेती होती है और जब अफीम उगती है तो तस्करी भी होती है ।



1974 में (Ncc कैप्टन ) उस समय के S P पुलिस और केंद्रीय नेता के साथ मैं  



 मध्यप्रदेश जिसे भारत का दिल कहते है ,,,,, यह शहर इसी राज्य का जिला है ..... बड़ा शहर है.....  इसको गेहूं और लहसुन की बड़ी मण्डी के रूप में जाना जाता है । यहाँ प्राकृतिक खनिज सम्पदा भी बहुत है सफ़ेद पेन्सिल स्लेट यहाँ की खनिज सम्पदा है  और पेन्सिल  बनने के कारखाने भी काफी  है । 

यहाँ 2 चीजे  बहुतयात में होती है एक तो लहसुन जिसे सफ़ेद सोना  कहते है और दूसरी  अफीम जिसे काला सोना कहते है .....कई लोग सफ़ेद स्लेट को भी सफ़ेद सोना कहते है  ।
अफ़ीम की खेती करने के लिए  सरकार की परमिशन जरूरी होती है ,जब अफ़ीम के पट्टे सरकार देती  थी तब हमारे स्कूल  की  छुटियां होती थी  (पट्टे  देना मतलब अफीम की खेती  करने की परमिशन देना ) क्योकि स्कूलों में ही लोगों  को पट्टे दिए जाते थे  उसके बगैर खेती करना गैर क़ानूनी  था ........ काफी मात्रा में किसान अपनी बैलगाड़ियों से आते थे तब हम छुट्टियों का मजा लेते थे  ।

 जब खेतों में अफ़ीम के फूल आते थे तो तबियत खुश हो जाती थी। ...क्योकि  रंग बिरंगे फूलों से सारे खेत सज जाते थे ....फूल के बाद उसमे फल लगते थे जिन्हे डोडे कहते है ।  जब डोडे  कच्चे ही रहते है तो उनमें ३ या ४ लाईने खींच देते है जिनसे दूध सा निकलता है और  धीरे धीरे वो दूध जम जाता है ,जब अच्छी तरह से दूध जम  जाता है तो डोडे तोड़ लेते है और उस जमे हुए दूध को निकलते है जो अफीम होती है। ....

उन डोडो में भी खसखस भरी होती है जिसे पोस्तादाना कहते है। . कहते है उन डोडो में भी नशा होता है यदि उनको उबालकर प्रयोग किया जाय  तो काफी नाश आता है ।  ,नशा करने वाले इसका प्रयोग करते है वैसे यदि किसी को दस्त लग जाये तो  इनको  उबालकर पिने से ठीक हो जाते है ।
जिला मन्दसौर यहाँ के फेमस मन्दिर से भी प्रसिध्य है । यह  एक शिव मन्दिर है जिसे पशुपतिनाथ मन्दिर कहते है। वैसे नेपाल में भी पशुपतिनाथ (भगवान शंकर ) का मन्दिर है पर उसमें भगवान शिव की चारमुखी मूर्ति है जबकि यहाँ पर अष्टमुखी मूर्ति है जो की लिंग रूप में स्थापित है। ...


यह मंदिर शिवना नाम की नदी के तट पर बसा है। .... यह मंदिर पश्चिममुखी हैं....   इस मन्दिर की ऊंचाई 101 फिट है ... 90 फ़ीट लम्बा और 30  फ़ीट चौड़ा है।  मन्दिर के शिखर पर 100 किलो वजनी सोने  का कलश है जिस पर 51 तोला सोने का पतरा राजमाता श्रीमती विजयाराजे सिंधियां द्वारा 26 जनवरी 1966 को चढ़ाया  गया था.....  


और यह एक मात्र ऐसा मन्दिर है जहाँ सावन के हर  सोमवार को शिवजी का सर्व मनोकामना सिद्धि अभिषेक होता है जो की विश्व के किसी भी शिव मन्दिर में नहीं होता।

ये शिव मूर्ति 7.5 फिट है और इस मूर्तिपर बाल्यावस्था, युवावस्था, अधेड़ावस्था और वृध्यावस्था की झलक दिखलाई देती है। यहाँ हर साल कार्तिक एकादशी से मार्गशीर्ष कृष्ण पंचमी तक  एक  मेले का आयोजन होता है जहाँ नाना  प्रकार के झूले होते है ।लोग दूर दूर से इस मेले का आनन्द उठाने आते है । 

   
इतिहास :--
इस मूर्ति का इतिहास 75 साल पुराना है  बड़ा ही विचित्र है ...कहते है--- एक धोबी को स्वप्न में भगवान शिव ने दर्शन दिए और कहा की -- ''जिस पत्थर पर तू कपडे धोता है  वो मैँ हूँ ! तू यही मेरी प्राण प्रतिष्ठा करवा दे ।"
 तब धोबी ने सबको अपने स्वप्न की बात बताई तो लोगो ने पहले तो विश्वास नहीं किया पर उसके अडिंग विश्वास को देखते हुए 19 जून 1940 को उस पत्थर को सीधा किया तब ये 1500 साल पुरानी प्रतिमा के दर्शन हुये पर किसी ने स्थापित नहीं किया। ....

21 साल तक ये मूर्ति शिवना नदी के किनारे ज्यो की त्यों पड़ी रही फिर 23 नवम्बर 1961 को चैतन्य आश्रम के स्वामी प्रत्याक्षा्नन्द महाराज ने इस मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करवाई और पशुपतिनाथ नामकरण किया। ....

इस मन्दिर की धारणा यह है की हर बारिश में शिवना नदी अपना प्रचण्ड रूप इख़्तियार कर लेती है और भगवान  पशुपतिनाथ के पैरो को छूने मंदिर तक आती है और उस समय शहर में बाढ़  जैसी स्थिति हो जाती है कई बार तो शहर की गलियो में नावे चलने लगती है  लेकिन भगवान पशुपति के पैर छूकर पानी तुरन्त उतर  जाता है ।  उस समय पुलिस वाले  बेचारे रातदिन लगे रहते है । 





॥ जय महाराज पशुपतिनाथ की जय ॥ 


पैरो को छूती शिवना नदी 




मन्दसौर शहर 
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अफ़ीम के फूल और डोडे 





अफीम के फूल 




अफीम के डोडे  :--इसमें से खसखस निकलती है जिसे पोस्तदाना भी कहते है 



इन डोडो में चीरा लगाते है और जब इनका दूध पक जाता  है तो वो अफ़ीम बनता है




(सभी फोटो गूगल बाबा के सौजन्य से )