मेरे अरमान.. मेरे सपने..


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मंगलवार, 25 मई 2021

सफर ओर हमसफ़र

सफर और हमसफ़र
~~~~~~~~~~~~`💝


ट्रेन चलने को ही थी कि अचानक कोई जाना पहचाना-सा चेहरा जनरल बोगी में आ गया... मैं अकेली सफर कर रही थी... सब अजनबी चेहरे थे.. स्लीपर का टिकिट नही मिला तो जनरल डिब्बे में ही बैठना पड़ा...
मगर यहां ऐसे हालात में उससे मिलना...अजीब हालत थी मेरी ...लेकिन जिंदगी में ये पल मेरे लिए एक संजीवनी के समान थे।

जिंदगी भी कमबख्त कभी-कभी अजीब से मोड़ पर ले आती है... ऐसे हालातों से सामना करवा देती है जिसकी कल्पना भी इंसान नही कर पाता।

वो आया और मेरे पास ही खाली पड़ी सीट पर बैठ गया...ना मेरी तरफ देखा,ना पहचानने की कोशिश की... कुछ इंच की दूरी बना कर चुप चाप पास आकर बैठ गया...बाहर सावन की रिमझिम लगी थी...बारिश जोरदार हो रही थी और ट्रेन ने प्लेटफार्म छोड़ दिया था...इस कारण वो कुछ भीगा हुआ लग रहा था..मैने कनखियों से नजर बचा कर उसको देखा....उम्र के इस पड़ाव पर भी कमबख्त वैसा का वैसा ही खूबसूरत था..हां, कुछ भारी हो गया था..मगर इतना ज्यादा भी नही की पहचान भी न सकूं।
फिर उसने जेब से चश्मा निकाला और मोबाइल में लग गया।

चश्मा देख कर मुझे कुछ आश्चर्य हुआ...उम्र का यही एक निशान उस पर नजर आया था कि आंखों पर चश्मा चढ़ गया था...चेहरे पर और सर पे मैने सफेद बाल खोजने की कोशिश की मग़र मुझे नही दिखे। 

मैंने जल्दी से सर पर स्कार्फ बांध लिया...बालों को डाई किए काफी दिन हो गए थे... वैसे भी आलस के कारण आजकल मैंने बालों को रंगना कम कर दिया था.. लेकिन मेरे सर में ज्यादा तो नही पर थोड़े-से बाल सफेद दिख रहे थे।

थोड़ी देर बाद मैं उठकर बाथरूम चली गई... हैंड बैग से फेसवाश निकाला चेहरे को ढंग से धोया फिर शीशे में चेहरे को गौर से देखा; उसको देखकर मेरे चेहरे पर एक अजीब-सी खुशी नाच रही थी...मैने खुश होकर शीशा वापस बैग में रख लिया और अपनी सीट पर आ गई। 

लेकिन ये क्या? वो साहब तो खुद खिड़की के पास मेरी सीट पर अपना आसान लगाए बैठे हुए थे...मुझे आया देख, मेरी तरह देखा भी नही बस बिना देखे ही कहा--- "सॉरी, भाग कर चढ़ा था तो पसीना आ गया था...थोड़ा सुख जाए फिर अपनी जगह पर बैठ जाऊंगा।" 

वह फिर अपने मोबाइल में लग गया... उसने मेरी इच्छा जानने की कोशिश भी नही की...मुझे उसकी यही बात हमेशा बुरी लगती थी...।

 ख़ेर, कुछ भी हो! पर ना जाने क्यों मैं आजतक उसको भूला नही सकी थी...एक वो था जो सिर्फ दस सालों में ही मुझे भूल गया था...फिर मैंने सोचा शायद उसने अभी तक मुझे गौर से देखा नही हो, देखेगा तो जरूर पहचान लेगा..थोड़ी मुटिया गई हूँ...पर इतनी भी नही की वो मेरा चेहरा ही भूल जाये.. मैं ओर उदास हो गई ..जिस शख्स को जीवन में कभी भुला नही पाई उसको मेरा चेहरा ही याद नहीं😔

वो शादीशुदा है...मैं जानती हूँ..मैं भी विवाहिता हूं, मग़र इसका मतलब यह तो नही कि अपने खयालों को, अपने सपनों को जीना ही छोड़ दूं...कितनी तमन्ना थी कि कुछ पल उसके साथ गुजारूं...।

आज वही शख्स मेरे पास बैठा हैं,लेकिन अजनबी बनके😪 वो जिसे स्कूल के टाइम से मैंने दिल में बसा रखा था.. आज भी फेसबुक पर उसकी सारी तस्वीरें छुपकर देखा करती हूं ... उसकी हर कविता, हर शायरी में खुद को खोजा करती हूं...खुद को ही पाती हूँ लेकिन, वह तो आज मुझे पहचान ही नही रहा😔 मैं थोड़ी उदास हो जाती हूँ।

हम में प्यार जैसा कुछ था ये तो पता नही,पर वो हरदम मेरे साथ रहता था..मेरी केयर करता था..मुझे भी उसके बगैर एक मिनट अच्छा नही लगता था...हम दोनों का साथ स्कूल से कालेज तक रहा.. कॉलेज में भी हमदोनों मशहूर थे..हमारे ठहाकों से कॉलेज की सुनी बिरादरियां गूंजती रहती थी.. कोई दिन ऐसा नही जाता था कि हम मिलते न हो...हमेशा हर पार्टी या पिकनिक हम दोनों के बगैर सुनी होती थी।

 फिर कॉलेज छुटा तो मेरी शादी हो गई और वो फ़ौज में चला गया... कोई गिला या शिकवा नहीं था,मैं खुश थी.. फिर सुना कि उसकी भी शादी हो गई...जब भी मायके जाती तो उसकी कुछ न कुछ  खबर मिल ही जाती थी।

बस ऐसे ही जिंदगी गुजरती गई, न कोई मलाल न कोई खुशी।

आधे घण्टे से ऊपर हो गया.. वो आराम से खिड़की के पास मेरी सीट पर बैठा अपने मोबाइल में लगा रहा.. उसने मुझे देखना तो दूर अपना चेहरा तक ऊपर नही किया था😔 सारे मर्द ऐसे ही होते है😠अब मुझे गुस्सा आने लगा था।

लेकिन अब मैं अपने मोबाइल को देखने लगी.. कभी अपने मोबाइल को देखती कभी उसकी तरफ देखती... फेसबुक खोलकर उसकी तस्वीर को भी मिलाया वही था; पक्का वही! शक की कोई गुंजाइश ही नही थी..
 वैसे भी हम महिलाएं किसी को पहचानने में कभी धोखा नही खा सकती...20-30 साल बाद भी सिर्फ आंखों से ही पहचान लेती हैं ☺️

फिर और कुछ वक्त गुजरा लेकिन माहौल वैसा का वैसा ही था मैं बस पहलू बदलती रही और वो तटस्थ अपना मोबाइल में उलझा रहा।

इतने में पता नहीं किधर से अचानक टीटी आ गया... सबसे टिकिट पूछ रहा था। 
मैंने अपना टिकिट दिखा दिया। उससे पूछा तो उसने कहा--" मेरे पास नही है।"
टीटी बोला-- "फाइन लगेगा"
वह बोला--" ok लगा दो"
टीटी बोला---" कहाँ का टिकिट बनाऊं?"
उसने जल्दी से जवाब नही दिया... मेरे हाथों की  तरफ देखने लगा..
मैं कुछ समझी नही। 
उसने मेरे हाथ में थमी टिकिट को गौर से देखा फिर टीटी से बोला--- "कानपुर।"
टीटी ने कानपुर की टिकिट बना दी.. और पैसे लेकर चला गया।

अब वो फिर अपने मोबाइल में तल्लीन हो गया।
मैं आवक -सा उसका चेहरा देखती रही...आखिर मुझसे रहा नही गया... मैंने पूछ ही लिया..."कानपुर में कहाँ रहते हो?"
वह मोबाइल में नजरें गढ़ाए हुए ही बोला-- " कहीँ नही"  
मैं फिर बोली--- "किसी काम से जा रहे हो"
वह बोला---"हां"
अब मैं चुप हो गई...वह अजनबी की तरह बात कर रहा था उसने अपनी गर्दन एक बार भी नहीं उठाई..
मुझे गुस्सा आ गया और मैं चुप हो गई।
कुछ देर चुप रहने के बाद आखिर मैंने पूछ ही लिया--- "वहां शायद आप नौकरी करते हो?"
उसका जवाब था---"नही"?

अब मुझसे रहा नही गया...मैंने हिम्मत कर के पूछा ही लिया---"तो किसी से मिलने जा रहे हो?"

उसका वही संक्षिप्त उत्तर-- "नही"

आखिर उसका जवाब सुनकर मेरी फिर हिम्मत नही हुई कि मैं फिर उससे कुछ पूछूँ ☹️ अजीब आदमी हैं... बिना काम सफर कर रहा था..
मैं भी अपना मुँह फेर कर मोबाइल में लग गई...भाड़ में जा!!😠

काफी देर तक मैंने उससे कुछ नही पूछा...ट्रेन अपनी रफ्तार से भागी जा रही थी और मैं मोबाइल में खोई हुई कोई रोचक कहानी पढ़ रही थी कि अचानक उसकी आवाज़ आई-- "अब ये भी पूछ लो की मैं क्यों जा रहा हूँ कानपुर?"

मैं उछल पड़ी...मेरे मुंह से जल्दी से निकला--- "बताओ, क्यों जा रहे हो?"
फिर अपने ही उतावलेपन पर मुझे शर्म-सी आ गई😀

उसने थोड़ा सा मुस्कराते हुये मुझे देखा और बोला--- " एक पुरानी दोस्त मिल गई थी जो आज अकेले सफर पर जा रही थी.. फौजी आदमी हूँ... सुरक्षा करना मेरा कर्तव्य है... उसको अकेले कैसे जाने देता... इसलिए उसे कानपुर तक छोड़ने जा रहा हूँ। " उसने एक दिलकश मुस्कान बिखेर कर इतनी बातें सहज भाव से बोल दी।

लेकिन उसकी बातें सुनकर मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा...मैं आवक हो उसकी शक्ल देखने लगी...फिर मन के भावों को दबाने का असफल प्रयत्न करते हुए मैंने हिम्मत कर के फिर पूछा-- " कहाँ है वो दोस्त?"
कमबख्त फिर मुस्कराता हुआ बोला--" यहीं ! मेरे पास बैठी है ना"
😲😲😲😲😲

मेरा मुंह खुला का खुला रह गया..
मुझे सबकुछ समझ में आ गया था कि क्यों उसने टिकिट नही लिया? क्योंकि उसे तो पता ही नही था मैं कहाँ जा रही हूं... सिर्फ और सिर्फ मेरे लिए वह दिल्ली से कानपुर का सफर कर रहा था...ओर मैं न जाने क्या -क्या सोचे जा रही थी... खुशी से मेरीआंखों में आंसू आ गए...दिल के भीतर एक गोला-सा बना और फट गया😢 परिणाम में आंखे तो भिगनी ही थी।

वो बोला--- "रो क्यों रही हो?"

मैं बस इतना ही सोच पाई---"तुम मर्दजात ऐसे ही होते हो... कुछ समझ नही सकते"। 

मैंने खुद को संभालते हुए कहा-- "शुक्रिया, मुझे पहचानने के लिए और मेरे लिए इतना टाइम निकालने के लिए"😊
वह बोला---"मैंने तुमको दिल्ली के प्लेटफार्म पर ही देख लिया था...तुम मुझे पहचानोगी या नही, यही सोच रहा था कि ट्रेन का समय हो गया,ओर मैं ट्रेन में घुस गया... प्लेटफार्म पर तुम अकेली घूम रही थी.. मैंने देखा तुम्हारे साथ कोई नही हैं तो मुझे तुमको सुरक्षित घर पहुंचाना ही था... आखिर फौजी हूं और ये मेंर कर्तव्य भी था...।" उसकी रौबदार आवाज़ ओर आवाज़ में अपनापन देखकर मुझे खुशी हुई।☺️ "मैं करती भी क्या ? उनको छुट्टी नही मिल रही थी...और भाई यहां दिल्ली में आकर बस गया... राखी बांधने तो आना ही था।" मैंने अपनी मजबूरी बताई।
"ऐसे भाई को राखी बांधने आई हो जिसको ये भी फिक्र नही कि मेरी बहिन इतना लंबा सफर अकेले कैसे करेगी?" वो थोड़ा गुस्सा हुआ।

" क्या करे, भाई शादी के बाद भाई रहे ही नही, भाभियों के हो गए.. मम्मी पापा जिंदा होते तो ये नोबत ही नही आती...अब तो अपना फर्ज निभाने आ जाती हूँ।" कह कर मैं उदास हो गई।☹️

 "तुम अपनी सुनाओ कैसे हो?" मैंने उदासी छोड़कर पूछा।
"अच्छा हूँ, कट रही है जिंदगी" उसका सटीक जवाब।
"मेरी याद आती थी क्या?" मैंने हिम्मत कर के पूछा ही लिया।
वो चुप हो गया...कुछ नही बोला तो मैं फिर बोली---"सॉरी, यूँ ही पूछ लिया...अब तो हम परिपक्व हो गए हैं ऐसी बातें कर सकते है..."मैंने शर्माते हुए बोला।
वो कुछ नहीं बोला उसने अपनी शर्ट के बाजू की बटन खोली और हाथ में पहना तांबे का कड़ा दिखाया जो मैंने ही फ्रेंडशिप -डे पर उसे दिया था वो बोला, " याद तो नही आती पर कमबख्त ये तेरी याद दिला देता हैं।" ओर वो जोर जोर से हंसने लगा।
😂😂😂

कड़ा देख कर मेरा दिल भी बल्लियों उछलने लगा दिल को बहुत शुकुन मिला... की आज भी मैं उसको याद हूं... फिर मैं हंसकर बोली-- "कभी तुमने सम्पर्क क्यों नही किया?"

वह बोला---" डिस्टर्ब नही करना चाहता था... तुम्हारी अपनी जिंदगी है और मेरी अपनी जिंदगी है।"
उसकी ये बात ठीक थी ,हम दोनों की अपनी अपनी गृहस्थी थी।

फिर सहज हो हम आपस में बातें करने लगे काफी देर बाद मैंने डरते-डरते पूछा---" तुम्हें छू लुँ क्या"?
वो मुस्कुराया ओर बोला--- " पाप लगेगा?"
मैं भी मुस्कुराकर बोली---" नही! छूने से पाप नही लगता।"☺️

फिर हम दोनों पहले की तरह बिंदास बातें करते रहे .. कानपुर तक हाथो को हाथ मैं पकड़े बतियाते रहे दिन दुनिया से बेखर...

ये एक दिन मेरी जिंदगी का एक ऐसा यादगार दिन बन गया जिसे आखरी सांस तक नही भुला पाऊंगी।
वह मुझे सुरक्षित घर छोड़ कर चला गया...रुका नही...बाहर से ही चला गया..उसको अपनी डियूटी पर, जम्मू जो जाना था।

उसके बाद उससे फिर कभी मुलाकात नही हुई ...क्योंकि हम दोनों बातों में इतने मशगूल थे कि हमदोनों ने एक दूसरे के फोन नम्बर ही नही लिए थे। 😪😪😪

हांलांकि हमारे बीच कभी भी वैसा प्यार नहीं था...बस एक पवित्र सा रिश्ता था.. जिसका कोई नाम नही था ...ओर हम दोनों को रिश्तों की गरिमा बनाए रखना अच्छे से आता था। 

कुछ महीनों बाद मैंने अखबार में पढ़ा कि वो देश के लिए शहीद हो गया...क्या गुजरी होगी मुझ पर उस वक्त वर्णन नही कर सकती...मेरी आँखों से दो बूंद गिर गई..शायद ये उसके शुक्राने के एवज में थी या एक पाक रिश्ते को श्रद्धांजलि थी😢
 
फिर लोक लाज के डर से मैं उसके अंतिम दर्शनों पर भी नही जा सकी।

आज उससे मिले एक साल गुजर चुका है.. आज भी रक्षाबन्धन का दूसरा दिन है ओर मैं अकेले ही सफर कर रही हूँ... दिल्ली से कानपुर जा रही हूं। जानबूझकर जनरल डिब्बे का टिकिट लिया है  ताकि फिर से उसे देख सकूं  आज न जाने दिल क्यों आस पाले बैठा है कि आज फिर वो आएगा और पसीना सुखाने के बहाने मेरी बगल में बैठ जाएगा ...लेकिन  ये मेरा भ्रम हैं😢
जाने वाले कभी लौट कर नही आते।

एक सफर वो था जिसमें वो मेरा हमसफ़र था।
एक सफर आज है जिसमें उसकी यादें मेरी हमसफ़र है 😥😥😥

---दर्शन के दिल से

बुधवार, 12 मई 2021

ख्वाबों से लड़ाई

                     ★कहानी ★ 

★ख्वाबों से लड़ाई★
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सुबह जैसे ही उठी बिस्तर की सलवटों को देखती रही .. मन कसमसाकर रह गया...तेरा यू अचानक चले जाना, कभी सोचा नही था...हरदम दिल पर एक बोझ -सा पड़ा रहता है.. सोचती हूँ,क्या तुझे कभी मेरी याद नही सताती... मैंने तो आज तक वो चादर तक नहीं बदली जिस पर हम आखरी बार सोए थे।
 
मैं यू ही घण्टों बैठी उस चादर को निहारती रहती हूँ ..तेरे अक्स को खोजती रहती हूं... तब तेरे बदन की खुशबु मुझे पूरे कमरे में फैली हुई महसूस होती है...!

फिर मैं सामने के शीशे मैं खुद को निहारने लगती हूँ .. कुछ सफ़ेद तार झिलमिलाने लगते है .. चेहरे पर कहीं -कहीं झुर्रियां अपना कब्जा जमाने मे लगी हैं...आँखों में भी मवाद -सा भर गया है...तब में अपनी मिचमीची आँखों से खुद को परखने लगती हूँ... "हम्म! कुछ मुटिया तो गई हूँ ।
आँखों के नीचे भी काले घेरे आ गए है...तो क्या सचमुच जवानी मुझसे रूठ गई हैं ?"
"उफ्फ्फ! क्या मैं इसे बुढ़ापे की मौन दस्तक  समझू?"
"अरे, नहीं !नहीं!!!!!!" 
"अभी मेरी उम्र ही क्या है " 
"जवान हूँ ?"
" खूबसूरत हूँ"
"चालीस ही तो पार हुए है"
फिर मैं अपने आप पर ख़िज़ने लगती हूँ...सफ़ेद बालों को नोंचने लगती हूँ।
"ऊ हूँ हूँ मुओ!कहीं और जाओ ! तुम्हारा यहाँ क्या काम !"

फिर धबरकर उन पर ख़िजाब मलने लगती हूँ ..चेहरे को रगड़ रगड़कर धोने लगती हूँ।

न जाने क्यों मुझे आजकल गुस्सा भी बहुत जल्दी आ जाता है...जब पड़ोस वाली पिंकी और उसके दोस्त मुझे 'आंटी' कहते है तो बहुत गुस्सा आता है...मन मसोसकर हाथ मलकर रह जाती हूँ ...क्यूँ अभी भी खुद को जवान और अल्हड समझती हूँ ?

पता नहीं क्यों? अपने ही दायरे में कैद हूँ .....

क्यों नही समझती की समय अपनी गति से भाग रहा हैं...ओर मैं इस जीवन गति का ही एक हिस्सा हूँ।

आँखों से दो बून्द टपक पडते हैं..
सपने टूटने का दर्द तो होता है ना😢

 ---दर्शन के दिल से

गुरुवार, 6 मई 2021

पथराई आँखों के सपने


# कहानी #
"पथराई आँखों के सपने 
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उसकी गली से जब भी गुजरना होता था मेरा जाने क्यों मेरे कदम उसके दर के आगे रुक जाया करते थे एक लम्बी सांस लेकर फिर मैं अचानक उस लम्बी सड़क को देखती जिस पर चलते हुए मैँ यहाँ तक पहुंची थी....

वो मेरा कुछ लगता तो नहीं था पर फिर भी मुझे उससे लगाव हो गया था !
कभी उस घर में जाने का सपना देखा था मैंने; वो बहुत संस्कारी और एजुकेटेड लोग थे कम से कम उनके 4 लड़कों में से 2 लड़के डॉ थे... उन्हीं में से एक लड़के पर मेरा दिल आ गया था ...शायद मैँ उससे प्यार करती थी...?
वो भी करता था----?
पता नहीं ???
उनका एक लड़का मशहूर वकील था और जो सबसे छोटा था वो मेरी ही उम्र का था अभी पढ़ रहा था... मुझे वो पसन्द तो नहीं था पर अक्सर हम दोनों को दादा इंग्लिश पढ़ाते थे । 

मैँ उनकी मम्मी को मौसी कहती थी और पापा को दादा कहती थी...दादा किसी कालेज में इंग्लिश के फ्रोफेसर थे...बहुत रोबीला व्यक्तित्व था उनका .... उनकी हाईट ही साढे 6 फिट थी।

अक्सर उनके घर में मेरा आना -जाना लगा रहता था । कभी माँ के काम से कभी मौसी के काम से, मेरा वहां आना जाना था। मैँ उस घर की रौनक हुआ करती थी क्योकि उस घर में कोई लड़की नहीं थी तो सब मुझे बहुत प्यार करते थे और मैँ सिर्फ तुमसे प्यार करती थी...
सिर्फ तुमसे!!!

पर तुम मेरे प्यार से अनजान थे ? बात तो करते थे पर कुछ खास नहीं... न मुझे अपना दोस्त समझते थे न कोई और रिलेशन मानते थे...
मैँ व्यर्थ ही तुम्हारी राह जोहती थी । रात को जब तक तुम आ नहीं जाते थे मैँ सीढ़ियों पे तुम्हारा इंतजार करती थी...मन ही मन तुम्हें पसन्द करती थी...तुम्हारे सपने देखती थी।

फिर वो दिन आया ...
वो मनहूस काली शाम  मैँ कभी नहीं भूल सकती, जब  मेरे सपने टूटे थे... जब मैँ जीते जी मर गई थी... जब मेरा अस्तित्व ख़त्म हो गया था...जब मैँ तुमसे दूर बहुत दूर चली गई थी।

तुम सब अपने गाँव किसी की शादी में गए हुये थे...मुझे पता नहीं था क्योकि मैँ  अपने चाचाजी के घर गई हुई थी...उस शाम मैँ बेधड़क तुम्हारे घर चली गई थी बहुत सन्नाटा था कोई नहीं था मैँ हर कमरे में तुम्हारा नाम लेकर घूम रही थी की अचानक एक कमरे से काफी आवाजें सुनाई दी तो मैंने झांककर देखा वहां तुम्हारा छोटा भाई अपने दोस्तों के साथ शराब पी रहा था... मुझे उसका ये रूप अलग ही नजर आया... मुझे देखकर उसकी आँखों में एक अनोखी चमक आ गई जिसे नजरअंदाज कर मैँ पलट पड़ी । मैँ बहुत सकते में थी इस मंदिर रूपी घर में शराब !!!छिः

मैं  गुस्से में पलटकर अपने घर को चल दी अचानक तुम्हारा भाई मुझे आवाज़ देता हुआ मेरे नजदीक आ गया बोला--" यार छाया,कुछ खाने को बना दो, मेरे और मेरे दोस्तों के लिए , बहुत भूख लगी है"।

मैँ उस वक्त वो सब टाल देती तो शायद अच्छा होता, तब वो सब नहीं होता जो हो गया था ।
मैँ बड़बड़ाती हुई उसको गालियां देती हुई किचन में आ गई ...अनजान-सा भाभी वाला अधिकार कही मुंह उठा रहा था ,..
"लो छाया, कोल्डरिंग पी लो आज बहुत गर्मी है फिर आराम से बनाना" उसने मेरे हाथ में एक ठंडी ड्रिंक रख दी..वो जानता था ठंडी चीजें मुझे बेहद पसंद हैं। मैंने फटाफट ड्रिंक ख़त्म की और काम में लग गई ......

जब होश आया तो मैँ पलंग पर चित लेटी थी माँ रो रही थी और पिताजी कमरे में चक्कर काट रहे थे...मैँ आवक थी !असहाय थी! दो दिन में मेरी दुनियां बदल गई थी।
वो मौसी बदल गई थी ? वो दादा बदल गए थे? वो प्यार बदल गया था ?वो घर बदल गया था ? रह गई थी तो सिर्फ सिसकियां! खामोश माहौल !! क्रंदन !!! खामोशी!!!!


रविवार, 18 अप्रैल 2021

जयपुर मेरी नजर में #1



जयपुर मेरी नजर में
"गलता जी"
भाग #1

26 जनवरी 2021
24 जनवरी को मैं,मिस्टर के साथ अपने छोटे भाई की लड़की की शादी में सम्मलित होने कोटा जाने को निकली।रात का सफर कटने के बाद सुबह हम कोटा पहुँच गए। सारा दिन आराम से गप्पे मारते हुए गुजरा ओर अचानक जयपुर जाने का प्लान बना लिया।टिकिट बुक करवाकर हम आराम करने लगे...ठंडी अपने जोरो पर थी ।
सुबह 5 बजे कड़कड़ाती सर्दी में हमारे कदम कोटा के रेल्वे स्टेशन की तरफ बढ़ रहे थे... चारों ओर धुंध छाई हुई थी... स्टेशन पर नाममात्र की भीड़ थी। ठीक 6:30 पर हमारी बॉम्बे -जयपुर ट्रेन प्लेटफार्म पर आई और हम फटाफट अपने Ac कम्पार्टमेंट में घुसकर दुबक गए। करोना काल अपनी आखरी सांसे गिन रहा था फिर भी हम सचेत थे।
12 बजने से पहले ही हम कोटा से जयपुर देवर के बेटे के घर मे चाय पी रहे थे।
कल 26 जनवरी थी और छुट्टी थी इसलिए सबने जयपुर के किले ओर ग़लता जी जाने का प्रोग्राम बनाया।
हम टोटल 6 परिवार के ही मेम्बर थे।  किराये की टैक्सी 2,500 में पूरे दि
न की कि थी सो टेंशन नही थी।
सबसे पहले हमारा इरादा गलताजी जाने का था।

गलताजी मंदिर:--
गलता जी का मन्दिर जयपुर शहर से महज 10 किमी दूर स्थित है...मंदिर परिसर में प्राकृतिक ताजा पानी का झरना और 7 पवित्र कुण्ड हैं..इन कुण्डों के बीच, 'गलता कुंड', भी शामिल है जो  कभी सुखता नहीं है। यहां पत्थरों के बीच एक गौमुख से शुद्ध पानी आता रहता हैं...कहते है गालव नामके एक संत ने यहां 100 साल तक तपश्या की थी जिससे देवताओं ने खुश होकर यहां प्रचुर मात्रा में पानी होने का आशीर्वाद दिया था...यह भव्य मंदिर, गुलाबी बलुआ पत्थर से बना हुआ है... पहाड़ियों के बीच बना ये सूर्य मंदिर यहां की प्राकृतिक और  शांत वातावरण के लिए प्रसिध्द हैं...यहां ओर भी कई मन्दिर हैं यहां बंदरों की कई प्रजातियां भी पाई जाती हैं।

इतिहास:--
18 वीं शताब्दी में दीवान राव कृपाराम ने सवाई जयसिंह द्वितीय के लिए गलताजी मंदिर का निर्माण किया था।
यह मन्दिर अरावली की पहाड़ियों में घने पेड़ों और झाड़ियों से घिरा हुआ है। हर साल, 'मकर संक्रांति', पर यहां काफी लोग पवित्र कुंड में डुबकी लगाने आते हैं । 
यहां आराम से टैक्सी द्वारा सूर्योदय से सूर्यास्त तक आ सकते है। 
गलता जी बहुत ही मोहक स्थान हैं ...मुझे यहां का सोंदर्य मोहित कर गया पर मैं ऊपर चढ़कर सूर्य मंदिर नही देख सकी क्योकि मेरे साथ ऊपर चढ़ने में कुछ लोग असहाय थे इसकारण मैं मन्दिर तक नही चढ़ सकी...वो फिर कभी पर छोड़कर हम सभी आगे को बढ़ गए।
अब हम जयगढ़ किला फ़तह करने निकल पड़े थे।
क्रमशः..





  
   

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

मोहब्बत का पंचनामा

तुम कहते हो---
तुम्हें फ़ूलों से मोहब्बत है!
पर जब फूल खिलते हैं----
तो तुम उन्हें तोड़ लेते हो!!

तुम कहते हो----
तुम्हें बाऱिश से मोहब्बत है!
पर जब  बारिश होती है ----
तो तुम छाता खोल लेते हो!!

तुम कहते हो----
तुम्हें हवाओं से मोहब्बत है!
पर जब हवा चलती है---
तो तुम खिड़कियाँ बंद कर लेते हो!!

मुझे उस वक़्त ओर डर लगता है,
जब तुम कहते हो---?
“मुझे तुमसे मोहब्बत है” 
-- -- -- -- -- -- -- -- --????
---दर्शन के दिल से💝

बुधवार, 31 मार्च 2021

स्वप्निल सपने


"* नींद आँखों से कोसों दूर थी?"
~~~~~~~~~~~~~~~~~~

कल की  रात बहुत शौख बड़ी चंचल थी .....
आसमां था काला, 
सितारों की बड़ी रौनक थी !
खुली खिड़की से रौशनी का गुब्बार मुझ पर आ रहा था! 
हवा के झौंके मेरे अंगों को छूकर  निकल जाते थे ..!
लेकिन...
नींद आँखों से कौसो दूर र्रर्रर थी...!!

झांकता हुआ चाँद किसी की याद दिला रहा था!
किसी का मदहोश अहसास मुझे बेसुध किये जा रहा था!
वो कोई था जिसकी बांहों में मेरी जन्नत थी!
वो मेरा खवाब! मेरा प्यार ! मेरा हमदम ! मेरा नसीब था...!
पर वो मुझसे करोड़ों मील दूर था ...
चाहकर भी मैं उसे छू नहीं पा रही थी !
इसीलिए....
नींद आँखों से कौसो दूर र्रर्रर थी ...!!

 वो मेरे साथ तो था,
 पर मेरे पास न था ...!
 उसके होने का एहसास,
मन को सुकून दे रहा था!
तन मेरी गिरफ्त से दूर किसी के आगोश में था ..
ख्यालों में ही सही,
अनुभूति तो थी---! 
क्या हुआ जो स्पर्श नहीं था---!
हसरते जवां थी और उमंगे बेकाबू थी ....
शायद इसीलिए...
नींद आंखों से कौसो दूरररर  थी...!!

तभी कही से अचानक एक कर्कश आवाज़ आई -----
"जागते रहो @#¢¥¿∆°

मैंने चोंक के देखा....
कोई पास न था ? 
कोई साथ न था  ????
कोई मेरे पहलू में न था😢

सिर्फ मैं थी और मेरी खामोशियाँ थी  और मेरी तन्हाईयां थी!

-- दर्शन के दिल से

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

प्यार की विडंबना


उसको प्यार है अपने प्यार से ! 
मुझको प्यार है अपने प्यार से !
न वो भूल सकता है अपने प्यार को! 
न मैँ छोड़ सकती हूँ अपने प्यार को !
अजीब विडम्बना है !

फिर क्या समानता है;
हम दोनों के प्यार में ? 
यही की ___ 
" हम दोनों का प्यार पर विश्वास है" ?
"हम दोनों का प्यार अटूट है "?
या __?
"हम दोनों ने प्यार के नाम पर धोखा खाया है" ?
प्यार! 
धोखा !!
प्यार !!!
धोखा!!!!
दो अलग -अलग नाम! 
पर एक दूसरे के पूरक !

"क्या हम दोनों को अपने -अपने  प्यार को परखना चाहिए "?
या__ 
जलने दे अपने - अपने 'दम्भ' को प्यार की चिता पर....
या__ 
किनारा कर ले और तौलने दे समय को प्यार की कसौटी पर....🙄

आगाज़ यही है; अंजाम खुदा जाने ....😍

---दर्शन के दिल से

शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

कर्नाटक डायरी#16


#कर्नाटक-डायरी
#मैसूर -यात्रा
#श्री रंगपट्टनम
#भाग=16
#30 मार्च 2018

3 दिन आराम करके हम शनिवार की सुबह नाश्ता कर के निकल पड़े टीपू सुल्तान की राजधानी---
 "श्री रंगपट्टनम"
मैसूर से महज 22 किलोमीटर दूर है श्री रंगपट्टन । श्रीरंगपटनम पड़ोसी जिले मांड्या में स्थित है । पूरा शहर कावेरी नदी से घिरा हुआ है।

द्वीप शहर श्रीरंगपट्टनम के स्मारकों को यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल के रूप में नामित किया गया है।

श्री रंगपट्टनमस्वामी मन्दिर:--
इस शहर का नाम रंगनाथ स्वामी के नाम  के कारण ही श्री रंगपट्टनम  प्रसिध्द हुआ । वैष्णव सम्प्रदाय का ये मन्दिर श्रीरंगपट्टनम दक्षिण भारत का सबसे बड़ा तीर्थ स्थल कहलाता हैं। ये मन्दिर भगवान विष्णु को समर्पित हैं।यहां काले पत्थर से निर्मित भगवान विष्णु की लेटी हुई प्रतिमा अपने आपमें बहुत ही खूबसूरत दिखती हैं।

मन्दिर के पीछे कावेरी नदी में गोल टोकरी में नदी का लुत्फ उठाया जा सकता हैं।

आधे घण्टे में हमारी कार मन्दिर के पास आकर रुकी...मन्दिर बाहर से ऊंची दीवार से ढंका हुआ था। देखने पर काफी पुराना लग रहा था लेकिंन वहां सफेदी हो रही थी,। बाहर तुलसी की बड़ी बड़ी ओर मोटी मोटी मालाएं मिल रही थी, भगवान विष्णु के मंदिरों की ये खासियत होती हैं कि यहां तुलसी की बहुत सुंदर मालाएं मिलती हैं।

मैंने बद्रीनाथ मन्दिर में भी ऐसी मोटी मोटी माला देखी थी।

मैंने भी एक सुंदर माला ली और अंदर प्रवेश किया।यहां मोबाइल अलाऊ नही था इसलिए मैंने बड़ी चालाकी से बाहर के कुछ फोटू खिंचे।
अंदर काफी बड़ी लाइन थी ,पूरा मन्दिर पत्थरों से बना हुआ था।अंदर जाकर देखा तो कुछ दिखाई नही दिया फिर पुजारी जी ने एक कोने में जाने का बोला,मैंने कोने से अंदर झांका तो भगवान विष्णु की अध लेटी मुद्रा में जिस प्रतिमा को देखा उसको देखती ही रह गई.. काले चमकीले पत्थर की मूर्ति पर सोने के आभूषण काफी खूबसूरत नजर आ रहे थे ऐसा लगता था मानो भगवान स्वयं अभी करवट बदलकर उठकर बैठ जायेगे....इतनी सजीव मूर्ति मैंने मेरी जिंदगी में आज से पहले कभी  नही देखी थी...
मैंने बगैर पलकें झपकाये एकटक उस मूर्ति के मोहजाल में खुद को समर्पित कर दिया।

कुछ देर बाद जब तंद्रा टूटी तो खुद को मदहोश पाया और ऐसी ही अवस्था में मन्दिर से बाहर आ गई ,मन्दिर से बाहर  तो आ गई लेकिन ऐसा लग रहा था मानो कुछ खो गया हो।
मिस्टर को भी ये मूर्ति कुछ स्वपलीन सी लगी।

 खुद को समर्पित होना किसी के मोहजाल में ओर वो भी भगवान के मोहजाल में किसको बुरा लगेगा लेकिन इस मंदिर की ये खासियत हैं कि ये मन्दिर सबको लुभावना लगेगा।

न चाहते हुए भी हम मन्दिर से निकल पड़े,ओर इसी चक्कर में कावेरी नदी और टोकरी का सफर एकदम भूल गए😀

टोकरी में घूमने का सफर किसी ओर वक्त करने का सोचकर हम चल दिये अपने अगके पड़ाव पर जो था टीपू का समर महल और दरिया-दौलत बाग।
क्रमशः...











मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

कर्नाटक डायरी#15


#कर्नाटक-डायरी
#मैसूर -यात्रा
#भाग=15
#27 मार्च 2018

कल हमने शुकावन की यात्रा की थी आज हम मैसूर का फ़ेमस चर्च देखने दोपहर के बाद निकल पड़े ,क्योंकि रात को इसका स्वरूप निखरकर आता हैं परंतु हम रात तक नही रुक सके और शाम को ही लौट आये।
मुझे अफसोस हुआ क्योंकि हमको दोपहर की जगह शाम को निकलना था,परन्तु इसके बारे में ज्यादा जानकारी न होने के कारण हम शाम तक वापस लौट आये थे।

ख़ेर, हमने ओला मंगवाई ओर चर्च देखने निकल पड़े।मैसूर महल से कुछ आगे गलियों से गुजरते हुए हम चर्च पहुँच गए।इसके ऊंचे गुम्मद हमको दूर से ही नजर आ रहे थे ,नजदीक देखा तो पता चला कि इसकी मरम्मत चल रही हैं आधा चर्च हरे कपड़े से ढंका हुआ था। हम अंदर चल पड़े।

सेंट Philomena कैथेड्रल  एक कैथोलिक चर्च या गिरजाघर है। पूरा नाम सेंट जोसेफ और सेंट फिलोमेना कैथेड्रल है । इसे सेंट जोसेफ कैथेड्रल के नाम से भी जाना जाता है । 

भारत में सबसे बड़े चर्चों में से एक हैं फेलोमीन्स चर्च!  यह राजसी चर्च है। यह एशिया का दूसरा सबसे बड़ा चर्च  है। सेंट फिलोमेन चर्च न केवल अपनी स्थापत्य सुंदरता और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है बल्कि
यह चर्च शहर के कैथलिक संप्रदाय   को मैसूर शासक द्वारा दिया गया  एक उपहार स्वरूप हैं।

यह चर्च मैसूर महल से महज 2 km के दायरे में पड़ता हैं। 

सेंट फिलोमेना चर्च का इतिहास:--
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1933 में महाराजा कृष्णराज वोडेयार चतुर्थ के शासनकाल के दौरान एक छोटा चर्च बनाया गया था।
1926 में, टीआरवी थम्बो चेट्टी, जो दीवान और मैसूर के मुख्य न्यायाधीश थे, ने पीटर पिसाणी, ईस्ट इंडीज के अपोस्टोलिक डेलीगेट से सेंट फिलोमेना के अवशेष प्राप्त किया, जिसे विधिवत रूप से फादर चेत को सुपुर्त कर दिया गया, जिन्होंने तब मैसूर महाराजा से संत के सम्मान में एक चर्च बनाने का अनुरोध किया था। उनके अनुरोध पर, मैसूर राजा कृष्णराजेंद्र वोडेयार बहादुर चतुर्थ ने इस चर्च के निर्माण की अनुमति दी। इसलिए, 1933 में, नए चर्च की नींव रखी गई। निर्माण के 8 वर्षों के बाद, चर्च ने 1941 में काम करना शुरू कर दिया। 

कहा जाता है कि सेंट फिलोमेना ग्रीस के एक छोटे से राज्य के सम्राट की बेटी थी। सम्राट संतानहीन था, इसलिए दंपति ने एक बच्चे के लिए भगवान से प्रार्थना की। एक साल बाद, एक बेटी उनके पास पैदा हुई, जिसे उन्होंने फिलोमेना नाम दिया। बचपन से ही फिलोमेना ईश्वर की भक्त थी । जब वह 13 साल की थी, तो उसके पिता उसे अपने साथ रोम ले गए थे, जहां वह सम्राट डायोक्लेटियन की मदद लेने गया था। फिलोमेना को देखकर, सम्राट उसकी सुंदरता का दीवाना हो गया उसने फ्लोमीना से शादी करने की इच्छा व्यक्त की।  लेकिन फिलोमेना ईश्वर की भक्ति में लीन थी तो उसने  सम्राट से शादी करने से इनकार कर दिया। सम्राट उसकी अस्वीकृति को सहन नही कर पाया और उसने उसको भयंकर यातना दी और उसे निष्पादित करने के आदेश दिए।

सेंट फिलोमेना चर्च की वास्तुकला:--
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 विक्टोरियन शैली में निर्मित, यह चर्च जर्मनी के कोलोन कैथेड्रल चर्च से मिलता हैं। इसे एक फ्रांसीसी कलाकार डेली द्वारा डिजाइन किया गया था। इस चर्च को एक क्रॉस के आकार में बनाया गया है, साथ ही मण्डली हॉल को 'नेव' के रूप में भी जाना जाता है जो क्रॉस का सबसे लंबा अंत है, ट्रेसीपर्स क्रॉस की दो भुजाएं हैं, क्रॉसिंग और वेदी ऊपरी भाग है या क्रॉस का छोटा हिस्सा।

चर्च का मुख्य आकर्षण 175 फीट की ऊँचाई वाले इसके दो सर हैं यानी कि 2 स्तम्भ हैं जिन्हें दूर से भी देखा जा सकता है। स्पियर्स का डिज़ाइन सेंट पैट्रिक चर्च के समान है जो न्यूयॉर्क में स्थित है। प्रत्येक शिखर पर 12 फीट की ऊंचाई के साथ एक क्रॉस है। वेदी जटिल रूप से तैयार किए गए संगमरमर और सेंट फिलोमेना की मूर्ति के साथ एक मनोरम दृश्य प्रस्तुत करती है जिसे फ्रांस से लाया गया था। अलार में आपको सेंट फिलोमेना की प्रतिमाएं और वेदी के नीचे, भूमिगत हॉल में, सेंट फिलोमेना के अवशेष मिलेंगे जो आज भी सुरक्षित रखे गए हैं।

चर्च के हॉल में 800 लोगों के करीब बैठने की क्षमता है। गर्भगृह अपनी सन ग्लास खिड़कियों के साथ अधिक सुंदर दिखता हैं, जो येसु के जीवन के विभिन्न चरणों को दर्शाता हैं जैसे कि जन्म, अंतिम भोज, क्रूस पे लटकाने ओर पुनर्जन्म के दृश्यों को! चर्च के सामने तीन छोटे छोटे दरवाजे हैं, जो आपको प्रार्थना हॉल में ले जाते हैं। चर्च के स्तंभों पर फूलों की सुंदर कलाकृति की गई हैं।

सेंट फिलोमेना चर्च की टाइमिंग:--
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आप शाम 6 बजे तक चर्च का दौरा कर सकते हैं क्योंकि सेंट फिलोमेना चर्च की टाइमिंग सुबह 05.00 बजे से शाम 06.00 बजे तक है। शाम को चर्च को देखना अच्छा लगता हैं। क्योंकि रात को चर्च को  रोशन किया जाता हैं।
 हर रविवार और त्यौहार पर, विशेष सामूहिक आयोजन किया जाता है, जबकि हर रोज़ सुबह और शाम को ही सामूहिक आयोजन होता  है। 11 अगस्त को चर्च में वार्षिक भोज का आयोजन किया जाता है। चर्च हॉल के अंदर फॉटोग्राफी की अनुमति नहीं है।(लेकिन मैंने चुपके से खींच लिए थे😂😂😂)

1977 की हिंदी बॉलीवुड फिल्म "अमर अकबर एंथोनी" की शूटिंग सेंट फिलोमेना चर्च के अंदर ही की गई थी।

चर्च वाकई में खूबसूरत डिजाइन किए हुए था अंदर की कलाकृति ओर उसके डार्क कलर देखने लायक थे रंगीन कांच से आती रोशनी बड़ी सुंदर दिख रही थी,वही से एक रास्ता नीचे गर्भगृह में गया हुआ था हम रम्प द्वारा नीचे आ गए यहां काफी ठंडक थी दूर एक मोमबती टिमटिमा रही थी,चर्च जाना और चर्च देखना मुझे कभी भी पसन्द नही आता, फिर भी फ़ेमस जगह देखने जरूर जाती हूँ। लोग कहते है यहां शांति होती हैं लेकिन मुझे ये शांति मरघट के सन्नाटे जैसी लगती हैं ।
ख़ेर,नीचे गर्भ गृह में सेंट फ्लोमिनो के अवशेष थे पर हमने नजदीक से नही देखे केयोकि वहां हमारे अलावा और कोई नही था ,मुझे घबराहट  होने लगी और हम सब तुरंत ऊपर आ गए ।
वहां से निकलकर हम बाहर आ गए चर्च के नजदीक ही कोई गुफा की तरह बनी हुई थी हम उधर चल पड़े,अंदर मोमबत्तियां जल रही थी । ये गुफा बनाने का क्या तुक हैं हमको कुछ समझ नही आया।
गुफा से बाहर आकर हमको एक स्कूल नजर आया वहां कोई फैंसी प्रोग्राम चल रहा था।क्योकि बच्चे फैंसी ड्रेस में घूम रहे थे।
शाम होने वाली थी अब हमने यहां से चलने का मन बना लिया ।क्योकि रात होने में काफी टाइम बाकी था।इसलिए रोशनी देखने का काम फिर कभी पर टाल कर हम घर की तरफ चल दिये।
वैसे ये चर्च एक बार देखने लायक हैं।
क्रमशः...








कर्नाटक डायरी #14

कर्नाटक-डायरी
#मैसूर -यात्रा
#भाग=14
#26 मार्च 2018

कुर्ग से आकर हमने 1 दिन आराम किया और दूसरे दिन चल दिये वापस मैसूर की सैर पर..
आज दोपहर का खाना खाकर हमने औला -कार मंगवाई ओर हम चल दिये "शुकावन" देखने.
मैसूर में ही स्थित हैं शुकावन पार्क।

शुकावन यानी शुक वाना :--

2000 से अधिक पक्षियों का घर हैं  शुकावन ....प्रकृति प्रेमियों के लिए ये वरदान स्वरूप हैं यहां 450 से अधिक विभिन्न प्रजातियों के पक्षी रहते हैं और यह 1 एकड़ के क्षेत्र में फैला हैं.. 50 मीटर ऊंची एवियरी गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज हैं.. इस एवियरी  (पक्षियों के लिए खुला आकाश) में सबसे अधिक पक्षी प्रजातियों को रखने का रिकॉर्ड  है। यह एक अनोखा पार्क हैं जिसे आमतौर पर तोता पार्क के रूप में जाना जाता है...।
ये श्री गणपति सचिदानंद आश्रम हैं इसमें अवधूत दत्त पीठम का एक हिस्सा है, और यह आश्रम घायल और परित्यक्त पक्षियों के पुनर्वास का भी केंद्र  हैं। इस खूबसूरत बाड़े में   तोते की कई दुर्लभ प्रजातियाँ पाई जाती हैं।

ये आश्रम सुबह 9:30 से 12:30 तक ओर 3:30 से 5:30 तक खुला रहता है। ये बुधवार को बन्द रहता हैं और इसकी एंट्री फ्री हैं।

आश्रम के मेन गेट से अंदर आकर हमको काफी खुला स्थान दिखाई दिया वही हमको एक पुरानी रॉल्स रायल कार एक कांच के केबिन में रखी दिखाई दी आगे जाकर दूर से हमको बजरंगबली की काफी बड़ी ओर ऊंची मूर्ति दिखाई दे रही थी, नजदीक जाकर देखा तो बहुत ही सुंदर हनुमानजी का मन्दिर नजर आया...मन्दिर में इस समय कोई नही था..थोड़ा आगे बढ़ने पर भगवान राम लक्ष्मण और सीताजी का भी मन्दिर दिखाई दिया जो बहुत ही खूबसूरत बना हुआ था। लेकिन वहां फोटू खींचना मना था इसलिए कोई फोटू नही खींच सकी।
आश्रम के अंदर पहुंचकर देखा कि ये बहुत ही सुन्दर पार्क बना हुआ हैं।
अंदर पक्षियों की सुंदर सुंदर मूर्तिया लगी हुई थी..आश्रम काफी साफ सुधरा था...अब हम उस जगह पर आए जिधर पिंजरों में बड़े बड़े विदेशी  तोते रक्खे हुए थे उनको देखते हुए हम अंदर की तरफ बढ़ गए, अंदर बड़े बड़े हाल बने हुए थे जिनमें तरह-तरह के पक्षी उड़ रहे थे । प्रत्येक हॉल में लाल,पीले,काले पक्षी उड़ रहे थे ...अगर आप इन पक्षियों के साथ अंदर जाकर फोटू खिंचवाते हो तो छोटी चिड़ियों के साथ 100 ₹ ओर बड़े विदेशी तोतो के साथ 150₹ का टिकिट कटवाना  पड़ेगा और  आप पिंजडे के अंदर जाकर दाना खिलाते हुए फोटू खिंचवा सकते हो।उस हालत में पंछी आपको घेर लेगे ओर आपके सर पर ,कंधे पर ओर हाथ में बैठ जायेगे। हमने भी एक फोटू खिंचवाया ओर रोमांचक अनुभव प्राप्त किया।जब पक्षी आपको चोंच मारते है और आपके हाथों से दाना चुगते हैं तो जो आनंद की अनुभूति होती हैं वो अद्वितीय हैं।

आश्रम में बोनसाई पार्क भी था,जिसमें एक से बढ़कर एक बोनसाई पेड़ लगे थे लेकिन उसका  टिकिट था परंतु हम देखने नही गए,इसके साथ ही एक संग्रहालय भी था लेकिन उसका भी टिकिट था परन्तु हम उसको भी देखने नही गए।

अगर आप पक्षी -प्रेमी हैं तो अपनी मैसूर यात्रा में आप शुकावन देखने जरूर जाये।
शुकावन में चलते चलते हम थक गए थे इसलिए फटाफट ओला पकड़कर हम घर को चल दिये।
क्रमशः....