मेरे अरमान.. मेरे सपने..


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शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

अकेलापन

★अकेलापन ★

मैं अकेली हूँ ? 
कल भी थी --
आज भी हूँ ?
ओर कल भी रहूंगी !!!!
दूर निकलना चाहती हूं ---
तेरी यादों के खंडहर से ?
खुली सांस में जीना चाहती हूँ।
रोज - रोज की पीड़ा से मुक्त होना चाहती हूँ।
थक गई हूँ तेरी सलीब को ढोते हुए,
पिंजर बनकर रह गई हूं।
अब मुक्कमल खामोशी चाहिए।
मुझे आजादी चाहिए।

कहने को तो मैं जिंदा हूं ?
होश भी है मुझको ---
फिर ये भटकाव कैसा ?
क्यों खोजती फिरती हूँ ---
उन अवशेषों को,
जो राख बन चुके है---
फिर भी उम्मीद पर जिंदा हूँ ।

अकेलेपन का ये अहसास,
मुझे महफ़िलों में जाने नही देता
खिलखिलाने नही देता !
मैं हंसना चाहती हूँ ...
गुनगुनाना चाहती हूं...
अपनी पूंजी किसी ओर पर लुटाना चाहती हूं।
काश, की कोई होता ---???
मेरी अधूरी चाहत को पूरा करता ?
काश, कोई होता ...............?

उम्मीद का दामन पकड़े आज भी इंतजार में हूँ !!!

---दर्शन के दिल से

अविरल-मंथन


सावन का आना ...
बिजली का कड़कना,
बारिश का बरसना,
जब तेरी याद के सागर में,
मैं डूब जाती हूँ ।
तब भूचाल आ जाता है ..
तूफान उठता हैं...
ओर ???
ओर मैं हर साल तेरी यादों का मंथन कर,
उनको किनारों पर छोड़ आती हूँ ।
फिर आगे बढ़ जाती हूँ ---------
लेकिन तुम; अपने किनारे तोड़ कर,
मेरी जलधारा बन,
फिर मुझमे मिल जाते हो ।
मैं फिर तुमको अपने में समेटे,
बहती रहती हूँ
निरंतर....
अविरल..
अगले सावन के इंतज़ार में।।

---दर्शन के दिल से @

सोमवार, 2 अगस्त 2021

अवचेतन- मन


★अवचेतन-मन★

"मैंने वो ख़त मेज की दराज़ में बंद कर दिए है ____ !
कभी फुरसत मिली तो फिर से पढूंगी,
तब मेरी आँखें डबडबा जायेगी,
ओर सुनी आंखों से गिरती बूंदे कराह उठेगी,
धुंधले शब्द पुकारेंगे ...
क्या उस समय तुम मेरी आवाज सुनकर आ जाओगे ???

तुम्हारी धुंधली -सी आकृति,
मेरे मानस-पटल पर आज भी अंकित है----!
तुम वैसे ही हो ना ???
दुबले-पतले-मरियल से,
ढीले- ढाले -से लिबास में,
अपने घुंघराले बालों को झटका देते हुये!
ये तुम ही हो ना 🤔

जरा नही बदले😜😜
उस दिन जब तुमने मेरे सम्मुख,
अपने गीले बालों को झटक दिया था !
तो मैं चौक पड़ी थी।
ओर तुम खिलखिला दिये थे ।
तुम्हारी वो मासूम हंसी से,
सारी कायनात झूमने लगी थी,
फिजायें चहकने लगी थी,
मानो सावन की झड़ी लग गई हो,
तब, सावन तो नही था,
पर चैत्र का महीना भी तो नही था!
हा, पहाड़ों पर ठंडक जरुर थी।

तुम्हें याद है ----
जब हम रात को खाना खाकर लौट रहे थे,
तुम मुझे प्यार से निहार रहे थे
ओर मैं___
मैं शर्म से दोहरी हुई जा रही थी🙈

वो पल ! आज सिमट गया है,
कहीं खो गया हैं...
इन कागजों को रंग गया है ।
ये काले स्याह अक्षर, 
आज मेरा मजाक उड़ा रहे  है----
तुमको मुझसे दूर कर के,
मेरी खिल्ली उड़ा रहे है ।

ऐ सुनो ! क्या तुम लौटकर आओगे?😍
वहां से, जहां से कोई वापस नहीं आता😢
आ जाओ ना !!!!😎

#दर्शन के 💝दिल से

सोमवार, 26 जुलाई 2021

मैं ओर मेरा भ्रम

"मैं ओर मेरा भ्रम"

जब भी ख्यालों की खिड़की खोलती हूँ ।
 तो एक तस्वीर मेरे ज़ेहन में उभरती हैं।
मैं दौड़कर उसे गले लगाने की असफल कोशिश करती हूं।
तब, वो मुझे परे थकेलकर मेरी कमजोरियों पर हंसती हैं।

‌मैं नशे के आलम में
‌उसको पुकारती हूँ,
‌पर वो शायद अपने कानों को बन्द कर मेरी आवाज को दूर झटक  अनसुनी कर देती है।
‌तब मैं उसको झिंझोड़कर अपने प्यार का वास्ता देकर कुछ पल के लिए रोक लेती हु।
‌पर वो एक फुंकार मारकर अपने विष का ऐलान कर देती हैं।
‌तब मैं निडर हो, 
उसके सर्फदंस को भोगकर,
 फिर से उसके सानिन्द का रस भोगने के लिए,
उसके इर्द गिर्द मंडराने लगती हूँ।
‌तब वो अपनी बीन निकाल मुझे मदहोश करने लगती हैं।
‌ओर मैं उसकी बीन पर थिरकने लगती हूँ।
‌सर्फदंश से मदहोश हुई मैं उस  स्थिति का रस भोगने लगती हूँ।
‌ओर चटकारे लेते हुए उस जहर को पीने लगती हूँ।
‌ओर तब व्याकुल हो,
 विरह के गीत गाकर,
उस मूर्छित पडी नागिन को पुनः जीवित करने की कोशिश करती हूँ।

इस कोशिश में मैं स्वयं को लहूलुहान कर लेती हूं।
तब! संतुष्टि की मौन स्वीकृति देकर, आशा की एक किरण को अपने पहलू में दबा कर चिर निद्रा  में विलीन हो जाती हूँ।

---दर्शन के दिल से

 

मंगलवार, 25 मई 2021

सफर ओर हमसफ़र

सफर और हमसफ़र
~~~~~~~~~~~~`💝


ट्रेन चलने को ही थी कि अचानक कोई जाना पहचाना-सा चेहरा जनरल बोगी में आ गया... मैं अकेली सफर कर रही थी... सब अजनबी चेहरे थे.. स्लीपर का टिकिट नही मिला तो जनरल डिब्बे में ही बैठना पड़ा...
मगर यहां ऐसे हालात में उससे मिलना...अजीब हालत थी मेरी ...लेकिन जिंदगी में ये पल मेरे लिए एक संजीवनी के समान थे।

जिंदगी भी कमबख्त कभी-कभी अजीब से मोड़ पर ले आती है... ऐसे हालातों से सामना करवा देती है जिसकी कल्पना भी इंसान नही कर पाता।

वो आया और मेरे पास ही खाली पड़ी सीट पर बैठ गया...ना मेरी तरफ देखा,ना पहचानने की कोशिश की... कुछ इंच की दूरी बना कर चुप चाप पास आकर बैठ गया...बाहर सावन की रिमझिम लगी थी...बारिश जोरदार हो रही थी और ट्रेन ने प्लेटफार्म छोड़ दिया था...इस कारण वो कुछ भीगा हुआ लग रहा था..मैने कनखियों से नजर बचा कर उसको देखा....उम्र के इस पड़ाव पर भी कमबख्त वैसा का वैसा ही खूबसूरत था..हां, कुछ भारी हो गया था..मगर इतना ज्यादा भी नही की पहचान भी न सकूं।
फिर उसने जेब से चश्मा निकाला और मोबाइल में लग गया।

चश्मा देख कर मुझे कुछ आश्चर्य हुआ...उम्र का यही एक निशान उस पर नजर आया था कि आंखों पर चश्मा चढ़ गया था...चेहरे पर और सर पे मैने सफेद बाल खोजने की कोशिश की मग़र मुझे नही दिखे। 

मैंने जल्दी से सर पर स्कार्फ बांध लिया...बालों को डाई किए काफी दिन हो गए थे... वैसे भी आलस के कारण आजकल मैंने बालों को रंगना कम कर दिया था.. लेकिन मेरे सर में ज्यादा तो नही पर थोड़े-से बाल सफेद दिख रहे थे।

थोड़ी देर बाद मैं उठकर बाथरूम चली गई... हैंड बैग से फेसवाश निकाला चेहरे को ढंग से धोया फिर शीशे में चेहरे को गौर से देखा; उसको देखकर मेरे चेहरे पर एक अजीब-सी खुशी नाच रही थी...मैने खुश होकर शीशा वापस बैग में रख लिया और अपनी सीट पर आ गई। 

लेकिन ये क्या? वो साहब तो खुद खिड़की के पास मेरी सीट पर अपना आसान लगाए बैठे हुए थे...मुझे आया देख, मेरी तरह देखा भी नही बस बिना देखे ही कहा--- "सॉरी, भाग कर चढ़ा था तो पसीना आ गया था...थोड़ा सुख जाए फिर अपनी जगह पर बैठ जाऊंगा।" 

वह फिर अपने मोबाइल में लग गया... उसने मेरी इच्छा जानने की कोशिश भी नही की...मुझे उसकी यही बात हमेशा बुरी लगती थी...।

 ख़ेर, कुछ भी हो! पर ना जाने क्यों मैं आजतक उसको भूला नही सकी थी...एक वो था जो सिर्फ दस सालों में ही मुझे भूल गया था...फिर मैंने सोचा शायद उसने अभी तक मुझे गौर से देखा नही हो, देखेगा तो जरूर पहचान लेगा..थोड़ी मुटिया गई हूँ...पर इतनी भी नही की वो मेरा चेहरा ही भूल जाये.. मैं ओर उदास हो गई ..जिस शख्स को जीवन में कभी भुला नही पाई उसको मेरा चेहरा ही याद नहीं😔

वो शादीशुदा है...मैं जानती हूँ..मैं भी विवाहिता हूं, मग़र इसका मतलब यह तो नही कि अपने खयालों को, अपने सपनों को जीना ही छोड़ दूं...कितनी तमन्ना थी कि कुछ पल उसके साथ गुजारूं...।

आज वही शख्स मेरे पास बैठा हैं,लेकिन अजनबी बनके😪 वो जिसे स्कूल के टाइम से मैंने दिल में बसा रखा था.. आज भी फेसबुक पर उसकी सारी तस्वीरें छुपकर देखा करती हूं ... उसकी हर कविता, हर शायरी में खुद को खोजा करती हूं...खुद को ही पाती हूँ लेकिन, वह तो आज मुझे पहचान ही नही रहा😔 मैं थोड़ी उदास हो जाती हूँ।

हम में प्यार जैसा कुछ था ये तो पता नही,पर वो हरदम मेरे साथ रहता था..मेरी केयर करता था..मुझे भी उसके बगैर एक मिनट अच्छा नही लगता था...हम दोनों का साथ स्कूल से कालेज तक रहा.. कॉलेज में भी हमदोनों मशहूर थे..हमारे ठहाकों से कॉलेज की सुनी बिरादरियां गूंजती रहती थी.. कोई दिन ऐसा नही जाता था कि हम मिलते न हो...हमेशा हर पार्टी या पिकनिक हम दोनों के बगैर सुनी होती थी।

 फिर कॉलेज छुटा तो मेरी शादी हो गई और वो फ़ौज में चला गया... कोई गिला या शिकवा नहीं था,मैं खुश थी.. फिर सुना कि उसकी भी शादी हो गई...जब भी मायके जाती तो उसकी कुछ न कुछ  खबर मिल ही जाती थी।

बस ऐसे ही जिंदगी गुजरती गई, न कोई मलाल न कोई खुशी।

आधे घण्टे से ऊपर हो गया.. वो आराम से खिड़की के पास मेरी सीट पर बैठा अपने मोबाइल में लगा रहा.. उसने मुझे देखना तो दूर अपना चेहरा तक ऊपर नही किया था😔 सारे मर्द ऐसे ही होते है😠अब मुझे गुस्सा आने लगा था।

लेकिन अब मैं अपने मोबाइल को देखने लगी.. कभी अपने मोबाइल को देखती कभी उसकी तरफ देखती... फेसबुक खोलकर उसकी तस्वीर को भी मिलाया वही था; पक्का वही! शक की कोई गुंजाइश ही नही थी..
 वैसे भी हम महिलाएं किसी को पहचानने में कभी धोखा नही खा सकती...20-30 साल बाद भी सिर्फ आंखों से ही पहचान लेती हैं ☺️

फिर और कुछ वक्त गुजरा लेकिन माहौल वैसा का वैसा ही था मैं बस पहलू बदलती रही और वो तटस्थ अपना मोबाइल में उलझा रहा।

इतने में पता नहीं किधर से अचानक टीटी आ गया... सबसे टिकिट पूछ रहा था। 
मैंने अपना टिकिट दिखा दिया। उससे पूछा तो उसने कहा--" मेरे पास नही है।"
टीटी बोला-- "फाइन लगेगा"
वह बोला--" ok लगा दो"
टीटी बोला---" कहाँ का टिकिट बनाऊं?"
उसने जल्दी से जवाब नही दिया... मेरे हाथों की  तरफ देखने लगा..
मैं कुछ समझी नही। 
उसने मेरे हाथ में थमी टिकिट को गौर से देखा फिर टीटी से बोला--- "कानपुर।"
टीटी ने कानपुर की टिकिट बना दी.. और पैसे लेकर चला गया।

अब वो फिर अपने मोबाइल में तल्लीन हो गया।
मैं आवक -सा उसका चेहरा देखती रही...आखिर मुझसे रहा नही गया... मैंने पूछ ही लिया..."कानपुर में कहाँ रहते हो?"
वह मोबाइल में नजरें गढ़ाए हुए ही बोला-- " कहीँ नही"  
मैं फिर बोली--- "किसी काम से जा रहे हो"
वह बोला---"हां"
अब मैं चुप हो गई...वह अजनबी की तरह बात कर रहा था उसने अपनी गर्दन एक बार भी नहीं उठाई..
मुझे गुस्सा आ गया और मैं चुप हो गई।
कुछ देर चुप रहने के बाद आखिर मैंने पूछ ही लिया--- "वहां शायद आप नौकरी करते हो?"
उसका जवाब था---"नही"?

अब मुझसे रहा नही गया...मैंने हिम्मत कर के पूछा ही लिया---"तो किसी से मिलने जा रहे हो?"

उसका वही संक्षिप्त उत्तर-- "नही"

आखिर उसका जवाब सुनकर मेरी फिर हिम्मत नही हुई कि मैं फिर उससे कुछ पूछूँ ☹️ अजीब आदमी हैं... बिना काम सफर कर रहा था..
मैं भी अपना मुँह फेर कर मोबाइल में लग गई...भाड़ में जा!!😠

काफी देर तक मैंने उससे कुछ नही पूछा...ट्रेन अपनी रफ्तार से भागी जा रही थी और मैं मोबाइल में खोई हुई कोई रोचक कहानी पढ़ रही थी कि अचानक उसकी आवाज़ आई-- "अब ये भी पूछ लो की मैं क्यों जा रहा हूँ कानपुर?"

मैं उछल पड़ी...मेरे मुंह से जल्दी से निकला--- "बताओ, क्यों जा रहे हो?"
फिर अपने ही उतावलेपन पर मुझे शर्म-सी आ गई😀

उसने थोड़ा सा मुस्कराते हुये मुझे देखा और बोला--- " एक पुरानी दोस्त मिल गई थी जो आज अकेले सफर पर जा रही थी.. फौजी आदमी हूँ... सुरक्षा करना मेरा कर्तव्य है... उसको अकेले कैसे जाने देता... इसलिए उसे कानपुर तक छोड़ने जा रहा हूँ। " उसने एक दिलकश मुस्कान बिखेर कर इतनी बातें सहज भाव से बोल दी।

लेकिन उसकी बातें सुनकर मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा...मैं आवक हो उसकी शक्ल देखने लगी...फिर मन के भावों को दबाने का असफल प्रयत्न करते हुए मैंने हिम्मत कर के फिर पूछा-- " कहाँ है वो दोस्त?"
कमबख्त फिर मुस्कराता हुआ बोला--" यहीं ! मेरे पास बैठी है ना"
😲😲😲😲😲

मेरा मुंह खुला का खुला रह गया..
मुझे सबकुछ समझ में आ गया था कि क्यों उसने टिकिट नही लिया? क्योंकि उसे तो पता ही नही था मैं कहाँ जा रही हूं... सिर्फ और सिर्फ मेरे लिए वह दिल्ली से कानपुर का सफर कर रहा था...ओर मैं न जाने क्या -क्या सोचे जा रही थी... खुशी से मेरीआंखों में आंसू आ गए...दिल के भीतर एक गोला-सा बना और फट गया😢 परिणाम में आंखे तो भिगनी ही थी।

वो बोला--- "रो क्यों रही हो?"

मैं बस इतना ही सोच पाई---"तुम मर्दजात ऐसे ही होते हो... कुछ समझ नही सकते"। 

मैंने खुद को संभालते हुए कहा-- "शुक्रिया, मुझे पहचानने के लिए और मेरे लिए इतना टाइम निकालने के लिए"😊
वह बोला---"मैंने तुमको दिल्ली के प्लेटफार्म पर ही देख लिया था...तुम मुझे पहचानोगी या नही, यही सोच रहा था कि ट्रेन का समय हो गया,ओर मैं ट्रेन में घुस गया... प्लेटफार्म पर तुम अकेली घूम रही थी.. मैंने देखा तुम्हारे साथ कोई नही हैं तो मुझे तुमको सुरक्षित घर पहुंचाना ही था... आखिर फौजी हूं और ये मेंर कर्तव्य भी था...।" उसकी रौबदार आवाज़ ओर आवाज़ में अपनापन देखकर मुझे खुशी हुई।☺️ "मैं करती भी क्या ? उनको छुट्टी नही मिल रही थी...और भाई यहां दिल्ली में आकर बस गया... राखी बांधने तो आना ही था।" मैंने अपनी मजबूरी बताई।
"ऐसे भाई को राखी बांधने आई हो जिसको ये भी फिक्र नही कि मेरी बहिन इतना लंबा सफर अकेले कैसे करेगी?" वो थोड़ा गुस्सा हुआ।

" क्या करे, भाई शादी के बाद भाई रहे ही नही, भाभियों के हो गए.. मम्मी पापा जिंदा होते तो ये नोबत ही नही आती...अब तो अपना फर्ज निभाने आ जाती हूँ।" कह कर मैं उदास हो गई।☹️

 "तुम अपनी सुनाओ कैसे हो?" मैंने उदासी छोड़कर पूछा।
"अच्छा हूँ, कट रही है जिंदगी" उसका सटीक जवाब।
"मेरी याद आती थी क्या?" मैंने हिम्मत कर के पूछा ही लिया।
वो चुप हो गया...कुछ नही बोला तो मैं फिर बोली---"सॉरी, यूँ ही पूछ लिया...अब तो हम परिपक्व हो गए हैं ऐसी बातें कर सकते है..."मैंने शर्माते हुए बोला।
वो कुछ नहीं बोला उसने अपनी शर्ट के बाजू की बटन खोली और हाथ में पहना तांबे का कड़ा दिखाया जो मैंने ही फ्रेंडशिप -डे पर उसे दिया था वो बोला, " याद तो नही आती पर कमबख्त ये तेरी याद दिला देता हैं।" ओर वो जोर जोर से हंसने लगा।
😂😂😂

कड़ा देख कर मेरा दिल भी बल्लियों उछलने लगा दिल को बहुत शुकुन मिला... की आज भी मैं उसको याद हूं... फिर मैं हंसकर बोली-- "कभी तुमने सम्पर्क क्यों नही किया?"

वह बोला---" डिस्टर्ब नही करना चाहता था... तुम्हारी अपनी जिंदगी है और मेरी अपनी जिंदगी है।"
उसकी ये बात ठीक थी ,हम दोनों की अपनी अपनी गृहस्थी थी।

फिर सहज हो हम आपस में बातें करने लगे काफी देर बाद मैंने डरते-डरते पूछा---" तुम्हें छू लुँ क्या"?
वो मुस्कुराया ओर बोला--- " पाप लगेगा?"
मैं भी मुस्कुराकर बोली---" नही! छूने से पाप नही लगता।"☺️

फिर हम दोनों पहले की तरह बिंदास बातें करते रहे .. कानपुर तक हाथो को हाथ मैं पकड़े बतियाते रहे दिन दुनिया से बेखर...

ये एक दिन मेरी जिंदगी का एक ऐसा यादगार दिन बन गया जिसे आखरी सांस तक नही भुला पाऊंगी।
वह मुझे सुरक्षित घर छोड़ कर चला गया...रुका नही...बाहर से ही चला गया..उसको अपनी डियूटी पर, जम्मू जो जाना था।

उसके बाद उससे फिर कभी मुलाकात नही हुई ...क्योंकि हम दोनों बातों में इतने मशगूल थे कि हमदोनों ने एक दूसरे के फोन नम्बर ही नही लिए थे। 😪😪😪

हांलांकि हमारे बीच कभी भी वैसा प्यार नहीं था...बस एक पवित्र सा रिश्ता था.. जिसका कोई नाम नही था ...ओर हम दोनों को रिश्तों की गरिमा बनाए रखना अच्छे से आता था। 

कुछ महीनों बाद मैंने अखबार में पढ़ा कि वो देश के लिए शहीद हो गया...क्या गुजरी होगी मुझ पर उस वक्त वर्णन नही कर सकती...मेरी आँखों से दो बूंद गिर गई..शायद ये उसके शुक्राने के एवज में थी या एक पाक रिश्ते को श्रद्धांजलि थी😢
 
फिर लोक लाज के डर से मैं उसके अंतिम दर्शनों पर भी नही जा सकी।

आज उससे मिले एक साल गुजर चुका है.. आज भी रक्षाबन्धन का दूसरा दिन है ओर मैं अकेले ही सफर कर रही हूँ... दिल्ली से कानपुर जा रही हूं। जानबूझकर जनरल डिब्बे का टिकिट लिया है  ताकि फिर से उसे देख सकूं  आज न जाने दिल क्यों आस पाले बैठा है कि आज फिर वो आएगा और पसीना सुखाने के बहाने मेरी बगल में बैठ जाएगा ...लेकिन  ये मेरा भ्रम हैं😢
जाने वाले कभी लौट कर नही आते।

एक सफर वो था जिसमें वो मेरा हमसफ़र था।
एक सफर आज है जिसमें उसकी यादें मेरी हमसफ़र है 😥😥😥

---दर्शन के दिल से

बुधवार, 12 मई 2021

ख्वाबों से लड़ाई

                     ★कहानी ★ 

★ख्वाबों से लड़ाई★
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सुबह जैसे ही उठी बिस्तर की सलवटों को देखती रही .. मन कसमसाकर रह गया...तेरा यू अचानक चले जाना, कभी सोचा नही था...हरदम दिल पर एक बोझ -सा पड़ा रहता है.. सोचती हूँ,क्या तुझे कभी मेरी याद नही सताती... मैंने तो आज तक वो चादर तक नहीं बदली जिस पर हम आखरी बार सोए थे।
 
मैं यू ही घण्टों बैठी उस चादर को निहारती रहती हूँ ..तेरे अक्स को खोजती रहती हूं... तब तेरे बदन की खुशबु मुझे पूरे कमरे में फैली हुई महसूस होती है...!

फिर मैं सामने के शीशे मैं खुद को निहारने लगती हूँ .. कुछ सफ़ेद तार झिलमिलाने लगते है .. चेहरे पर कहीं -कहीं झुर्रियां अपना कब्जा जमाने मे लगी हैं...आँखों में भी मवाद -सा भर गया है...तब में अपनी मिचमीची आँखों से खुद को परखने लगती हूँ... "हम्म! कुछ मुटिया तो गई हूँ ।
आँखों के नीचे भी काले घेरे आ गए है...तो क्या सचमुच जवानी मुझसे रूठ गई हैं ?"
"उफ्फ्फ! क्या मैं इसे बुढ़ापे की मौन दस्तक  समझू?"
"अरे, नहीं !नहीं!!!!!!" 
"अभी मेरी उम्र ही क्या है " 
"जवान हूँ ?"
" खूबसूरत हूँ"
"चालीस ही तो पार हुए है"
फिर मैं अपने आप पर ख़िज़ने लगती हूँ...सफ़ेद बालों को नोंचने लगती हूँ।
"ऊ हूँ हूँ मुओ!कहीं और जाओ ! तुम्हारा यहाँ क्या काम !"

फिर धबरकर उन पर ख़िजाब मलने लगती हूँ ..चेहरे को रगड़ रगड़कर धोने लगती हूँ।

न जाने क्यों मुझे आजकल गुस्सा भी बहुत जल्दी आ जाता है...जब पड़ोस वाली पिंकी और उसके दोस्त मुझे 'आंटी' कहते है तो बहुत गुस्सा आता है...मन मसोसकर हाथ मलकर रह जाती हूँ ...क्यूँ अभी भी खुद को जवान और अल्हड समझती हूँ ?

पता नहीं क्यों? अपने ही दायरे में कैद हूँ .....

क्यों नही समझती की समय अपनी गति से भाग रहा हैं...ओर मैं इस जीवन गति का ही एक हिस्सा हूँ।

आँखों से दो बून्द टपक पडते हैं..
सपने टूटने का दर्द तो होता है ना😢

 ---दर्शन के दिल से

गुरुवार, 6 मई 2021

पथराई आँखों के सपने


# कहानी #
"पथराई आँखों के सपने 
~~~~~~~~~~~~~~

उसकी गली से जब भी गुजरना होता था मेरा जाने क्यों मेरे कदम उसके दर के आगे रुक जाया करते थे एक लम्बी सांस लेकर फिर मैं अचानक उस लम्बी सड़क को देखती जिस पर चलते हुए मैँ यहाँ तक पहुंची थी....

वो मेरा कुछ लगता तो नहीं था पर फिर भी मुझे उससे लगाव हो गया था !
कभी उस घर में जाने का सपना देखा था मैंने; वो बहुत संस्कारी और एजुकेटेड लोग थे कम से कम उनके 4 लड़कों में से 2 लड़के डॉ थे... उन्हीं में से एक लड़के पर मेरा दिल आ गया था ...शायद मैँ उससे प्यार करती थी...?
वो भी करता था----?
पता नहीं ???
उनका एक लड़का मशहूर वकील था और जो सबसे छोटा था वो मेरी ही उम्र का था अभी पढ़ रहा था... मुझे वो पसन्द तो नहीं था पर अक्सर हम दोनों को दादा इंग्लिश पढ़ाते थे । 

मैँ उनकी मम्मी को मौसी कहती थी और पापा को दादा कहती थी...दादा किसी कालेज में इंग्लिश के फ्रोफेसर थे...बहुत रोबीला व्यक्तित्व था उनका .... उनकी हाईट ही साढे 6 फिट थी।

अक्सर उनके घर में मेरा आना -जाना लगा रहता था । कभी माँ के काम से कभी मौसी के काम से, मेरा वहां आना जाना था। मैँ उस घर की रौनक हुआ करती थी क्योकि उस घर में कोई लड़की नहीं थी तो सब मुझे बहुत प्यार करते थे और मैँ सिर्फ तुमसे प्यार करती थी...
सिर्फ तुमसे!!!

पर तुम मेरे प्यार से अनजान थे ? बात तो करते थे पर कुछ खास नहीं... न मुझे अपना दोस्त समझते थे न कोई और रिलेशन मानते थे...
मैँ व्यर्थ ही तुम्हारी राह जोहती थी । रात को जब तक तुम आ नहीं जाते थे मैँ सीढ़ियों पे तुम्हारा इंतजार करती थी...मन ही मन तुम्हें पसन्द करती थी...तुम्हारे सपने देखती थी।

फिर वो दिन आया ...
वो मनहूस काली शाम  मैँ कभी नहीं भूल सकती, जब  मेरे सपने टूटे थे... जब मैँ जीते जी मर गई थी... जब मेरा अस्तित्व ख़त्म हो गया था...जब मैँ तुमसे दूर बहुत दूर चली गई थी।

तुम सब अपने गाँव किसी की शादी में गए हुये थे...मुझे पता नहीं था क्योकि मैँ  अपने चाचाजी के घर गई हुई थी...उस शाम मैँ बेधड़क तुम्हारे घर चली गई थी बहुत सन्नाटा था कोई नहीं था मैँ हर कमरे में तुम्हारा नाम लेकर घूम रही थी की अचानक एक कमरे से काफी आवाजें सुनाई दी तो मैंने झांककर देखा वहां तुम्हारा छोटा भाई अपने दोस्तों के साथ शराब पी रहा था... मुझे उसका ये रूप अलग ही नजर आया... मुझे देखकर उसकी आँखों में एक अनोखी चमक आ गई जिसे नजरअंदाज कर मैँ पलट पड़ी । मैँ बहुत सकते में थी इस मंदिर रूपी घर में शराब !!!छिः

मैं  गुस्से में पलटकर अपने घर को चल दी अचानक तुम्हारा भाई मुझे आवाज़ देता हुआ मेरे नजदीक आ गया बोला--" यार छाया,कुछ खाने को बना दो, मेरे और मेरे दोस्तों के लिए , बहुत भूख लगी है"।

मैँ उस वक्त वो सब टाल देती तो शायद अच्छा होता, तब वो सब नहीं होता जो हो गया था ।
मैँ बड़बड़ाती हुई उसको गालियां देती हुई किचन में आ गई ...अनजान-सा भाभी वाला अधिकार कही मुंह उठा रहा था ,..
"लो छाया, कोल्डरिंग पी लो आज बहुत गर्मी है फिर आराम से बनाना" उसने मेरे हाथ में एक ठंडी ड्रिंक रख दी..वो जानता था ठंडी चीजें मुझे बेहद पसंद हैं। मैंने फटाफट ड्रिंक ख़त्म की और काम में लग गई ......

जब होश आया तो मैँ पलंग पर चित लेटी थी माँ रो रही थी और पिताजी कमरे में चक्कर काट रहे थे...मैँ आवक थी !असहाय थी! दो दिन में मेरी दुनियां बदल गई थी।
वो मौसी बदल गई थी ? वो दादा बदल गए थे? वो प्यार बदल गया था ?वो घर बदल गया था ? रह गई थी तो सिर्फ सिसकियां! खामोश माहौल !! क्रंदन !!! खामोशी!!!!


रविवार, 18 अप्रैल 2021

जयपुर मेरी नजर में #1



जयपुर मेरी नजर में
"गलता जी"
भाग #1

26 जनवरी 2021
24 जनवरी को मैं,मिस्टर के साथ अपने छोटे भाई की लड़की की शादी में सम्मलित होने कोटा जाने को निकली।रात का सफर कटने के बाद सुबह हम कोटा पहुँच गए। सारा दिन आराम से गप्पे मारते हुए गुजरा ओर अचानक जयपुर जाने का प्लान बना लिया।टिकिट बुक करवाकर हम आराम करने लगे...ठंडी अपने जोरो पर थी ।
सुबह 5 बजे कड़कड़ाती सर्दी में हमारे कदम कोटा के रेल्वे स्टेशन की तरफ बढ़ रहे थे... चारों ओर धुंध छाई हुई थी... स्टेशन पर नाममात्र की भीड़ थी। ठीक 6:30 पर हमारी बॉम्बे -जयपुर ट्रेन प्लेटफार्म पर आई और हम फटाफट अपने Ac कम्पार्टमेंट में घुसकर दुबक गए। करोना काल अपनी आखरी सांसे गिन रहा था फिर भी हम सचेत थे।
12 बजने से पहले ही हम कोटा से जयपुर देवर के बेटे के घर मे चाय पी रहे थे।
कल 26 जनवरी थी और छुट्टी थी इसलिए सबने जयपुर के किले ओर ग़लता जी जाने का प्रोग्राम बनाया।
हम टोटल 6 परिवार के ही मेम्बर थे।  किराये की टैक्सी 2,500 में पूरे दि
न की कि थी सो टेंशन नही थी।
सबसे पहले हमारा इरादा गलताजी जाने का था।

गलताजी मंदिर:--
गलता जी का मन्दिर जयपुर शहर से महज 10 किमी दूर स्थित है...मंदिर परिसर में प्राकृतिक ताजा पानी का झरना और 7 पवित्र कुण्ड हैं..इन कुण्डों के बीच, 'गलता कुंड', भी शामिल है जो  कभी सुखता नहीं है। यहां पत्थरों के बीच एक गौमुख से शुद्ध पानी आता रहता हैं...कहते है गालव नामके एक संत ने यहां 100 साल तक तपश्या की थी जिससे देवताओं ने खुश होकर यहां प्रचुर मात्रा में पानी होने का आशीर्वाद दिया था...यह भव्य मंदिर, गुलाबी बलुआ पत्थर से बना हुआ है... पहाड़ियों के बीच बना ये सूर्य मंदिर यहां की प्राकृतिक और  शांत वातावरण के लिए प्रसिध्द हैं...यहां ओर भी कई मन्दिर हैं यहां बंदरों की कई प्रजातियां भी पाई जाती हैं।

इतिहास:--
18 वीं शताब्दी में दीवान राव कृपाराम ने सवाई जयसिंह द्वितीय के लिए गलताजी मंदिर का निर्माण किया था।
यह मन्दिर अरावली की पहाड़ियों में घने पेड़ों और झाड़ियों से घिरा हुआ है। हर साल, 'मकर संक्रांति', पर यहां काफी लोग पवित्र कुंड में डुबकी लगाने आते हैं । 
यहां आराम से टैक्सी द्वारा सूर्योदय से सूर्यास्त तक आ सकते है। 
गलता जी बहुत ही मोहक स्थान हैं ...मुझे यहां का सोंदर्य मोहित कर गया पर मैं ऊपर चढ़कर सूर्य मंदिर नही देख सकी क्योकि मेरे साथ ऊपर चढ़ने में कुछ लोग असहाय थे इसकारण मैं मन्दिर तक नही चढ़ सकी...वो फिर कभी पर छोड़कर हम सभी आगे को बढ़ गए।
अब हम जयगढ़ किला फ़तह करने निकल पड़े थे।
क्रमशः..





  
   

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

मोहब्बत का पंचनामा

तुम कहते हो---
तुम्हें फ़ूलों से मोहब्बत है!
पर जब फूल खिलते हैं----
तो तुम उन्हें तोड़ लेते हो!!

तुम कहते हो----
तुम्हें बाऱिश से मोहब्बत है!
पर जब  बारिश होती है ----
तो तुम छाता खोल लेते हो!!

तुम कहते हो----
तुम्हें हवाओं से मोहब्बत है!
पर जब हवा चलती है---
तो तुम खिड़कियाँ बंद कर लेते हो!!

मुझे उस वक़्त ओर डर लगता है,
जब तुम कहते हो---?
“मुझे तुमसे मोहब्बत है” 
-- -- -- -- -- -- -- -- --????
---दर्शन के दिल से💝

बुधवार, 31 मार्च 2021

स्वप्निल सपने


"* नींद आँखों से कोसों दूर थी?"
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कल की  रात बहुत शौख बड़ी चंचल थी .....
आसमां था काला, 
सितारों की बड़ी रौनक थी !
खुली खिड़की से रौशनी का गुब्बार मुझ पर आ रहा था! 
हवा के झौंके मेरे अंगों को छूकर  निकल जाते थे ..!
लेकिन...
नींद आँखों से कौसो दूर र्रर्रर थी...!!

झांकता हुआ चाँद किसी की याद दिला रहा था!
किसी का मदहोश अहसास मुझे बेसुध किये जा रहा था!
वो कोई था जिसकी बांहों में मेरी जन्नत थी!
वो मेरा खवाब! मेरा प्यार ! मेरा हमदम ! मेरा नसीब था...!
पर वो मुझसे करोड़ों मील दूर था ...
चाहकर भी मैं उसे छू नहीं पा रही थी !
इसीलिए....
नींद आँखों से कौसो दूर र्रर्रर थी ...!!

 वो मेरे साथ तो था,
 पर मेरे पास न था ...!
 उसके होने का एहसास,
मन को सुकून दे रहा था!
तन मेरी गिरफ्त से दूर किसी के आगोश में था ..
ख्यालों में ही सही,
अनुभूति तो थी---! 
क्या हुआ जो स्पर्श नहीं था---!
हसरते जवां थी और उमंगे बेकाबू थी ....
शायद इसीलिए...
नींद आंखों से कौसो दूरररर  थी...!!

तभी कही से अचानक एक कर्कश आवाज़ आई -----
"जागते रहो @#¢¥¿∆°

मैंने चोंक के देखा....
कोई पास न था ? 
कोई साथ न था  ????
कोई मेरे पहलू में न था😢

सिर्फ मैं थी और मेरी खामोशियाँ थी  और मेरी तन्हाईयां थी!

-- दर्शन के दिल से