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रविवार, 21 मई 2017

यात्रा जगन्नाथपुरी ( YATRA JAGANNATHPURI -- 4 )





*यात्रा जगन्नाथपुरी*

भाग--4  
कोणार्क मंदिर भाग 1  

मंदिर के ऊपर कभी चुंबक हुआ करता था  


31 मार्च 2017 
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28 मार्च को मेरा जन्मदिन था और इसी  दिन मैं अपनी सहेली और उसके परिवार के साथ जगन्नाथपुरी की यात्रा को निकल पड़ी | 

आज मुझको पुरी आये दो दिन हो गए ,कल हमने जगन्नाथ मंदिर देखा और पुरी के अन्य धार्मिक स्थल देखे ,शाम को हमने पुरी का समुन्दर बीच भी देखा और रात को थके हारे सो गए। ... अब आगे ----

आज हमको कोणार्क मंदिर देखने जाना है। ..  

सुबह 4  बजे मेरी नींद खुल गई देखा तो ऐ. सी. बंद था गर्मी लगने लगी थी क्योकि पंखा भी बंद था और बाहर शोर सुनाई दे रहा था बाहर निकलकर देखा तो सब गेस्ट हॉउस के टेककेयर से झगड़ा कर रहे थे क्योकि लाईट नहीं थी कोई तार जल गया था चारो और अंधकार और गर्मी थी और मच्छर भी अपनी सेना   के साथ उपस्थित थे ,तो लाजमी था नींद तो आने से रही , कल के थके हुए थे और ८ बजे तक सोने का प्रोग्राम था लेकिन क्या करे मजबूरी थी यदि 7 बजे तक और  नींद आ जाती तो सब फ्रेश हो जाते खेर, सबने सोचा की बैठकर क्या करे तैयार हो कर निकल पड़ते है  आखिर 2 -3 घंटे बाद लाईट आई तब तक हम सब तैयार हो चुके थे , मन ही मन होटल वाले को गलियां देते हुए हम रूम से बाहर निकले। .. 

आज हमको कोणार्क का सूर्यमंदिर देखना था ,हमने पहले नाश्ता करने की सोची और बेड़ी हनुमान के पास के एक रेस्टोरेंट में गए ,ऑटो हमने कल ही नक्की कर लिया था 600  रु में उसको बुलाने की देर थी अब हमने ऑटो वाले को फोन किया और रेस्टोरेंट ही बुलवा लिया और सबने  टेस्टी आलू का पराठा दही नाल खाया तब तक ऑटो वाला भी आ गया था और हम सब अपनी अपनी सीट पर सुकड़कर बैठ गए। कल वाला ही रास्ता था लेकिन आज समुन्दर के किनारे- किनारे सड़क पर हमारा ऑटो चल रहा था जहाँ तेज हवा से हमारे बाल उड़ रहे थे। गर्मी का नामोनिशान नहीं था और हम भी कल की तरह मस्ती करते हुए नारियल पानी पीते हुए अपनी  मंजिल को बढ़ रहे थे  एक सुंदर सी जगह हम पहुंचे बहुत ही प्यारा बीच था हमने ऑटो रुकवाया लेकिन ऑटो वाला बोला की वापसी में आएंगे पर हम कहाँ मानने वाले थे  तुरंत कूद पड़े और बिच पर जाकर ही दम लिया। 

चंद्रभागा बीच  ;---
चंद्रभागा बीच कोणार्क से 3 किलोमीटर दूर और पुरी से 30 किलोमीटर दूर है ये गोल्डन बीच है और बंगाल की खाड़ी  पर स्थित है ऊँची-ऊँची भयंकर लहरे शोर मचा रही थी और सड़क के पास ही ये बीच था मुझे लगता है की जब समुन्द्र में ज्वार आता होगा तो शायद इसका पानी सड़क पर भी आ जाता होगा,क्योकि मैंने सड़क के पास काफी रेत देखि थी यहाँ की सफ़ेद रेत चांदी के सामान चमक रही थी। 

इतना ब्यूटीफुल बीच मैंने बॉम्बे में नहीं देखा यहाँ का सनसेट बहुत खूबसूरत होता है ऐसा मैंने सुना था पर हम तो यहाँ सुबह ही पहुंच गए थे खेर, हमने यहाँ खूब मस्ती की और फोटू खींचे। फिर हम आगे बढ़ गए।  

कोणार्क के सूर्यमंदिर का इतिहास 

कोणार्क मंदिर भारत के उड़ीसा राज्य में स्थित है। इसे लाल बलुआ पत्थर और काले ग्रेनाइड पत्थरों से सन 1236 -1264 ईसा पूर्व में गंगवंश के राजा  नृसिंह देव द्वारा बनवाया गया था। यह भारत के सबसे प्रसिध्य स्थलों में से एक है इसे यूनेस्को द्वारा 1984 में विश्व धरोहर स्थल के रूप में घोषित किया गया था। कलिंग शैली में निर्मित सूर्य मंदिर रथ की शक्ल में बना है और सूर्य देव की भव्य यात्रा को दर्शाता है।  इसमें भगवान सूर्य के रथ की तरह ही सात घोड़े जुते हुए है पर अब एक ही घोडा नजर आता है। रथ के 12 पहिये है जो साल के 12 महीने दर्शाते है और  पहियों के अंदर 8 धारिया समय के आठ पहर को दर्शाती है । अब ये पहिये ही इस मंदिर की पहचान बन गए है। 

 इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर ही नट मंदिर है जहाँ कुचपुड़ी नृत्य शैली की कई कृतियाँ है जो उड़ीसा की फेमस नृत्यशैली को दर्शाती है, कहते है यहाँ नर्तकियां सूर्य को अर्पण करने के लिए नृत्य किया करती थी यहाँ कई मानव ,गंधर्व,देव, किन्नर आदि की आकृतियाँ उकेरी गई है। 

दूसरी तरफ मुख्य मंदिर के चारों तरफ कामसूत्र को दर्शाती अनेक शिल्प कृतियां है जो उस समय के पारिवारिक जीवन को दर्शाती है। कुछ मुर्तिया मुझे श्रृंगार करती हुई और हाई हिल पहनी हुई भी दिखी।
यह सूर्य मंदिर है तो यहाँ भगवान सूर्य की तीन प्रतिमाएँ भी है जो क्रमशः बाल्यावस्था , युवावस्था और प्रौढ़ावस्था दर्शाती है। सूर्य का ये रूप प्रतिमाओ के जरिये दिखाया गया है जैसे बाल्यावस्था की प्रतिमा 8 फीट है तो युवावस्था की 9.5 फीट और प्रौढ़ावस्था की 3.5 फीट। 
लेकिन अब ये मंदिर खंडहर बन चूका है। उड़ीसा सरकार इसके रखरखाव पर ध्यान दे रही है। 
   
12 बजे 
हम जब मंदिर पहुंचे तो सूर्य अपनी प्रचंड किरणे फैला रहा था काफी घूप और गर्मी थी पर मंदिर देखने की इतनी बेताबी थी की हम बगैर परवाह किये चल पड़े यहाँ भी टिकिट लेकर हम अंदर गए तो एक गाईड महोदय पीछे पड़ गए फिर ये सोचकर की इनसे पीछा छुड़ाना मुश्किल है तो हमने पैसे पूछे वो बोला  100 रु पर हमने 50 रु नक्की किये और चल पड़े। 
वो  हमको इतिहास बताता रहा और बारीकी से हर चीज दिखता रहा तब हमको भी लगा की गाईड करना महंगा सौदा नहीं था फिर 50 रु में आजकल क्या मिलता है।  
मंदिर देखकर जब हम निकले तो मन प्रसन्न था  बाहर काफी बड़ा बाजार लगा था जहाँ हैंडमेड चीजे थी और काफी सस्ती भी थी हमने काफी खरीदारी की और चल पड़े अगली डेस्टिनेशन पर। ... 

शेष अगले भाग में। .... 







           


 हमारा हॉलिडे गेस्ट हॉउस 




 नाश्ता करने पहुंची हमारी टीम 



गर्मागर्म पराठा 

   

चंद्रभागा बीच


कोणार्क की नृत्य करती गणिकाएं


प्रवेश द्धार के सामने खड़े दो सिंह 



रथ में जूते घोड़ों में  बचा इकलौता घोड़ा  

हमारी टीम 





प्रवेश द्धार पर लगा पहला पहिया 




सूर्य मंदिर का आखरी पहिया 



अगले भाग में चलेगे जगन्नाथ मंदिर के  ध्वज बदलने का दृश्य। 



1.  यात्रा जगन्नाथपुरी की -- भाग 1
2.  यात्रा जगन्नाथपुरी  की -- भाग 2
3.  पुरी के अन्य दार्शनिक स्थल-- भाग 3
4.  कोणार्क मंदिर -- भाग 4
5.  भुवनेश्वर और अन्य स्थल -- भाग 5
6 . भुवनेश्वर से बनारस-- भाग 6
7 .  बनारस से बॉम्बे --भाग 7
 






सोमवार, 8 मई 2017

यात्रा जगन्नाथपुरी ( YATRA JAGANNATHPURI --3 )



* यात्रा जगन्नाथपुरी *

भाग --3 




साक्षी गोपाल  मंदिर 


30 मार्च 2017 

28 मार्च को मेरा जन्मदिन था और इसी  दिन मैं अपनी सहेली और उसके परिवार के साथ जगन्नाथपुरी की यात्रा को निकल पड़ी | 
सुबह हमने मंदिर के दर्शन किये ,खाना खाया और 3 बजे बाहर निकल गए अब आगे ----

मंदिर के दर्शन कर के हम बाहर निकले 3 ही बजे थे अब दोपहर को कहा जाये यही सोचने  लगे क्योकि आसपास के मंदिर देखने का प्रोग्राम कल का था फिर दोपहर को सागर किनारे भी नहीं जा सकते थे और मंदिर पर ध्वज चढ़ाने का भी प्रोग्राम शाम 5 बजे का था तो क्या करे  ??? 

मैंने कहा वापस रूम पर चलते है थोड़ा आराम करेंगे फिर 5 बजे मंदिर पर ध्वज देखेंगे और रात को समुंदर पर घूमेंगे पर किसी ने नहीं सुना इतने में पास खड़े ऑटो वाले ने हमारी बातें सुनी और बोला  आपको आसपास के मंदिर घूमना है ? थोड़ा मोलभाव किया और 600 रु में वो हमको आसपास के मंदिर दिखाने लेकर चला दिया । ... 

रास्ता बहुत ही सुहाना था सड़क भी एकदम मस्त बनी थी साईड में लहराते खेत और नारियल के पेड़ बहुत ही सुंदर लग रहे थे हरियाली की तो पूछो मत इतना पानी और हरियाली थी की लग ही नहीं रहा था की हम अप्रैल महीने में यहाँ आये है सबको लग रहा था मानो अभी अभी बारिश ख़त्म हुई है और ठंडी हवा के झोके मानो हमको सलामी दे रहे थे  ऑटो में जरा भी परेशानी नहीं हो रही थी और रस्ते में नारियल वालो के ठेले हमको लुभा रहे थे बहुत ही सस्ते नारियल थे मेरे बॉम्बे से भी सस्ते हम कही भी ऑटो रुकाकर नारियल पानी का स्वाद लेते थे फिर उसकी मलाई खाते थे   | 

पर इंसान यहाँ के हमको पसंद नहीं आये सब लूटने के चक्कर में ही रहते थे अब इस ऑटो वाले को ही देखो इसने झूठ बोलै था की 25 km जाना है कुल 50 km हुआ जबकि 18 km ही मंदिर था बाकि तो सारे मंदिर पास ही थे खेर,धार्मिक स्थानों पर तो ये सब होता ही है |   


1 . नरेंदर सरोवर मंदिर ;--

सबसे पहले वो जिस मंदिर में ले गया उसका नाम था  नरेंद्र सरोवर मंदिर | 
यहाँ  पूरी शहर का सबसे बड़ा तालाब है यहाँ हर साल  भगवान की चंदन यात्रा मनाई जाती है गर्मियां  होने से इसका बहुत महत्व है यहाँ भगवान रथयात्रा निकासी के दौरान जब वापस पूरी आते है तब नाव से खेकर नौका -लीला करते है  | फूलों और फलों से बहुत सुंदर नौका का श्रृंगार होता है , दो नाव सजती है एक में भगवान जगन्नाथ और स दूसरे में भगवान राम होते है। .. यह भगवान राम का मंदिर है यहाँ भी मंदिर दर्शन के 5 रु प्रति व्यक्ति टिकिट था  | 

2 . साक्षी गोपाल मंदिर ;---

मंदिर की कथा ;-- ''कहते है जब तक आप साक्षी गोपाल मंदिर के दर्शन न कर लो आपकी जगन्नाथ पूरी यात्रा अधूरी मानी जाती है पूरी से इस मंदिर की दुरी  महज 18 किलो मीटर है यहाँ एक तालाब  भी है जिसमे स्नान किया जाता है कहते है की एक बार एक अमीर ब्राह्मण अकेला यात्रा को  निकला उसके साथ एक गरीब युवा ब्राह्मण भी था जिसने उस ब्राह्मण की तन मन से सेवा की बृंदावन पहुँचने पर वृद्ध ब्राह्मण ने उस निर्धन ब्राह्मण को बोला--''घर लौटकर मैं अपनी बेटी का विवाह तुमसे सम्पन्न करुँगा '' लेकिन बूढ़े ब्राह्मण के पुत्रो ने मना कर दिया और बोला-- 'आपने किस के सामने यह बात बोली थी'-- तब बूढ़े ने गोपाल का नाम लिया पुत्रो ने बोला की 'यदि वो साक्षी दे तो हम विवाह सम्पन्न कर सकते है '-- तब वो निर्धन ब्राह्मण वृंदावन गया और रो रोकर कृष्ण को सारी बाते बताई और साक्षी के लिए चलने को बोला भगवान के कहा --'ठीक है पर तुम आगे आगे चलो मैं पीछे पीछे चलता हूँ किन्तु तुम जहाँ भी रुक गए मैं वही रुक जाऊँगा ' | अब निर्धन आगे आगे चलता रहा और भगवान के घुंघरुओं की आवाज़ पीछे पीछे आती रही ,एक जगह जब  समुन्द्र की रेत के कारण घुंघरुओं की आवाज़ बंद हो गई तो निर्धन ब्राह्मण रुक गया और पीछे मुड़कर देखने लगा भगवान वही स्थापित हो गए ब्राह्मण का काम भी हो गया था | भगवान को साक्षी देने यहाँ तक आना पड़ा  इसलिए ये मंदिर साक्षी गोपाल कहलाया | 
बाद में कटक नरेश ने भगवान गोपाल की मूर्ति उठाकर मंदिर में स्थापित की यहाँ राधारानी का भी मंदिर है |     

3 . गुंदीचा मंदिर 
इस मंदिर तक भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा आती है यह मंदिर जनकपुरी के नाम से भी जाना जाता है क्योकि पौराणिक कथाओ के अनुसार इंद्रधुमन राजा के कई बलिदानो के स्वरूप भगवान ने अपने भाई और बहन के साथ उनको दर्शन दिए थे इसलिए रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ यहाँ 9 दिन गुजारते  है और वापस अपने धाम जाते है इसको भगवान का ननिहाल भी कहा जाता है और मौसी का घर भी .....  
 यहाँ हमको एक नन्ही सी ठिगनी मौसी भी मिली | 

4 . बेड़ी हनुमान मंदिर 
यह मंदिर हनुमानजी का है इसको बेड़िया हनुमान जी इसलिए कहते है क्योकि इसकी भी एक रोचक कहानी है ;-- उड़ीसा का यह समुन्द्र तट बहुत ही प्रचंड माना जाता है और इसका पानी हमेशा मंदिर के किनारे बने जगन्नाथ मंदिर में घुस जाता था तो भगवान ने हनुमान जी को आदेश दिया की वो इन प्रचंड लहरों को रोक कर रखे और मंदिर की रक्षा करे ताकि मंदिर में इसका जल प्रवेश न कर सके ,परन्तु हनुमान जी हमेशा ये कार्य छोड़कर अयोध्या भाग जाते थे इसलिए भगवान ने उनको बेड़ियों में जकड़ दिया तभी से इस मंदिर को बेड़िया हनुमान मंदिर कहा जाता है | यह पूरी के मंदिर से पश्चिमी छोर पर बना है |  

हर मंदिर में 5 रु टिकिट थे हम बहुत परेशां हो गए फिर हर मंदिर में जुते  उतारकर जाना मेरे लिए बड़ा कष्टकारी था खेर, अब हम अपने रूम में आ गए और थोड़ा आराम कर शाम को समुन्द्र की और निकल पड़े  .... 

शाम का मौसम सुहाना था 70 रु देकर हम समुन्द्र किनारे चले गए ,काफी भीड़ थी लोग आपस में मस्ती कर रहे थे कुछ लोग पानी की लहरों से खेल रहे  थे ,ऐसा लग रहा था मानो जुहू बीच पर आ गई हूँ लेकिन यहाँ का समुन्द्र सड़क के बहुत पास था जबकि हमारे बॉम्बे में शाम को समुन्द्र काफी दूर  चला जाता है और दूर तक रेत का साम्राज्य रहता है और रेत भी इतनी नहीं होती ,यहाँ रेत में पैर गड़े जा रहे थे चलना भी मुश्किल हो रहा था। .. सब लोग समुन्द्र के पास कुर्सियों पर बैठे थे मैंने एक आदमी से पूछा की कितने की एक कुर्सी होगी तो वो बोला -- 20 रु में एक घंटा बैठने को मिलेगा ; मुझे समुन्द्र को देखने में कोई इंट्रेस नहीं था इसलिए मैं दुकानों की और मुड़ गई ,बहुत ही सुंदर मोतियों की मालाये मिल रही थी और बहुत ही सस्ते में ,मैंने कुछ गले की मोतियों की माला खरीदी | बाकि सीप की वस्तुएं तो बॉम्बे में भी मिलती है |  

आठ बजे तक हम समुन्द्र किनारे घूमते रहे वही छुटपुट खाते रहे बहुत थक गए थे इसलिए  दोबारा ऑटो किया और हमारे हॉलिडे गेस्टहाउस में लौट आये | 

कल कोणार्क टेम्पल जायेगे ---




  
ऑटो में हमारी सवारी 




रास्ते की हरियाली ---- ये हरियाली और ये रास्ता ...






नरेंदर सरोवर मंदिर 




चंदन यात्रा फोटू -- गूगल दादा से 



गुण्डिचा मंदिर और हमारी टीम मेम्बर 






गुण्डिचा मंदिर और धूप  की चांदनी 



छोटी नन्ही मौसी मेरी सखी के साथ गुंडिचा मंदिर 




चाय का भक्षण करते हुए साक्षी मंदिर के पास 



साक्षी मंदिर का सिंह 




बेड़ी हनुमान मंदिर का गेट 



 समुन्द्र भ्रमण === पुरी चौपाटी 




समुन्द्र की भयंकर लहरें 





मैं और पुरी  का समुन्द्र तट 



मारू साहब के साथ  चाय और पुरी  का समुन्द्र तट 



दो जासूस करे महसूस  ---हमारी टीम के दो जग्गा जासूस ! पुरी चौपाटी 



1.  यात्रा जगन्नाथपुरी की -- भाग 1
2.  यात्रा जगन्नाथपुरी  की -- भाग 2
3.  पुरी के अन्य दार्शनिक स्थल-- भाग 3
4.  कोणार्क मंदिर -- भाग 4
5.  भुवनेश्वर और अन्य स्थल -- भाग 5
6 . भुवनेश्वर से बनारस-- भाग 6
7 .  बनारस से बॉम्बे --भाग 7
 







रविवार, 30 अप्रैल 2017

यात्रा जगन्नाथपुरी ( YATRA JAGANNATHPURI --2 )




*यात्रा जगन्नाथपुरी*

भाग--2 



मंदिर के पास जूते और मोबाईल रखने का स्थान 



30 मार्च 2017 

28 मार्च को मेरा जन्मदिन था और इसी  दिन मैं अपनी सहेली और उसके परिवार के साथ जगन्नाथपुरी की यात्रा को निकल पड़ी | 
सुबह 4 बजे पहुंचने  वाली गाड़ी 7 बजे भुवनेश्वर पहुंची वहां से 8 बजे की दूसरी ट्रेन पकड़कर हम 10 बजे पूरी स्टेशन पहुंचे  हमने 100 रु में एक ऑटो किया और अपने बुकिंग गेस्ट हॉउस की और चल दिए यहाँ  दो बेडरूम और एक हॉल था जिसमे फ्रीज़ भी रखा था और किराया 1800 सो रुपये था हम सबने   A C चलाकर थोड़ा विश्राम किया और तैयार हो मस्त गुलफाम बने अपने गेस्टरूम से निकल पड़े। ...अब आगे -----

12 बजे का टाईम था गर्मी और धूप अपने पुरे शबाब पर थी पर हवा ठंडी चल रही थी बाहर आकर हमने एक ऑटो किया किराया 70 रू 
ऑटो वाला हमको मंदिर के पास छोड़कर चला गया मंदिर थोड़ी दूर था और हमको दूर से ही दिखाई दे रहा था ,कहते है इस मंदिर के ऊपर कोई पक्षी नहीं उड़ता और हवाई जहाज भी कभी ऊपर से उड़कर नहीं जाता | हम पैदल  ही मंदिर के पास चल पड़े , चारो और दूर दूर दुकाने बनी थी बीच का रोड काफी चौड़ा था शायद रथयात्रा  के कारण इतना खुला मैदान जैसा रास्ता था खेर, मंदिर के पास पूजा सामग्री की दुकाने थी नजदीक ही 4 -5  गेट बने हुए थे जहाँ पुलिस की भीड़ नजर आ रही थी जहाँ मुस्तैदी से चेकिंग हो रही थी हम भी भीड़ के साथ ही  गेट पर चले गए वहां एक लेडी इंस्पेक्टर ने हमको बताया की आप मोबाईल अंदर  नहीं ले जा सकते , मोबाईल को पास ही काउंटर पर जमा करवाना पड़ेगा हममें से एक आदमी बाहर निकला और सबके मोबाईल काउंटर पर जमा करवा आया 5 रु  एक मोबाईल का किराया लगा साथ ही बेल्ट भी जमा करवानी पड़ी सबकी रसीद लेकर वो दोबारा लाईन में लगा। ..  हमारे पर्स और पानी की बोतल लेकर हम जाँच  प्रक्रिया से गुजरकर मंदिर के अंदर बढ़ चले  | मंदिर के द्वार के सामने ही एक 16 कोणों का स्तम्भ है  जिसे अरुण स्तम्भ कहते है  यह पहले सूर्य मंदिर के सामने था बाद में  1 8 वी सदी में इसे पूरी लाया गया मंदिर के प्रवेश द्वार के पास ही हमको भगवान जगन्नाथ ,सुभद्रा और बलराम की बड़ी बड़ी मूर्तियां नजर आई ये डमी मूर्तियां थी जो विदेशी सैलानियों के लिए थी उनको इन्ही मूर्तियों के दर्शन करने होते है क्योंकि मंदिर में उनका प्रवेश निषेद है | 

हम अंदर आ गए यहाँ कई पुजारी घूम रहे  थे  हमको अंदर आता देख कई पंडित मच्छरों की तरह हमारे आगे पीछे मडराने लगे कोई पूजा अर्चना करवाने का बोल रहा था , कोई गाईड का बोल रहा था। .. मैंने पैसे पूछे तो बोला  कुछ भी दे देना पर मैंने कहा पहले पैसे बताओ तो उसने 100 रु बताये हमने आपस में सलाह की और 50 रु बोले ताकि वो सुनकर चला जाये लेकिन आश्चर्य हुआ जब उसने ओके बोला  और हमको लेकर अंदर की तरफ चल दिया |वैसे पुजारी या गाईड का कोई काम ही नहीं था  खेर,

सीढियाँ चढ़कर हम जिस भाग में आये वो था भोग - भवन यानि भगवान को चढाने वाला भोजन | यहाँ भगवान को 5 बार नाश्ता और 4 बार भोजन का भोग लगता है। .. रसोईघर से भोग भवन को एक अंदरुनी रास्ता  जाता है जहाँ आम पब्लिक का जाना मना है , रसोईघर से भोग भवन तक खाना कांवड में रखकर रसोइयों के सहयोगी लाते है  जिन्हे हम दूर से देखते है | 

भगवान के भोग में 56 पकवान होते है जिसमें दाल ,चावल,चटनी और सब्जीयां प्रमुख होती है खाना बिलकुल वैष्णव तरिके का बनता है जिसमें लहसुन और कांदे का प्रयोग नहीं होता  सिर्फ नारियल और सूखे मेवे ही डाले जाते है | सारा खाना मिटटी के बर्तनो में ही बनता है जिन्हे दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जाता | सारा खाना लकड़ी के चूल्हे पर बनता है  खाना 7 बर्तनो में पकता है जो एक दूसरे के ऊपर रखे होते है  सबसे ऊपर के बर्तन का का खाना सबसे पहले पकता है  फिर नीचे का और अंत में सबसे नीचे के बर्तन का खाना पकता है | 

यहाँ पानी दो कुंडो से आता है जिसे गंगा - जमुना कुंड कहते है ये प्राकृतिक कुंड है और इनमें पानी कभी ख़त्म नहीं होता | कहते है मंदिर का प्रसाद कभी ख़त्म नहीं होता चाहे कितने भी भक्त आ जाये लेकिन ,मंदिर का द्वार बंद होते ही प्रसाद भी ख़त्म हो जाता है 

अब हम भोग भवन से मेन मंदिर की तरफ मुड़ गए हमारे पुजारी गाईड ने हमको प्रसादी भवन के सामने रोक दिया यहाँ से हमको भगवान को चढ़ाने वाला प्रसाद  खरीदना था, प्रसाद का मेनू देखा तो  चक्कर  आ गए इतना महंगा प्रसाद ? खेर, हमने सबसे सस्ता प्रसाद खरीदा सिर्फ 221 रु वाला। .. प्रसाद की रसीद बनने के टाईम वहां बैठे एक मोटे  पेट वाले आदमी ने इतनी बातें पूछी की मैं हैरान हो गई मुझे लगा की कहीं मैं दूसरे देश की जासूस तो नहीं हूँ  यानी की मेरा नाम, पति का नाम , बच्चो के नाम,बहु का नाम, पोते का नाम, दामाद का नाम, गोत्र, जाति, धर्म , ससुर का नाम, पिता का नाम, ससुर का धर्म, पिता का धर्म इत्यादि ||| और ये सारी जानकारी उसने उस रसीद में लिखकर प्रसाद के साथ हमको सोप दी और बोला ये साथ ले जाना गुम हो जाने पर अंदर घुसने नहीं दिया जायेगा उफ्फ्फफ्फ्फ़ !!!!!

अब हम मेन मंदिर की क्यू में लग गए भीड़ ज्यादा नहीं थी हम आराम से मंदिर के अंदर प्रवेश कर गए लेकिन ये क्या भगवान की मूर्ति हमसे 50 फीट दूर थी दिखाई तो दे रही थी पर सुना था की आप अंदर जाकर मूर्ति को स्पर्श कर सकते हो लेकिन यहाँ मंदिर का काम चल रहा था इसलिए किसी को भी अंदर जाने की अनुमति नहीं थी हमने वही बाहर से प्रभु के दर्शन किये और प्रार्थना की  मन में बहुत मलाल था इतनी मुश्किलों से आना हुआ और भगवान के दर्शन नहीं के बराबर हुए खेर,  दूर से ही सही भगवान को देखने का मेरा सालो पुराना सपना पूरा हुआ |

भीड़ ने मुझे जबरजस्ती किनारे पटक दिया ,मैं दोबारा भगवान के दर्शन करने मूर्ति के आगे आ गई अब थोड़ी भीड़ हो गई थी और धक्कामुक्की चल रही थी मेरे हाथो में भाई के और बेटे के दिए पैसे थे जिनको चढ़ाने के लिए मैंने ताला लगा दानपात्र ढूंढा पर वहां कही दिखाई नहीं  दिया अब मेरा ध्यान मूर्ति से अलग होकर नीचे गया तो वहां तीन बड़े -बड़े थाल रखे थे जिनके  पीछे तीन मोटे-मोटे  पुजारी खड़े हुए थे जिनके शरीर पर काफी सोना था और हाथो में नोट पकड़े थे वो लोगो से पैसे छीन रहे थे और अपने सामने पड़े थालो में रख रहे थे मुझे ये देखकर हिंदी फिल्मो के वो  दृश्य याद आ गए जब विलेन के गुर्गे लोगो को मारकर पैसे इकठ्ठा करते है वही स्थिति यहाँ भी थी अंतर् सिर्फ यह था की यहाँ लोग हाथ जोड़कर पैसे दे रहे थे | खेर, मैंने भी अपने हाथ का पैसा जैसे ही एक थाल में डालना चाहा वहां खडे  पुजारी ने मेरा हाथ पकड़ लिया। .. मैं जोर से चिल्लाई--- ''हाथ नहीं पकड़ना ''  वो धबरा गया उसने मेरा हाथ छोड़ दिया हा हा हा हा मैंने एक विजय मुस्कान भगवान की मूर्ति पर डाली नमन किया  और पैसे अपने हाथ से थाल में सरका दिए। ..  

इस मंदिर में भी अन्य मंदिरो की तरह लूटपाट होती है मंदिर के पुजारी लोगो के हाथो से पैसे छीनते है ये देखकर मन बहुत खराब हुआ | भगवान इन लोगो को कोई सजा क्यों नहीं देते |

बाहर निकलकर हम थोड़ी देर सीढ़ियों पर बैठ गए पास ही मंदिर की विशाल बुर्ज दिख रही थी जिसपर झंडा फहरा रहा था कहते है मंदिर की छाया किसी भी टाईम नीचे नहीं दिखती। ..  कुछ देर आराम कर हम  मंदिर के अंदर के अन्य मंदिरो के दर्शन करने चल दिये सभी मंदिरो में लूटखसोट जारी थी पर हमने सभी मंदिरो में सिक्के या 10 रु चढा  कर इतिश्री की | 

इन सब कामो में हमको 2  बज गए अब पेट पूजा की जाय ,रुक्मा मेरी सहेली पहले भी एक बार आ चुकी है इसलिए वो हमको भगवान का भोग खिलाने आनंदबाजार ले गई......  आनंदबाजार में कई दुकाने सजी हुई थी सभी दुकानों पर दाल - भात -सब्जी- चटनी मिल रही थी हमने भी 150  रु में एक छोटा चावल का सकोरा जो पाव कीलो जितना था खरीदा दाल 100 रु की चटनी 50 रु की और दो सब्जियाँ क्रमशं 75 -75 की और स्ट्रा दाल 50 रु की और ली इस तरह कुल  खाना हमको 500 में मिला साथ में पत्तल भी मिली ,हम  आनंद बाजार में बैठने की जगह तलाश करने लगे काफी भीड़ थी और सब जगह दाल चावल बिखरे पड़े थे  मुझे नीचे बैठकर खाना कुछ अजीब लगा ,फिर एक जगह कुछ साफ़ जगह दिखी  वही बैठकर खाना खाया मुझे खाना काफी कम लग रहा था और भूख बहुत तेज लग रही थी लेकिन थोड़ा थोड़ा खाना ही काफी हुआ हमारा पेट इतना भर गया की कुछ पूछो मत ,खाना बचा भी नहीं और खाने में जो आनंद आया की सारा गुस्सा और मलाल बह गया जय जगन्नाथ !!!!

बाद में मैंने एक लड्डू  जो 5 रु का था खाया ,बाकी लोगो ने रबड़ी खाई , खाना खाकर हम मंदिर से बाहर आ गए 3 बज रहे थे अब क्या  किया जाए यही सब सोचने लगे इतने में नजदीक से एक आँटो वाले ने पूछा की कही बाहर घूमने जायेगे और हम मोबाईल वगैरा लेकर उसके ऑटो में बैठकर अन्य मंदिरो की सैर करने निकल पड़े ----

शेष अगले अंक में ----- 
सारे फोटू गूगल से  क्योकि कैमरा नहीं ले जाने दिया  





 गेस्ट हॉउस के बाहर की सजावट 






हमने कुछ इसी तरह का खाना खाया था 
चित्र -- गूगल से 





मंदिर का ध्वज फोटू गूगल से 




पांच रूपये का एक लड्डू और ५ रु का एक मालपुआ 
चित्र -- गूगलबाबा 




प्रशाद का डिब्बा 


मंदिर के पास की सड़क यहाँ से सुदर्शन चक्र सीधा दिख रहा है
 फोटू -- संजय कुमार सिंह 


मंदिर के सामने का दृश्य, यहाँ से भी सुदर्शन चक्र सीधा दिख रहा है 
फोटू -- संजय कुमार सिंह 




मेनगेट के सामने लगा अरुण स्तम्भ 



मंदिर के सामने का दृश्य यहाँ से भी सुदर्शन चक्र सीधा दिख रहा है 
फोटू -- संजय कुमार सिंह 




गेस्ट हॉउस 




1.  यात्रा जगन्नाथपुरी की -- भाग 1
2.  यात्रा जगन्नाथपुरी  की -- भाग 2
3.  पुरी के अन्य दार्शनिक स्थल-- भाग 3
4.  कोणार्क मंदिर -- भाग 4
5.  भुवनेश्वर और अन्य स्थल -- भाग 5
6 . भुवनेश्वर से बनारस-- भाग 6
7 .  बनारस से बॉम्बे --भाग 7