मेरे अरमान.. मेरे सपने..


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शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

525 शिवलिंग के दर्शन"




525 शिवलिंग के दर्शन"
शिवपुरी धाम 













थेगड़ा (शिवपुरी धाम ) कोटा ( राजस्थान)
करीब 37 साल पहले जब मैं राजस्थान के इस शहर कोटा में आई थी तो यह शहर काफी पुराना और नये ज़माने के बीच झूल रहा था , मैं ठहरी इंदौर (MP) शहर की एक चंचल लड़की पर मुझे यहाँ  किसी भी तरह का कोई आदेश धोपा नहीं गया और मैं कुछ समय आराम से निकाल कर करीब 83 में बॉम्बे आ गई । मेरे आने के बाद ही इस मंदिर की स्थापना हुई । इसीकारण ये मंन्दिर देख नहीं पाई ।

कल अचानक इस मंदिर का जिक्र सुना तो रहा नहीं गया।
हम सारा परिवार 4 बजे इस मंदिर को देखने निकल पड़े ,स्टेशन रोड (हमारा घर) से एक बड़ी नगरीय सेवा (

टाटा मैजिक) से हम 9 लॉगो का झुण्ड चल पड़ा।

नयापुरा, बसस्टॉप, तालाब, नहर से होते हुए बोरखेड़ा के पास ही पुराना गाँव है थेगड़ा  जहाँ ये 525 शिवलिंग है हम पहुँच गए  ।

भीड़ अधिक तो नहीं थी पर सुनसान भी नहीं था ,कुछ लोगो की गोट (पिकनिक) चल रही थी जहाँ दाल - बाटी बन रही थी और बाटी की सोंधी - सोंधी खुशबु फिजाओं में फ़ैल रही थी । मन बाटी खाने को मचल रहा था पर दर्शन करने भी जरुरी थे हम आगे बढ़ गए।

सामने ही ढाई टन का पारद का शिवलिंग था सब उस पर जल चढ़ा रहे थे शिवलिंग के नजदीक ही एक विशाल नन्दी भी बना हुआ था । 

कुछ आगे एक बाबा जैसे नागा साधु बैठे थे सब उनके चरणस्पर्श कर रहे थे उनके पास ही हवनकुण्ड बना हुआ था जिसमें अग्नि जल रही थी ये आज के इस मंदिर के संस्थापक थे ।

उनके सामने उनके गुरु का मोम से बना तपस्या में लीन पुतला था जिसके आगे भी अग्नि प्रज्वलित थी। नमस्कार कर आगे बढे तो राईट साईड में कल्पतरु का पेड था कुछ आगे बढे तो पारस पीपल का पेड़ था जो नगण्य ही पाया जाता है  ।आगे चले तो रुद्राक्ष का पेड़ नजर आया जिसपर काफी मात्रा में हरे हरे रुद्राक्ष लगे थे ,वही गिरा एक हरा रुद्राक्ष भी मिझे मिला ।

उससे आगे बढे तो एक अनोखा दृश्य मेरे सामने था सामने त्रिशूल के आकार पर स्थापित अनेक शिवलिंग थे पास ही पानी की टँकिया थी और लोटे थे जिनमें पानी भर श्रद्धालु शिवलिंग पर चढ़ा रहे थे बहुत ही भक्तिपूर्ण मनमोहक दृश्य था...

इतने शिवलिंग देखकर मन प्रफुल्लि होना स्वाभाविक था \ काफी देर तक हम इस भक्तिपूर्ण माहौल में घूमते रहे जब अँधेरा धिर आया तो सब तृप्त हो वापसी के लिए निकल पड़े। ....







संस्थापक देवलोक वासी  गुरु जी की मोम की प्रतिमा 




रुद्राक्ष का पेड़ जो नेपाल में बहुतयात में पाए जाते है 

पीपल पारस भी बहुत विरले ही दीखता है  





कच्चा रुद्राक्ष  



















पारद के  ढाई टन के शिवलिंग 


अभी के नागाबाबा  श्री सनातन  गुरु जी   


पारस  पीपल का पेड़  


 कल्पतरु का पेड़ 


शिवलिंग के विहंगम दृश्य   




शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

मन्दसौर का पशुपतिनाथ मन्दिर


*मन्दसौर का पशुपतिनाथ मन्दिर*




पशुपतिनाथ भगवान 



आज मैँ  आपको अपने बचपन के शहर मंदसौर ( मध्य प्रदेश ) की सैर करवा रही हूँ :---

मैँ मन्दसौर 4 साल रही हूँ, जब मैँ 9th में थी तब इस शहर में मेरे पापा का ट्रांसफर हुआ था .. मेरे पापा पुलिस डिपार्टमेंट  में थे यहाँ के नई आबादी पुलिस स्टेशन पर अधीक्षक के पद पर कार्यरत थे ।  ,वही  पीछे  हमारा छोटा सा सरकारी बंगला था। .....आजकल  यहाँ पुलिस  हेड क्वार्टर बना हुआ है ।
पुलिस विभाग जिला  मन्दसोर संभाग को माल वाला संभाग कहते है क्योकि यहाँ अफीम की खेती होती है और जब अफीम उगती है तो तस्करी भी होती है ।



1974 में (Ncc कैप्टन ) उस समय के S P पुलिस और केंद्रीय नेता के साथ मैं  



 मध्यप्रदेश जिसे भारत का दिल कहते है ,,,,, यह शहर इसी राज्य का जिला है ..... बड़ा शहर है.....  इसको गेहूं और लहसुन की बड़ी मण्डी के रूप में जाना जाता है । यहाँ प्राकृतिक खनिज सम्पदा भी बहुत है सफ़ेद पेन्सिल स्लेट यहाँ की खनिज सम्पदा है  और पेन्सिल  बनने के कारखाने भी काफी  है । 

यहाँ 2 चीजे  बहुतयात में होती है एक तो लहसुन जिसे सफ़ेद सोना  कहते है और दूसरी  अफीम जिसे काला सोना कहते है .....कई लोग सफ़ेद स्लेट को भी सफ़ेद सोना कहते है  ।
अफ़ीम की खेती करने के लिए  सरकार की परमिशन जरूरी होती है ,जब अफ़ीम के पट्टे सरकार देती  थी तब हमारे स्कूल  की  छुटियां होती थी  (पट्टे  देना मतलब अफीम की खेती  करने की परमिशन देना ) क्योकि स्कूलों में ही लोगों  को पट्टे दिए जाते थे  उसके बगैर खेती करना गैर क़ानूनी  था ........ काफी मात्रा में किसान अपनी बैलगाड़ियों से आते थे तब हम छुट्टियों का मजा लेते थे  ।

 जब खेतों में अफ़ीम के फूल आते थे तो तबियत खुश हो जाती थी। ...क्योकि  रंग बिरंगे फूलों से सारे खेत सज जाते थे ....फूल के बाद उसमे फल लगते थे जिन्हे डोडे कहते है ।  जब डोडे  कच्चे ही रहते है तो उनमें ३ या ४ लाईने खींच देते है जिनसे दूध सा निकलता है और  धीरे धीरे वो दूध जम जाता है ,जब अच्छी तरह से दूध जम  जाता है तो डोडे तोड़ लेते है और उस जमे हुए दूध को निकलते है जो अफीम होती है। ....

उन डोडो में भी खसखस भरी होती है जिसे पोस्तादाना कहते है। . कहते है उन डोडो में भी नशा होता है यदि उनको उबालकर प्रयोग किया जाय  तो काफी नाश आता है ।  ,नशा करने वाले इसका प्रयोग करते है वैसे यदि किसी को दस्त लग जाये तो  इनको  उबालकर पिने से ठीक हो जाते है ।
जिला मन्दसौर यहाँ के फेमस मन्दिर से भी प्रसिध्य है । यह  एक शिव मन्दिर है जिसे पशुपतिनाथ मन्दिर कहते है। वैसे नेपाल में भी पशुपतिनाथ (भगवान शंकर ) का मन्दिर है पर उसमें भगवान शिव की चारमुखी मूर्ति है जबकि यहाँ पर अष्टमुखी मूर्ति है जो की लिंग रूप में स्थापित है। ...


यह मंदिर शिवना नाम की नदी के तट पर बसा है। .... यह मंदिर पश्चिममुखी हैं....   इस मन्दिर की ऊंचाई 101 फिट है ... 90 फ़ीट लम्बा और 30  फ़ीट चौड़ा है।  मन्दिर के शिखर पर 100 किलो वजनी सोने  का कलश है जिस पर 51 तोला सोने का पतरा राजमाता श्रीमती विजयाराजे सिंधियां द्वारा 26 जनवरी 1966 को चढ़ाया  गया था.....  


और यह एक मात्र ऐसा मन्दिर है जहाँ सावन के हर  सोमवार को शिवजी का सर्व मनोकामना सिद्धि अभिषेक होता है जो की विश्व के किसी भी शिव मन्दिर में नहीं होता।

ये शिव मूर्ति 7.5 फिट है और इस मूर्तिपर बाल्यावस्था, युवावस्था, अधेड़ावस्था और वृध्यावस्था की झलक दिखलाई देती है। यहाँ हर साल कार्तिक एकादशी से मार्गशीर्ष कृष्ण पंचमी तक  एक  मेले का आयोजन होता है जहाँ नाना  प्रकार के झूले होते है ।लोग दूर दूर से इस मेले का आनन्द उठाने आते है । 

   
इतिहास :--
इस मूर्ति का इतिहास 75 साल पुराना है  बड़ा ही विचित्र है ...कहते है--- एक धोबी को स्वप्न में भगवान शिव ने दर्शन दिए और कहा की -- ''जिस पत्थर पर तू कपडे धोता है  वो मैँ हूँ ! तू यही मेरी प्राण प्रतिष्ठा करवा दे ।"
 तब धोबी ने सबको अपने स्वप्न की बात बताई तो लोगो ने पहले तो विश्वास नहीं किया पर उसके अडिंग विश्वास को देखते हुए 19 जून 1940 को उस पत्थर को सीधा किया तब ये 1500 साल पुरानी प्रतिमा के दर्शन हुये पर किसी ने स्थापित नहीं किया। ....

21 साल तक ये मूर्ति शिवना नदी के किनारे ज्यो की त्यों पड़ी रही फिर 23 नवम्बर 1961 को चैतन्य आश्रम के स्वामी प्रत्याक्षा्नन्द महाराज ने इस मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करवाई और पशुपतिनाथ नामकरण किया। ....

इस मन्दिर की धारणा यह है की हर बारिश में शिवना नदी अपना प्रचण्ड रूप इख़्तियार कर लेती है और भगवान  पशुपतिनाथ के पैरो को छूने मंदिर तक आती है और उस समय शहर में बाढ़  जैसी स्थिति हो जाती है कई बार तो शहर की गलियो में नावे चलने लगती है  लेकिन भगवान पशुपति के पैर छूकर पानी तुरन्त उतर  जाता है ।  उस समय पुलिस वाले  बेचारे रातदिन लगे रहते है । 





॥ जय महाराज पशुपतिनाथ की जय ॥ 


पैरो को छूती शिवना नदी 




मन्दसौर शहर 
++











अफ़ीम के फूल और डोडे 





अफीम के फूल 




अफीम के डोडे  :--इसमें से खसखस निकलती है जिसे पोस्तदाना भी कहते है 



इन डोडो में चीरा लगाते है और जब इनका दूध पक जाता  है तो वो अफ़ीम बनता है




(सभी फोटो गूगल बाबा के सौजन्य से )










गुरुवार, 26 जनवरी 2017

ओरछा की वीरांगनायें { Orchha ki Virangnaye}





* ओरछा  की वीरांगनायें *







24 दिसम्बर 2016  



झांसी से लेकर ओरछा तक का 18 किलो मीटर का दायरा वीरांगनाओं से भरा पड़ा है । एक तरफ झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई है,तो दूसरी तरफ ओरछा की महारानी गनेश कुँवरी है ।जिनकी कहानियां यहाँ क़े जनमानस में बोलकर गाई जाती है ।

और इसी तरह की वीरांगनाएं हमारे ग्रुप में भी है , कुछ ग्रुप में है कुछ ग्रुप के बाहर की है यानि ग्रुप के पतियों की पत्नियां है और पत्नियां भी ऐसी जो पतियों पर भरोसा कर चल पड़ी -----
" जीवन डोर तुम्ही संग बाँधी ...." इस तर्ज पर ।

और ग्रुप भी कौन - सा व्हॉट्सअप का जिसकी कई बातें झूठी ओर फ़ेक होती है ; पर मजाल है जो एक भी बीबी ने अपने शौहर को इस ग्रुप में आने से मना किया हो ,भले ही बेचारियां रात को चुपचाप  तकियों में सिर फँसाये कनखियों से अपने मियां के होठों पर नाचती मुस्कान देख खीझती नहीं, और न ही झल्लाती है बल्कि,  दिल ही दिल में संतुष्ट होती है की ये कोई सौत नहीं बल्कि ग्रुप मेम्बर की आपसी चुहलबाजी चल रही है ; यही विश्वास ,अपनापन, आपसी समझ ही हमारे ग्रुप की जान है ।
मैं दर्शन कौर सबकी बुआ यानि जगत बुआ:--




जब मुझे पता चला की ओरछा में मिलन समारोह का कार्यक्रम बन रहा है तो मैंने कुछ खास ध्यान नहीं दिया ,(अगर दे देती तो सारे कार्यक्रम का आनंद लेती ) क्योकि ग्रुपवासी आपस में मिलते ही रहते है कइयों से तो मैं भी मिल चुकी थी । फिर ये ओरछा है क्या बला !
कहाँ है ?
किधर है ?
और उस पर दिसम्बर की सर्दी ---
ना ! ना!! बाबा ना ना !!!
मेरा निकलना तो असम्भव ही है ।
पर पहली बार जब फैमिली का जिक्र हुआ तो माथा ठनका !

फैमिली के साथ आने की बात का पता चला तो मन थोड़ा व्याकुल हुआ पर मुझे पता था मेरी फैमिली से कोई न आएगा न मुझ अकेली को आने देगा ?

स्थिति बड़ी डांवाडोल थी ,
मन था, पर कहाँ रुकुंगी ? कैसे  मैनेज  करुँगी ????
लेकिन जब व्यवस्था की डोर पांडे जी के हाथ देखी तो थोड़ा मैं चौकी ---" ओ तेररी की....अब भला मैं क्यों पीछे रहती और गिरते पड़ते आख़िरकार पहुँच ही गई ओरछा ...





और फिर हुआ 40- 45 लोगो का मधुर मिलन  # ओरछा_महामिलन_दिल_से #
जिसकी कई स्मृतियां मानस पटल पर अंकित है और रहेगी जिंदगी - भर।

और उन सबमें प्रमुख है वो महिलाये जो इस ग्रुप में न होते हुये भी सिर्फ अपने पतियों के कहने पर ,उन पर विश्वास कर ओरछा आई और इस महा -मिलन को यादगार बनाया ।
तो अब चलते है अपने असली मकसद पर, हुआ यू की एक दिन मुकेश कुमार पांडे जी (जिन्हें मैं शार्ट में पांडे जी कहती हूँ )  ने बोला की --" बुआजी आप ओरछा आई महिलाओं के बारे में कुछ लिखिये ।" पहले तो समझ नहीं आया क्योकि बहुत सीमित समय के लिए सबसे मिली थी कुछ से तो सिर्फ हैलो मात्र ही हुई थी और इस समागम को अधूरा छोड़ भाग भी गई थी फिर सोचा विचार बढियां है क्यों न प्रयास किया जाये फिर मदद तो इनके पतिदेवो से मिल ही जायेगी☺
तो ओरछा आई हुई महिलाओं का परिचय मेरी नजर से ...

ओरछा महा-मिलान की पहली मंथली ऐनिवर्सरी के अवसर पर .....
ओरछा आने से पहले मैं कुछ ही लोगो से मिली थी इतने मेम्बर्स से एक ही दिन एक ही छत के नीचे मिलना अपने आपमें काफी आश्चर्यजनक था। इस ग्रुप के एडमिन मुकेश भालसे को मैं पहले नहीं जानती थी इस ग्रुप में आने के बाद ही मुकेश को जाना फिर पता चला की इंदौर के नजदीक ही रहते है (अब तो इंदौर ही आ गए ) तो थोड़ा अच्छा लगा उन्ही के जरिये कविता के बारे में पता चला...ओर फिर बातें हुई ।
तो सबसे पहले जिक्र करुँगी हमारे एडमिन मुकेश भालसे साहेब की शोख, चंचल ,खूबसूरत ग्रुप मेंबर ---
कविता भालसे का :---






कविता के पीछे ओरछा की फ़ेमस छतरियां 

कविता को काफी टाईम से जानती थी और मेरे इकलौते जन्म स्थान की होने के कारण थोड़ा ट्चिंग ज्यादा था । फेसबुक पर भी कमेंट चलते रहते थे इसलिए मिलने की इच्छुक थी ,सोचा था कभी इंदौर जाऊंगी तो जरूर मिलूँगी पर सयोंग ओरछा में बन गया ओर जैसा सोचा था उससे काफी अधिक ही मिलनसार कविता को पाया । हंसमुख ,सौम्य,चंचल और मेरी ही तरह फ़ोटू खींचवाने की दीवानी हमारी कवितारानी जिनके पतिदेव मुकेश जी हमारे ग्रुप एडमिन उनकी हर अदा को अपने कैमरे में कैद करने कोे तत्पर ।हमारे ग्रुप के लव बर्ड्स ।
"हम बने तुम बने इक दूजे के लिये"
एकदम फिट गीत ☺☺☺☺


और अब आते है हमारे ग्रुप के दूसरे ग्रुप एडमिन संजय कौशिक की हमसफ़र नीलम कौशिक की तरफ----
नीलम कौशिक :----





संजय से मेरी पहली मुलाकात बॉम्बे में ही उनकी लाई मशहूर घेवर के साथ हुई थी, मुलाकात मीठी तो थी पर सीमित थी। लेकिन ग्रुप में बातचीत हंसीमजाक के जरिये काफी पहचान हो गई थी । सुलझे व्यक्तित्व के मालिक संजय भी तुरन्त उत्तेजित नहीं होते हमेशा शांत होकर ही ग्रुप के किसी मसले का फैसला करते है और हम लोग हमेशा उनको एक वाक्य से खुश करते रहते है -- "ऐसे ही कोई एडमिन नहीं बन जाता --'"

ओरछा में नीलम से मेरी पहली मुलाकात थी । धीर,गम्भीर ,सिम्पल नीलम अपने नाम के अनुसार ही नई थी मतलब नई नवेली ! जब हंसती थी तो खुलकर अपनापन झलकता था ,बेतवा माँ की गोद में जब हल्की हल्की ठंडी बुहार चल रही थी तब कुछ पल साथ बैठने और फ़ोटू खिंचने का मौका मिला था तब लगा ही नहीं की आज पहली बार मिल रहे है वो पल अपने आप में सम्पूर्ण था ।और जब नीलम ने कहा कि वो खुद भी कामकाजी महिला है और न्यायालय जैसी संस्था से जुडी है तो और भी गर्व महसूस हुआ की हमारा ग्रुप अपने आपमें कितना जीनियस है जहाँ एक पत्नी अपने पति के आभासी दोस्तों से मिलने चल दी ...जहाँ मेरे जैसी खूबसूरत लेडी भी थी हा हा हा हा हा
"धन्य है भारत की नारी"।

और अब आते है हमारे तीसरे एडमिन रीतेश गुप्ता के पास, जो मोहब्बत के शहर आगरा से ताल्लुक रखते हैे और अपनी खूबसूरत पत्नी  रश्मी गुप्ता के साथ ओरछा आये थे।
रश्मी गुप्ता :---





रीतेश से तो मैं कई सालों से परिचित थी और काफी अच्छी तरह से जानती भी थी इस ग्रुप में रीतेश ने ही मुझे जोड़ा था और मेरा नाम बुआ फेमस करने वाला भी रीतेश ही है ।

हम दोनों काफी टाईम से एक दूसरे को ब्लॉगिंग के जरिये जानते थे क्योकि हम दोनों ही यात्रा ब्लॉग लिखते थे और सफर के दौरान होने वाले अपने अनुभव एक दूसरे को सुनाते भी थे और सुनते भी थे  ।अपनी आगामी यात्रा के बारे में डिसकस भी करते थे --' मुझे याद है अपनी नैनीताल वाली यात्रा में मुझसे "पाताल भुवनेश्वर" छूट गया था और मैंने रिक्वेस्ट की थी की तुम जरूर जाना रीतेश और मुझे बताना ।वहां रीतेश गए भी और मुझे अनुभव बताये भी । हम फेसबुक पर भी कई स्थानों के बारे में आपस में बातचीत करते रहते थे पर असली साक्षात्कार स्थल बना ओरछा ।

यहाँ रीतेश की पत्नी रश्मी से भी मुलाकात हुई नाजुक- सी दुबली पतली रश्मी एक नजर में ही अपना ध्यान खींचने वाली शख्सियत है ,रीतेश के ब्लॉग में उनके साथ कई यात्रा तस्वीरों में रश्मी को देखा था इसलिए जब ओरछा पहुंची तो हाल में निगाह दौड़ाते वक्त रश्मी को पहचानना कोई बड़ा काम नहीं था , तुरन्त पहचान लिया; और रश्मी भी अपनी आँखों में आदर लिए मिलने आ पहुंची थी ,तब कोई अजनबीपन तो लगा ही नहीं ऐसा लगा मानो बहुत सालो से जानपहचान है। सबकुछ अपना अपना सा लगा था ।और वोही कशिश आज भी हम सबके दिलों में है ।

चलिए गाडी बढ़ाते है और पहुँच जाते है छतीसगढ़ यानी प्रकाश यादव के पास जो अपनी सहचर्या नयना के साथ विराजमान थे ओरछा की उस पावन सरज़मी पर,
नयना यादव :---



प्रकाश से मेरा पहले से कोई परिचय नहीं था सिर्फ ललित के मुंह से एक दो बार नाम सुना था वो भी भूटान यात्रा की बुकिंग के टाईम  पर; पर किसी कारण वश मुझे भूटान का कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा ,प्रकाश हमारे ग्रुप में है मुझे तो यह भी मालूम नहीं था बहुत कम ग्रुप पर आते थे और कम बाते करते थे शायद इसलिए कम जानती थी ,जिस दिन ओरछा आने का हुआ तो ग्रुप पर प्रकाश अपनी फैमिली के साथ आ रहे थे ये मालूम पड़ा फिर उनका फ़ोटू भी देखा अपनी पत्नी और दो बेटियों के साथ तब पता चला था ।

प्रकाश से और नयना से मेरी मुलाकात ओरछा में ही हुई । अपनी चमकती आँखों से मुस्कुराती नयना मुझे हाल में ही दिखाई दी थी पर मैंने उनको पहचाना नहीं था शाम को जब भगवान राजा राम की आरती मैं गये तब परिचय हुआ। और रात को जब परिचय -पार्टी चल रही थी तब पता चला की असल में घुमक्कड़ी ग्रुप तो नयना को ज्वॉइन करना था फ़ालतू में प्रकाश फँस गए  क्योकि असली घुमक्कड़ तो वही थी जिन्होंने अपने मजबूत इरादों से प्रकाश  को भी घुमक्कड़ बना दिया ।

वैसे, पत्नी की बातों में आने वाले पहले शख्स है प्रकाश  वरना कौन घर का सुख छोड़कर कठिन राह अपनाता है घुमक्कड़ी की ☺वैसे उम्दा फोटुग्राफर है प्रकाश।

और अब मिलते है दिल्ली गाज़ियाबाद से आये एक और घुमक्कड़ परिवार से ये है सचिन त्यागी । सचिन हमारे ग्रुप के पुराने मेम्बर है पर उनकी पत्नी आभा ग्रुप की मेम्बर नहीं है ।
आभा त्यागी :-




सचिन से भी मेरी मुलाकात ग्रुप में ही हुई थी उससे पहले मैं उसको नहीं पहचानती थी । हमेशा ग्रुप में सक्रिय रहना और पॉइंट की बातें करना सचिन की आदत है ,ग्रुप मेंबर के साथ सचिन ने  ट्रेकिंग भी काफी की है पर हमारी ये पहली ही मुलाकात थी , सचिन एक अच्छे स्वभाव के मालिक है , आभा से मेरी पहले कोई पहचान नहीं थी शर्मीली, अपने आप में खोई हुई मासूम सी मुस्कान लिए जब सचिन ने परिचय करवाया तो अच्छा लगा , जो पत्नियां पति के कंधे से कंधा मिलाकर साथ देती है मुझे वो पसन्द आती है फिर आभा तो सचिन की सारथी भी थी मतलब ये की  दोनों अपनी कार से ही ओरछा आये थे और वापसी भी उनकी कार से ही थी जब  मेरे  कहने पर की ---' इतना लंबा सफर कार से करना क्या सचिन को कोई परेशानी नहीं हुई ?' तो मुस्कुराते हुए आभा ने कहा--'' आधी दूरी तो मैंने भी नापी है उनके साथ बुआ जी '' सुनकर अच्छा लगा था । अगर दोनों को कार चलाना आता है फिर तो फतेह समझो ...और जब दोनों घुमक्कड़ हो तो क्या कहने ,सोने पर सुहागा ।
मेरे ही साथ वो लोग भी ओरछा से जल्दी ही निकल गए थे क्योकि उन लोगो को  ताजमहल के दीदार जो करने थे।

"बुआ प्रनाम " एक लंबी सी छरछरी सी काया मेरे कदमो में लिपटी हुई थी तो अचानक मैंने सोचा ये कौन है ? शक्ल कुछ जानी पहचानी लगी अरे, ये तो अपनी हेमा है ....


हेमा सिंग ;---








हेमा से भी मेरा यह पहला परिचय था । उसने अभी नया ही हमारा ग्रुप ज्वाइन किया है पर लगता ही नहीं की हेमा ने अभी हाल ही में हमारा ग्रुप ज्वॉइन किया है वो हमारे ग्रुप की सक्रिय सदस्या है । हेमा से ग्रुप में काफी बाते होती रहती है वो अपनी बेटी और बेटे के साथ रांची (झारखंड )से आई थी , हंसमुख हेमा ग्रुप में भी सबको अपनी बातों से खुश करती रहती है और यहाँ अपनी शैतान बेटी के पीछे भागती हुई नजर आई । बार-बार हेमा का ये कहना --' बुआजी आप रांची जरूर आना' मन को छू गया।
और अब सबसे अंत में हमारे मेजमान पांडे जी के गृहमंत्रालय का ज़िक्र न हो तो बात अधूरी ही रह जायेगी ।
निभा पांडे :--







निभा पांडे हमारे मुकेश पांडे जी की खूबसूत बिलौरी आँखों वाली धर्मपत्नी है जो थोड़ी शर्मीली और अपने आप में रहने वाली महिला है पर जब हम सब महिला वर्ग उनसे मिलने उनके सरकारी आवास पर गए तो लगा ही नहीं की वो आज से पहले अज़नबी थी ,बहुत आत्मीयता से सबसे मिली अपने न आने का सबब भी बताया और सबसे न मिलने के लिये माफ़ी भी मांगी । निभा सबको नाम से जानती थी और मुझे तो स्पेशल ही बुआ के नाम से सम्बोधित किया । मतलब ये साफ है की पर्दे क़े पीछे भी वो सक्रिय थी ।और पांडे जी की हर बात से सहमत भी ;

 बहुत छोटा और सीमित मिलन था फिर मिलने का वादा कर हम पांडेजी के घर से निकले क्योकि आज मुझे बॉम्बे के लिए निकलना था और सभी को जंगल में मंगल मनाने जाना था।
इस तरह ये ओरछा महामिलन मेरी तरफ से समापन हुआ क्योकि आज मुझे जाना था मजबूरी थी,  फिर भी अगली  ट्रिप में मिलने का वादा कर सब महिलावर्ग आपस में बिदा हुआ।

सारी महिला मंडल ओरछा मे




मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

"ओरछा की कहानी मेरी जुबानी"



"ओरछा की कहानी मेरी जुबानी"
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23 दिसम्बर 2016 


दिसम्बर की एक खूबसूरत शाम जब हम ओरछा के लिए निकले | ओरछा मध्यप्रदेश का एक ऐतिहासिक शहर है जो की झाँसी से18 किलोमीटर की दुरी पर है जिसे आप  आधे घण्टे में पार कर सकते है  ।यहाँ पहुंचने के लिए सबसे निकटतम हवाईअड्डा है --खजुराहों  जो  मात्रा 163 किलोमीटर पड़ता है ।  झाँसी शहर किसी परिचय का मोहताज नहीं है हम सबने सुभद्रा कुमारी चौहान की फेमस पँक्तिया सुनी है ;-----
''   बुन्देलों हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी । ''


भारतीय इतिहास में ओरछा का अपना ही महत्व है । 

इतिहास 

ओरछा का इतिहास 8 वीं शताब्दी से शुरू होता है पंचम बुंदेला के वंशज सम्राट रूद्रदेव ने ओरछा शहर की स्थापना की  । यहाँ का भव्य किला बनवाया । इस शहर की सबसे रोचक कहानी यहाँ के मन्दिर की है । यहाँ के राजा मधुकर शाह 1554 ई. में ओरछा की गद्दी पर बैठे वो कृष्ण भक्त थे पर उनकी रानी गनेश कुँवर राम भक्त थी ,जब मधुकर शाह ने पत्नी को ब्रज चलने को कहा तो वो  बोली हम अवध चलेगे इस पर राजा क्रोधित हुए और उन्होंने रानी को आदेश दिया की जब तक वो अवध से राम को लेकर नहीं आएगी तब तक ओरछा न लौटे । रानी भी क्षत्रिय थी वचन दे दिया की रामलल्ला के साथ ही  लौटेगी । अवध पहुंचकर जब गणेश कुँवरी ने श्री राम को ओरछा चलने को कहा तो उन्होंने साफ मना कर दिया तब निराश हो रानी ने सरयू के तट पर  धोर तपस्या की जिससे प्रसन्न हो राम ओरछा चलने को तैयार हो गए  । लेकिन उनकी एक शर्त थी की --'' मैं चलूँगा पर  पहली बार तुम मुझे जहाँ स्थापित करोगी मैं वही रहूँगा ।'' रानी ने हा कर दी अब,  रानी श्री राम को लेकर ओरछा पहुंची तो राजा बहुत प्रसन्न हुए  लेकिन उस समय मन्दिर बना नहीं था इसलिए मूर्ति को रानी ने अपने रनिवास में ही स्थापित कर दिया ,जब मन्दिर का निर्माण हुआ और उसको चतर्भुज मन्दिर का नाम दिया ,निश्चित तारीख को जब मूर्ति स्थापित करने का टाईम आया तो मूर्ति अपने स्थान से हिली भी नहीं हारकर मूर्ति को रनिवास में ही रहने दिया और उसी को राम राजा मन्दिर का नाम दिया । इसी मन्दिर के चारो और शहर बसा है और हर साल रामनवमी यहाँ बड़े धूमधाम से मनाते है ।   

यहाँ के अन्य ऐतिहासिक जगह है ;---

1 जहाँगीरमहल    
2 राम राजा मन्दिर 
3  चतुर्भुज मन्दिर  
4े राय प्रवीण मन्दिर 
5  लक्ष्मीनारायण मन्दिर
6 फूलबाग 
7 सुंदर महल । 

यहाँ दो मीनारे ऐसी है जिन्हें कहते है की भादो के महीने में आपस में जुड़ जाती है । 

अब हमारी कहानी 

मेरा एक व्हाट्सअप ग्रुप है जिसका नाम है ---''घुमक्कड़ी.... दिल से '' जिसे घुमक्कड़ी करने वाले लोगो ने बनाया है जिसमें यात्रा ब्लॉक लिखने वाले लोग भी शामिल है और इसी कारण  मैं भी इस ग्रुप की सक्रिय सदस्य हूँ;उमर में सबसे बड़ी होने के कारण सभी मुझे  प्यार से बुआ कहते है और बहुत स्नेह रखते है ।   सभी घुमक्कड़ समय समय पर मिलते रहते है एक दिन विनोदगुप्ता  ने बातो बातो में एक मिलन की रुपरेखा बनाई  और सबने इस पर अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी  ,अब जाया कहाँ जाये ?इसको सुलझाया ओरछा निवासी   मुकेश कुमार पांडे'चन्दन'  जी ने जो वहां आबकारी अधीक्षक के पद पर असीन है । उन्होंने ही सारे इंतजाम किये ।  
और इसतरह हमारा महामिलन ओरछा में हुआ । 
ओरछा आना मेरा 99% नहीं था क्योंकि मुझे अच्छी तरह से मालूम था कि मेरे परिवार वाले मुझे एक अंजान शहर में मेरी शारीरिक प्राब्लम की वजय से अकेले कभी नहीं जाने देगे । इसलिए मैंने भी ओरछा आना सीरियस नहीं लिया , न तो रिजर्वेशन  करवाया और न घर में जिक्र किया ।पर जब सभी प्यार से बहुत जोर देने लगे तो मैंने घर पर बात की और रिजल्ट वही ढाक के तीन पात ..... 

फिर एक दिन विनोद और प्रतिक जो बॉम्बे ही रहते है घर आये और उन्होंने सबको दिलासा दिलाया कि हम अपनी जुम्मेदारी पर ले जायेगे बुआ कोे ; इजाजत तो मिल गई पर सन्नी बेटे को फिर भी आशंका थी की मुझे कौन संभालेगा ।
खेर, तैयारी तो कर ली पर टिकिट इन दोनों की कम्फ़र्म नहीं थी ,मामला फिर टांय- टांय -फिसस्स ... सो, एक दिन पहले तत्काल में भी संजय कौशिक जो हमारे एडमिन है, के थ्रू टिकिट करवाई पर यहाँ भी 28 वेटिंग् आया तो मेरी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया वो भी बर्फ वाला ।

मैंने गुस्से में बेग से सामान निकाल कर रख दिया अब तो श्योर था कि नहीं जाना हैं । संजय को बोला की टिकिट केंसिल करवा दो अब आना मुश्किल है ।

उधर उसी दिन मिस्टर का भी एक छोटा सा एक्सीडेंट हो गया और रही सही उम्मीदों पर पानी फेरने का काम हुआ। लेकिन ग्रुप का इतना आग्रह था कि मन मेरा तो 100% जाने का था।पर टिकिट कम्फ़र्म हो और सीट हो तो मिस्टर भी ना नहीं कहेंगे ,ऐसा मुझे विश्वास था।

और फिर एक हल्की सी किरण नजर आई जब 4.35 को पता चला की एक सीट कम्फ़र्म हो गई ,अब मन में आस की डोर बन्ध गई थी, प्रतिक ने भी उस ड़ोर की गांठ को कस दिया की आपको हर हालत में चलना ही है ,उधर हमारे एडमिन संजय कौशिक और किशन बाहेती  भी डटे हुए थे ।  डरते -डरते मिस्टर से पूछा तो उन्होंने एकदम  मना कर दिया की इतनी ठंडी में क्या करेगी ।
अब मेरी असमर्थता  आंसुओ में ढल गई ,और ये देखकर उनका भी दिल पसीज गया( महिलाओ का आखरी हथियार ) और मेरी जीत हुई ....

फिर क्या था 5 बज रहे थे और दादर से 7.55 की पंजाब मेल पकड़नी थी ,घर से दादर पहुँचने का टाईम 2 घण्टे तो फिक्स था और 15 मिनट तैयार होने में और 15 मिनट स्टेशन पहुँचने में लगना था ,फटाफट बेग जमाया स्वेटर और कम्बल लिए कपड़े पहने और 5:30 को घर से निकल गई ,6.00बजे की लोकल में बैठकर ऐसा लग रहा था मानो एक जंग तो जीत ली  । इतने कम टाईम में घर से निकलना जिंदगी का ये मेरा पहला अनुभव था ।

अब, दूसरी जंग थी मेरा टिकिट ,जो निकाला ही नहीं गया था बगैर टिकिट के ट्रेन में सवार हो गई , सोचा की रेल्वे कर्मचारी होने का लाभ उठाया जाय और टी टी पतिदेव के नाम का इस्तेमाल कर के ये जंग भी फतेह कर ली। .....

रास्ते में विनोद की लाई आलू -मटर की टेस्टी पूरी खाई और उसकी बकबक सुनते रहे , खंडवा से हमारे दो और साथी आ मिले  मनोज धारकर और अलोक अब हम कुल 5 लोग हो गए  सभी दोपहर 2 . 30  को झांसी स्टेशन उतर गए

झांसी में पांडे जी ने कार भेजी और साथ ही सूरज को भी जिसको पहली बार देखा, देखते ही सूरज ने पैर छूकर सम्मान दिया। ..  रास्ता सूरज की बातों में निकल गया और जैसे ही हाल में कदम रखा तो जिंदगी में ऐसा  सुनहरा पल कभी नहीं देखा ,चारो और से "बुआ - बुआ" का शोर मानो कोई VIP आ गया हो । सारे चेहरे जाने-पहचाने ख़ुशी की इतनी इन्तहां थी की कौन गले मिल रहा है और कौन पैर छू रहा है कुछ ध्यान ही नहीं , पहली बार मिल रही हूँ ऐसा एहसास तो था ही नहीं ,भतीजे तो भतीजे, उनकी पत्नियां और बच्चे भी गले मिल रहे थे और पैर छू रहे थे। यह दृश्य जिंदगी में कभी नहीं भूल सकती।और शायद जिंदगी में ये पल कभी आएगा भी नहीं ।

बच्चो की उमर के भतीजो से बुआ सुनना और अपने हम उमर रमेश जी से भी बुआ सुनना अपने आप में कम रोमांचक नहीं है ..
थैंक्स प्रतिक,विनोद, मनोज ,आलोक जिनके साथ सफर आराम से और मजे से गुजरा ।

संजय,किशन,रितेश ,बीनू और पांडे जी जिनके प्रयास और प्रोत्साहन की बदौलत मैं ओरछा आई और इस मीटिंग को अटेन्ड किया ।

मुकेश भालसे  और उनकी पत्नी कविता भालसे , हेमा,संजय कौशिक और उनकी पत्नी नीलम , रितेश और उनकी पत्नी रश्मी , प्रकाशजी और उनकी पत्नी नयना , सचिन त्यागी और उनकी पत्नी ,पांडेजी और उनकी पत्नी इन सबका सहयोग भी काफी रहा , महिलावर्ग में मैं सिर्फ कविता से परिचित थी लेकिन सभी बहुओं ने मुझे आदर और सम्मान दिया । इनका तहे दिल से धन्यवाद करती हूँ।

ग्रुप के वो भतीजे जिनसे पहली बार मिली तो लगा ही नहीं की आज पहली बार मिल रही हूँ ,जैसे ही शक्ल देखती तो नाम भूल जाती थी पर तुरंत याद आ जाता था कि ---"अरे ये तो वो है?

अंत मैं मुकेश पांडे जी का सबसे ज्यादा सहयोग और आग्रह के लिए धन्यवाद जिनके प्रयासों के तहत हम सब एक साथ इतने लोग जुड़े और मिले और इस मिलन को यादगार बनाया।
दो दिवसीय इस प्रोग्राम का उद्देश्य सिर्फ मिलना मिलाना ही नहीं था बल्कि वहां पेड़ भी लगाये गए और ओरछा का इतिहास जानने का मौका भी मिला। इतिहास की धरोहर ओरछा का किला , माँ समान बेतवा नदी और राजा राम मंदिर के दर्शन भी हुए जहाँ आज भी रामलल्ला को सरकारी ऑनर मिलता है ।देखकर बहुत ख़ुशी हुई ,
आरती के बाद यहाँ की ऐतिहासिक स्टोरी 'लाईट ऐंड साउंड' के माध्यम से देखना और सुनना काफी सुखद रहा । ऐसा महसूस हो रहा था मानो हम भी बुंदेलों के समय में पहुँच गए हो और चारों और से आवाजे आ रही हो की -- "बुंदेलों के मुख से हमने सुनी कहानी थी -----------"
वापसी में निकलते हुए कई यादगार पल थे , बिछोह का गम था, फिर मिलने का वादा था और एक और सेल्फी की भूख थी और याद था सबका स्नेह जो मैं साथ लेकर जा रहे थी  ...
जय माँ बेतवा और जय राजा राम की ।

अन्य मिलने वाले ;---
1 सचिन जांगड़ा 
2 नरेश सहगल 
3 कमल सिंह 
4 पंकज जी 
5 रोमेशजी  
6 प्रकाश यादव जी 
7 डॉ प्रदीप त्यागी जी 
8 डॉ सुमित शर्मा जी 
9 हेमा जी 
10 सुशांत सिंधल जी 
11 संजय कुमार सिंह जी 
12 रूपेश कुमार 
13 रामदयाल 
14 रजत 
15 नटवर लाल भार्गव 
16 हरेन्द्र  
17 सूरज मिश्रा
18 संदीप मन्ना 
सबका हार्दिक स्वागत है इस महामिलन के लिए अभिनन्दन । 

झाँसी पहुंच गए ,प्रतिक ,विनोद ,मनोज ,आलोक और मैं 


खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी 

प्रतिक, मैं ,कविता,और मनोज 

 ओरछा की सुबह 

और ये वो अर्जुन का पेड़ है जहाँ 'कैटरीना' ने स्लाइस कोल्ड ड्रिंक  की मॉडलिंग की थी ।  मुझे भी vip फीलिंग हुई थी क्योकि देश के होनहार और हमारे ग्रुप के कैमरामैनों  ने अपने अपने कैमरों से मेरा फोटू खीचा था । 





 नटवर,कमल,मैं ,बीनू और पाण्डे जी 


 गरमा गर्म नाश्ता 


 पंकज जी की एक अदा  सेल्फी हो जाये रे 

एडमिनो की मीटिंग 


 बच्चो ने क्रिसमस भी धूमधाम से मनाया   
भतीजो के बीच बुआ 



प्रकाश यादव के कैमरे से ओरछा  

जंगल में मंगल दाल बाटी चूरमा के साथ  
मेरे पीछे भव्य ओरछा 


घुमक्कड़ी जिंदाबाद 

झाँसी स्टेशन पर वापसी 

 पीछे की दो मीनार जो आपस में जुड़ जाती है 

क्या बात 


राजाराम मन्दिर के बाहर दो तोपे 

प्रतिक, मन्ना,मुकेश और आलोक दूसरे गृह के प्राणी  


ओरछा की खूबसूरत गालिया 

ओरछा का लक्ष्मीनारायण मन्दिर 


अनिमेष बाबू , महिला वर्ग को आश्चर्य से देखते हुए 



सूर्यास्त 


राजाराम मन्दिर 


सचिन जांगड़ा 

लाईट ऐंड साउंड शो 


इंजॉय 
महिला वर्ग भी पीछे क्यों रहे   

माँ बेतवा के ग्रेनाइड पत्थरो पर विराजत साधु महाराज 

चतुर्भुज मंदिर की अट्टालिकाएं 


ये गालिया ये चोबारे यहाँ आएंगे दोबारे 




विनोद की मस्ती और  नोका विहार 



और अंत में हमारे ग्रुप के होनहार फोटूग्राफर मित्र सुशांत सिंघल जी अपनी ही मस्ती में मस्त