मेरे अरमान.. मेरे सपने..


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शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2020

पिता की याद में

           

★पिता की याद में★

मुझे वो कंधा आज याद आया।
जब पिता का साथ था घना साया।

अपने आंगन की...
मैं फुदकती हुई चिरैया थी!
दाना चुगती हुई गौरैया थी!
आये जो पंख,उड़ना मुझको भाया,
पिता ने ही मुझे उड़ना सिखाया!
मुझे वो कंधा आज  याद आया!!

मुझे एक गुड़िया ला के देना,
उसका नाम 'अप्पू' बताना,
ओर मेरा इसी नाम से फ़ेमस हो जाना,
हमेशा उनका कहना–
"मेरी बेटी मेरे सिर माथे पर रहना!"
देखा एक घर और मुझे गुड्डे संग सजाया,
मुझे वो कंधा आज याद आया !!

मेरी दुनिया में पापा 😢
तुम न लौट कर आये...
जियूँ कैसे
कोई मुझको बताये!
मेरी किस्मत ने ऐसा धोखा क्यूँ खाया!
मुझे वो कंधा आज क्यूं याद आया!!
मुझे वो कन्धा आज क्यूँ याद आया🙏

मेरे पिता को सादर नमन👏

7मार्च 1982

गुरुवार, 22 अक्तूबर 2020

कर्नाटक-डायरी#2


#मैसूर -यात्रा
#भाग=2
#कर्नाटका
#11मार्च 2018

मैसूर यात्रा मेरी एक पंथ दो कॉज की तरह थी...ये एक घरेलू यात्रा थी.. मतलब मैसूर में मेरी बड़ी बेटी और दामाद रहते हैं तो यू हुआ कि बेटी से मिलना भी हो गया और अपनी घुमक्कड़ी भी हो गई।😊
कल ही पहुँचकर मैंने मैसूर पैलेस की लाइटिंग ओर चामुण्डायै मन्दिर देखा अब आगे:---

 आज हमने दोपहर का खाना खाया और घूमने के लिए तैयार हो गए, बेटी ओर दामाद अपने अपने ऑफिस गए हुए थे ओर हमारे पास शाम तक टाईम ही टाईम था...ऑफिस से ही बेटी ने ओला बुक कर दी और हम चल दिया मैसूर की सड़कें नापने के लिए...😊

आज हम रेल - संग्रहालय यानी कि रेल्वे म्यूजियम देखने जा रहे है... रेल संग्रहालय कृष्णराज सागर रोड पर स्थित सीएफटी रिसर्च इंस्टीट्यूट के सामने है। मैसूर के रेलवे संग्रहालय को  मैसूर के संग्रहालयों में काफ़ी महत्त्वपूर्ण स्थान  हासिल है।

 मैसूर के रेल संग्रहालय की स्थापना 1979 में हुई थी यानी की मेरी शादी के समय😊 मेरी शादी भी 1979 में एक रेल्वे कर्मचारी से ही हुई हैं😂😂😂

यह म्यूजियम सुबह 10 बजे से 1 बजे तक और शाम को 3 से 5 बजे तक खुला रहता हैं। सोमवार को ये बन्द रहता हैं। इस संग्रहालय में मैसूर स्टेट (रेल्वे) की उन चलत ट्रेनों को प्रदर्शित किया गया है जो 1881 से 1951 के बीच  चलती थी।
 
इतिहास:--
इस म्यूजियम की  स्थापना वर्ष 1979 में हुई थी.. इसमें वर्ष 1881 से 1951 तक संचालित मैसूर राज्य के रेल्वे के दिनों की यादें  सँजोई हुई हैं। इसमें रखी गई यादगार वस्तुएं कभी मैसूर राजमहल की शान हुआ करती थीं। इन ट्रेनों को देखकर मैसूर राज्य के स्वर्णिम युग की याद ताजा होती हैं। इसमें 19 वीं शताब्दी के समय से लेकर अब तक की रेलवे के विकास की जानकारी भी मिलती है। लोकोमोटिव वाष्प इंजनों यानी भाप से चलने वाली ट्रेन के भी कई मॉडल इस संग्रहालय की शान हैं। यहां राजा का राजसी सेलून भी हैं जिससे राजा ओर उनकी फैमिली सफर करते थे।

हमको ओला वाले ने  रोड पर ही उतार दिया...देखा सामने ही रेल संग्रहालय का बोर्ड लगा  हुआ था, हम अंदर चल दिये..सामने ही टिकिट खिड़की थी, मैं जब टिकिट लेने खिड़की पर पहुंची तो वहां एक सूचना पर मेरी निगाह पड़ी उसमें लिखा था कि "रेल्वे कर्मचारियों को यहां टिकिट लेने की आवश्यकता नही हैं।"😊हुरर्रेर्रर्रर

अब हम मिस्टर का आई कार्ड खिड़की पर दिखाकर शान से अंदर आ गए।अंदर एक से बढ़कर एक इंजन करीने से खुले मैदान में थोड़े-थोड़े फ़ासले  पर खड़े हुए थे...सब जगह पटरियों का माया जाल बिछा हुआ था जिन पर एक एक इंजन खड़ा हुआ था। यहाँ इंजन के अलावा डिंब्बे भी थे, ओर पूरी गाड़ी भी थी..एक जगह तो बहुत ही छोटू इंजन खड़ा हुआ था। वो मुझे बहुत ही प्यारा लगा😊
इसके अलावा एक लाल रंग की वेन भी खड़ी थी नजदीक जाकर देखा तो वो भी एक ट्रेन ही थी।

हम धीरे- धीरे चलते हुए फोटू खींचते हुए आगे बढ़ते रहे ।यहां काफी सुंदर बगीचा भी बना था और बैठने के लिए हर जगह बेंचे लगी हुई थी। माहौल बिल्कुल स्टेशन जैसा था ।क्रॉस करती पटरियां ,सिंग्नल, गेट ओर भी वो वस्तुएं जो स्टेशन पर  होती हैं। ओर उस समय हुआ करती थी।
काफी देर तक फोटू खींचकर हम बाहर निकल गए।बहुत ही खूबसूरत संग्रहालय था।
अब हम आगे रेत की कारीगरी देखने चामुंडा हिल के नजदीक चल दिये...
क्रमशः....

 







बुधवार, 21 अक्तूबर 2020

कर्नाटका डायरी #1


#मैसूर -यात्रा
#भाग=1
#कर्नाटका
#8 मार्च 2018

मैसूर यात्रा मेरी एक पंथ दो कॉज की तरह थी...ये एक घरेलू यात्रा थी.. मतलब मैसूर में मेरी बड़ी बेटी और दामाद रहते हैं तो यू हुआ कि बेटी से मिलना भी हो गया और अपनी घुमक्कड़ी भी हो गई।😊

उसके घर में रहते हुए ही हमने 15 दिनों में मैसूर,ऊटी, श्रीरंगपट्टनम, कुर्ग वगैरा की यात्रा की थी।

8 मार्च को मिस्टर के साथ उनकी बड़ी बहन ओर मेंने मुम्बई - मैसूर -  एक्सप्रेस ट्रेन दादर स्टेशन से पकड़ी... ये ट्रेन वीक में 2 बार आती और जाती हैं।
हमारी गाड़ी 8 मार्च 2018 को शाम को बॉम्बे से चलकर 10 मार्च 2018 को सुबह 6 बजे मैसूर पहुंची।

काफी लंबा सफर था लेकिन वेस्टर्न घाट की खूबसूरती देखते हुए कब टाइम निकल गया कुछ पता ही नही चला...घर आकर बहुत थकान हो गई तो खाना खाकर हम सब सो गए ...

5 बजे उठे तो थकान का नामोनिशान नही था हमने शाम की चाय पी ओर राजा बाबू बन मैसूर पैलेस यानी की अम्बा विलास पैलेस की लाइटिंग देखने निकल पड़े, ये पैलेस शहर के बीचोबीच स्थित है। 

मैसूर शहर छोटा और खूबसूरत हैं ,ये शहर अपने खूबसूरत तालाब,बगीचे, मैसूर साड़ी, मैसूर पाक,मैसूर सोप, मैसूर सिंदल पावडर, अगरबती ओर मैसूर मसाला डोसा के लिए दुनिया भर में प्रसिध्द हैं। यहां का वृंदावन गार्डन पहला म्यूजिकल गार्डन था जहां कई फिल्मों की शूटिंग हुई थी। यहां चंदन की लकड़ी पर खूबसूरत नक्कासी किये शो पीस, खिलोने ओर तस्वीरे भी मिलती हैं।

मैसूर पैलेस पहुंचकर हम हक्काबक्का रह गए क्योंकि पैलेस की जगमगाहट ईतनी खूबसूरत नजर आ रहा थी की कह नही सकती। यहां हर सण्डे रात को करीब 1लाख बल्ब जलते हैं। इसको देखने दूर दूर से लोग आते है।

 इस रोशनी को देखकर मुझे करीब 33साल पुराना दृश्य याद आ गया जब हम तिरुपति बालाजी के दर्शन करके वापसी में एक रात मैसूर ही रुके थे, ये बात 1985 की हैं  ओर इतेफाकन वो शायद सण्डे की ही रात रही होगी क्योकि उस दिन भी यहां काफी बल्ब जल रहे थे, बहुत उजाला था,तब मुझे ज्यादा नॉलेज नही था। उस समय हम इस पैलेस के सामने ही एक होटल में रुके थे और रात को अपनी खिड़की से ही इस सजावट को देखा था। तब मैसूर के बारे में खास जानकारी भी नही थी इसलिए न हमने पैलेस देखा और न लाइटिंग देखने नीचे उतरे थे। क्योकि सुबह जल्दी हमको श्री श्रवणबेलगोला जाना था।

आज भी सण्डे था ओर अब मेरे पास इस पैलेस को देखने के लिए पर्याप्त जानकारी थी।😊

सण्डे के अलावा राष्ट्रीय त्यौहार यानी कि 15 अगस्त ओर 26 जनवरी को भी ये महल ऐसे ही जगमगाता हैं । शहर के बीचोबीच होने के कारण आसपास की जगह भी काफी सुंदर और भव्य हैं। कहते हैं इसके एक भाग में अभी भी राजा कृष्ण वाडियार (चतुर्थ ) अपनी फैमिली के साथ रहते है।

अम्बा विलास पैलेस:--
महाराजा पैलेस यानी कि मैसूर का पैलेस ! मैसूर का राजमहल यहां के राजा कृष्णराज वाडियार चतुर्थ का हैं। यह पैलेस बाद में बनवाया गया था इससे पहले का राजमहल चन्दन की लकड़ियों से बना हुआ था। एक दुर्घटना में उस राजमहल की बहुत क्षति हुई जिसके बाद यह दूसरा महल बनवाया गया। पुराने महल को बाद में ठीक किया गया जहाँ अब संग्रहालय है। 
(लेकिन कुछ दिन बाद जब हम इस संग्रहालय को देखने गए तो ये बन्द मिला, क्योकि इसका रंगरोगन हो रहा था। )
आज सण्डे होने के कारण रात को पैलेस बहुत जगमगा रहा था । भीड़ भी काफी थी। 
दशहरे के दिन इस पैलेस की छटा निराली होती हैं यहां भव्य मेला लगता हैं, एक महीने पहले से यहां महावत अपने अपने हाथी लेकर जमा हो जाते हैं  .. ये हाथी राजा की कस्टडी में #दुबाले नामक जगह पर रहते हैं और दशहरे पर राजा की सवारी के साथ इनका भव्य प्रोसेशन निकलता हैं...इसको देखने देश से ही नही अपितु विदेश से भी काफी पर्यटक आते हैं। उस दिन इस पैलेस की खूबसूरती और जगमगाहट देखने काबिल होती हैं।
हम आज सिर्फ बाहर से पैलेस देखने आये थे क्योंकि शाम को पैलेस बन्द हो जाता हैं इसलिए अंदर से पैलेस फिर कभी देखने आएंगे। अभी हम सिर्फ बाहर से देखकर लौट जाएंगे। 

मैसूर पैलेस से सीधे हम पहाड़ी पर बने चामुण्डायै माता के मन्दिर में  गए। यहां चौक में बड़ी सी तलवार लिए एक आदमकद मूर्ति लगी हुई थी ।कहते है ये प्रतिमा राक्षसों का वध करती हैं। मन्दिर के अंदर कैमरा अलाऊ नही था वैसे भी अंधेरा  होने के कारण अंदर के फोटू नही खींच सकी। 

मन्दिर में कुछ खास भीड़ नही थी, लेकिन आम दिनों में यहां काफी भीड़ होती हैं ।मन्दिर में भी बहुत ही ज्यादा लाइटिंग थी और दक्षिण स्टाईल के मंदिरों की तरह यहां भी लंबा ओर ऊंचा गोपुरा था । जब दर्शन कर के बाहर निकले तो गोपुरा की लाईट बन्द हो गई थी शायद मन्दिर बन्द होने का टाइम हो गया था।

इस मंदिर के पिछली पहाड़ी पर बैल की काफी बड़ी मूर्ति हैं।जिसे बुल टेम्पल कहते हैं लेकिन वो किसी ओर दिन देखेंगे। अभी रात होने के कारण हम मन्दिर से चल पड़े।

पहाड़ी से उतरते हुए एक जगह लोगों का हुजूम देखकर हम भी रुक गए ,यहां से मैसूर शहर बहुत ही सुंदर दिखाई दे रहा था सबके मोबाइल और कैमरे फटाफट इस दृश्य को कैद कर रहे थे चारों ओर घनधोर अंधेरे में घरों की लाईट ऐसे चमक रही थी मानो सैकड़ों दीये टिमटिमा रहे हो और दूर मैसूर का पैलेस ऐसा लग रहा था मानो सैकड़ों दियों के बीच एक सूरज चमक रहा हो।
बहुत ही अद्भुत ओर आलौकिक दृश्य था जिसे मेरे मोबाइल ने भी कैद कर लिया लेकिन मेरे स्मृति पटल पर वो दृश्य आज भी ज्यो का त्यों अंकित हैं।
रात को हमने एक साउथ इंडियन रेस्टोरेन्ट में खाना खाया और घर आकर सो गए।
क्रमषः----

                      बेटी के घर

 
 
                   मन्दिर का गोपुरा

 
                  मन्दिर के अंदर

              मन्दिर के अंदर लाइन में

          बाहर निकलते ही बत्ती गुुुल




गुरुवार, 15 अक्तूबर 2020

मेरी वन्डरफुल यात्रा भाग=4


मेरी वंडरफुल यात्रा
भाग= 4 
(राजस्थान डायरी)
(अंतिम)

1 अक्टूम्बर 2019

29 सितम्बर को बॉम्बे से इंदौर उज्जैन होते हुए  माता बगुलामुखी के दर्शन करके रात मंदसौर में गुजारकर हम सुबह चारभुजा जी और कांकरोली जी के दर्शन करते हुए आज श्रीनाथजी पहुंच गए ,सुबह श्रीनाथजी के दर्शनों का लाभ उठाकर हम एकलिंग जी पहुंचे ...
अब आगे चित्तौड़गढ़ की तरफ रुखसत हुए....

एकलिंग जी के दर्शन कर के हम चित्तौड़गढ़ चल दिये
करीब 1बजे हम चित्तौड़ के किले में प्रवेश कर रहे थे...चित्तौड़ का किला एक पहाड़ी पर स्थित हैं और अंदर अभी भी लोग रहते है काफी मजबूत दिखाई दे रहा था हम विजयस्तम्भ पर उतर गए यही रानी पद्मावती ने अपनी दासियों के साथ सामूहिक जोहर किया और ख़िलजी के आगे घुटने नही टेके थे , यही कृष्ण भक्त मीराबाई का भी मन्दिर हैं ...
चित्तौड़ का किला अंदर से नही देख सकी उसको फिर कभी देखूंगी।

चित्तौड़ के किले से उतरकर हम बाजार में  कल्पना रेस्टोरेंट में गए क्योंकि भूख लग रही थी और दाल बाटी चूरमा खाने को पेट मचल रहा था और जीभ पानी पानी हुई जा रही थी... 99 रु. में अनलिमिटेड दाल बाटी सब्जी और चटनी थी ,चूरमा अलग से लेना था आधी कटोरी देशी घी से भरी थी और हम सभी टूट पड़े थे ...बहुत ही टेस्टी खाना था मैंने 2 बाफले खाये थे उससे ज्यादा खाने का मन था लेकिन दूसरा पेट कहा से लाऊँ 😢 पेट का सवाल था जी😜😜😜

अब पेटपूजा करके हमने दूजा काम किया रुक्मा की बेटी का ससुराल यही है उनसे मिलना भी जरूरी था तो वही बाजार में उनके घर पर दस्तक दी और थोड़ी देर आराम कर चाय पीकर हम निकल गए अपने अगले ओर आख़री डेस्टिनेशन पर...

सांवरिया जी
करीब 5 बजे हम सांवरिया सेठ मन्दिर में प्रवेश कर रहे थे ... मन्दिर नया बना है और मन्दिर की बनावट बेजोड़ हैं ये काफी बड़े प्रागंण में बना हैं
ये मन्दिर भी कृष्ण को समर्पित हैं ...इस बार किशन कन्हिया के दर्शन बहुत हुए।
मन्दिर के बाहर ही काफी दुकानें बनी हैं जिधर भांति भांति की वस्तुएं मिलती हैं ,हम काफी देर इन दुकानों की चीजों को देखते रहे और कुछ खरीदारी भी करते रहे।

1घण्टा इधर गुजारकर हम सीधे चल दिये मंदसौर की ओर, यहां मुझे अपनी बिछड़ी सहेली से मिलना था करीब 44 साल बाद मैं अपनी सहेली से मिल रही थी...

मेरे ज़ेहन में अभी तक उसकी सलोनी तस्वीर ही तैर रही थी...लेकींन समय ने उस सलोनी सूरत को झुर्रियों से सजा दिया था.. पर मन उसका आज भी मेरे लिए प्यार से लबरेज़ था... भगवान की लीला अपरम्पार हैं उमर का तकाजा किसी को कम तो किसी को ज्यादा होता हैं और यहां तो थोड़ा ज्यादा ही था 😢 चंद पंक्तियां जसबीर के लिए:--

"दोस्ती अब पुरानी हो गई हैं----
हैं वही सखी,
पर अब ओर भी प्यारी हो गई हैं---
समय ने दी हैं अनगिनत सोगातें --
चेहरा तो वही है ,
पर लकीरें उसको बहुत सारी  हो गई हैं ---।"😢

फिर भी उसके साथ गुजारे बहुत सारे पल याद करके उससे गले मिल मैंने इंदौर की ओर प्रस्थान किया ..दिल बहुत उदास था कुछ भी समझ नहीं  आ रहा था...रह- रहकर गुजरा जमाना याद आ रहा था आंखों से आँसुओं की धारा बह रही थी और दिमाग सुन्न था .. 
ओर इसी चक्कर में मैं अपने दूसरे fb दोस्त सुनील से मिल नहीं सकी इसका मुझे बहुत अफसोस हुआ...
कार में सन्नाटा फैला हुआ था सब सो रहे थे और मेरा दिमाग सायकिल पर सवार जसबीर ओर मेरे आसपास दौड़ रहा था...
"कॉलेज के दिन याद आ रहे थे कैसे गले मे बांहे डाले हम सायकिल पर सवार गाने गाते हुए कॉलेज में जाते थे ... लड़के रिमार्क कसते थे ,लेकिन हमको कोई फर्क नही पड़ता था.. लोग हमारी दोस्ती की मिसाल देते थे ? 
वो भी क्या दिन थे...दिन - दुनिया से बेख़बर हमारी दोस्ती की जड़े बहुत मजबूत थी लेकिन उसको समय ने तोडा जब मैं इंदौर आ गई और  फिर उससे कभी मिल नही सकी .. ।
वो तो भला हो मेरे fb दोस्त सुनील का जिसने गुम हुई जसबीर को फिर से जिंदा कर दिया और उसका पता ढिकाना ढूंढकर मुझे खबर किया...  आज सुनील के कारण मैंने दोबारा जसबीर से मुलाकात की लेकिन, मैं उस भले इंसान से नही मिल सकी जिसने मेरी सखी को ढूंढा था... क्योंकि मेरे साथियों को उसी दिन इंदौर पहुंचना था और मंदसौर में ही रात के 9 बज रहे थे जबकि इंदौर का सफर अभी भी 3 घण्टे का ओर था ..
खेर, अगली बार मैं फिर से मंदसौर जाउंगी ओर सबसे मिलूँगी।ये मेरा वादा हैं👍
 वीर बालक मद्धम आवाज़ में अपने पसंदीदा गाने गुनगुना रहा था ओर सभी थके हुए लोग गहरी नींद में सो रहे थे लेकिन मेरी आँखों में नींद का कोसों दूर तक पता नही था मैं अपने गुजरे जमाने मे अभी तक विचरण कर रही थी... फिर रात के 2 बजे इंदौर आ गया और मुझे पता ही नही चला...हम सब अपने ठिकाने पहुंच गए थे लेकिन मेरा दिल अभी भी उदास था😢
इसतरह ये 3 दिन का सफर समाप्त हुआ👏

  
               दाल बााटी चूरमा




           
     यहां रानी पदमावति ने जोहर  किया  था          

                    सांवरिया जी

                     सांवरिया जी

                    सांवरिया जी
               दूसरे दिन मेरीी वापसी

बुधवार, 14 अक्तूबर 2020

मेरी वंडरफुल यात्रा भाग =3


मेरी वंडरफुल यात्रा
भाग= 3
(राजस्थान डायरी)
1 अक्टूम्बर 2019

बॉम्बे से इंदौर उज्जैन होते हुए  माता बगुलामुखी के दर्शन करके रात मंदसौर में गुजारकर हम सुबह चारभुजा जी और कांकरोली जी के दर्शन करते हुए आज श्रीनाथजी पहुंच गए ।अब आगे...

हमको श्रीनाथजी में रूम बढिया मिले ,सुबह मैं तो आराम से उठी जबकि सब लोग सुबह 6 बजे श्रीनाथजी के दर्शन कर आये जिसे मंगला -आरती बोलते है।

लेकिन मैं फ्रेश होकर साढ़े सात बजे के दर्शन को निकली...मुझे भी भव्य दर्शन हुए .. ऐसा लगा मानो खुद मुरलीमनोहर मुझे निहार रहे है... साक्षात प्रभु से साक्षात्कार हो रहा था और अनायास मेरी पलकें गीली हो गई 😢मुझे ऐसे अनुभव बहुत ही कम होते हैं क्योंकि मैं ज्यादा भक्ति में लीन होने वालों में से नही हूँ।☺️

श्रीनाथजी के दर्शन कर हम वही बाजार में कुछ खरीदारी करने लगे,न चाहते हुए भी मैंने एक छोटी सी मूर्ति श्रीनाथजी की खरीद ही ली ।

"श्रीनाथजी"
ये मन्दिर उदयपुर से 48 km दूर है
 पुष्टिमार्गीय वैष्‍णव सम्प्रदाय की ये प्रमुख पीठ हैं यहां सैकड़ो वैष्णवी श्रध्यालू रोज दर्शन करने आते हैं ये मन्दिर 337 साल पुराना हैं।
दर्शन के बाद हमने वही बैठकर एक होटल में सुबह का नाश्ता किया वही इंदौरी पोहे ओर अहमदाबादी फाफड़े ओर मीठी कड़ी.. भूख बहुत लग रही थी इसलिए फोटू नही ले सकी।
श्रीनाथजी की यात्रा समाप्त होते ही हम चल दिये गोवर्धन परिक्रमा करने ...पूरा गोवर्धन पर्वत का चक्कर लगाकर हम एक ऐसी जगह आये जहां पर विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा के दर्शन हुए ये प्रतिमा भोलेनाथ की थी 351 फिट ऊंची लार्ड शिवा की ये मूर्ति विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा  हैं..तपस्या में लीन शिव शम्भू की ये प्रतिमा देखने लायक थी। ये हमको हाइवे से ही नजर आ रही थी।

"एकलिंगजी महादेव"
यहां से निकलकर हम चल दिये एकलिंगजी के भव्य मंदिर में जो भगवान शिव को ही समर्पित हैं.. यह मंदिर उदयपुर से 18 km उत्तर में बसा हैं ये खूबसूरत मन्दिर 2पहाड़ियों के बीच स्थित हैं ।
मेवाड़ के राजाओं के शिव आराध्य देवता थे ओर वो अपने हर युध्य में जाने से पहले इस मंदिर में आकर पूजा अर्चना करते थे।
जब हम यहां पहुंचे तो सुबह के 10 बज रहे थे और मन्दिर खुलने का टाईम साढ़े 10 था जो हमको यहां का एक बोर्ड बता रहा था..यहां सारा सामान हमको एक लॉकर में जमा करना पड़ा क्योंकि अंदर कुछ भी ले जाना मना था, पता नही इन मंदिरों में मोबाइल ले जाना और फोटू खींचना क्यो मना होता हैं।😢

अंदर मन्दिर बहुत ही खूबसूरत बना हुआ था उसकी नक्कासीदार डिजाइन मन को मोह गई ...अंदर कई छोटे छोटे मन्दिर थे ओर सभी एक से बढ़कर एक👍
एकलिंग जी के मंदिर की भव्यता देखकर फोटू न उतारने का अफसोस जरूर हुआ लेकिन इतने खूबसूरत मन्दिर देखने का जो सौभाग्य मिला उसने अफसोस के सारे रंज धो दिए।
ओर यहां के बाद हम चल दिये चित्तौड़गढ़....
शेष आगे----

                     दामोदर धाम
 

                    एकलिंगजी