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मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

कर्नाटक डायरी#15


#कर्नाटक-डायरी
#मैसूर -यात्रा
#भाग=15
#27 मार्च 2018

कल हमने शुकावन की यात्रा की थी आज हम मैसूर का फ़ेमस चर्च देखने दोपहर के बाद निकल पड़े ,क्योंकि रात को इसका स्वरूप निखरकर आता हैं परंतु हम रात तक नही रुक सके और शाम को ही लौट आये।
मुझे अफसोस हुआ क्योंकि हमको दोपहर की जगह शाम को निकलना था,परन्तु इसके बारे में ज्यादा जानकारी न होने के कारण हम शाम तक वापस लौट आये थे।

ख़ेर, हमने ओला मंगवाई ओर चर्च देखने निकल पड़े।मैसूर महल से कुछ आगे गलियों से गुजरते हुए हम चर्च पहुँच गए।इसके ऊंचे गुम्मद हमको दूर से ही नजर आ रहे थे ,नजदीक देखा तो पता चला कि इसकी मरम्मत चल रही हैं आधा चर्च हरे कपड़े से ढंका हुआ था। हम अंदर चल पड़े।

सेंट Philomena कैथेड्रल  एक कैथोलिक चर्च या गिरजाघर है। पूरा नाम सेंट जोसेफ और सेंट फिलोमेना कैथेड्रल है । इसे सेंट जोसेफ कैथेड्रल के नाम से भी जाना जाता है । 

भारत में सबसे बड़े चर्चों में से एक हैं फेलोमीन्स चर्च!  यह राजसी चर्च है। यह एशिया का दूसरा सबसे बड़ा चर्च  है। सेंट फिलोमेन चर्च न केवल अपनी स्थापत्य सुंदरता और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है बल्कि
यह चर्च शहर के कैथलिक संप्रदाय   को मैसूर शासक द्वारा दिया गया  एक उपहार स्वरूप हैं।

यह चर्च मैसूर महल से महज 2 km के दायरे में पड़ता हैं। 

सेंट फिलोमेना चर्च का इतिहास:--
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1933 में महाराजा कृष्णराज वोडेयार चतुर्थ के शासनकाल के दौरान एक छोटा चर्च बनाया गया था।
1926 में, टीआरवी थम्बो चेट्टी, जो दीवान और मैसूर के मुख्य न्यायाधीश थे, ने पीटर पिसाणी, ईस्ट इंडीज के अपोस्टोलिक डेलीगेट से सेंट फिलोमेना के अवशेष प्राप्त किया, जिसे विधिवत रूप से फादर चेत को सुपुर्त कर दिया गया, जिन्होंने तब मैसूर महाराजा से संत के सम्मान में एक चर्च बनाने का अनुरोध किया था। उनके अनुरोध पर, मैसूर राजा कृष्णराजेंद्र वोडेयार बहादुर चतुर्थ ने इस चर्च के निर्माण की अनुमति दी। इसलिए, 1933 में, नए चर्च की नींव रखी गई। निर्माण के 8 वर्षों के बाद, चर्च ने 1941 में काम करना शुरू कर दिया। 

कहा जाता है कि सेंट फिलोमेना ग्रीस के एक छोटे से राज्य के सम्राट की बेटी थी। सम्राट संतानहीन था, इसलिए दंपति ने एक बच्चे के लिए भगवान से प्रार्थना की। एक साल बाद, एक बेटी उनके पास पैदा हुई, जिसे उन्होंने फिलोमेना नाम दिया। बचपन से ही फिलोमेना ईश्वर की भक्त थी । जब वह 13 साल की थी, तो उसके पिता उसे अपने साथ रोम ले गए थे, जहां वह सम्राट डायोक्लेटियन की मदद लेने गया था। फिलोमेना को देखकर, सम्राट उसकी सुंदरता का दीवाना हो गया उसने फ्लोमीना से शादी करने की इच्छा व्यक्त की।  लेकिन फिलोमेना ईश्वर की भक्ति में लीन थी तो उसने  सम्राट से शादी करने से इनकार कर दिया। सम्राट उसकी अस्वीकृति को सहन नही कर पाया और उसने उसको भयंकर यातना दी और उसे निष्पादित करने के आदेश दिए।

सेंट फिलोमेना चर्च की वास्तुकला:--
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 विक्टोरियन शैली में निर्मित, यह चर्च जर्मनी के कोलोन कैथेड्रल चर्च से मिलता हैं। इसे एक फ्रांसीसी कलाकार डेली द्वारा डिजाइन किया गया था। इस चर्च को एक क्रॉस के आकार में बनाया गया है, साथ ही मण्डली हॉल को 'नेव' के रूप में भी जाना जाता है जो क्रॉस का सबसे लंबा अंत है, ट्रेसीपर्स क्रॉस की दो भुजाएं हैं, क्रॉसिंग और वेदी ऊपरी भाग है या क्रॉस का छोटा हिस्सा।

चर्च का मुख्य आकर्षण 175 फीट की ऊँचाई वाले इसके दो सर हैं यानी कि 2 स्तम्भ हैं जिन्हें दूर से भी देखा जा सकता है। स्पियर्स का डिज़ाइन सेंट पैट्रिक चर्च के समान है जो न्यूयॉर्क में स्थित है। प्रत्येक शिखर पर 12 फीट की ऊंचाई के साथ एक क्रॉस है। वेदी जटिल रूप से तैयार किए गए संगमरमर और सेंट फिलोमेना की मूर्ति के साथ एक मनोरम दृश्य प्रस्तुत करती है जिसे फ्रांस से लाया गया था। अलार में आपको सेंट फिलोमेना की प्रतिमाएं और वेदी के नीचे, भूमिगत हॉल में, सेंट फिलोमेना के अवशेष मिलेंगे जो आज भी सुरक्षित रखे गए हैं।

चर्च के हॉल में 800 लोगों के करीब बैठने की क्षमता है। गर्भगृह अपनी सन ग्लास खिड़कियों के साथ अधिक सुंदर दिखता हैं, जो येसु के जीवन के विभिन्न चरणों को दर्शाता हैं जैसे कि जन्म, अंतिम भोज, क्रूस पे लटकाने ओर पुनर्जन्म के दृश्यों को! चर्च के सामने तीन छोटे छोटे दरवाजे हैं, जो आपको प्रार्थना हॉल में ले जाते हैं। चर्च के स्तंभों पर फूलों की सुंदर कलाकृति की गई हैं।

सेंट फिलोमेना चर्च की टाइमिंग:--
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आप शाम 6 बजे तक चर्च का दौरा कर सकते हैं क्योंकि सेंट फिलोमेना चर्च की टाइमिंग सुबह 05.00 बजे से शाम 06.00 बजे तक है। शाम को चर्च को देखना अच्छा लगता हैं। क्योंकि रात को चर्च को  रोशन किया जाता हैं।
 हर रविवार और त्यौहार पर, विशेष सामूहिक आयोजन किया जाता है, जबकि हर रोज़ सुबह और शाम को ही सामूहिक आयोजन होता  है। 11 अगस्त को चर्च में वार्षिक भोज का आयोजन किया जाता है। चर्च हॉल के अंदर फॉटोग्राफी की अनुमति नहीं है।(लेकिन मैंने चुपके से खींच लिए थे😂😂😂)

1977 की हिंदी बॉलीवुड फिल्म "अमर अकबर एंथोनी" की शूटिंग सेंट फिलोमेना चर्च के अंदर ही की गई थी।

चर्च वाकई में खूबसूरत डिजाइन किए हुए था अंदर की कलाकृति ओर उसके डार्क कलर देखने लायक थे रंगीन कांच से आती रोशनी बड़ी सुंदर दिख रही थी,वही से एक रास्ता नीचे गर्भगृह में गया हुआ था हम रम्प द्वारा नीचे आ गए यहां काफी ठंडक थी दूर एक मोमबती टिमटिमा रही थी,चर्च जाना और चर्च देखना मुझे कभी भी पसन्द नही आता, फिर भी फ़ेमस जगह देखने जरूर जाती हूँ। लोग कहते है यहां शांति होती हैं लेकिन मुझे ये शांति मरघट के सन्नाटे जैसी लगती हैं ।
ख़ेर,नीचे गर्भ गृह में सेंट फ्लोमिनो के अवशेष थे पर हमने नजदीक से नही देखे केयोकि वहां हमारे अलावा और कोई नही था ,मुझे घबराहट  होने लगी और हम सब तुरंत ऊपर आ गए ।
वहां से निकलकर हम बाहर आ गए चर्च के नजदीक ही कोई गुफा की तरह बनी हुई थी हम उधर चल पड़े,अंदर मोमबत्तियां जल रही थी । ये गुफा बनाने का क्या तुक हैं हमको कुछ समझ नही आया।
गुफा से बाहर आकर हमको एक स्कूल नजर आया वहां कोई फैंसी प्रोग्राम चल रहा था।क्योकि बच्चे फैंसी ड्रेस में घूम रहे थे।
शाम होने वाली थी अब हमने यहां से चलने का मन बना लिया ।क्योकि रात होने में काफी टाइम बाकी था।इसलिए रोशनी देखने का काम फिर कभी पर टाल कर हम घर की तरफ चल दिये।
वैसे ये चर्च एक बार देखने लायक हैं।
क्रमशः...








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