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गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

यात्रा जगन्नाथपुरी ( YATRA JAGANNATHPURI --1 )




* यात्रा जगन्नाथपुरी *
भाग --1 


मंदिर का प्रवेश द्वार 

28 मार्च 2017  

28 मार्च को मेरा जन्मदिन भी था और इसी  दिन मैं अपनी सहेली और उसके परिवार के साथ जगन्नाथपुरी की यात्रा को निकल पड़ी | 
मेरी काफी सालो से ये अभिलाषा थी की एक बार जगन्नाथ पूरी के दर्शन को जरूर जाउंगी , क्योकि मेरा   इतनी दूर जाना मुश्किल ही नहीं असम्भव ही था | और सरदार फैमिली की होने के कारण किसी का झुकाव भी इस मंदिर में  नहीं था ,कोई मुझे इतनी दूर लेकर नहीं जाना चाहेगा , इसलिए मेरा मन बहुत व्याकुल था |

आखिर काफी परिवार वालो की असहमति होने के बावजूद भी मैं निकलने में सफल हुई। ... जय घुमक्क्ड़ी !!!!

12 बजे अपने  निवास स्थल वसई से मैंने लोकल पकड़ी वी. टी. जाने के लिए , वी  टी  मेरे घर से काफी दूर था और मुझे 3 :15 की कोणार्क एक्सप्रेस  पकड़नी थी | पौने 2 बजे मेरी लोकल चर्चगेट स्टेशन पहुंची | वहां से टैक्सी लेकर मैं वी टी (पुराना नाम ) नया नाम छत्रपति शिवजी टर्मिनस C S T  के 14 नंबर प्लेटफॉर्म पर पहुंची  पर अभी तक न मेरी सहेली का पता था ना गाडी का खेर, अभी काफी टाईम था मैं वही एक बेंच पर बैठकर उन लोगो का इन्तजार करने लगी |

3 बजे से पहले ही सब आ गए और गाडी भी अपने राईट टाईम पर प्लेटफार्म पर लग गई और हम सब B 4  के अपने A C कम्पार्टमेंट में आ गए जहाँ आकर बम्बई की गर्मी से कुछ राहत मिली | गाड़ी 20 मिनिट लेट चली और हम सब गप्पे मारने  में मशगूल हो गए |

शाम को सबने ताश खेलने और गप्पे हाकने में निकाल दिया | ट्रेन सब छोटे बड़े स्टेशनों को सलाम करती हुई रेंगती रही ये हमको 36 घंटे में भुवनेश्वर उतार दे तो समझो पार हुए |सारे रास्ते जलेबी के समान शब्दमाला के पोस्टर दिखलाई देते रहे वो तो शुक्र करो की उनके निचे ही अंग्रेजी शब्दों में स्थानीय नाम लिखे थे वरना तो अपने राम जलेबी की गोलाइयों में खो जाते |.

सुबह 4 बजे पहुंचने  वाली गाड़ी 7 बजे भुवनेश्वर पहुंची वहां से 8 बजे की दूसरी ट्रेन पकड़कर हम 10 बजे पूरी स्टेशन पहुंचे उधर हमने 100 रु में एक ऑटो किया और अपने नियत बुकिंग रूम की और चल दिए यह रूम, रूम नहीं था बल्कि सियूट था दो बेडरूम और एक हॉल था जिसमे फ्रीज़ भी रखा था और किराया 1800 सो रुपये पर डे था हम सब  A C चलाकर थोड़ा विश्राम करने लगे फिर एक एक नहाकर तैयार होकर निकलने लगा ठीक 12 बजे सब तैयार होकर मंदिर दर्शन को निकल पड़े। ...

थोड़ी चर्चा जगन्नाथपुरी की :---

भगवान जगन्नाथ का मंदिर श्रीकृष्ण (विष्णु ) का मंदिर है और यह वैष्णव संप्रदाय का मंदिर है यह मंदिर उड़ीसा राज्य के पूरी शहर में स्थित है | हिन्दू समाज के चारधाम  तीर्थो में एक धाम जगन्नाथ पूरी का भी आता है | गंगोत्री ,यमनोत्री ,द्वारका और जगन्नाथपुरी ये चार धाम यात्रा कहलाती है यहाँ से हर साल निकलने वाली रथयात्रा काफी मशहूर है देश विदेश से काफी लोग इसको देखने आते है  इस यात्रा में भगवान कृष्ण उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा का ये मंदिर है |
कलिंग शैली में बना ये मंदिर 4 ,00 ,000 स्क्वायर फुट में फैला हुआ है | इस मंदिर के शिखर पर भगवान कृष्ण का सुदर्शन चक्र मंडित है जो अष्टधातु से निर्मित है | मुख्य मंदिर 214 फुट लम्बा है | यहाँ का ध्वज बदलने का दृश्य देखने लायक और रोंगटे खड़े करने लायक है क्योकि मंदिर के पंडे  उल्टा मंदिर में चढ़ते  है और बिना किसी सहारे के....इतने बड़े मंदिर पर चढ़कर ध्वज बदलते है वो दृश्य कभी भूल नहीं सकती | यह क्रिया हर शाम को 5 बजे शुरू  होती है और एक घंटा चलती है फिर वो ध्वज नीचे आकर बिकते है , सारा दृश्य स्वप्न की भांति नजर आता है | कैमरा बाहर जमा करवा लेते है वरना वीडियो जरूर बनती |

मंदिर की कुछ अनोखी कहानियाँ :---

1.  इस मंदिर से जुडी अनेक कहानियां प्रचलित हैं कहते है ----'' मालवा नरेश इन्द्रद्युम्न  को स्वप्न में एक मूर्ति दिखाई दी थी तब उसने कड़ी तपस्या की और भगवान विष्णु ने खुश होकर उसको आदेश दिया की वो पुरी के समुंद्र तट पर जाये जहाँ उसको एक लकड़ी का लठ्ठा मिलेगा जिससे उसको बिलकुल वैसी ही मूर्ति बनवानी  है जो स्वप्न में दिखाई दी थी  | राजा ने ऐसा ही किया पूरी के समुन्द्र तट पर तैरता हुआ उसको एक लकड़ी का लट्ठा दिखाई दिया जिसे लेकर वो राजमहल में आ गया पर किसी भी कारीगर से वो लट्ठा हिला तक नहीं राजा आश्चर्य में आ गया किया जाय  तो क्या ?
आखिर भगवान विष्णु बूढ़े  कारीगर के वेश में राजा के सामने उपस्थित हुऐ और मूर्ति  बनाने की इच्छा  व्यक्त की राजा ने स्वीकृति दे दी लेकिन बूढ़े कारीगर की ये शर्त थी की मूर्ति  एक महीने में तैयार हो जाएगी लेकिन वो अकेला एकांत में वो मूर्ति बनाएगा जिसे कोई देख नहीं सकेगा | तब राजा ने उस बूढ़े को एक कमरे में मूर्ति तैयार करने को कहा ,कारीगर कमरे में बंद  हो गया रोज  कमरे से  खट -ख़ट की आवाजें आती रहती थी किसी को भी उधर झाकनें की मनाही थी  लेकिन आखरी दिनों में जब खट - खट की कोई आवाज़ सुनाई नहीं दी तो राजा ने सोचा की कही बूढ़ा कारीगर मर तो नहीं गया और उसने कमरे में झांक लिया , राजा के झांकते ही बूढ़ा कारीगर बाहर आ गया और बोला  अभी मूर्तियां अधूरी है हाथ नहीं बने है पर अब इन मूर्तियों को ऐसे ही स्थापित करना पड़ेगा जैसी प्रभु की इच्छा ''--- और वो कारीगर चला गया | बाद में राजा ने अंदर देखा तो तीन मूर्तियां बनी थी जिनके हाथ नहीं थे ,,,ये मूर्तियां भगवान जगन्नाथ , श्रीकृष्ण उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा की थी  और राजा ने इन्ही मूर्तियों को स्थापित किया |

आज भी 12  वर्ष बाद इसी तरह राजा को स्वप्न आता है लकड़ी का टुकड़ा तैरकर मिलता है और एकांत में मूर्ति का निर्माण होता है फिर दौबारा मूर्तियों की स्थापना होती है |

2. एक और कहानी महाराजा रणजीत सिंह से संबंधित है जिन्होंने इस मंदिर को कई किलो सोना दान में  दिया था और मशहूर हिरा कोहनूर भी देना चाहते थे  परन्तु तब तक अंग्रेजो ने अपना कब्जा पंजाब पर जमा दिया था और वो  हिरा ब्रिटिश ले गए ,वरना आज कोहनूर हिरा जगन्नाथ भगवान के मुकुट की शोभा बनता |

3.  कहते है भगवान जगन्नाथ मंदिर का ध्वज हवा की विपरीत दिशा में लहराता है |

4.  इस मंदिर में विशाल रसोईघर है जिसे 500 रसोइये अपने 300 सहयोगियों के साथ दिनभर में 9 बार बनाते है क्योकि भगवान को 5 बार नाश्ता और 4 बार खाने का भोग लगता है | सारा रसोई मानव निर्मित हाथों से ही बनता है | कहते है रसोई घर में खाना मिटटी के बर्तनो में बनता है , और सात बर्तनो में एक के ऊपर एक बर्तन रखे जाते है और खाना सबसे पहले ऊपर वाले बर्तन में पकता है और  सबसे नीचे वाले बर्तन में सबसे आखरी में पकता है जबकि चूल्हे की आंच सबसे पहले नीचे ही आती है |  रसोई घर साधारण जनता को देखने नहीं दिया जाता |

5. इस मंदिर में विदेशी पर्यटको का प्रवेश वर्जित है साथ ही मुस्लिम और ईसाई सम्प्रदाय के लोगो का भी प्रवेश वर्जित है | कहते है अपने समय में बनी प्रधानमंत्री इंदिरागांधी को इस मंदिर में प्रवेश नहीं दिया गया था |यहाँ अपना नाम और गोत्र बताने पर ही मंदिर में प्रवेश मिलता है |

6 . भोग लगने के बाद वो सारा  खाना बाहर आनंद बाजार में बिकने को आ जाता है | कहते है जितना भी खाना खरीदो वो कभी व्यर्थ नहीं जाता थोड़ा भी खाना लो तो सारे मेंबर  में खप जाता है | रोज 36 पकवानो से भगवान को भोग लगता है और वो सभी पकवान आनंद बाजार में बिकने को आते है कोई भी खाना कभी बर्बाद नहीं होता न फेंका जाता है  |

7 . कहते है मंदिर की चार  दीवारी के अंदर समुन्द्र की आवाज़ भी नहीं आती और बाहर निकलते ही समुन्दर का  शोर सुनाई देता है |




रास्ते की ग्रिनरी 


टाईम पास 


 भगवान के 36 भोग चित्र -- गूगल दादा से 


आनंद बाजार का दृश्य चित्र -- गूगल दादा से 

जगन्नाथ भगवान की रथ यात्रा मंदिर के सामने से चित्र -- गूगल दादा से 


भगवान जगन्नाथ सुभद्रा और बलराम चित्र --गूगल से 


आज की यात्रा इतनी ही शेष जल्दी ही  ...


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1.  यात्रा जगन्नाथपुरी की -- भाग 1
2.  यात्रा जगन्नाथपुरी  की -- भाग 2
3.  पुरी के अन्य दार्शनिक स्थल-- भाग 3
4.  कोणार्क मंदिर -- भाग 4
5.  भुवनेश्वर और अन्य स्थल -- भाग 5
6 . भुवनेश्वर से बनारस-- भाग 6
7 .  बनारस से बॉम्बे --भाग 7



                  




शुक्रवार, 3 मार्च 2017

लवासा ( Lawasa)



लवासा 
महाराष्ट्रा सरकार द्वारा  बनाया हिलस्टेशन 



लवासा (मराठी नाम )

10 -12  -16   पूना 

2 दिसम्बर  को अपनी  बेटी के घर  पूना गई थी पूना  के कई ऐतिहासिक जगह पर घूमकर आखिर में 10 तारीख़  को लवासा घूमने का प्रोग्राम बनाया , दामाद ने अपनी नई आई टेन i 10 गाडी को तेल पानी पिलाया  और हम सुबह नाश्ता करके निकल पड़े लवासा हिलस्टेशन देखने ,,,,,
दिसम्बर का महीना सुबह ठंडी ठंडी हवा में हमारा कारवां बढतारहा ,,,, बॉम्बे के मुकाबले  पूना थोड़ा ठंडा है पर इतना भी नहीं की स्वेटर लादना पड़े सिर्फ एक शा ल से काम  चल गया । 

 लवासा पुणे के पास वरसगांव बांध  / जलाशय के पीछे बाज़ी पासलकर जलाशय के किनारे पश्चिमी घाट में स्थित  है  पुणे से 50 किलो मीटर दूर बसा  है लवासा ।  ये पुणे से 80 मिनिट में पहुंचा जा सकता है । बॉम्बे से ये 180 किलो मीटर के करीब पड़ता  है जो आप 3 घण्टे की दुरी से आराम से पहुँच सकते हो | 

यह शहर वरसगांव बाँध और जलाशय को  चारो  और से घेरने वाली आठ बड़ी बड़ी पहाड़ियों की गोद  में स्थित है बहुत ही सुंदर तरीके से इसको बसाया है आजादी के बाद बना पहला हिल स्टेशन है लवासा;जो महाराष्ट्रा गवर्मेन्ट का ड्रीम प्रोजेक्ट है ।यह प्लान से बना हिल स्टेशन है जो 25 हेक्टर्स मैं फैला है यानि 100 किलो मीटर में फैला है इस पर अब तक  करीब   50 अरब रूपया खर्च हो गया है । और ये अब भी बन रहा है।कहते है ये 2021 में पूर्ण होगा । यहाँ 1000  बंगले और 500 फ्लेट बनकर तैयार है यह प्रोजेक्ट अमेरिकन कम्पनी के साथ  मिलकर हिंदुस्तान कन्ट्रक्शन कम्पनी के द्वारा हो रहा है ।  

इस पर स्वीजरलैंड की तर्ज पर झील, 5 स्टार होटल, सड़क,घर,हॉस्पिटल बनाने का प्लान है  , ऑक्सफोर्ट यूनिवर्सिटी की एक शाखा भी यहाँ खोलने का प्लान है  इस ड्रीम प्रोजेक्ट को सन 2000  में स्वीकृति मिल गई थी फिर इस पर काम शुरू हुआ ये अंग्रेजो के बनाये हिल स्टेशनों जैसा तो नहीं है फिर भी बोम्बे पूना वालो के लिए एक वरदान स्वरूप है ।

यहाँ गेट पर ही पार्किंग चार्ज लिया जाता है जिसे एंट्री फीस भी कह सकते है । 
कार 500 रु 
बाइक 200रु
बस 1000 रु
इसके अलावा और कोई चार्ज नहीं है ।
पार्किंग के बाद करीब 6-7 किलोमीटर चलने के बाद ही मेन सिटी शुरू होती है ।ज्यादा  ऊँचे तो नहीं पर पर्वत और उनकी श्रृंखलाएं मन को मोह लेती है,सुंदर  सड़क और सड़क के किनारे ही क्यारियों में सजावटी  खूबसूरत फूलों के पौधे और एक ही कतार में बने एक ही रंग में रंगे बंगले जो इनकी सुंदरता में चार चांद लगा देते है ।

यहाँ का मेन आकर्षक है एक झील और उसके पास बने सुन्दर घर और उन घरों पर लगाया एक ही कलर ।
झील के पास ही बनी सुन्दर सड़क पर घूमते सैलानी अपनी खुशी आप ही बखानते नजर आते है ।
झील में दौड़ती नावे और स्पीड बोट पर चहकते बच्चे और युवा  की ख़ुशी साफ झलकती है ।

यहाँ पैदल घूमना भी अपने आपमें कम नहीं है झील से सटी सड़क पर कोई वाहन नहीं आ सकता सिर्फ साईकिल ही आप चला सकते हो जो यहाँ पर महज 200 रुपये में 1घण्टा किराये पर उपलब्ध हो जाती है ।महंगी तो है पर यहाँ के सौंदर्य को तपासने के लिए जरुरी भी है ।

यहाँ झील में एक पूल भी है जो आपको इस तरफ से दूसरी तरफ ले जा सकता है यहाँ हर तरह का खाना उपलब्ध है झील के किनारे थोड़ा महंगा और ऊपर सड़क पर थोड़ा सस्ता और अच्छा है  ।

यहाँ बैंक और ATM  भी है जिससे आप जब चाहे पैसा निकाल सकते है। पब्लिक टॉयलेट भी साफ और काफी बड़े बने है ।  यहाँ रात्रि विश्राम के लिए कम दामो में रूम सर्विस है यदि आप ठहरना चाहे तो ठहर भी सकते है और वापस पूना भी आ सकते है ।और हम अँधेरा होने से पहले ही निकल आये । 
पूना वालो के लिए ये वन डे ऑफर  अच्छा है ।

लवासा की कमिया :---

लवासा अपने आप में अच्छा हिलस्टेशन है पर ये केवल पूना या बॉम्बे से ही सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है  विकसित सड़के होने के बावजूद एक पहाड़ी ईलाके में स्थित होने की वजय से इन सड़को में कुछ जगह खड़ी ढाल है । और हेलीकाप्टर के अलावा निकट भविष्य में कोई हवाई योजना नहीं  बनी है । 
  

गुड़ बाय लवासा और अब देखिये  लवासा के सूंदर फोटू :---



लवासा का एकमात्र दरवाजा यानी एंट्री 



 
बैठने को कुर्सियां बनी है 

 ये मेरा दिल---- दीवाना - मस्ताना 


 झील एकदम साफ़ 



 सफाई इतनी की निचे भी बैठ जाओ 






 सुंदरता बिखरी है 


 झील के बाहर की सड़क और झील पर बने फ्लेट 














 बाज़ार 






लवासा का मानचित्र 



झील के किनारे वाली सड़क पर सैलानी 

 रात का शमा झूमे चँद्रमा 


नोकविहार का आनन्द 


 बंगले 


 सड़क पर दौड़ती ट्रेन 



बंगलो का पिछवाड़ा 


शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

525 शिवलिंग के दर्शन"




525 शिवलिंग के दर्शन"
शिवपुरी धाम 













थेगड़ा (शिवपुरी धाम ) कोटा ( राजस्थान)
करीब 37 साल पहले जब मैं राजस्थान के इस शहर कोटा में आई थी तो यह शहर काफी पुराना और नये ज़माने के बीच झूल रहा था , मैं ठहरी इंदौर (MP) शहर की एक चंचल लड़की पर मुझे यहाँ  किसी भी तरह का कोई आदेश धोपा नहीं गया और मैं कुछ समय आराम से निकाल कर करीब 83 में बॉम्बे आ गई । मेरे आने के बाद ही इस मंदिर की स्थापना हुई । इसीकारण ये मंन्दिर देख नहीं पाई ।

कल अचानक इस मंदिर का जिक्र सुना तो रहा नहीं गया।
हम सारा परिवार 4 बजे इस मंदिर को देखने निकल पड़े ,स्टेशन रोड (हमारा घर) से एक बड़ी नगरीय सेवा (

टाटा मैजिक) से हम 9 लॉगो का झुण्ड चल पड़ा।

नयापुरा, बसस्टॉप, तालाब, नहर से होते हुए बोरखेड़ा के पास ही पुराना गाँव है थेगड़ा  जहाँ ये 525 शिवलिंग है हम पहुँच गए  ।

भीड़ अधिक तो नहीं थी पर सुनसान भी नहीं था ,कुछ लोगो की गोट (पिकनिक) चल रही थी जहाँ दाल - बाटी बन रही थी और बाटी की सोंधी - सोंधी खुशबु फिजाओं में फ़ैल रही थी । मन बाटी खाने को मचल रहा था पर दर्शन करने भी जरुरी थे हम आगे बढ़ गए।

सामने ही ढाई टन का पारद का शिवलिंग था सब उस पर जल चढ़ा रहे थे शिवलिंग के नजदीक ही एक विशाल नन्दी भी बना हुआ था । 

कुछ आगे एक बाबा जैसे नागा साधु बैठे थे सब उनके चरणस्पर्श कर रहे थे उनके पास ही हवनकुण्ड बना हुआ था जिसमें अग्नि जल रही थी ये आज के इस मंदिर के संस्थापक थे ।

उनके सामने उनके गुरु का मोम से बना तपस्या में लीन पुतला था जिसके आगे भी अग्नि प्रज्वलित थी। नमस्कार कर आगे बढे तो राईट साईड में कल्पतरु का पेड था कुछ आगे बढे तो पारस पीपल का पेड़ था जो नगण्य ही पाया जाता है  ।आगे चले तो रुद्राक्ष का पेड़ नजर आया जिसपर काफी मात्रा में हरे हरे रुद्राक्ष लगे थे ,वही गिरा एक हरा रुद्राक्ष भी मिझे मिला ।

उससे आगे बढे तो एक अनोखा दृश्य मेरे सामने था सामने त्रिशूल के आकार पर स्थापित अनेक शिवलिंग थे पास ही पानी की टँकिया थी और लोटे थे जिनमें पानी भर श्रद्धालु शिवलिंग पर चढ़ा रहे थे बहुत ही भक्तिपूर्ण मनमोहक दृश्य था...

इतने शिवलिंग देखकर मन प्रफुल्लि होना स्वाभाविक था \ काफी देर तक हम इस भक्तिपूर्ण माहौल में घूमते रहे जब अँधेरा धिर आया तो सब तृप्त हो वापसी के लिए निकल पड़े। ....







संस्थापक देवलोक वासी  गुरु जी की मोम की प्रतिमा 




रुद्राक्ष का पेड़ जो नेपाल में बहुतयात में पाए जाते है 

पीपल पारस भी बहुत विरले ही दीखता है  





कच्चा रुद्राक्ष  



















पारद के  ढाई टन के शिवलिंग 


अभी के नागाबाबा  श्री सनातन  गुरु जी   


पारस  पीपल का पेड़  


 कल्पतरु का पेड़ 


शिवलिंग के विहंगम दृश्य   




शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

मन्दसौर का पशुपतिनाथ मन्दिर


*मन्दसौर का पशुपतिनाथ मन्दिर*




पशुपतिनाथ भगवान 



आज मैँ  आपको अपने बचपन के शहर मंदसौर ( मध्य प्रदेश ) की सैर करवा रही हूँ :---

मैँ मन्दसौर 4 साल रही हूँ, जब मैँ 9th में थी तब इस शहर में मेरे पापा का ट्रांसफर हुआ था .. मेरे पापा पुलिस डिपार्टमेंट  में थे यहाँ के नई आबादी पुलिस स्टेशन पर अधीक्षक के पद पर कार्यरत थे ।  ,वही  पीछे  हमारा छोटा सा सरकारी बंगला था। .....आजकल  यहाँ पुलिस  हेड क्वार्टर बना हुआ है ।
पुलिस विभाग जिला  मन्दसोर संभाग को माल वाला संभाग कहते है क्योकि यहाँ अफीम की खेती होती है और जब अफीम उगती है तो तस्करी भी होती है ।



1974 में (Ncc कैप्टन ) उस समय के S P पुलिस और केंद्रीय नेता के साथ मैं  



 मध्यप्रदेश जिसे भारत का दिल कहते है ,,,,, यह शहर इसी राज्य का जिला है ..... बड़ा शहर है.....  इसको गेहूं और लहसुन की बड़ी मण्डी के रूप में जाना जाता है । यहाँ प्राकृतिक खनिज सम्पदा भी बहुत है सफ़ेद पेन्सिल स्लेट यहाँ की खनिज सम्पदा है  और पेन्सिल  बनने के कारखाने भी काफी  है । 

यहाँ 2 चीजे  बहुतयात में होती है एक तो लहसुन जिसे सफ़ेद सोना  कहते है और दूसरी  अफीम जिसे काला सोना कहते है .....कई लोग सफ़ेद स्लेट को भी सफ़ेद सोना कहते है  ।
अफ़ीम की खेती करने के लिए  सरकार की परमिशन जरूरी होती है ,जब अफ़ीम के पट्टे सरकार देती  थी तब हमारे स्कूल  की  छुटियां होती थी  (पट्टे  देना मतलब अफीम की खेती  करने की परमिशन देना ) क्योकि स्कूलों में ही लोगों  को पट्टे दिए जाते थे  उसके बगैर खेती करना गैर क़ानूनी  था ........ काफी मात्रा में किसान अपनी बैलगाड़ियों से आते थे तब हम छुट्टियों का मजा लेते थे  ।

 जब खेतों में अफ़ीम के फूल आते थे तो तबियत खुश हो जाती थी। ...क्योकि  रंग बिरंगे फूलों से सारे खेत सज जाते थे ....फूल के बाद उसमे फल लगते थे जिन्हे डोडे कहते है ।  जब डोडे  कच्चे ही रहते है तो उनमें ३ या ४ लाईने खींच देते है जिनसे दूध सा निकलता है और  धीरे धीरे वो दूध जम जाता है ,जब अच्छी तरह से दूध जम  जाता है तो डोडे तोड़ लेते है और उस जमे हुए दूध को निकलते है जो अफीम होती है। ....

उन डोडो में भी खसखस भरी होती है जिसे पोस्तादाना कहते है। . कहते है उन डोडो में भी नशा होता है यदि उनको उबालकर प्रयोग किया जाय  तो काफी नाश आता है ।  ,नशा करने वाले इसका प्रयोग करते है वैसे यदि किसी को दस्त लग जाये तो  इनको  उबालकर पिने से ठीक हो जाते है ।
जिला मन्दसौर यहाँ के फेमस मन्दिर से भी प्रसिध्य है । यह  एक शिव मन्दिर है जिसे पशुपतिनाथ मन्दिर कहते है। वैसे नेपाल में भी पशुपतिनाथ (भगवान शंकर ) का मन्दिर है पर उसमें भगवान शिव की चारमुखी मूर्ति है जबकि यहाँ पर अष्टमुखी मूर्ति है जो की लिंग रूप में स्थापित है। ...


यह मंदिर शिवना नाम की नदी के तट पर बसा है। .... यह मंदिर पश्चिममुखी हैं....   इस मन्दिर की ऊंचाई 101 फिट है ... 90 फ़ीट लम्बा और 30  फ़ीट चौड़ा है।  मन्दिर के शिखर पर 100 किलो वजनी सोने  का कलश है जिस पर 51 तोला सोने का पतरा राजमाता श्रीमती विजयाराजे सिंधियां द्वारा 26 जनवरी 1966 को चढ़ाया  गया था.....  


और यह एक मात्र ऐसा मन्दिर है जहाँ सावन के हर  सोमवार को शिवजी का सर्व मनोकामना सिद्धि अभिषेक होता है जो की विश्व के किसी भी शिव मन्दिर में नहीं होता।

ये शिव मूर्ति 7.5 फिट है और इस मूर्तिपर बाल्यावस्था, युवावस्था, अधेड़ावस्था और वृध्यावस्था की झलक दिखलाई देती है। यहाँ हर साल कार्तिक एकादशी से मार्गशीर्ष कृष्ण पंचमी तक  एक  मेले का आयोजन होता है जहाँ नाना  प्रकार के झूले होते है ।लोग दूर दूर से इस मेले का आनन्द उठाने आते है । 

   
इतिहास :--
इस मूर्ति का इतिहास 75 साल पुराना है  बड़ा ही विचित्र है ...कहते है--- एक धोबी को स्वप्न में भगवान शिव ने दर्शन दिए और कहा की -- ''जिस पत्थर पर तू कपडे धोता है  वो मैँ हूँ ! तू यही मेरी प्राण प्रतिष्ठा करवा दे ।"
 तब धोबी ने सबको अपने स्वप्न की बात बताई तो लोगो ने पहले तो विश्वास नहीं किया पर उसके अडिंग विश्वास को देखते हुए 19 जून 1940 को उस पत्थर को सीधा किया तब ये 1500 साल पुरानी प्रतिमा के दर्शन हुये पर किसी ने स्थापित नहीं किया। ....

21 साल तक ये मूर्ति शिवना नदी के किनारे ज्यो की त्यों पड़ी रही फिर 23 नवम्बर 1961 को चैतन्य आश्रम के स्वामी प्रत्याक्षा्नन्द महाराज ने इस मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करवाई और पशुपतिनाथ नामकरण किया। ....

इस मन्दिर की धारणा यह है की हर बारिश में शिवना नदी अपना प्रचण्ड रूप इख़्तियार कर लेती है और भगवान  पशुपतिनाथ के पैरो को छूने मंदिर तक आती है और उस समय शहर में बाढ़  जैसी स्थिति हो जाती है कई बार तो शहर की गलियो में नावे चलने लगती है  लेकिन भगवान पशुपति के पैर छूकर पानी तुरन्त उतर  जाता है ।  उस समय पुलिस वाले  बेचारे रातदिन लगे रहते है । 





॥ जय महाराज पशुपतिनाथ की जय ॥ 


पैरो को छूती शिवना नदी 




मन्दसौर शहर 
++











अफ़ीम के फूल और डोडे 





अफीम के फूल 




अफीम के डोडे  :--इसमें से खसखस निकलती है जिसे पोस्तदाना भी कहते है 



इन डोडो में चीरा लगाते है और जब इनका दूध पक जाता  है तो वो अफ़ीम बनता है




(सभी फोटो गूगल बाबा के सौजन्य से )