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बुधवार, 23 अगस्त 2017

यात्रा जगन्नाथपुरी ( YATRA JAGANNATHPURI -- 10 )



* यात्रा जगन्नाथपुरी * 
भाग  -- 10
काशी विश्वनाथ  





28 मार्च को मेरा जन्मदिन था और इसी  दिन मैं अपनी सहेली और उसके परिवार के साथ जगन्नाथपुरी की यात्रा को निकल पड़ी |

4 अप्रैल 2017 

कल बहुत थकान के कारण जो नींद आई तो बस सुबह नींद ही नहीं खुली फिर एकदूसने ने आपस में उठाया और तैयार हुए और निकल पड़े पैदल ही काशी विश्वनाथ के दर्शन करने। ..... 

काशी विश्वनाथ मंदिर;---
वाराणसी मंदिरों का शहर भी कहलाता है इसके हर चौराहे पर एक मंदिर स्थित है। काशी विश्वनाथ मंदिर ज्योतर्लिंग भी है इसलिए इसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है। इसका वर्तमान स्वरूप इंदौर की महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने सन 1780 में किया था ,इस मंदिर के शिखर के लिए सन 1839  में सोना पंजाब के शासक पंजाब केसरी सरदार रणजीत सिंह ने दिया था।अब ये मंदिर सरकार की देखरेख  में है ।   
 इस मंदिर को मुगल सम्राट ओरंगजेब ने ध्वस कर दिया था और मस्ज़िद का निर्माण कर दिया था। बाद में अलग और नजदीक ही इस मंदिर का पुनः निर्माण हुआ। यहाँ और भी अनेक प्रसिध्य मंदिर है।  


सुबह रोड खाली था और हम जहाँ रुके थे वहां से मंदिर ज्यादा दूर नहीं था हम जल्दी ही मंदिर के प्रगांढ़ में पहुंचे पर ये क्या? यहाँ तो काफी लम्बी लाईन लगी थी और पुलिस की फ़ौज खड़ी थी हम भी लाईन में लग गए।  लेकिन कुछ देर बाद एक लड़का आया जो एक आदमी के 200 रु लेकर हमको जल्दी शॉर्ट कट रास्ते से अंदर जाने को बोलने लगा ,मुझे बहुत गुस्सा आया मैंने उसको डांट कर भगा दिया। लेकिन वो पीछे कहा छोड़ने वाला था फिर हमारे पीछे लग गया आखिर में मोलभाव कर के हमको 500 रु में लेकर जाने को तैयार हो गया. 

हमको लेकर वो पास की गली में चला गया काफी दूर चलकर जाने के बाद हमको एक गेट दिखा जहाँ पुलिस खड़ी थी और एक- एक कर के अंदर गली में जाने दे रही थी ,हमारा वाला छोकरा भी पुलिस के पास जाकर कुछ गुटरगूं  किया और हमको भी अंदर जाने दिया।  अंदर जाकर हम लाईन में खड़े हो गए और मंदिर में प्रवेश किया जल्दी ही हम जंजीरो से जकड़े ,रेलिंग लगे काशी विश्वनाथ को देख रहे थे। हमारे हाथ में पकड़ा दूध और फूल फेंकते हुए पुलिस वालो ने हमको बहार खदेड़ दिया और हम मुर्ख बने बहार निकल अपने आपको शहंशाह समझ आगे बढ़  गए अगली मंजिल की ओर। ..और आगे पंडितो ने हमको ठग लिया पूजा के नाम पर और हम भी अपने आपको चंगेज खां समझते हुए 500 -500 का पत्ता लुटा आये। 
  
मुझे सिर्फ इस बात का दुःख है की  मुझे मंदिर में ठीक से हाथ भी जोड़ने नहीं दिया गया और मैं अपने आराध्य देवता को ठीक से देख भी नहीं पाई। क्या फ़ायदा इतनी दूर से हम आते है और भागमभाग में रहते है।  

इतिहास ;--

चलिए अब कुछ रौशनी डाली जाये वाराणसी के इतिहास पर 

वाराणसी यानी बनारस यानी काशी उत्तरप्रदेश का बहुत प्रसिध्य शहर है। इसको भारत का प्राचीन शहर भी कहते है। हिन्दू धर्म में इसको पवित्र नगरी माना  गया है। शास्त्रीय संगीत का बनारस घराना यही जन्मा  और यही विकसित हुआ है। यहाँ कबीर , रविदास, स्वामी रमानन्द,वल्ल्भाचार्य,मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद,पंडित रविशंकर, पंडित हरी प्रसाद चौरसिया,और उस्ताद बिस्मिल्लाह खां इसी शहर की देन है। 
कहते है इस शहर को शिव ने बसाया था यहाँ की बनारसी साड़ियां विश्वभर में प्रसिध्य है। यहाँ का पान ,कलाकंद ,इत्र और रेशमी कपड़ा भी प्रसिध्य है। 
यहाँ गंगा नदी के किनारे कई घाट बने है जिनकी अपनी ही विशेषता है ;--
1. दशमेश घाट ;-- यह घाट ब्रह्माजी ने बनाया है और यही गंगाजी की आरती होती है। 
2. मणिकर्णिका घाट ;-- यह घाट शिव को समर्पित है यहाँ शव जलाये जाते है। 
3. सिंधिया घाट ;-- इस घाट को ग्वालियर की महारानी ने बनवाया था। 
4. मानमंदिर घाट ;-- इसको जयपुर महाराजा द्वितीय ने बनवाया था।  
5. ललित घाट ;-- इस घाट को नेपाल नरेश ने बनवाया था। 
और भी अनेक घाट बने हुए है। 
  
अब हम आराम से बाहर निकलकर पैदल ही चल दिए ,सबसे पहले तो पेट के चूहों को शांत किया ,बनारस की गरमा गर्म कचौरी और जलेबी से फिर निकल पड़े बनारस की गलियों से होते हुए गंगाजी के घाट पर। 
घाट पर हमने एक नाव किराये पर ली और हम भी बह चले गंगाजी की मोझो के साथ .... 
नाव का किराया 700 रु अदा किया गया था। 

नाव में एक घंटा घूमकर हमने सारे घाटों का जायजा लिया और बीचो बीच गंगाजी के गए जहाँ शांत भाव से गंगाजी बह रही थी और मुझे स्वर्गीय भूपेंद्र हजारिका का गाना याद आ रहा था ----

''विस्तार है अपार 
प्रजा दोनों पार 
करे हाहाकार 
निःशब्द  सदा     
ओ गंगा तुम 
ओ गंगा बहती हो क्यों .........  

यात्रा जगन्नाथ पुरी की समाप्त। 


नदी में डूबा मंदिर 












हमारी नाव 



 बीचोबीच ठहरी हुई गंभीर गंगा  







फाइव स्टार होटल वालो की नाव 




काशी विश्वनाथ मंदिर ( चित्र -गूगल )




गंगा आरती ( चित्र -गूगल )








2 टिप्‍पणियां:

Dev Rawat ने कहा…

अब का तो पता नहीं पर बनारस के ठग मशहूर हुआ करते थे इसलिए इसे ठगों का सहर भी कहते थे

स्वाति ने कहा…

बहुत ही रोचक वर्णन। एक बार में ही पूरे 10 भाग पढ़ लिए,मन प्रसन्‍न हो गया। आप बहुत ही सरल सरस लिखती है। बधाई।