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सोमवार, 11 मई 2026

मेरी जगन्नाथपुरी यात्रा

मेरी जगन्नाथपुरी यात्रा
भाग★6 (अंतिम)



8 फरवरी 2026

4 फरवरी की रात 12:15 पर हमारी ट्रेन LTT रेल्वे स्टेशन बॉम्बे से निकली और हम 6 फरवरी सुबह 12 बजे पूरी पहुँच गए । शाम को हमने श्री जगन्नाथ जी के दर्शन किये । कल हमने पूरी के अन्य मन्दिर देखे थे ...आज हम साक्षी गोपाल मन्दिर गये।
अब आगे.....

साक्षी गोपाल मन्दिर देखकर हम कोणार्क मन्दिर की तरफ चल दिये।रास्ते मे चंद्रभागा बीच पर कुछ देर रुककर हम आगे सूर्य मन्दिर देखने पहुँचे।

सारा मन्दिर टूट गया है फिर भी कुछ अवशेष बाकी है ।नृत्य करती मूर्तिया ओर रथ के चक्र अभी बाकी हैं।

इतिहास:--
ओडिशा के पुरी जिले में चंद्रभागा नदी के तट पर स्थित कोणार्क सूर्य मंदिर (13वीं सदी) वास्तुकला का एक अद्भुत उदाहरण है। राजा नरसिंह देव प्रथम द्वारा निर्मित यह मंदिर सूर्य देव के विशाल रथ के आकार का है, जिसमें 12 जोड़ी पहिये और 7 घोड़े हैं, जो समय को दर्शाते हैं। 1984 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित यह मंदिर अपनी नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है।

लोक मान्यता:--
 पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण के पुत्र सांब ने कुष्ठ रोग से मुक्ति पाने के लिए यहां सूर्य देव की तपस्या की थी। 
यह मंदिर सुबह 6:00 बजे से शाम 8:00 बजे तक खुला रहता है।
भारतीयों के लिए 40रु और विदेशियों के लिए 600 रु टिकिट हैं।

इसका निकटतम हवाई अड्डा भुवनेश्वर 65 किमी दूर हैं।

बहुत भीड़ भाड़ वाले सूर्य मन्दिर को देखने पूरी के मन्दिर के बाद सभी लोग इधर  आते हैं।और देखकर बहुत अचंभित होते है।

 पहियो पर बनी कलाकृतियां देखने लायक है। जब मैं 2018 में आई थी तब इसके काफी हिस्से अच्छे थे पर अब काफी बड़ी साइज़ की प्रतिमाएं गिर गई हैं।

सूर्य मन्दिर में पूजा नही होती है ।
सूर्य मन्दिर देखकर हम वापस पूरी शहर को लौट आये।

कमरे में कुछ देर आराम कर के हम आज पे वाले बीच पर पहुँच गए।

 इस बीच को "ब्लू फ्लैग बीच" का खिताब मिला है। यहाँ 50₹का टिकिट था। टिकिट निकालकर अब हम एक साफ सुथरे बीच पर बैठे थे। कुछ लोग स्नान कर रहे थे और कुछ पतंग उड़ा रहे थे।हम कुछ देर इस मनमोहक दृश्य को देखते रहे।

 यहाँ का सूर्य पानी में नही डूबता है अलग डूबता हैं। अक्सर मैंने सूरज समुद्र के पानी मे डूबते हुए देखे है।यहाँ बात जुदा थी☺️ सूर्यअस्त के बाद हम यहां से चल दिये।

ऑटो वाले ने हमको जगन्नाथ मन्दिर के पूर्वी गेट पर उतार दिया और हम मन्दिर के बाहर से दर्शन कर बाजार से होते हुए अपने होटल वापस लौट गए।

इस तरह मेरी जगन्नाथपुरी की ये यात्रा कम्प्लीट हुई।

जय जगन्नाथ🙏



मेरी जगन्नाथ यात्रा

मेरी जगन्नाथपुरी यात्रा
भाग★5


8 फरवरी 2026

4 फरवरी की रात 12:15 पर हमारी ट्रेन LTT रेल्वे स्टेशन बॉम्बे से निकली और हम 6 फरवरी सुबह 12 बजे पूरी पहुँच गए । शाम को हमने श्री जगन्नाथ जी के दर्शन किये । कल हमने पूरी के अन्य मन्दिर देखे थे ...
अब आगे.....

कल हमने पूरी के अन्य लोकल मन्दिर देखे और आज हम कोणार्क सूर्य मन्दिर देखने निकले है।

कल मैंने एक ड्राइवर को बोलकर एक कैब बुक की थी जो हमको सूर्य मन्दिर ओर साक्षी गोपाल मन्दिर के दर्शन करवा सके।टोटल 2200 सों रु।

सुबह उठकर होटल के रेस्तरां में बढ़िया नाश्ता किया फिर पैदल चौक तक निकल गए।यहाँ तो कार आती नही है सबको 200 मीटर दूर चौक तक जाना होता है।

चौक पर पहुँचकर हम कार में बैठे और आगे का सफर तैय करने लगे।
सबसे पहले हम " साक्षी गोपाल" मन्दिर पहुँचे। इसको "सत्यवादी गोपीनाथ मन्दिर" भी बोलते है। यह मन्दिर पुरी से 20 km दूर है। ये मन्दिर भगवान कृष्ण को समर्पित है।
यहाँ बिल्कुल भीड़ नही थी हमने आराम से दर्शन किये।

यहाँ पंडित लोगो का बहुत आतंक है।पर हमको पहले से पता था तो हम किसी के झांसे में नही आये।
यहाँ का इतिहास इस प्रकार है कि:---
" कहते है कि जगन्नाथ पुरी की यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक भक्त साक्षी गोपाल मंदिर के दर्शन नहीं कर लेते। यह दुनिया के उन दुर्लभ विष्णु मंदिरों में से एक है जहाँ भगवान को प्रसाद के रूप में चावल के बजाय गेहूं (जैसे पूरी या लप्सी) का भोग लगाया जाता है。
मंदिर का निर्माण पारंपरिक कलिंग शैली में किया गया है, जो इसकी भव्यता और ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है।

आंवला नवमी मंदिर का सबसे बड़ा उत्सव है। साल में केवल इसी दिन भक्तों को देवी राधा के चरणों के दर्शन करने का अवसर मिलता है।

पौराणिक कथा:- 
एक वृद्वय ओर एक युवा ब्राह्मण वृंदावन की यात्रा पर गए थे रास्ते मे युवा ब्राह्मण ने वृद्वय ब्राह्मण की बहुत सेवा की जिससे खुश होकर वृद्वय ब्राह्मण ने अपनी इकलौती लड़की की शादी उससे करवाने का वचन दिया था। परन्तु यात्रा खत्म होने के बाद गांव लौटकर आने पर वृद्वय ब्राह्मण अपने वचन से मुकर गया तो दुखी हो युवा ब्राह्मण ने भगवान कृष्ण से गवाही देने की विन्नति की। भगवान उसकी साक्षी यानी कि गवाही देने के लिए तैयार हो गए परन्तु उन्होंने एक शर्त रखी कि –– "तुम आगे-आगे चलना ओर मैं पीछे-पीछे चलूंगा। तुम पीछे मुड़कर मत देखना"
तब भक्त बोला कि–-" प्रभु मुझे कैसे पता चलेगा कि आप पीछे आ रहे हो?"
तब भगवान बोले कि––" मेरे घुधरुओ की आवाज़ तुमको सुनाई देती रहेगी।"
तब ब्राह्मण अपने गांव पहुँचने ही वाला था कि अचानक आवाज़ आनी बन्द हो गई तो धबराकर ब्राह्मण ने पीछे मुड़कर  देख लिया। बस भगवान वही पत्थर के बन गए ।पर उन्होंने वही रुककर ब्राह्मण के सत्य की गवाही दी इसीलिए इस मन्दिर को साक्षी गोपाल मन्दिर बोलते है।

यहाँ पर ब्राह्मण लोग नाम पता लिखकर पैसे लेते है और बोलते है कि आप इस मन्दिर में आये तो उसकी गवाही यही है।परंतु मैंने ऐसा कुछ नही किया हमने भगवान के दर्शन कर लिए यही हमारे लिए काफी है।

यहाँ भगवान के भोग के आटे के लड्डू ओर गुड़ के पकोड़े जैसे कुछ मिलते है जिसे स्थानीय भाषा मे पता नही क्या बोलते है।

उसके बाद हम आगे "रेत की कारीगरी" देखने गए मतलब "सेंड म्यूज़ियम" यहाँ रेती से बहुत सुंदर कलाकारी की गई थी।पर इससे पहले मैं मैसूर का देख चुकी थी तो मुझे ज्यादा पसन्द नही आया।वैसे धूप और गर्मी के कारण कुछ मजा भी नही आ रहा था।अगर शाम को देखा जाय तो जरूर अच्छा लगेगा।

पोस्ट लंबी हो जाने से यही विश्राम देती हूं अगला मन्दिर सूर्य मन्दिर का वर्णन हम नेक्स्ट भाग में करेगे।

जय जगन्नाथ🙏



 

मेरी जगन्नाथ यात्रा

मेरी जगन्नाथपुरी यात्रा
भाग★4



7 फरवरी 2026

4 फरवरी की रात 12:15 पर हमारी ट्रेन LTT रेल्वे स्टेशन बॉम्बे से निकली और हम 6 फरवरी सुबह 12 बजे पूरी पहुँच गए । शाम को हमने श्री जगन्नाथ जी के दर्शन किये । आज हम सुबह से निकले है पूरी के अन्य मन्दिर देखने ...


अब आगे.....
हमने अलारनाथ,बेड़ी हनुमान ओर नरेंद्र तालाब मन्दिर के दर्शन किये थे ।
अगला मन्दिर पुरी से 5-6 km दूरी पर था ।जिसका नाम था " गुप्त वृंदावन" कहते है यहाँ वृंदावन की आध्यात्मिक ऊर्जा मौजूद है इसलिए लोग इसको गुप्त वृंदावन बोलते है वैसे इसको "श्री गौर विहार आश्रम या माता मठ के नाम से भी पुकारते है।"
यह मन्दिर चैतन्य महाप्रभु की साधना से भी जुड़ा हुआ है।
इस मन्दिर में काफी सुंदर पौराणिक दृश्यों से चित्रित सजी मूर्तिया बनी हुई थी।जो देखने मे बहुत सुंदर नजर आ रही थी। एक बड़ा चक्र भी था।मैंने यहाँ पर जीभर कर फोटू खिंचे।
यहाँ भगवानशिव,विष्णु,हनुमान,कृष्ण की ओर चैतन्य महाप्रभु की मनमोहक प्रतिमाएं थी।

यहाँ कई जगह सेल्फी पॉइंट भी बने हुए थे जिधर लोग अपनी तस्वीरे उतार रहे थे।बीच मे बड़ा सा तालाब भी था।


इस मंदिर में टिकिट था । परन्तु सफाई नदारत थी इतने अच्छे मन्दिर का मेंटनेंस न के बराबर था।


इस मन्दिर में थोड़ी भीड़ थी।सबसे पहले हमसे बोला गया कि लंगर चालू है अगर किसी को खाना खाना हो तो जा सकते हो।


हमने भी सुबह नाश्ता किया था फिर कुछ  खाया नही था तो हमको भी भूख लगने लगी थी तो हम उस तरफ चल दिये जिधर बोला गया था।


आगे जाकर देखा तो ये एक छोटा -सा खुला एरिया था जिधर टेबल कुर्सियों पर लोग खाना खा रहे थे ।वातावरण एकदम देशी था। पंडित जैसी वेशभूषा में लोग खाना परोस रहे थे। यहाँ लंगर फ्री नही था,एक आदमी का 80 रु चार्ज था। खाना अनलिमिटेड था जितना खाना हो खाओ। तो मैंने 160 रु के 2 कूपन कटवाए ओर पत्तल लेकर हमदोनो एक खाली टेबल पर बैठ गए।


यहाँ हमको सब्जी,दाल, चावल दिए गए। रोटी नही थी । सब्जी बहुत टेस्टी थी। लास्ट में दी गई मीठी चटनी तो कमाल की थी। खाना स्वादिष्ट था। वैसे भी लंगर का खाना स्वादिष्ट ही होता है।हम दोनों के पेट फुल हो गये थे।  इतना टेस्टी खाना सिर्फ़ 80 रु में काफी सस्ता था पर बाथरूम जाना उतना ही महंगा था😂 हम 10-10 ₹ देकर बाथरूम में फ्रेश हुये।


बाद में हमने सारा मन्दिर देखा जो काफी बड़ा था । हमने काफी इंजॉय किया और ऑटो वाले के बार बार बुलाने पर आखिर मन न होते हुए भी हम मन्दिर से बाहर आ गए।


अब हम आखरी मन्दिर की तरफ चल दिये जो पुरी से 3-4km दूरी पर है। इस मन्दिर को "ओंकारेश्वर" मन्दिर के नाम से जाना जाता है और भगवान शिव को समर्पित है।

 
यहाँ गेट पर नन्दी की विशाल प्रतिमा थी जो भगवान शिव की तरफ मुंह कर के बैठी थी। यहाँ 108 शिवलिंग भी थे।इस मन्दिर में भी बहुत सी प्रतिमाएं थी  और काफी खूबसूरत थी।यहाँ भी एक चक्र था जो काफी बड़ा और काफी भारी था जिसे सब चला रहे थे।मैंने ओर मिस्टर ने भी उस चक्र को घुमाया पर भारी होने से हमसे बरोबर घुमा नही☺️ फिर हम एक हॉल में गए जिधर 108 शिवलिंग बने हुए थे। उनके दर्शन कर भगवान ओंकारेश्वर के दर्शन कर के हम बाहर आ गए।


3 बजे हम वापस होटल में आ गए ।
कुछ देर आराम कर के हम 5 बजे फिर से बाहर निकले और गोल्डन बीच पर पहुँचे। लेकिन आज हम लेट हो गए बीच पर पहुँचे तो अंधेरा हो गया था।मुझे लगा था कि हम सूर्यास्त तक पहुँच जायेगे पर बीच पर अंधेरा हो गया था। हम ने वहाँ गोलगप्पे खाये पर इतने घटिया गोलगप्पे मैंने जिंदगी में कभी नही खाये थे 😅 पुरी प्लेट खाये बगैर ही हम आगे चल दिये।थोड़ी देर दुकानों पर कुछ देखा पर कुछ खास नही था तो हम कुछ देर अंधेरे में घूमकर वापस होटल को चल दिये।


शेष अगले भाग में
जय जगन्नाथ🙏