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शनिवार, 7 जुलाई 2012

नैनीताल भाग 10 कौसानी 2


नैनीताल भाग 10 -- कौसानी 2 


कौसानी की एक सुबह 


13 मई 2012:--






रात को हम ऐसे सोये की कुछ पता ही नहीं चला ...सुबह जल्दी तो उठना नहीं था क्योकि हमें मालुम था की सूर्योदय तो दिखाई देगा नहीं ?  पर फिर भी पहाड़ पर आओ और सुबह की सैर न करो तो पहाड़ पर आने का क्या मतलब कुछ मज़ा नहीं आता इसलिए सबको उठाया पर कोई उठने को तैयार ही नहीं था आख़िरकार हरिजी को उठाया और चल पड़े पहाड़ घुमने को ...
बहुत ही खुबसूरत नजारा था ..पहाड़ों पर दूर तक सूरज की किरने मचल रही थी ..ठंडी भी बहुत थी मैने तो शाल ले रखा था पर बड़ा ही आन्नद आ रहा था ,अफ़सोस था सिर्फ फोटू का, सेल  डाउन होने के कारण फोटू खिंच नहीं सकी ..मोबाईल से ही कुछ फोटू खिंच पाई ....

कौसानी में लम्बे -लम्बे पेड बहुत ही सुंदर लग रहे थे ..ऊंचे -ऊँचे पहाड़ उस पर लहराते टेढ़े -मेढ़े रास्ते ..जब हम काफी दूर निकल गए तो वापसी के लिए चल पड़े ..अभी मैं पलट ही रही थी की कुछ लाल बंदरो के झुड पेड़ से कूद पड़े ..मैने सोचा की फोटू उतारू पर मोबाईल भी अपनी अंतिम साँसे ले रहा था ...इतने में अचानक एक बन्दर ने  मेरी  पीछे से टांग पकड ली .. 'अरेरेरेरेरे..मैं जोर से चिल्लाई, पर उसने मेरी टांग नहीं छोड़ी ..इतने में हरिजी जो थोडा आगे चल रहे थे पलटकर आए और दूर से एक और आदमी आ रहा था वो भी जोर से चिल्लाया तब उस नटखट बन्दर ने पीछा छोड़ा ...अब, हरिजी कहने लगे आप पर तो हनुमानजी की विशेष कृपा हो गई जी ..मेरा तो डर के मारे बुरा हाल था ..और हंसी भी आ रही थी ..हम  काफी देर तक हँसते रहे ... तब तक दुकाने खुल गई थी हमने एक दुकान में जाकर गरमा गरम चाय पी..और होटल लौट आये ...लाईट आ गई थी ..पहले सेल चार्ज करने रखे ....सारे मोबाईल भी रखे ... 

टेढ़े -मेढ़े  रास्ते 


ऊपर छोटा -सा लाल रंग का जो घर दिख रहा है वो अनाशक्ति आश्रम है 





सुबह का अलसाया चेहरा 


पर इधर आलस का नमो- निशान नहीं .. हमेशा की तरह खुश ..

यह है कविता विष्ट ..होटल की केयर टेकर-कम- रिसेप्शनिष्ट- कम- मालकिन ..हरिजी की इनसे दोस्ती हो गई ....और मेरी भी .... 


होटल  pine  और दूर खड़े बातूनी  हरिजी  ..बातो में मशगुल ...


हरी जी और मैं ----सुबह की सैर के बाद 


कमरे में आकर हम नहा धोकर निचे उतरे --मंगलसिंह जी आ गए थे --हमने सारा सामान  गाडी में रखवाया और नाश्ता करने निचे  रेस्टोरेंट में चल  दिए ...नाश्ता करके करीब 11 बजे हम चल दिए .. पाताल   भुवनेश्वर  देखने ...पाताल भुवनेश्वर  यहाँ से 70 किलो मीटर दूर है ऐसा मंगल सिंह जी ने बताया --हम दोपहर तक पहुँच जाएगे ऐसा उन्होंने बताया ... रास्ते में हमने काफी मस्ती की ..अन्ताक्षरी का दौर चला तो चलता गया ....हरी जी ने कुछ कविताएं सुनाई और मंगलसिंह जी ने वहाँ के गढ़वाली  लोक गीत सुनाये और साथ ही उन गीतों का अर्थ भी समझाया तो शमा बंध गया ...कैसे रास्ता कट गया पता ही नहीं चला .. पर शायद हमारी किस्मत में वहां जाना लिखा ही नहीं था, कैसे ? देखते है ....


यह है गरुड़  एक छोटा सा गाँव --यहाँ सिर्फ S B I बैंक ही है 



इस  जगह का नाम नहीं मालुम पर देखने से बहुत ही सुंदर गाँव लगा तो रुक कर कुछ फोटू खिंचवाए 


बहुत ही सुंदर जगह 


 चौकोड़ी गाँव 



मिस्टर और मंगलसिंह जी खाने में व्यस्त 



3 बजे हम चौकोड़ी गाँव पहुंचे ..कुछ भूख भी लग रही थी और इसके बाद खाना कहीं मिलना ही नहीं था सो,खाना खाने रुक गए  ..खाना ठीक ही था ...कढ़ी -पकौड़ी और चावल ..आन्नद आ गया ...शर्माजी कढ़ी नहीं खाते थे तो उन्होंने आमलेट खाया .. हमें यही 4 बज गए ..आगे की यात्रा के लिए हम फ्रेश होकर निकल पड़े ..चौकड़ी से चलने के बाद हमें पता चला की अभी तो हम आधे रास्ते में ही है और वहां तक पहुँचने में हमें शायद रात हो जायगी और रात को वहां रुकने की कोई जगह नहीं है ..हमें वापस चौकोडी ही आना पड़ेगा रात रुकने के लिए पर चौकोड़ी भी मेरे ख्याल से ज्यादा ठीक जगह नहीं लगी ...यह सब बाते हमको रास्ते में करीब 6 बजे मालुम हुई जब रास्ता बहुत खराब हो गया तो मिस्टर ने वापस चलने को कह दिया ..क्योकि उन्हें उल्टियां होने लगी थी इधर शर्माजी की तबियत भी खराब हो रही  थी और निक्की को भी धबराहट हो रही थी ..तो हम वापसी के लिए चल दिए ....सबकी राजी समझकर मैनें  भी वापसी के लिए हाँ  कर दी  ...

हम वापस लौट चले ..हमारी सबसे बड़ी गलती थी की हम सुबह देर से निकले फिर हमें ठीक से पातळ -भुवनेश्वर  की दुरी का पता नहीं था ..और बार -बार रुकने से टाईम की खराबी हुई जो अलग ..हमारा पूरा दिन खराब हुआ और हमने कुछ नहीं देखा ....खेर ऐसा होता है  ..पर उस दिन हमने बहुत आनन्द किया ...

रात को 10 बजे तक हम वापस शर्माजी के घर सोमेश्वर  आ गए "लौट के बुद्धू घर को आये " ......


सामने के होटल से शर्माजी ने खाना मंगवाया ...मेरा तो थकान से बुरा हाल था ...लेटते ही नींद आ गई ! सुबह और कई स्थानों की यात्रा का प्रोग्राम बनाया... पर बच्चों का मन ख़राब हो चूका था ..सबने एक ही स्वर मैं कहा वापस नैनीताल ही चलेगे ....और हम वापस नैनीताल को चल दिए ....

जारी ...


14 टिप्‍पणियां:

सदा ने कहा…

यात्रा वृतांत और चित्र सभी बेहद रोचक ... आभार आपका

डॉ टी एस दराल ने कहा…

हमारी भी यात्रा साथ साथ हो रही है, सुन्दर तस्वीरों के माध्यम से .
बढ़िया है जी .

Reena Maurya ने कहा…

रोचक यात्रा..
बहुत बढ़िया...
:-)

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

वाह बढ़ि‍या चि‍त्रण व वि‍वरण

मदन शर्मा ने कहा…

यात्रा का बहुत सुन्दर चित्रण जिसे चित्रों ने और भी जिवंत कर दिया ...और फिर चौकोडी के शाह भोजनालय में भोजन !!!वाह भाई वाह अब तो पेट भी भर गया है ...ठीक है अब चल के पाइन होटल में विश्राम कर लेते हैं ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (08-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

Rakesh Kumar ने कहा…

काला चश्मा,काला सूट
वाह! दर्शी जी निराला दर्श है आपका.

पर हनुमान जी की बात आपने क्यों नही सुनी.
अभी तक. मेरी समझ में तो हनुमान जी के दूत ने आपको
हनुमान लीला-५ की याद दिलाई है जी..

रविकर फैजाबादी ने कहा…

छायांकन खुबसूरती, है मनभावन साथ |
ताल शिखर घाटी सड़क, सब कुछ प्रभु के हाथ ||

amanvaishnavi ने कहा…

bahut badhiya maasi maa.aapke saath hum bhi ghoom rahe hain.thanks

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

दिलकश यात्रा वृतांत !

Pankaj Dosad ने कहा…

मैं भी कौसानी से ही हूँ,पर आपने जीतना भी कौसानी के बारे मैं लिखा है,बहुत खूब!

धन्यवाद
पंकज दोसाद

RITESH GUPTA ने कहा…

बहुत खूब दर्शन जी...
काफी अच्छा लिखा हैं आपने कौसानी के बारे....और फोटो तो उसमे चार चाँद लगा रहे हैं....|
धन्यवाद

Manu Tyagi ने कहा…

फोटोज ने समां बांध दिया

harshita joshi ने कहा…

कभी कभी होता है ऐसा भी