मेरे अरमान.. मेरे सपने..


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गुरुवार, 3 मई 2012

समर्पण ...



"आज उनसे पहली मुलाकात होगी "







आज मुझे उससे मिलना हैं 

 कार दौड़ रही हैं ...
और उससे भी तीव्र गति से मेरा मन दौड़ रहा हैं  ...
 सारी धरती दौड़  रही हैं ..
खिड़की से झांकती मेरी आँखें  ...
दू.. ऊऊररर  .. तक फैली हरियाली ....
गुनगुनाती फिजाए ..
हँसते नज़ारे ...
झूमते पेड ..
गिरते पात ..
पहाड़ों पर चढ़ती धूप ...
बहती नदी की कल -कल ध्वनी ...
दूर तक फैली ऊँची -ऊँची चोटियाँ ...
गहरी  धाटियाँ  ..
टेढ़े -मेढ़े  रास्ते ...
धुमावदार पगडंडियाँ...
पर्वत पर मंदिर ..
मंदिर पर लहराता ध्वज ...
प्रसाद  की खुशबु ..
घंटों की आवाजें ..
नगाड़ों की थापें ...
बांसुरी की धुन  ..
भक्ति की स्वर लहरियां .
आसमान में उड़ता हुआ धुँआ ...
अंदर तक मन को आनंद विभोर कर रहा हैं  ...!




आज मुझे उससे मिलना हैं ...

उसी से जिससे मैं प्यार करती हूँ ...
जिसपर मेरी कविताए समर्पित हैं ...
जो मेरे ख्यालों में बसता हैं ..
जो इन्हीं पहाड़ों का वाशिंदा हैं ...
मैं उससे परिचित नहीं हूँ ...?
कभी मिली भी नहीं हूँ ...
पर मेरे दिल पर उसी का 'राज'  चलता हैं ...?
पहाड़ों से मैं जरुर परिचित हूँ ...!
यहाँ मेरा दिल बसता हैं ...!
सुकून मिलता हैं ...?
मन करता हैं आँखें मुंद्द लू....
कुछ पल आराम कर लू ..
कितनी शांति हैं यहाँ ..
 मरघट की ख़ामोशी जरुर हैं ...
पर, जीवन की हलचल भी हैं .....



आज मुझे उससे मिलना हैं ...


कार दौडती बल खाते रास्तो पर चली जा रही हैं  ...
छोटे -छोटे घर इधर -उधर नजर आ रहे हैं  ...
जैसे थाली में मोती बिखरे हो ...
पतली -पतली पगडंडियाँ नसों में हरकत करती हुई प्रतीत हो रही हैं ...
ठंडा माहौल ...
बदन में रोमांच भर रहा हैं ..!
खिलें हुए फुल ..
मानो साँसों में ताजगी भर रहे हो ...!
गुलाबी चेहरें !
बेदांग धुले जिस्म !
भोली मुस्कान !
अधखुली आँखें !
प्यार से ओत -पोत शब्द !
जैसे कह रहो हो ----
" शाब  -मैंम शाब "
कितना अपना -पन लिए बोलती जुबान ....
मिठास तो ऐसी.... जैसे शहद घोल  दी हो ......!





आज मुझे उससे मिलना हैं


कैसा होगा वो ?
वो अजनबी शख्स ?
कठोर या निर्मल ?
प्यारा या बेजान ?
उसे मैं नहीं जानती ?
पर मन जरुर टटोला था मैनें ?
शायद, मुझ में समर्पित तो था वो ?
पर ----??????
कुछ आशंका हैं ?
मन डर रहा हैं ---
कहीं उसके दिल में मेरे लिए कोई जगह नहीं हुई तो ?
तो ???
सवाल कई हैं ????
पर ----?
मुझे आज उससे मिलना हैं --
 आज उससे वाकिफ होना हैं ---!
कुछ कहना हैं ???
वो जो अधुरा हैं ---
कुछ अनसुलझे प्रश्न हैं --जिन्हें खोजना हैं...?
जो तडप ! जो पीड़ा ! मेरी आँखों में बसी हैं ..
वो उसकी आँखों में भी देखना हैं ...?
 प्यार हैं या नहीं ? यह सोचना हैं .--
कुछ अनगिनत बातों को  बताना हैं ?
कुछ अनलिखे खतों के जवाब लेना हैं ?
उसका प्यार मेरा मुकद्दर हैं ...
आज उसको कहना हैं ..?




मुझे आज उससे मिलना हैं 


आज रस्में - उल्फत निभाना हैं ..
सदियों की प्यास को पल में बुझाना हैं...
 सारी दुनियां को छोड़कर जिसको मैनें पाया हैं  --
वो  कोई सपना नहीं एक हकीकत हैं ..
यह आज उसको बताना हैं ..
आज मुझे उससे मिलना हैं ....
आज रस्में -उल्फत निभाना हैं ....!
      

24 टिप्‍पणियां:

सदा ने कहा…

मुझे आज उससे मिलना हैं ... भावमय शब्‍द संयोजन रचना का ... बहुत खूब ।

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर भावमयी शब्द चित्र....

डॉ टी एस दराल ने कहा…

किस से मिलना है --यह तो अंत तक भी राज़ ही बना रहा .
लेकिन आप की रचनाओं में ताजगी भरा रोमांस होता है .
बढ़िया जी .

दर्शन कौर 'दर्शी' ने कहा…

डॉ. साहेब यह तो मिलने के बाद ही मालुम होगा न ..अंत क्या हुआ ?आज तो मिल ही रही हूँ ..

दर्शन कौर 'दर्शी' ने कहा…

थंक्स कैलाश जी....

दर्शन कौर 'दर्शी' ने कहा…

थेंक्स सदाजी ...जर्रा नवाजी का ...

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

यूं ही मिलना जुलना औ मुलाकात होती रहे,
इश्क-ए-रस्म-ओ-रिवाजों की बात होती रहे
बलखाती पगडंडियों पर हाथों में हाथ डाले
दिल-ओ-गमख्वार की बात-बेबात होती रहे।

जज्बात औ अरमां मचलते रहे
आसमां के तारे रंग बदलते रहें
बिजली सी कौंधे जब यादों की
सपनों में एक सरगम बजते रहे

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आज चार दिनों बाद नेट पर आना हुआ है। अतः केवल उपस्थिति ही दर्ज करा रहा हूँ!

sushma 'आहुति' ने कहा…

चित्र शब्दों क बयाँ कर रहे है.... या शब्द चित्र को बयाँ कर रहे है.... पर जो भी दिल के सारे एहसास उकेर कर शब्दों में आ गए है......

Reena Maurya ने कहा…

बहुत -बहुत सुन्दर प्रस्तुति..
सुन्दर रचना...

अजय कुमार झा ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत चित्रों के साथ ..एक चित्रहार सरीखी पोस्ट है दर्शन जी । आनंद और सुकून दोनों आ गए ..बहुत बहुत शुभकामनाएं

दर्शन कौर 'दर्शी' ने कहा…

thanx shastri ji ..

दर्शन कौर 'दर्शी' ने कहा…

Waah ! ajay ji aapka aana sukhad aehsas hei ...

दर्शन कौर 'दर्शी' ने कहा…

Reena Maurya ji aane ka tahe dil se shukriya ..

दर्शन कौर 'दर्शी' ने कहा…

sushmaji dil se nikle jajbaat hei ....

दर्शन कौर 'दर्शी' ने कहा…

जैसा चाहते थे हम उन्हें ...
वो भी हमें चाहते तो कोई बात होती ...
पाने का अरमान तो था ...
बिन मांगे मिल जाते तो कोई बात होती ...
इस दिल में कितना प्यार भरा हैं ...
वो भी जान लेते तो कोई बात होती ..
हमने मांगा था उन्हें खुदा से ...
वो भी मांग लेते तो कोई बात होती ..

दर्शन कौर 'दर्शी' ने कहा…

thanx lalitji ..is khubsurat kavita ke liae ...

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

सूचनार्थ: ब्लॉग4वार्ता के पाठकों के लिए खुशखबरी है कि वार्ता का प्रकाशन नित्य प्रिंट मीडिया में भी किया जा रहा है, जिससे चिट्ठाकारों को अधिक पाठक उपलब्ध हो सकें। 

वन्दना ने कहा…

बेहद भावमयी रचना…………आज उससे मिलना है …………वाह !!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
आपकी प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!
चर्चा मंच सजा दिया, देख लीजिए आप।
टिप्पणियों से किसी को, देना मत सन्ताप।।
मित्रभाव से सभी को, देना सही सुझाव।
उद्गारों के साथ में, अंकित करना भाव।।

amanvaishnavi ने कहा…

bahut sundar,dharshan jee.thanks

Rakesh Kumar ने कहा…

दू.. ऊऊररर .. तक फैली हरियाली ....
गुनगुनाती फिजाए ..
हँसते नज़ारे ...
झूमते पेड ..
गिरते पात ..
पहाड़ों पर चढ़ती धूप ...
बहती नदी की कल -कल ध्वनी ...
दूर तक फैली ऊँची -ऊँची चोटियाँ ...

बहुउ उ उ त सुन्दर दर्शी जी.
आपने शानदार नज़ारे का दर्शन
करवाते हुए जो दिल की बात
लिखी है वह दिल को छूती है.

आपकी काव्य प्रतिभा को नमन.

Manu Tyagi ने कहा…

वाकई , रचना के साथ साथ आपके लगाये गये चित्र गजब ढा रहे हैं
और उनसे रचना और भी सुंदर हो गयी है

सतीश सक्सेना ने कहा…

अलग अंदाज़ ...बहुत सुंदर !
शुभकामनायें आपको !