मेरे अरमान.. मेरे सपने..


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गुरुवार, 29 अक्तूबर 2015

मणियों की घाटी "मनिकरण"

# मणियो की घाटी #


भाग 2
कल शिमला से चले थे और रात हो गई मनिकरण पहुँचने में अब आगे :--
जैसे ही पहाड़ी पर पंचर हुआ हमारी सबकी नींद खुल गई - हम सब गाडी से उतर गए ...
बियाबनं जंगल सर सर की आवाजें बिलकुल फ़िल्मी स्टाइल में ;नदी का शोर , झिंगरुओ की आवाज़ माहौल को और भी भयानक बना रहे थे । दिल घबरा रहा था -"कहाँ फंस गए "?
उस पर आगे को झुके पहाड़ ,रास्ता भी सीमित ! सचमुच डर तो था पर रोमांच भी कम नहीं था ।पहाड़ी जंगल में फिर दौबारा आना कहाँ होगा ।बच्चे  तो मस्त खेलने लगे ।नीचे बहती पार्वती नदी खूब शोर मचा रही थी ।
ड्रायवर बोल रहा था -"मैडम ,यह पार्वती नदी जितनी दिन में शांत होती है रात में उतनी ही भयानक हो जाती है।"मुझे भी लगा दिन में ये पहाड़ कितने खूबसूरत लगते है और रात में उतने ही भयानक ...
पंचर लग गया था (अब ठीक है ) और हम सब फटाफट चल दिए।
मनिकरण के पास जब पहुंचे तो दूर से ही काफी भाप दिखाई दे रही थी । एकदम अंधकार ! कुछ दिखाई नहीं दे रहा था ।सिर्फ सफ़ेद सफ़ेद धुँआ दिखाई दे रहा था।चारों और अंधकार
ड्रायवर ने बताया शायद लाईट नहीं है शहर में ;आपको कहाँ उतरना है अब अंधकार में कुछ सूझ नहीं रहा था 11बजे ही पूरा शहर सोया हुआ था ।हमने भी उसी को बोला कोई होटल में ले चल वही रुकते है।वो एक होटल में ले गया ।बड़ी मुश्किल से टॉर्च की सहायता से कमरें में पहुंचे  । रात गुजारनी थी सो सब थके हुए फटाफट सो गए।
कल दिन में मनिकरण का वर्णन ...
क्रमशः ---




3 टिप्‍पणियां:

राकेश कौशिक ने कहा…

आभार

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, परमाणु शक्ति राष्ट्र, करवा का व्रत और ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

बीनू कुकरेती ने कहा…

वैसे बुआ वाकई में रात को नदियों की आवाज ज्यादा सुनाई देती है। मैं तो अलकनंदा के किनारे वाला हूँ।