मेरे अरमान.. मेरे सपने..


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शनिवार, 15 अक्तूबर 2011

सपनो का विरोधाभास् !!!










मेरी आँखों में जो सपने पल रहे थे ---
आँख खुलते ही सब मिट्टी में दफन  हो गए ---
मेरे लिए भी थी कभी कुछ पेड़ों की छाँव ---
पर वो कट चुके तेरी नफ़रत की कुल्हाड़ी से --

मेरे दिल के बागीचे  में खिले थे प्यार के चंद फूल --
      कम्व्ख्त! वो भी किसी हसीना के गले का हार बन गए --
मैंने सोचा था आएगी पतझड़ के बाद बहारे कभी --
पर जिन्दगी की रेल-पेल में पतझड़ ही आती रही--

मुझे मिले नहीं कभी हँसते -खेलते -नाचते -गाते कांरवा--
हमेशा मिले वीरान स्टेशन ! सुनसान राहें !बेजान मेहमां --
ले सकी न सांस मैं कभी इन बन्धनों को तोड़कर --
न ये बंधन कभी मेरे गले का हार बन सके --

हर कदम पर तेरी नफरत से सामना हुआ मेरा --
प्यार मिल न सका कभी तेरी गठरियो से मुझे --
अब, तुम कहते हो 'ये नफरत से भरी गठरी  हम ढोए '--
तो तुम ही कहो ----
" कैसे हम उन सपनो को कत्ल करे ?
कैसे हम तुम्हारी नफ़रत को तिलांजलि दे ?
कैसे हम तुम्हारे दिल में प्यार का बीज बोए ?
अब, तुम ही कहो --कैसे हम खुद को दिया वचन तोड़े "?










तुम तो चले गए यह कहकर की-- 'हमे प्यार नहीं तुमसे '
पर मैं कहाँ जाऊ --
तेरे प्यार का श्रृंगार ले कर --
तेरे नाम का सिंदूर लेकर --
तेरी प्रीत की माला पहन कर -- 


इन राहो में अनेक कांटे हैं ,कही भी फूल दिखाई नहीं देते ?
चारो और हाहाकार हैं ,सुकून के दो पल दिखाई नहीं देते ?
क्या बहारे फिर से आएगी ? मगर कब ???
क्या खिजाए अब तो जाएगी ?मगर कब ???  
मौसम बदला ऋतुए बदली ..पर तू न बदल सका ---
राह जोता किए हूँ हर पल आँखों में इन्तजार लिए ... 




          
"देख ले आकर  महकते हुए जख्मो की बहार ! 
मैने  अब तक तेरे गुलशन को सजा रखा हैं !"




20 टिप्‍पणियां:

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

-- जिंदगी है, तो सपने हैं,
सपने हैं तो तुम हो
तुम हो तो दुनिया है........

vandan gupta ने कहा…

बहुत दर्द भर दिया।

शकुन्‍तला शर्मा ने कहा…

सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

मेरे दिल के बागीचे में खिले थे प्यार के चंद फूल --
कम्व्ख्त! वो भी किसी हसीना के गले का हार बन गए --

चलिए किसी के तो काम आए ।
फुर्सत में बैठकर लिखे अहसास पसंद आए ।

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

bahut sundar dharshan ji sare sapne sach khan hote hain...

रविकर ने कहा…

कम्व्ख्त! वो भी किसी हसीना के गले का हार बन गए --

बहुत बढ़िया प्रस्तुति ||
शुभ-कामनाएं ||

Pallavi saxena ने कहा…

माना के सारे सपने कभी सच नहीं होते। मगर सपने ही तो अपने होते है ना। इसलिए सपने पूरे हो या न हो, सपने देखना कभी नहीं छोड़ना चाहिए। बहुत खूबसूरत भावपूर्ण अभिव्यक्ति ...समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है।

Sunil Kumar ने कहा…

कैसे हम उन सपनो को कत्ल करे ?
क्या बात है दर्शन कौर जी , बहुत सुन्दर .....

Unknown ने कहा…

खूबसूरत भाव

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

अच्छी कविता, सुंदर भाव, शानदार प्रस्तुति

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

Smart Indian ने कहा…

हृदयस्पर्शी रचना!

sushmaa kumarri ने कहा…

बेहद मार्मिक रचना....

महेन्‍द्र वर्मा ने कहा…

सुंदर भाव, सुंदर अभिव्यक्ति।

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

मर्मस्पर्शी... सुन्दर रचना...
सादर बधाई...

Maheshwari kaneri ने कहा…

बड़ी सुन्दर अभिव्यक्ति। .. मर्मस्पर्शी...

36solutions ने कहा…

प्रेम के इस पहलू का अच्‍छा चित्रण है दर्शन कौर जी. धन्‍यवाद.

सागर ने कहा…

prabhavi abhivaykti...

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

Bahut Sunder Bhav....

Rakesh Kumar ने कहा…

" कैसे हम उन सपनो को कत्ल करे ?
कैसे हम तुम्हारी नफ़रत को तिलांजलि दे ?
कैसे हम तुम्हारे दिल में प्यार का बीज बोए ?
अब, तुम ही कहो --कैसे हम खुद को दिया वचन तोड़े "?

हम तो बस यही कहेंगे दर्शी जी 'राम नाम जपते रहो जब लग घट में प्राण'
'नाम जप' के विषय में अपने अमूल्य विचार व अनुभव
मेरे ब्लॉग पर प्रस्तुत करके अनुग्रहित कीजियेगा.