#gds_Thrillar
2015
बात उन दिनों की है जब नया-नया व्हाट्सएप आया था तब मैं इस फीचर को जानती नही थी ।मेरी सहेली अलजीरा ने उसके बारे में बताया था।
तब, मैंने पहला व्हाट्सएप ग्रुप ज्वाईन किया था।जिसका नाम था–– "घुमक्कड़ी दिल से"।
इसमे ज्यादातर वो लोग थे जो यात्रा ब्लॉक लिखते थे और पक्के वाले घुमक्कड थे। इसी ग्रुप में मुझे रितेश गुप्ता ने ज्वाईन करवाया था जिनको मैं ब्लॉगिग के टाइम से अच्छी तरह जानती थी।
उस समय इस ग्रुप में मैं अकेली महिला मेम्बर थी। तब ये वाला फेसबुक का ग्रुप नही बना था।
इस ग्रुप में ज्यादातर ब्लॉग वाले ही थे ओर मै काफी लोगो को पहचानती तो थी परंतु मिली सिर्फ 2 लोगो से थी।
एक था नीरज जाट ओर दूसरा था संदीप जाट जो जाट देवता नाम से ब्लॉग लिखता था।
धीरे-धीरे इस ग्रुप में ओर मेम्बर भी शामिल हो गए जो बड़े ब्लॉगर थे और कुछ तो ब्लॉगर नही थे परन्तु घूमना उनका शोक था।
इस ग्रुप में हमारी बोइंडिंग बढ़िया थी। सब खूब हंसी मजाक करते थे,इज्जत करते थे,प्यार करते थे।इस ग्रुप में सब मुझे बुआ कहते थे।बुआ मुझे संदीप जाट बोला करते थे। क्योकि उनकी बुआ मेरे जैसी थी। बाद में रितेश भी बुआ बोलने लगे, ओर इसतरह मैं इस आभासी दुनिया की जगत-बुआ बन गई।
इस ग्रुप की एक मीट दिल्ली में ओर एक बरसुडी में हो चुकी थी परंतु उसमे बॉम्बे का कोई मेंम्बर न होने के कारण चाह कर भी मैं शामिल नही हो सकी थी।
फिर हमारे ग्रुप में बॉम्बे के 2 मेम्बर शामिल हुए एक था प्रतीक गांधी ओर दूसरा था विनोद गुप्ता।
विनोद के कहने पर एक मीट फिर करने के लिए ग्रुप में हलचल होंने लगी। 25 दिसम्बर फिक्स किया गया। मगर मैंने ज्यादा ध्यान नही दिया क्योकि मुझे पता था कि मेरे मिस्टर मुझे अकेले कीधर भी जाने नही देगे।
उन्ही दिनों हमारे ग्रुप में ओरछा के आबकारी अधिकारी मुकेश पांडे जी शामिल हुए जो अपनी सीरीज नदी की आत्मकथा से बहुत फेमस हुए थे।तो उनके पदस्थ स्थल ओरछा में मीट रखने की स्वकृति हुई। ओरछा नाम मैंने पहली बार ही सुना था। जबकि मैं खुद Mp की थी फिर भी मैंने इससे पहले ओरछा नाम सुना नही था।
इसी कारण मेरा मन ओरछा जाने का बहूत हो रहा था । ये बात जब ग्रुप में बोली तो प्रतीक ओर विनोद मेरे घर आये और मिस्टर को मनाया। मैंने यहाँ एक झूठ बोला कि ग्रुप में ओर भी महिलाएं है। शायद इसी कारण मिस्टर ने इजाजत दे दी होगी।
लेकिन इन सब बातों के कारण मैं लेट हो गई थी दिसम्बर में ट्रेन में रिजर्वेशन नही था ओर इन दोनों की टिकिट भी कंफर्म नही थी। मेरे पास भी टिकिट नही था पर उसकी मुझको कोई फिकर नही थी। एक TT की बीबी को बगैर टिकिट चलने की आदत थी। कई बार हम कोटा बगैर टिकिट ओर बगैर रिजर्वेशन गए है।गाड़ी में एक सीट मिल ही जाती थी।
खेर, बगैर टिकिट मुझे यात्रा करनी थी परन्तु मिस्टर के बगैर ये मेरी पहली यात्रा थी तो थोड़ा डर जरूर था।
जाने में 2 दिन ही थे । मैंने बैग जमा लिया था। लास्ट जिस दिन जाना था उस दिन सुबह तक टिकिट कंफर्म नही हुआ तो मैंने ये ट्रिप केंसिल कर दी और बैग से सामान निकाल दिया।बगैर सीट जाना अब मुझसे नही होगा ।कम से कम बैठने की जगह तो होनी ही चाहिए।
अचानक 5 बजे प्रतीक का फोन आया कि--" बुआ एक सीट कंफर्म हो गई है चलो!" अब क्या करूँ! 6 बजे तक मुझे निकलना था कैसे क्या होगा ? सोचने लगी।
लेकिन मैंने फटाफट सोचा ओर हड़बड़ाहट में फटाफट मिस्टर को बोला और उनकी सहमति की प्रतीक्षा किये बगैर बैग में कपड़े ठूस लिए ओर घर से बाहर निकल गई।
मेरे मन मे यही था कि अभी नही तो कभी नही। क्योकि मैं कभी अकेले नही निकली थी,साहस ही नही था परंतु उस दिन पता नही कैसे साहस आ गया और मैं निकल पड़ी।
लोकल में बैठकर प्रतीक ओर विनोद को फोन कर रही थी की मैं भी आ रही हु परन्तु दोनों फोन उठा ही नही रहे थे। चिंता होने लगी कि अगर ये लोग नही मिले तो? फिर दिल को तसल्ली दी कि कोई बात नही है अगर नही मिले तो वापस घर आ जाउंगी।
होठों पर मुस्कान लिए मैं दादर स्टेशन पर उतरी की अचानक विनोद का फोन आ गया। मैंने संतोष की एक सांस ली। अब तो फतेह हुई समझो।
कुछ देर बाद हम तीनों विनोद के घर से लाये हुए पराठें खा रहे थे। 😂🤣
वो मीट मेरे जीवन की एक यादगार ग्रुप मीट थी।
ओरछा में सबसे प्यार से मिली और उस मीट में मैं अकेली लेडिस नही थी काफी लेडिस थी।
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