फिर तेरी याद आई
यू तो मरते है कई लोग मुहब्बत में यारा !
मै तो मरकर भी मेरी जान तुझे चाहूंगी !
मै तो मरकर भी मेरी जान तुझे चाहूंगी !
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मै भी क्या शै हूँ ,क्या चीज हूँ
खाया था कभी तीर कोई
आज जब दर्द ने सताया तो ,
तेरी याद आई !!!
जब राह में फूलो के अम्बार सजाए थे तुने
मुझ पर कलियाँ बरसाई थी तुने
आज उन कांटो ने चुभाया तो ,
तेरी याद आई !!!
तेरी बांहों के घेरे में झूलती रही बरसों
खुद को महफूज़ समझती रही हरसों
आज उसी गिरेबा को जो देखा तो,
तेरी याद आई !!!
तुझसे ख्यालो में मिलती रही छिप -छिपकर
खुद को अपना मुकद्दर समझा किए हरदम
वो हसीन ख़्वाब टुटा तो ,
तेरी याद आई !!!
चाँद पे जाने का तेरा वो होंसला
मुझको पाने की तेरी वो ख्वाहिश
उदास चांदनी को जो देखा तो ,
तेरी याद आई !!!
राह में बिछे कांटो को लांधकर पहुंची सेहरा में ,मै
फुल नही थे वो थी, खारे- आरजू
उस तपती हुई रेत से खुद को जलाया तो ,
तेरी याद आई !!!
जब चोट लगी दिल-पे तो आंसू निकल पड़े
खुद अपने जख्मो -पे मरहम लगाया हमने
आज उसी निशाँ को देखा तो ,
तेरी याद आई !!!
बरसो खेला किए एक ही अंगना में हम
कभी होली ! कभी दिवाली ! कभी ईद मनाई हमने
आज वो खाली मका देखा तो ,
तेरी याद आई !!!
जला दिया था मुहब्बत का आशियाना खुद अपने हाथो
जिन्हें बनाया था हम दोनों ने बरसों
आज उस जमी को वीरा देखा तो ,
तेरी याद आई !!!
जब बूझा दिया था तू ने मेरी फडफडाती लो को
अन्धकार गहन था, दूर था सवेरा--
आज जब उड़ता हुआ धुँआ देखा तो,
तेरी याद आई !!!
जो फरेब खाए थे मैने तुझे राजदा बनाकर ' दर्शी'
उन्हें रोंदकर तुने मुझे सरेआम बदनाम किया
आज वो दास्ताँ फिर दोहराई तो ,
तेरी याद आई !!!
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न मिटा ठोकरों से मेरी मजार को ऐ जालिम !
जरा रहम कर ! खुदाया ,यहाँ कोई सो रहा है
अपने 'बुत ' पे परेशां तुझे देखा तो ,
तेरी याद आई !!!





