मेरे अरमान.. मेरे सपने..


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सोमवार, 28 मार्च 2011

दिलकश चाँद !


दिलकश  चाँद !







 " चलो दिलदार चलो 
  चाँद के पार चलो "

तुम्हारी चमकती आँखों में छांककर पूछती--
और तुम अपनी मदमस्त आँखों को घुमाकर कहते --

" हम हैं  तैयार चलो "--

और मैं  ख़ुशी के हिंडोले में सवार 
दू.....र... आकाश में अपने पंख पसार 
बादलो से परे,
चाँद की पथरीली जमीं पर,
उड़ते -उड़ते घायल हो चुकी हूँ ,
अपने लहू -लुहान जिस्म को समेटे ,
कातर निगाहों से तुम्हे धूर रही हूँ  ,
और तुम दू....र खड़े मुसकुराते हुए,
मानो,मेरा मजाक उड़ा रहे हो---

"  चाँद को छूने वाले ओंधे मुंह जो गिरते है "








मैं  सोच रही हूँ  की यह चाँद दूर से कितना ,
हसीन !कितना दिलकश था !
क्यों मैने इसके नजदीक जाने का साहस किया !                      





तुम भी तो ' राज' ! 
उस चाँद की तरह हो ,
जिसे मैं  देख तो सकती हूँ  ,
पर छू नही सकती ----?





अपने तन -मन को घायल कर --
आज सवालों के घेरे में खड़ी हूँ  --!

दू......र से आवाज आ रही हैं  -- 

" आओ खो जाए सितारों में कहीं 
छोड़ दे आज ये दुनिया ये जमीं  " 

चलो दिलदार चलो 
चाँद के पार चलो 
हम हैं तैयार चलो ~~~~~~~!