मेरे अरमान.. मेरे सपने..


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मंगलवार, 27 मार्च 2012

मैं की परिभाषा ....








निर्झर  के निर्मल जल-सी मैं ..  
कभी चंचल, कभी मतवाली मैं  ..
कभी गरजती बिज़ली -सी मैं ...
कभी बरसती बदरी -सी मैं .....
कभी सलोनी मुस्कान-सी मैं ...
कभी आँखों में झिलमिलाते सपनो-सी मैं ..
कभी ख़्वाबों को तरसती मैं ...
कभी चाँद को लपकती  मैं ...
कभी दामन को पकडती  मैं ..
कभी काँटों से दिल बहलाती मैं ...
कभी जिन्दगी  के थपेड़ों से खुद को बचाती मैं  ..
कभी तपकर कुंदन बन चम् -चमाती मैं .....!





आँचल में अपने सपनों को सजा पिया घर आई मैं ...?
क्या होगा ? कैसा होगा ? कौन होगा ? बोराई -सी मैं ...
कजरारे नैनो में अपने प्रीतम का अक्स सजाए ----- ?
डोली में सवार अपने पिया के घर आई मैं ..?  

कभी शर्माती ? कभी धबराती ? कभी गुनगुनाती ? कभी मुस्कुराती मैं ...
कभी गम छुपाती ? कभी खुद पर आंसू  बहाती ....
कभी सहज हो जाती ? कभी जख्मो पर मरहम लगाती मैं ...?
कभी भोर की किरणों से खुद को गुदगुदाती ?
कभी मेहँदी की खुशबु चारो और फैलाती ?
कभी दुसरो के सामने बिन बात खिलखिलाती ?
कभी गुलशन में तितलीयो  की तरह मंडराती  ?
कभी इन्द्रधनुष को अपनी बांहों में समाती ?
कभी अपना वजूद भूलकर ओरो को सहलाती ?
बस, ऐसी ही हूँ  मैं ???????






कल तक एक अच्छी बेटी एक अच्छी बहन बनी थी मैं ...
आज एक अच्छी पत्नी,एक अच्छी माँ बन सकी हूँ या नहीं मैं ?

ख्वाहिशें बहुत थी अंजुमन में मेरी ----
खुदा भी किश्तों में अदा करता हैं  ----!!!


सोमवार, 18 जुलाई 2011

* सपनो का महल और मैं *



 * सपनो का महल और मैं *  







सपने देखती वो नन्ही परी...
अपने सपनो मै मग्न --
उड़ानों मैं व्यस्त,
अपने घर की खिड़की मैं बैठी--
बाहर बच्चो को खेलते देखती रहती ???

अपनी उदास आँखों से नभ को ताकती रहती !
मजबूर थीं बेचारी !
माँ जो न थी उसकी !!

उसका दुःख कोई नहीं जानता था ?
अपने अकेलेपन से वो खुश न थी ?
पर उमंगे कम न थी --
बादलो पे सवार --
अपनी ही दुनिया मैं खोई हुई --
वो हमेशा आकाश में विचरण करती रहती थी --

सपनों में रहती ! सपनो मैं खाती ! सपनो मैं सोती थी !

चाँद को बांहों में भरने की ललक थी उसमें !





समय अपने पंख पसार उड़ता रहा ---एक दिन ---

अपनी बगियाँ में बैठी फूलो से बाते कर रही थी --
शाम का झुरमुट फैल रहा था --
सूरज की लालिमा और
रात की कालिमा के बीच
अचानक --
उसे महसूस हुआ --
कोई देख रहा हैं --
नजरे घुमाकर देखा --
 "यह वो था "
वो मुझे 'अपलक' निहार रहा था ?
वो 'शायद'  मुझसे प्यार करता था ?
दीवाना था वो मेरा --
पर मैं हमेशा उसे मायूस करती--
मुझे भ्रम था की --'जो मुझे चाहेगा '--
वो मुझसे दूर चला जाएगा --

मेरी माँ की तरह !
मेरे पापा की तरह !!






पर विधि का विधान कुछ ही और था --

धीरे -धीरे हमारी मुलाकाते होने लगी --
मैं 'शायद' उसे प्यार करने लगी --??????
 यह दुनियाँ  हसीन लगने लगी-----
हम दोनों की एक अलग ही दुनिया थी --
जहां प्यार--और सिर्फ प्यार था --?

पर होनी को कौन  टाल सकता हें--
फिर एक बार मेरी किस्मत ने मुझे धोखा दिया ..
मेरे रेत के धरोंदे को किसी ने बेदर्दी से तोड़ दिया --
काल के धिनौने पंजे --
मेरी तकदीर पर पंख पसार चुके थे ..?
'उसको' अपने खुले जबड़े मैं फंसा चुके थे ..??
उसको मुझसे दूर ~~~ले जा चुके थे..?????





मैं बहुत रोई ! गिड़गिड़ाई --
पर किसी पत्थर की मूरत को ,
मुझ पर दया न आई ---

मेरी उमंगे !मेरी हसरते !मेरी ख्वाहिशें !!!!!

सब धरी रह गई ......
और मैं ठगी -सी --
अपनी दुनिया लुटती देखती रही --

पंख कुतर चुके थे मेरे ???????
और मैं कठोर धरातल पर आ गिरी !!!!

आँखों से अश्क सुख चुके थे  --




उसका अक्स आँखों में लिए मैं फिर खिड़की के पास आ बैठी ---
बच्चे अभी भी खेल रहे थे ********