यादों का समुंदर..
तन्हाईयो में जब -जब तेरी यादों से मिली हूँ !
महसूस हुआ हैं की तुझे देख रही हूँ *******!
यादों के समुंदर में तैरती हुई -उभरती हुई ---
बहुत आगे निकल चुकी थी की ---
अचानक !लहरों ने पीछे धकेल दिया ---
-- डर गई --?
पीछे गुजरा हुआ जमाना था --?
बहुत अदभुत और सुहाना था --?
पर दुखदायी भी था
खुला आकाश !
खुला मंज़र !
न किसी की चाहत !
न किसी का इंतजार !
न रूठना !
न मनाना !
न कोई रवानगी !
न कोई फ़साना !
कोई हलचल न थी --?
कोई कोलाहल न था !
युही कारंवा बढ़ता रहा --
मंजिले आती रही --
मेहरबा छुटते रहे --
---फिर अचानक ---
तुमसे मुलाक़ात हुई --
बात हुई --
चाह हुई --
इज़हार हुआ --
इकरार हुआ --
कदम से कदम मिले --
हम राह बने --
फूल खिलने लगे --
पक्षी चहचहाने लगे --
हम युही चलते रहे --
!!अचानक !!
ठोकर लगी
हाथ छुट गया --
लाख कोशिश की पर वो मिल न सका --
मिला सिर्फ अंधकार !
सूनापन !!
सन्नाटा !!
आँखे खोलती हूँ तो मुझे रात के सन्नाटे डसते हैं ?
बंद करती हूँ तो और भी जबड़े में कसते हैं ?
भागती हूँ
चिल्लाती हूँ
अरे, "कोई हैं "
अपने ही शौर में आवाज़ गुम हो जाती हैं
लगता हैं कोई गला दबा रहा हो ?
आंखे उबल पड़ी हैं
"तुम ,कहाँ हो प्रिये !"
साँसे, उखड़ने लगी हैं
हाथ -पैर मारने लगती हूँ --
अचानक! तंद्रा भंग हुई --
ऐसा लगा मानो कोई सपना देख रही थी ?
यादों के समुंदर में गोता खाती हुई न जाने कितनी दूर निकल गई थी
हौले -हौले बाहर आने लगी --
दूर क्षितिज में सूरज डूब रहा था --
सारी कायनात ने सिंदूरी चादर ओढ़ ली थी --
लहरें थकीं -थकीं लौट रही थी --
****और मैं****
बालू में धसी नन्ही -नन्ही सीपों को,
मुंह खोलते-बंद होते हुए देख रही थी-- ?
"क्या कभी कोई बारिश की पहली बूंद इनके मुंह में जाएगी "
जहाँ से एक सच्चा मोती बनकर बाहर आएगा -- ?
या
हमेशा की तरह इनमें बना मोती 'झूठा' साबित होगा ???
कुछ लोग पास रहकर भी याद नहीं आते ?
कुछ लोग दूर रहकर भी भुलाए नहीं जाते ?
बहुत आगे निकल चुकी थी की ---
अचानक !लहरों ने पीछे धकेल दिया ---
-- डर गई --?
पीछे गुजरा हुआ जमाना था --?
बहुत अदभुत और सुहाना था --?
पर दुखदायी भी था
खुला आकाश !
खुला मंज़र !
न किसी की चाहत !
न किसी का इंतजार !
न रूठना !
न मनाना !
न कोई रवानगी !
न कोई फ़साना !
कोई हलचल न थी --?
कोई कोलाहल न था !
युही कारंवा बढ़ता रहा --
मंजिले आती रही --
मेहरबा छुटते रहे --
---फिर अचानक ---
तुमसे मुलाक़ात हुई --
बात हुई --
चाह हुई --
इज़हार हुआ --
इकरार हुआ --
कदम से कदम मिले --
हम राह बने --
फूल खिलने लगे --
पक्षी चहचहाने लगे --
हम युही चलते रहे --
!!अचानक !!
ठोकर लगी
हाथ छुट गया --
लाख कोशिश की पर वो मिल न सका --
मिला सिर्फ अंधकार !
सूनापन !!
सन्नाटा !!
आँखे खोलती हूँ तो मुझे रात के सन्नाटे डसते हैं ?
बंद करती हूँ तो और भी जबड़े में कसते हैं ?
भागती हूँ
चिल्लाती हूँ
अरे, "कोई हैं "
अपने ही शौर में आवाज़ गुम हो जाती हैं
लगता हैं कोई गला दबा रहा हो ?
आंखे उबल पड़ी हैं
"तुम ,कहाँ हो प्रिये !"
साँसे, उखड़ने लगी हैं
हाथ -पैर मारने लगती हूँ --
अचानक! तंद्रा भंग हुई --
ऐसा लगा मानो कोई सपना देख रही थी ?
यादों के समुंदर में गोता खाती हुई न जाने कितनी दूर निकल गई थी
हौले -हौले बाहर आने लगी --
दूर क्षितिज में सूरज डूब रहा था --
सारी कायनात ने सिंदूरी चादर ओढ़ ली थी --
लहरें थकीं -थकीं लौट रही थी --
****और मैं****
बालू में धसी नन्ही -नन्ही सीपों को,
मुंह खोलते-बंद होते हुए देख रही थी-- ?
"क्या कभी कोई बारिश की पहली बूंद इनके मुंह में जाएगी "
जहाँ से एक सच्चा मोती बनकर बाहर आएगा -- ?
या
हमेशा की तरह इनमें बना मोती 'झूठा' साबित होगा ???
कुछ लोग पास रहकर भी याद नहीं आते ?
कुछ लोग दूर रहकर भी भुलाए नहीं जाते ?
* सारे चित्र --गूगल से सभार





