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सोमवार, 25 अप्रैल 2011

माउंट आबू ( 4 )mount abu ( 4 )

  



*  माउंट आबू  *

( रेत का समुंदर  )  


१४ मई १९९८  

आज सुबह से ही गर्मी बहुत हो रही है --हवा भी गर्म चल रही है --मोसम अचानक बदल गया है --बाद में मालुम पड़ा की पोखरण में देश का पहला परमाणु परीक्षण हुआ है --आबू में इससे गर्मी बड  गई है --


आज आए हुए हमे ५दिन हो गए है --इतना गर्म दिन आज पहली बार लगा है --खेर ,दिन में हम पहले गुरूद्वारे गए --गुरुद्वारा काफी बड़ा है --अरदास की फिर कुछ देर वहा बैठकर हमने लंगर भी खाया --उन्होंने हमारे लिए भी बनवाया था --हमको और वही रुकने का कह रहे थे--पर हमारे पास अभी २दिन के लिए रूम और था फिर हमारा रिटर्न रिजर्वेशन था --चलो अभी 2दिन और है घुमने के लिए --


यहाँ के बाजारों में चमड़े की जूतियाँ बहुत मिलती है जिन्हें 'मोजडी 'कहते है यह बड़ी सुंदर होती है --टिकाऊ भी होती है --यहाँ मेहँदी भी बहुत मिलती है ढेर सारे स्टाल शाम को मालरोड पर सजे रहते है --यहाँ पीतल ,ताम्बे,कांसे  पर नक्कासी की हुई वस्तुए भी बहुत मिलती है --लकड़ी के खिलोने तो अन्यास आपका मन मोह लेगे --राजस्थानी ड्रेस में सजे रंग -बिरंगे यह खिलोने देखने में ही बड़े खूब सुरत लगते है 
और सबसे आकर्षण तो है --यहाँ की 'कठपुतलियाँ' जो हर दूकान पर टंगी हुई दिख जाएगी --आप भी देखे :---     


(कलात्मक शो -पीस )


(काठपुतलियाँ )


( काठपुतली का खेल )


यहाँ आपको कठपुतली का खेल भी देखने को मिल जाएगा --!
यहाँ गेस्ट -हाउस बहुत बने है -- राजभवन स्थित ' कला - दीर्धा ' देखने लायक है --राजस्थान के महामहिम राज्यपाल का यह ग्रीष्मकालीन मुख्यालय भी है--इस टाईम राजस्थान सरकार का सारा काम काज यही होता है --तब यहाँ अफसरों की फोज नजर आती है --




म्यूजियम और आर्ट गेलरी :--


राज भवन परिसर में १९६२ मे गवरमेंट म्यूजियम स्थापित किया गया , ताकि इस इलाके  की पुरानी संपदा को सरंक्षण मिल सके --यहाँ आपको आबू के इतिहास के बारे में सबकुछ मालुम पड़ता है --


शाम को ४ बजे हम यहाँ की फेमस टोड-रॉक देखने चल पड़े -रास्ता निक्की झील से ही जाता है --थोडा उबड़ -खाबड़ और पथरीला है--पर आप चढ  सकते है -आज मेने निश्चय किया की इस बार मै ऊपर चोटी पर जरुर जाउंगी --चाहे जो हो ? और हम धीरे -धीरे ऊपर आ ही गए ---  


     
     
(यह है मेढंक के शक्ल की चट्टान )




(जेस ,सन्नी ,निक्की और मै )


इसे टोड़- रॉक कहते है --यहाँ से आबू का जो द्रश्य दिखलाई देता है--वो अविश्वरनीय है --ऐसा लगता है की मानो यह मेंढक अभी कूदकर झील की गहराइयो मै खो जाएगा --यहाँ से निक्की झील का अस्तित्व भी अनोखा नजर आता है --सारा आबू दिखाई देता है --यह पहाड़ी भी काफी ऊँची है --इसका पथरीला रास्ता है पर आप आराम से चढ सकते है --यहाँ पर भी सेलानियो की काफी भीड़ जमा रहती है --पर चट्टान नामो से भरी हुई है --सारी चट्टान पर चाक और कोयले से नाम .शहर ,दिनांक छपी हुई है -पता नही लोग क्यों पुरातन संपती को इस तरह नुकसान पहुंचाते है --
यहाँ से निक्की -झील का शानदार द्रश्य दिखलाई देता है :--



(दूर ~~~टोंड -रॉक दिखाई दे रही है )



(निक्की झील का विहंगम द्रश्य )

(बीचो -बीच टापू पर फाउन्टेन चलता है )


( निक्की झील का नजारा )  



(निक्की- झील ~~~गूगल )






  (   निक्की झील  )


     


निक्की -झील का इतिहास  :-

निक्की- झील को माउंट -आबू का दिल कहते है --यह शहर के बीचो -बीच स्थित है --सारे शहर का आकर्षण यह झील ही है --इसके चोरो तरफ पर्वत श्रंखलाए है --झील के बीचो -बीच एक टापू बना है जहां फाउन्टेन चलता है जिसकी धारा 80 फुट ऊँची जाती है --कडाके की ठंडी पड़े तो यह झील जम भी जाती है --वेसे यहाँ बर्फ नही पड़ती --
कहते है की एक हिन्दू देवता ने अपने नाख़ून से इसे खोदा था --इसलिए इसका नाम निखि झील पड़ा ,जो कालांतर में " निक्की " नाम से प्रसिध्य हुआ --इसके चारोऔर पहाडियों होने के कारण इस झील की सुन्दरता मोहित करती है --ढाई किलो मीटर के दायरे में फैली हुई इस   झील के चारो तरफ सडक बनी हुई है --जिसके किनारे पर  बहुत सुंदर बगीचा बना है --जहां हर समय सैलानियों की भीड़ जमा रहती है --नोका - विहार से इसकी खुबसुरती   में चार चाँद लग जाते है --      




(राजस्थान का उत्सव -मेला )




वन्यजीव अभ्यारण्य :-- 

वन्यजीव अभ्यारण्य 228 वर्ग मीटर में फैला है --इसे १९६० में धोषित किया गया --भालू ,चीतल ,बंदर ,तेंदुआ,साम्भर .लंगूर देखे जा सकते है --यहाँ आप प्रवासी पक्षी भी देख सकते है --यहाँ २५० पक्षियों की किस्मे पाई जाती है --ओर पोधो की १५०प्रजातिया पाई जाती है --

रात को हम खाना खाने माल रोड पर चल दिए ---वही थाली वाली पुरानी जगह पर जहा के 'खमंड- ढोकले' बच्चो को बहुत पसंद थे --



(रात  को मालरोड पर खाने का आनंद लेते हुए )  

आबू से ढाई किलो मीटर दूर है ,हनुमान जी का मन्दिर --यहाँ ७०० सीढियां उतरने के बाद गुरु विशिष्ट जी का आश्रम आता है --जिसे हम नही देख सके --क्योकि हमें जानकारी बाद में मिली --

उसी तरह अम्बा जी का मन्दिर भी हम नही देख सके --क्योकि वहां निर्माण कार्य हो रहा था --और हम जा नही सके क्योकि परमाणु -टेस्ट के कारण आबू झुलसने लगा था --गर्मी काफी बड गई थी --और हमने एक अच्छे बच्चे की तरह वहाँ से खिसकने में ही अपनी भलाई समझी --- 


(माँ आंबे का मन्दिर )


इस तरह मेरी आबू की एक शानदार यात्रा का समापन हुआ --

जल्दी ही एक नए सफ़र पर ----- दर्शन 'दर्शी '