( बसंत पंचमी की सबको हार्दिक शुभकामनाए )
शास्त्रीजी ( डॉ. रूपचन्द्र "मयंक" ) की बसंत के आगमन की कविताए पढकर मेरा भी कवि ह्रदय यह सोचने लगा की, अब तो बसंत का आगमन करना ही पड़ेगा सो, शास्त्री जी ज़ेसी काव्य क्षमता तो नही हे मेरी अपनी सीधी -साधी भाषा में यह कविता लिख रही हु -----
लो फिर बसंत आया
फूलो पे रंग छाया
पेड़ो पे टेसू आया
लो फिर बसंत आया
कलियों ने सिर उठाया
भवरों ने प्यार जताया
लो फिर बसंत आया
जाड़े ने दुम दबाया
मोसम ने भी तपाया
लो फिर बसंत आया
कोयल ने चहचहाया
बुगला भी फडफडाया
लो फिर बसंत आया
फागुन ने फाग चड़ाया
होली ने रंग उड़ाया
लो फिर बसंत आया
सूरज ने भी गरमाया
कोहरा भी कसमसाया
लो फिर बसंत आया
चंदा भी मुस्कुराया
तारा भी टिमटिमाया
लो फिर बसंत आया
सरसों को फिर उगाया
मन झूम -झूम के गाया
लो फिर बसंत आया
फूलो पे रंग छाया
लो फिर बसंत आया --!!
