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सोमवार, 7 मार्च 2011

तपोभूमि श्री हेमकुंड साहिब ! ( 1 )






( तपोभूमि श्री हेमकुंड साहिब )




    
  (  आज आपको अपनी २००8 की हेमकुंडसाहिब की आलोकिक यात्रा का वर्णन बता रही हु चलिए ---)   


 8 सितम्बर 2008 

आज हम वसई गुरूद्वारे के जत्थे के साथ हेमकुंड साहिब की यात्रा पर निकल रहे हे --मेरे साथ मेरी कुछ सहेलियां है  और उन सबमे विशेष सखी  रेखा है ---

बांद्रा-टर्मिनस से शाम ५बजे हम 'गरीब -रथ 'से दिल्ली के लिए रवाना हुए ..सफ़र बड़ा ही सुहाना था --सब जाने -पहचाने चेहरे थे --हमारे जत्थेदार थे चड्डा सा.,उनकी तरफ से ही खाने-पिने का इंतजाम था --हमने सिर्फ किराया ही अदा किया हे बाकि इंतजाम उनका ही हे  --वो पिछले १० सालो से संगत को हेमकुंड साहेब की यात्रा करवा रहे हे ---


9 सितम्बर 2008 
       
दिन के ११बजे हम दिल्ली पहुंचे --स्टेशन के बाहर ही हमारी तीन बसे खड़ी थी --उसी में सवार हम दिल्ली के निजामुद्दीन गुरुद्वारे पहुंचे --इस गुरूद्वारे का नाम हे 'मजनू का टीला' क्यों हे पता नही ?

( निजामुद्दीन गुरुद्वारा ,दिल्ली ) 



दोपहर १ बजे हम फ्रेश होकर गुरूद्वारे के दर्शन करके ,लंगर खा- पी कर चल पड़े आगे की यात्रा पर --
दिल्ली में बहुत गर्मी हे --गर्मी के कारन कुछ समझ में नही आ रहा है --रास्ते में एक रिसोर्ट पर रुके जहां हमने चाय - नाश्ता किया --कुछ फोटो खिचवाए --
            

(एक रिसोर्ट का चित्र ) 


(रिसोर्ट में बनी एक मूर्ति के साथ मै ) 



रिसोर्ट से हम एक घंटे बाद निकले --बहुत अच्छा था ,थोड़ी गर्मी से राहत मिली --हमारी बस हरिद्वार पहुंची हम थोड़ी देर बाज़ार में  रुके,हमारे जत्थेदार चड्डा सा. को कुछ काम था --वहां से सीधे बस ऋषिकेश पहुची --हम ऋषिकेश गुरूद्वारे पहुंचे --लंगर हमे यही करना था --पर यहाँ  रुके नही फटाफट  लंगर खाया और  चल दिए--अब ऋषिकेश वापसी में रुकेगे--

ऋषिकेश का इतिहास :--

ऋषिकेश को आप हिमालय का प्रवेश द्वार कह सकते है--1360फीट की उचाई पर स्थित यह सबसे पवित्र तीर्थ स्थल है-यहाँ से केदारनाथ,बद्रीनाथ    गंगोत्री -यमुनोत्री,हेमकुंड साहेब   का सीधा रास्ता है --
कहते है की भगवान शिव ने जो जहर समुन्द्र -मंथन में पीया था यह वही स्थान है --श्री राम ने वनवास में इसी स्थान का भ्रमण किया था --तब रस्सी से एक पुल  का निर्माण किया था उसे अपने अनुज लक्ष्मण का नाम दिया और यही  पुल लक्ष्मण -झुला कहलाता है --इसका पुनह निर्माण 1939ई में हुआ --यह झुला 450 फिट लम्बा है और बीच में से हिलता हुआ प्रतीत होता है --इस के नजदीक ही राम -झुला भी है --यहाँ काफी मात्रा   में मंदिर और आश्रम बने हुए है --भोलेनाथ की यहाँ बड़ी -बड़ी प्रतिमाए बनी है ,,,,                                                                    

 अब हमें रात होने से पहले पौंटासाहेब पहुंचना है --आज रात वही रुकने का प्रोग्राम है --आगे पहाड़ों की श्रंखलाए भी  शुरू हो गई--निचे बहती नदिया   और ऊपर हम ! कभी हम नीचे और कभी ऊपर ऊँचे -ऊँचे पहाड़!              




(बस से उतारा चित्र )


(रास्ते के द्रश्य )
  
उतराखंड को भगवान शिव की पहली पसंद कह सकते है --रास्ते की सुन्दर द्रशावली देखते हुए समय का कुछ पता ही नही चलता है-- रात होते ही यह पहाड़ जो दिन की रौशनी में इतने सुन्दर जान पड़ते है रात होते ही भयानक नजर आते है --पहाडो पर दिन के उजाले में ही अपने गतव्य स्थान पर पहुँच जाना चाहिए --रात को सफ़र भी करना ठीक नही है --

अब हम उतराखंड से हिमाचल प्रदेश जा रहे है---
  
हम रात के ११ बजे पौंटा साहेब पहुंचे --हमारी बस को एक किलो मीटर दूर खड़ी कर दी क्यों पता नही ? हमारा सामान बस में ही था --सिर्फ एक ड्रेस रख ली थी सुबह पहनने के लिए --रात को कोई सवारी भी नही मिली इसलिए हम पैदल ही गुरुद्वारे चल दिए --ठंडी हवा के झोके नींद की झपकिया ला रहे थे- ऐसा लग रहा था की कोई यही बिस्तर लगा दे --और हम गहरी नींद में सो जाए --
गुरुद्वारे पहुच कर सबसे पहले सबने लंगर खाया --भूख नही थी फिर भी थोडा -सा खा लिया --बस अब सोने को मिल जाए --हमारे कमरे दूसरी मंजिल पर थे --थकान से सबका बुरा हाल था--आज की जर्नी सबसे लम्बी थी --रेस्ट भी नही मिला था --

कल हम श्रीनगर रुकेगे -

जारी ---