मेरे अरमान.. मेरे सपने..


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शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

कशमकश !!!



" मत पूछो ऐ दुनियां वालों कैसे  मेरी  किस्मत फूटी !
अपनों ने ही मेरे बनकर मेरे प्यार की दुनियां लुटी !!"







उनके जाने से मेरे दिल का वो कोना खाली हैं 
जहाँ  सजाई थी मैनें  कभी तेरी इक तस्वीर 
तंग गलियां !सुनी दीवारे ! जंगल में पड़ी इक मज़ार !
यादों का झुरमुट हैं या गुज़रे दिनों की बहार ...

तेरे रहने से इस बे-जान हंसी ने ,
 ठहाकों  का रूप लिया था कभी ,
जमी हुई ओंस ने तब --
 पिधलना शुरू कर दिया था --
बर्फ की मानिंद इस जमी हुई रूह को 
अब, तेरे आगोश का इन्तजार रहेगा ----?

भटकती रही हूँ दर -ब -दर 
तेरे  कदमों  के निशाँ  ढूंढती  हुई 
इस भीड़ में अब कोई मुझे पुकारेगा नहीं---?

कोई गलती नहीं थी फिर भी सज़ा पा रही हूँ मैं ---
तुझसे दिल लगाया क्या यही जुर्म हुआ मुझसे ?

न मैं समझ सकी, न तुम बता सके --
जिन्दगी के ये फलसफे ..उलझकर रह गए 
उलझे हुए तारो को सुलझा सकी नहीं कभी --
इस उलझन में हम कब उलझ गए पता ही नहीं ???   

   



मेरी पेंटिंग --दर्शन !



बुधवार, 5 जनवरी 2011

प्रेम दीवानी

तुम ..वो ..ऊचाई  हो ...
जिसे छूने के प्रयास मे  -
मै  बार  बार गिरती गई -गिरती  गई -
परत -दर -परत तुम्हारे सामने -
खुलती रही ---बिछती रही -
पर --तुम्हारे  भीतर  कही  कुछ  उद्वेलित नही  हुआ ----|
मेरी आत्म -- स्वकृति को तुमने  कुछ  और ही अर्थ  दे  डाला --?
मै अंधी गुमनाम धाटियो मे तुम्हारा नाम पुकारती रही -----
धायल  !
खुरदरी --पीड़ा -जनक -!!
अकेलेपन  का एहसास !!!
ल--- म्बे  समय  से झेल रही हु ------?
 नाहक ,तुम्हे बंधने की कोशिश ---
" छलावे के पीछे भागने वाले  ओंधे मुंह गिरते है -"
इस तपती हुई मरुभूमि मे ----
चमकती -सी बालू -का -राशि ---
जैसे कोई प्यासा हिरन ,पानी के लिए ----
कुलांचे  भरता जाता है ---                  
अंत--  मे  थककर दम तोड़ देता है ---
राज , ---तुम्हारे लिए --------
इस मरु भूमि मे ---मै भी भटक रही हूँ ----
काश -- कि --तुम ----मिल जाते --------|