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शनिवार, 29 जनवरी 2011

डलहोजी ( २ )



डलहोजी का माल रोड 


    १२  जुलाई  

आज ही हम सुबह डलहोजी पहुंचे थे --थोडा आराम किया --करीब ४बजे हम नीचे उतरे --होटल वाले ने बताया की थोडा राइट चलना पड़ेगा ५ मिनट में मालरोड आ जाएगा ;हम पैदल ही मालरोड की तरफ चल दिए --रास्ते में कोई भी दिखाई नही दे रहा था --न इन्सान न जानवर !राइट साईट में होटलों की कतार  थी और लेफ्ट में गहरी खाई !  खाई के नजदीक रेलिंग पर कारे धुल से अट्टी  पड़ी थी --सिर्फ नजदीक से कोई कार गुजर जाती थी , पर इंसान कही दिखाई नही दिया --न कोई स्थानीय आदमी नजर आ रहा था-- मन में ख्याल आया की ' कही यहाँ आकर कोई गलती तो नही कर दी ' पर मन की बात मन में ही रखी ' वरना सब मुझे ही चिल्लाते '!
  
    खेर ,वैसे मौसम बहुत ख़ुशगवार था--आसमान एकदम साफ था--धुप   बिखरी हुई थी--जाता हुआ सूरज सारी  खाई को सुनहरी आभा प्रदान कर रहा था--ठंडी हवा के झोके तन- मन को मदहोश कर रहे थे --



(मौसम  बहुत अच्छा था )



( धुप खिली हुई थी )

खेर ,जैसे तैसे १० मिनट में बढते-  बढते अचानक एक मोड़ आया -- वाह अन्यास  मुंह से निकल पड़ा -- सामने ही मालरोड था --वहां काफी चहल पहल थी --ज्यादातर वैवाहित  जोड़े हाथो में हाथ डाले धूम रहे थे -- 


( माल रोड की सरगर्मियां )


( मालरोड का खुबसुरत नजारा)


( माल रोड पे  रेस्ट करने के लिए बनाई गई है बेन्चेस  )

माल रोड पर बहुत रश था --दुकाने सजी थी --लोग गर्मागर्म जलेबियाँ और उबले अंडे खा रहे थे -छोटा -सा मालरोड था --ढंडी हवा और धुप का मिलाजुला मंजर देखने को मिला --एक तरफ बैठने के लिए बेन्चेस लगे थे --काफी फेमेलियाँ वहाँ बैठी थी --बच्चे खेल रहे थे क्योकि वहां बंदर भी सबका मनोरंजन कर रहे थे - यहाँ आकर मन शांत हुआ की हम अकेले नही हे  दिल में जो डर था वो भाग चूका था हम भी भीड़ में शामिल हो गए--

(शाल व् स्वेटर की दुकाने )

(  पावभाजी का स्टाल )

(यममी  sss- --आइसक्रीम )

( गरमा-गरम ममोज  )    

तिब्बती मार्केट बहुत ही छोटा और संकरा बना हुआ था --दोनों तरफ दुकाने सजी हुई थी --अंदर बहुत भीड़ थी ४-५ फिट के गलियारे में मेरा तो दम धुटने लगा इसलिए मै बाहर निकल आई --बच्चे अपने लिए औरअपने     दोस्तों के लिए गिफ्ट ले रहे थे -हम दोनों ने ठेले पर चाय पी --मुझे ठेले की चाय बहुत पसंद हे --कडक ! मीठी !

    धीरे -धीरे अँधेरा छा  रहा था --समय का पता ही नही चला --नजदीक ही हिमाचल टूरिज्म का आफिस था हमको कल के लिए वाहन की जरूरत थी --इंतजाम करना था --वहां कई पैकेज थे जैसे --खजियार -डलहोजी ,चंबा -डलहोजी -खजियार ,वगेरा ? हमारे पास टाइम कम था सो ,चंबा का प्रोग्राम केंसिल किया --वेसे लक्ष्मी नारायण का मंदिर और चम्बा देखने की इच्छा  बहुत  थी- अगर एक दिन और  होता तो मै चंबा जरुर देखने  जाती  --खेर ,खजियार के लिए तो गाडी करनी ही थी रात वही गुजारनी हे  --हिमाचल टूरिज्म की गाडी 1600 रु में की --सुबह पंचकुला दिखाकर खजियार जाने का प्रोग्राम बना |

( रात का नजारा एक खूबसूरत पप्पी के साथ )

 रात  को वापस आ रहे थे तो मोहन मिला वो हमे इतना सफर 1200 रु में करवाने को तैयार था --हमने पूछा की तुमको कैसे पता चला तो वो बोला --आप आफिस में बात कर रहे थे तब मै वही था खेर ,वो हमे कल खजियार धुमाकर रात वही  गुजारकर दुसरे दिन पठानकोट तक छोड़ देगा --कुल किराया 2600 रु में बात पक्की हुई --सुबह ही वो होटल में आ जाएगा -हमने होटल का नाम बताया और होटल चल दिए --मोहन चला  गया -हम भी चल दिए जब--मोड़ पर पहुचे तो शाम की बात अचानक याद आई 'अरे यह रास्ता तो एकदम सुनसान हे'--अब क्या करे मोहन को देखा तो वो जा चूका था -सामने रोड एकदम सुनसान थी --हम अकेले थे--पराया शहर !रात के ९बज रहे थे , मेरी तो हालत पतली हो चुकी थी -पर मिस्टर बोले -वाहेगुरु का नाम  जप बेडा पार होगा --ऐसी परेशानी आजतक कही नही आई थी --अब तक कितने ही हिल स्टेशन धूम चुकी हु पर ऐसा कभी नही हुआ --खेर वाहेगुरु -वाहेगुरु जपते -जपते चल रहे थे तो, देखा-- दिन में जहाँ परिंदा  नही था वही   रात में काफी लोग अपने होटलों के आगे मटरगस्ती कर रहे थे --हम फटाफट अपने होटल में आ गए --कमरे में आकर वाहेगुरु का शुक्रिया अदा किया --उस पर सब छोड़ दो --सब कुछ ठीक हो जाता हे --!
   बाहर बहुत ठंडी है  --रात को हम जल्दी ही सो गए --बच्चे फ़ुटबाल का मैच देख रहे थे--आज फ़ाइनल जो हे --सुबह खजियार जाना हैं  --
जारी  ---

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

दरबार साहेब ..||

दिन भर दरबार साहिब मे ही गुजर गया | और रात का मंज़र तो लाजबाब ही निकला , चारो ओर बस प्रकाश ही प्रकाश था , लोगो का हुजूम उमड़ पड़ा था | हम लंगर खाने चल दिए |  बर्तनों की सेवा के लिए लम्बी लाईन लगी थी ,हम भी शामिल हो गए |


( लंगर का दृश्य )


( बर्तनों की सेवा )

रात के ११ बजे सुखासन होता है , महाराज की सवारी पालकी मे दरबार साहिब से गाजे -बाजे के साथ अकाल तख्त मे चली जाती है | विश्राम के लिए |


      
( सुखासन की तैयारी )




( पालकी साहेब )




जिथे जाये बहे मेरा सतगुरु
वो थान सुहावा राम राजे..



( सुखासन )


रात को दरबार साहिब के दरवाजे बंद हो जाते है.. पर संगत बंद दरवाजे के पास कीर्तन और पाठ करने मे मगन हो जाती है.. यह सिलसिला पूरी रात चलता है... सुबह ४ बजे तक... जब  दरबार साहिब की पहली अरदास होती है... और महाराज की सवारी सुबह ६बजे पालकी साहेब से आती है |
हम भी सुबह ५ बजे  दरबार साहिब मे पहुच गए... दुबारा दर्शन करने के लिए .. न जाने फिर कब मौका मिले  ... 




जलियांवाला बाग़

१२ बजे हम अमृतसर साहेब से चल दिए | जलियांवाला बाग़ देखने .....
जलियांवाला बाग़ उन शहीदों की याद मै बना है जो १३ अप्रेल १९१९ मे बैशाखी वाले दिन जनरल डायर की गोलियो से छलनी हुए थे ..
महिलाए, बच्चे व् बुजर्ग भी शामिल थे ..कुछ तो अपनी जान बचने के लिए एक अंधे कुए मे कूद पड़े थे .. वही उनकी समाधि बन गई | आज भी वो कुआ उस समय की अंग्रेजी हुकूमत का जीता जगाता उदाहरण है |








( शहीदी कुआ )



( शहीदों की याद में )




जारी है..