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शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

गुरु गोविन्द सिंह जी का जनम- स्थान (1) पटना साहेब !

२८  अगस्त 2010




(पटना साहेब !गुरु गोविन्द सिंह जी का जनम- स्थान !)


आज  मै एक धार्मिक -यात्रा कर रही हु --हमारे गुरूद्वारे के स्त्री -जत्थे के साथ ! साथ में मेरे पतिदेव ,मेरी अजीज सहेली रेखा और उसकी मम्मी भी है --बच्चे नही आए --क्योकि उनके कालेज खुल चुके हे ---

 छत्रपति शिवाजी टर्मिनस ( वी.टी.) से रात को ग्यारह बजे चलने वाली राजेंद्र नगर एक्सप्रेस से हमारा रिजर्वेसन था --हम चारो सेकंड ऐ सी में बैठ गए बाकी की लेडिस सेकंड क्लास में थी --सफर परसों सुबह तक का था --गर्मी बहुत थी --बिहार में वेसे भी गर्मी बहुत पडती हे --खेर,

(मिस्टर ट्रेन में मैगज़ीन का आनंद लेते हुए )  


( ट्रेन में यात्रा का लुत्फ़ लेते हुए )

   चलिए ---चलते -चलते आपको पटना साहेब का इतिहास बता दू--आप सोच रहे होगे की इतना बड़ा पंजाब छोड़कर हमारे गुरु को यहाँ बिहार में गंगा किनारे जन्म लेने की क्या जरूरत थी ---?



गुरु गोविन्द सिंह जी के पिताजी सिख धर्म के ९वे धर्मगुरु थे --उनका नाम गुरु तेगबहादर जी था --सन १६६६ ईसवी में जब वे धर्म प्रचार करते हुए बिहार पहुचे तो उनकी पत्नी माता गुजरी माँ बनने वाली थी ,ऐसी हालत में वो सफर करने लायक नही थी इसलिए उन्होंने अपने एक विशवास -पात्र अनुयायी  के यहाँ उन्हें  छोड़ दिया-- और खुद प्रचार करने निकल पड़े --
यही बालक गोविन्द का जनम २३ दिसम्बर  १६६६ को  हुआ--
६ वर्ष तक बालक गोविन्द यही पर रहे --यही उनकी बाल लीलाए हुई --जहाँ आज गुरुद्वारे खड़े हुए रोनक बखश रहे हे ---

बाद में; ६ साल बाद जब वे वापस बिहार आए तो अपने साथ माँ -बेटे दोनों को आनंदपुर साहेब ले गए |
  
दिनांक ३०अगस्त २०१०


 सुबह ६ बजे गाडी राजेंद्र नगर स्टेशन पर पहुंची पर हमे यहाँ नही उतरना था क्योकि यह गाडी सीधी पटना साहेब स्टेशन ही जाएगी --स्टेशन का नाम ही ' पटना- साहेब ' हे--यहाँ बेहद गर्मी हे ,धुल -मिटटी से बुरा हांल हे --सुबह का यह नजारा हे, दोपहर को क्या होगा ?



टेम्पो करके हम गुरुद्वारा पहुंचे --दो मज्ज़िदो के बीच गुरुद्वारे का गेट देखकर थोडा अजीब लगा पर जब अंदर पहुंचे तो विशाल आँगन को देखकर हमारी ख़ुशी का ठिकाना न रहा --पर संगत(लोग )बिलकुल भी नही थी--सिख धर्म के स्थापक गुरुगोविंद सिंह जी के जन्म स्थान पर संगत का  न होना आश्चर्य की बात थी ---       

पास ही आफिस था एक रूम का किराया १००रु.!रूम ठीक थे पर ऐ.सी रूम नही मिले --गर्मी बहुत थी ,कैसे रहेगे! पर हमे बड़े पंखे मिल गए --हम तो होटल जाने वाले थे पर दुसरे लोग तेयार न हुए-- मजबूरी वश हमे भी वही रुकना पड़ा --| खेर, यात्रा करने आए हे--तफरीह करने नही --? 

नहाधोकर तैयार हो गुरुद्वारे चले --माथा टेकने --सबसे पहले प्रशाद खरीदा यहाँ दो तरह का प्रसाद मिलता हे --कड़ा प्रसाद ,पिन्नी प्रसाद | 
 .
(ग्रन्थ साहेब की सवारी के साथ ही महाराज का फोटू )

(शास्त्र दिखाते हुए पाठी )

( गुरूद्वारे के  अंदर का द्रश्य )


 ( माता गुजरी का पवित्र कुआं  )
           
(चोला साहब, गुरु का पहना हुआ कपड़ा )  

(चोला साहब का इतिहास )

(ग्रन्थ साहेब की सवारी ) 
बहुत अच्छा माहोल था --रागी जत्थे शबद-कीर्तन कर रहे थे --यहाँ थोड़ी संगत जरुर थी पर हुजुर साहेब (नांदेड ) से १०% भी नही थी | सबने बैठकर सुखमनी -साहेब का पाठ किया --प्रसाद चडाया,  फिर  अरदास के बाद  नाश्ता करने पीछे की तरफ चल दिए --यहाँ नाश्ते का कमरा अलग हे और लंगर का हाल अलग हे --यहाँ के सेवादार बड़े भले हे --सबसे अदब से पेश आते हे --सुबह -सुबह भूख जोरो की लग रही हे-- हम सब पंगत में बेठ गए --वाह ! क्या नाश्ता हे --पराठे के साथ कड़ी ,वह भी पकोड़ो वाली --साथ में चाय भी --     


( नाश्ते का लुत्फ़ उठती रेखा पीछे पतिदेव भी ) 


(सफर के बाद मजेदार गरमा - गरम पराठे -कड़ी का नाश्ता)


नाश्ते के बाद हम वही गुरुद्वारे में धुमने लगे पास ही गली में मार्किट हे जहाँ गुरमत से सम्बंधित पुस्तके और सामान मिलता हे --आचार-बड़ियोकीबड़ी दुकाने हे यहाँ ,हमने कुछ सामान खरीदा --वापस रूम में आ गए --     

(आराम के पल गुरूद्वारे में ) 
शाम को ५ बजे हम वापस गुरूद्वारे पहुंचे- रहिरास साहिब का पाठ चल रहा था  --बाद में कीर्तन शुरू हो गया --करीब ८बजे सुखासन हुआ इसमे सिरकत करके हम लंगर -कक्ष्य में खाने चल दिए --


(रात को आरती करते हुए पाठी जी  )


(आरती करते हुए ज्ञानी जी )


(बाहर खुले आगन में बैठे है )     


(रात को कुछ सहेलियों के साथ गुरूद्वारे के बाहर )


(सुखासन के बाद वापस जाते हुए ) 


रात को गुरुद्वारे में आरती होती हे --वेसे हमारे धर्म में मूर्ति -पूजा,आरती मना हे पर नांदेड साहेब में भी आरती होती हे और यहाँ भी --क्योकि गुरु गोविन्द सिंह जी एक योध्या भी थे और शास्त्र  रखते  थे  इसलिए मान्यता हे की शास्त्रों की पूजा करनी चाहिए सो ;यहाँ भी शास्त्र रखे हुए हे और उनकी ही आरती होती हे --यह मेरी राय हे ? हो सकता हे इसके पीछे कोई और कारण हो---? कल के लिए एक गाडी किराए पर की हे --पटना धुमने के लिए --      

रात को हम वापस कमरों में आ गए --गर्मी बहुत हे --पर रात सुहानी हे  --कल हमे धुमने जाना हे --राजगीर,नालंदा !देखते हे कहाँ कहाँ जाते हे --

जारी---