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सोमवार, 11 अप्रैल 2011

माउंट आबू भाग ( 2 ) Mount-Abu ( 2 )



** माउंट आबू **




(मरू भूमि रंगीलो राजस्थान )  


  11 मई  1998:---

रात को ही हमने धुमने के लिए सब जानकारी निकाल ली थी --रात आबू की बड़ी सुहानी होती है --मालरोड की सारी दुकाने बाहर सज जाती है --कुर्सिया लग जाती है--हमने भी एक होटल के बाहर बैठकर खाना खाया -यहाँ गुजराती थाली ,जेन थाली,और राजस्थानी थाली मिलती है --यहाँ थाली का रिवाज है जितना खाना चाहो खाओ !केवल थाली की कीमत लगती है -उस समय शायद ३० -५०रु. थाली थी !हमको होटल वाले ने ही कहाँ की आप ३ थाली ले ले ,दोनों बच्चे छोटे थे !सो हमने ३ थाली  ही मंगवाई --बहुत टेस्टी खाना था --भरपेट खाया !कल स्पेशल राजस्थानी दाल - बाट्टी-चूरमा खाएगे --वेसे यहाँ नानवेज खाना भी मिलता है --रात को घूमते हुए जब हम लोट रहे थे तो रास्ते से दूध अंडे -ब्रेड भी खरीद लाए 


सुबह जल्दी ही नींद खुल गई --मै और बेटा दोनों वाक् को निकल पड़े --काफी लोग घूम रहे थे --हम दोनों भी घूमते हुए निक्की झील के पास आ गए --बड़ा सुहावना द्रश्य था --शांत !कोई आवाज नही !पानी में बतखे तैर   रही थी उनकी आवाजे शांत वातावरण में गूंज रही थी --ऐसा लगता था की मयूर बन नाचू --बतख बन पानी में तेरु -- !!  क्या शमा था--बया नही कर सकती --कोई ट्रेनिग स्कुल भी था, जिसके नोजवान वहाँ परेड करते  हुए जा रहे थे --शायद IPS ट्रेनिग सेंटर था --ऐसा लगता है --


हम वापस होलीडे होम में आ गए --आकर सबको जगाया--चाय -नाश्ते से फ्री होकर हम तेय़ार हो निकल पड़े --आज हमे आबू घूमना है --पहले बस वाला कहाँ ले गया पता नही --फिर भी जो याद है वो इस प्रकार है --


(भाईला )

बाज़ार में बहुत रोनक थी,काफी 'भाईले' धूम रहे थे-भाईले यानी  पारम्परिक   ड्रेस में राजस्थानी लोग ,हम कोटा में उन्हें इसी नाम से पुकारते है --आज वहां कोई मेला था-- जगह का नाम याद नही आ रहा है-- खेर,हम ने टूरिज्म वालो की बस में अपनी सीट बुक की और चल पड़े :--  
               
ओम शन्ति ब्रह्मकुमारी विश्वविधालय :--     


   


( ब्रह्म कुमारी भवन के सामने बेटी निक्की  )  


ॐ शांतीभवन :- यह भवन बहुत ही सुंदर है यहाँ युनिवर्सल पीस -हाल है बहुत विशाल हाल है इसमे 3500से4000तक लोगो के बेठने की व्यवस्था है --यहाँ ट्रांसलेटर माइक्रोफोन द्वारा 100 भाषाओ  में व्याखान सुने जा सकते है --यह बिना खम्बो पर टिका हाल है --यहाँ 8 ह्जार लोग रोज आने का रिकार्ड है -- इस हाल में बैठकर स्वर्गीय आन्नद लिया जा सका है --धर्म से सम्बंधित काफी जानकारी वाली पुस्तके वहां आपको मिल जाएगी -- 





(प्रजापति ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय  )  




(पीछे अचल गढ़ किला व् मन्दिर है )

8 किलो  मीटर दूर अचलगढ किला! यह पहाड़ी पर बना है --यहाँ एक 15 वी शताब्दी में बना अचलेश्वर मंदिर भगवान शिव का है --यहाँ तक जाने के लिए काफी लम्बी शायद 200 सीढियां है यहाँ भगवान् शिव के पेरो के निशान भी बने है --पास ही १६वी शताब्दी का काशीनाथ जेन मंदिर भी है यहाँ से हम गोमुख मन्दिर गए -


गोमुख मन्दिर:--


( tree  buffalo  तीन भेंसे )


इन भेसो की भी कोई स्टोरी है ,पर मुझे याद नही आ रही है --  
गोमुख मन्दिर :-मन्दिर परिसर में गाय की एक मूर्ति है जिसके सर पर प्राकृतिक रूप से एक धारा बहती है --इसी कारण इसे गोमुख मन्दिर कहते है --मन्दिर में एक सांप की विशाल प्रतिमा है --पीतल के नंदी की भी आकर्षण प्रतिमा है --      



( नंदी की विशाल मूर्ति  )




( नंदी~~ गूगल चित्र ) 




( मन्दिर के बाहर बनी हाथी की मूर्ति )


गुरु-शिखर:---

अरावली पर्वत की सबसे ऊँची चोटी 1727 मीटर पर गुरु- शिखर स्थित है --यह शहर से १५ किलो मीटर दूर है --मनोरम द्रस्यो से भरी यह पर्वत श्रंखला के ऊपर एक मंदिर है -यह भगवान् विष्णु का दत्तात्रेय रूप का मंदिर है --मन्दिर के पास ही सीढियां है शिखर पर जाने के लिए --वहा एक ऊँची चट्टान पर प्राचीन घंटा लगा है --वहां से घाटी का मनोरम द्रश्य नजर आता है -- 



( गुरु शिखर का मार्ग ~~~गूगल चित्र )




( गुरु शिखर की सबसे ऊँची चोटी पर जेस )




(मैं ऊपर नही चढ़ सकी, मैनें यही आराम किया )
( जेस ,मैं और सन्नी)  



(सन्नी ,जेस निक्की और पापा गुरु शिखर पर )  



(काका -काकी  हनीमून पाइंट )

गुरु शिखर से कुछ ही दूर है ये काका -काकी की दिलकश चट्टान--जिसे हनीमून पाइंट कहते है --दोनों इस जहां से दूर एक नई दुनिया में मदहोश  



दिलवाडा टेम्पल:--

दिलवाडा टेम्पल के बगैर आबू की यात्रा अधूरी है :-- 

यह आबू की शान समझे जाते है--यह ५ मंदिरो का समूह है --११ वी शताब्दी और १३ वी शताब्दी में बने यह जेन धर्म के तीर्थकरो को  समर्पित है ---
'विमल वासाही' मन्दिर 'प्रथम तीर्थंकर' को समर्पित है--यह सर्वाधिक प्राचीन मन्दिर है जो 1031 ईस्वी में बना था --
22 वे तीर्थंकर नेमीनाथजी को समर्पित 'लुन-वासाही 'मन्दिर भी कॉफी  लोकप्रिय है यह 1231 ईस्वी में वास्तुपाल और तेजपाल नाम के दो भाईयो ने बनवाया था --यहाँ 5 मन्दिर संगमरमर के है --मन्दिरों में 48 स्तंभों में  न्रत्यांगनाओ की आक्रतिया बनी हुई है --यह मन्दिर मूर्ति कला का बेजोड़ नमूना है --देख कर ही पता चलता है --
तेजपाल और वास्तुपाल की पत्नियों का मन्दिर ;देवरानी -जेठानी का मन्दिर शिल्पकला  का अदिव्तीय  नमूना है --सारी दुनिया में इससे खुबसुरत शिल्पकला का कोई दूसरा मन्दिर नही मिलेगा --
हाथीशाला में 10-10 संगमरमर के हाथी बने हुए है --  

यह सुबह से शाम 6 बजे तक खुला रहता है --मन्दिर में कैमरा ले जाने की इजाजत नही है इसलिए बाहर का ही फोटो खीचा है -- 
यहाँ का अदभुत सोंदर्य आपको दूसरी दुनिया में ले जाता है -- 
                           

(  दिलवाडा टेम्पल के सामने हम-लोग  ) 



(  मुख्य  मंदिर ~~चित्र गूगल )   




( देवरानी -जेठानी निवास ) 





( कलात्मक छत ) 




 
( आकर्षण छत की बनावट )


(   चित्र उधार का ~~~गूगल ) 




(48  स्तम्भ ) 


दिलवाडा टेम्पल वास्तु कला के बेजोड़ नमूने है--एक शिलालेख से पता चलता है की दिलवाडा टेम्पल बनाने वाले तेजपाल -वस्तुपाल भाइयो ने कई शिव मंदिरों का उध्दार करवाया --उन्हें फिर से बनवाया --
      (यदि इस इतिहास पर किसी को आपति है तो माफ़ करे )



और अब करले पेट पूजा :---



( राजस्थानी दाल  और बाटी  )  




वापस आने में रात हो गई थी--मालरोड की रंगीनियाँ अपने पुरे शबाब पर थी --आज हमने  दाल बाटी चूरमे का भोग लगाया --आप भी शामिल हो सा. --राजस्थानी खाने की  बात ही निराली है -- अनोखा स्वाद होता है -- 


( सा.--शब्द राजस्थान में सम्मान  के लिए इस्तेमाल होता है जेसे :-जीजा सा.,मामा सा.,काकी सा.,इत्यादि )  



  (गुजराती थाली और राजस्थानी थाली का मेल _)



इस  तरह आज की थका देने वाली और एक मजेदार यात्रा खत्म हुई --अगली यात्रा सनसेट पाईंट  पर !धन्यवाद --

पर्यटक कार्यालय
राजस्थान पर्यटन
टूरिस्ट रिसेप्शन सेंटर
बस स्टैंड के सामने,माउंट आबू
फ़ोन 02974-235151STD कोड-02974

सभी ब्लोगर जगत को अग्रिम वैशाखी की लख -लख बधाइयां ! 


( बहुत से चित्र उधार के है जिन माई -बाप के हो माफ़ करे )