तमिलनाडु डायरी ★6
तिरुवलममलाई (अरुणाचलेश्वर)
19 जनवरी 2026
12 जनवरी को बॉम्बे से चलकर मैं 13 की रात 3 बजे त्रिची पहुँची। हमने श्री रँगनाथ स्वामी,जम्बुकेश्वर मन्दिर ओर 3दिव्यदेशम मन्दिरो के अलावा तन्जोवर के ब्राहतेश्वर मन्दिर के दर्शन कर के कुम्भकोलम के मन्दिरो के दर्शन कर चिदम्बरम घूमे, चिदम्बर से हम कांचीपुरम के मन्दिरो में गए और फिर अरुणाचलन को चल दिये,अब आगे:---
कांचीपुरम से हम तिरुवन्नमलाई मन्दिर गए जो कांचीपुराम से 118 km है ओर पहुचने का समय ढाई घण्टे का है। ये मन्दिर शिव के चौथा तत्व "अग्नि तत्व" को प्रजेंट करता है।
हम तिरुवन्नमलाई यानी कि अरुणाचलेश्वर मन्दिर पहुँचे तब तक रात हो गई थी।हम मन्दिर के पास पहुँचे हम फटाफट दर्शन कर के वेलूर जाना चाहते थे और आज की रात वही रुकना चाहते थे।पर मन्दिर में बहुत भीड़ थी।मन्दिर के अंदर केबिन बने हुए थे,जिसमे काफी श्रद्धालु दिखाई दे रहे थे। जिनको देखकर ये लगा कि जल्दी नम्बर आने वाला नही है तो हम लौट गए। यहाँ रुकमा मेरी सहेली के मिस्टर की भी तबियत ठीक नही लग रही थी तो सोचा रात यही रुक जाते है और सुबह जल्दी दर्शन करेगे।
यहाँ हमको मन्दिर के पिछली ओर एक होम स्टे मिल गया।इधर भी हमको 2 बड़े बेड का एक रूम मिला । ये भी 1800 so मांग रहा था पर मोलभाव कर के 1500 so में बात बन गई। रूम काफी लंबा था ।घर के स्वामी भी पीछे वाले पोर्शन में रहते थे। सहेली के मिस्टर के लिए दूध हमको वो ही गर्म कर के दे गए।
यहाँ शाम को मिस्टर ओर मैं थोड़ा बाजार भी घूमे ओर वही खाना खाया। रात को हम चारो गप्प सप्प करते हुए सो गए।
सुबह 4 बजे उठकर हम दोनों मन्दिर की तरफ चल दिये।दोनों मर्दों ने हाथ ऊंचे कर दिए क्योकि इतनी भीड़ में उनको जाने का मन नही था। वैसे भी सहेली के मिस्टर को हल्का बुखार था तो मेरे मिस्टर भी नही गए।
अब हम दोनों सुबह2 सुनसान सड़क पर गाना गाते हुये मन्दिर के पास जा रहे थे ––– "दो बेचारे बिना सहारे...😄
मन्दिर के नजदीक पहुँचकर देखा की मन्दिर के केबिन अभी भी भरे हुए थे अब क्या करे ये सोच ही रहे थे कि एक बाईक हमारे पास आकर रुकी, उसपर बैठा एक लड़का हमको स्पेशल दर्शन करवाने को बोल रहा था। हम दोनों ने तुरंत उसका प्रपोजल मान लिया और उसकी बाईक पर बैठ गए वो हमको मन्दिर के पिछले पश्चिमी गेट पर ले गया जिस पर pay -Gopuram लिखा हुआ था। हम समझ गए कि ये पेमेंट लेकर दर्शन करवाते है। वहां कुछ लोग ओर भी खड़े हुए थे हम भी पास ही खड़े हो गए।
ठीक 6 बजे मन्दिर का बड़ा गेट खुला,काफी लोग अपने पटाये लोगो को अंदर भेज रहे थे हमारा वाला लड़का भी 6-7 ओर लोगो के साथ हमको भी अंदर ले गया। कुछ अंदुरिनि रास्तों से गुजारता हुआ वो हमको मूर्ति के सामने लाईन में लगा गया ..15 मिनिट में हम दोनों ने अच्छे से नजदीक जाकर भगवान शिव के दर्शन किये।
दर्शन कर के उसने हमको पद्मावती मन्दिर के दर्शनों की लाइन में लगवा दिया। यहाँ उसने हम दोनों के 500-500रु लिए जो जायज भी थे। वरना इतनी भीड़ के रहते आज दोपहर तक भी दर्शन होना मुश्किल था।
दर्शन कर हम बाहर आये पर पश्चिम गेट पर ताला लगा था ओर सब लोग साउथ गेट की ओर बढ़ रहे थे तो हम भी साउथ गेट की तरफ चल दिये। साउथ गेट काफी दूर था हमको वहाँ से निकलकर वापस पश्चिम गेट पर आना था क्योकि वहाँ हमारी चप्पलें पड़ी थी और पश्चिम गेट भी बहुत दूर था। साउथ गेट से बाहर आये तो ऑटोवाले खड़े थे,दिल को तसल्ली हुई कि अब ऑटो से होटल पहुच जायेगे। परन्तु ऑटो वाले जरा सी दूर का 200 रु ले रहे थे ।हम तो तैयार थे पर हमको हमारे होटल का नाम याद नही था तो ऑटो वाले लेकर नही गए। वहाँ से पैदल ही चलते हुए हम पश्चिम गेट तक आये और चप्पल पहनी।
साउथ के मन्दिर बड़े बेकार है एक तो बड़े बड़े होते है ऊपर से इनके प्रांगण भी लंबे-चौड़े होते है बाहर ही चप्पल उतरवा लेते है अब नंगे पैर चलते रहो।
नंगे पैर चलना मुझे सबसे कठिन काम लगता है।बड़ी मुश्किल से चलते चलते मैं पश्चिमी गेट तक आई और अपनी चप्पल पहनी।
पश्चिम गेट के पास ही हमारा होम स्टे दिख गया ।चलो भगवान भला करे हम बहुत थक गए थे।
कमरे पर आए तो दोनों लंबी तान मार कर सो रहे थे। उनको उठाया और थोड़ा आराम मैने भी किया।
सब तैयार हो गए तो पेकिंग कर के हमने रूम छोड़ दिया। आगे रास्ते मे नाश्ता कर के हम वेलूर को चल दिये।
शेष अगले एपिसोट में...