मेरे अरमान.. मेरे सपने..


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गुरुवार, 29 सितंबर 2022

जिंदगी का सफर



जिंदगी का सफर
---~~~~💝--~~~
कैसे कटा 21 से 60
तक का यह सफ़र,
पता ही नहीं चला ।

क्या पाया, क्या खोया,
क्यों खोया,
पता ही नहीं चला !

बीता बचपन, 
गई जवानी
कब आया बुढ़ापा,
पता ही नहीं चला ।

कल तक बेटी थी,
कब सास बन गई,
पता ही नहीं चला !

कब मम्मी से
नानी-दादी बन गई
पता ही नहीं चला ।

कोई कहता सठिया गई,
कोई कहता छा गई
क्या सच है?
पता ही नहीं चला !

पहले माँ बाप की चली,
फिर पति की चली,
फिर चली बच्चों की,
अपनी कब चली,?
पता ही नहीं चला !
        
दिल कहता जवान हूँ मैं,
उम्र कहती है नादान हूँ मैं,
इस चक्कर में कब
घुटनें घिस गये?
पता ही नहीं चला !

झड़ गये बाल, 
लटक गये गाल,
लग गया चश्मा,
कब बदली यह सूरत?
पता ही नहीं चला !

समय बदला,
मैं बदली
बदल गई मित्र-
मंडली भी
कितने छूट गये,
कितने रह गये मित्र,
पता ही नही चला।

कल तक अठखेलियाँ
करती थी मित्रों के साथ, 
कब सीनियर सिटिज़न
की लाइन में आ गई
पता ही नहीं चला !

बहु, जमाईं, नाते, पोते,
खुशियाँ आई,
कब मुस्कुराई उदास
ज़िन्दगी,
पता ही नहीं चला ।

जी भर के जी लो प्यारो
फिर न कहना कि ..

मुझे पता ही नहीं चला।
🥰🥰😂😂😂🥰
---दर्शन के दिल से

     

गुरुवार, 15 सितंबर 2022

Gds के साथ वैष्णोदेवी की यात्रा

मेरी वैष्णोदेवी की यात्रा
15 -18अगस्त 2021
लॉक डाउन के चलते घर में घुसे घुसे एक अरसा बीत गया था...तन के  साथ- साथ मन भी पगलोट हो गया था... पागलपन अपनी चरम सीमा लांघने ही वाला था कि अचानक चारु के फोन ने रिमझिम फुहार बिखेर दी..."ग्रुप का प्रोग्राम बन रहा हैं बुआ वैष्णोदेवी चलोगी" ? पूछ रही थी। 

अंधा क्या मांगे 2 आंखें 😜😜😜 मैंने बगैर घर में पूछे "हा" में अपनी मोटी गर्दन हिला दी।
टिकिट बुक हो गए तब ध्यान आया कि वैष्णोदेवी की कठिन चढ़ाई अब मेरे बूते के बाहर हो गई हैं.. ? तुरंत अचंभे की स्थिति में खुद को घिरा हुआ पाया।क्या करूँ!क्या न करूं!!!

आखिर बहुत सोचने के बाद मैंने बुझे मन से टिकिट कैंसिल करवा दी।
लेकिन माता का बुलावा था तो जाना तो तैय था ही फिर फटाफट 2 दिन में मिस्टर ने आने-जाने की टिकिट करवा दी।टिकिट कंफर्म भी मिली और जाना भी पक्का हो गया।😀

"चलो बुलावा आया है माता ने बुलाया हैं... जय माता दी😂"

आखिर जीत माता की हुई और मैं ओर चारु नियत समय 15 अगस्त को घर वालों को टा-टा बॉय-बॉय बोलकर निकल पड़े।

11बजे जब बॉन्द्ररा स्टेशन से हमारी ट्रेन निकली तो खुशी के बादल  हंसकर हमारा फूलों से स्वागत कर रहे थे।😂 यानी कि बारिश जोरों पर थी।
धुंआधार बारिश ने मौसम को बेईमान बना दिया था और मैं खिड़की से अपना चेहरा बाहर निकालकर गिरती हुई बूंदों का अभिवादन स्वीकार कर रही थी।
रास्ते में जमकर मस्ती की।हमारे साथ-साथ डिब्बे में भी हंसी के गोले फूट रहे थे।😀
रात 11 बजे कोटा स्टेशन आया और हम 2 सदस्यों में एक ओर सदस्य जुड़ गया, वो थी सरोज...
सरोज से कुछ देर गपशप करने के बाद सब अपनी -अपनी बर्थ पर सोने चले गए।
इधर बारिश का नामोनिशान नही था..इसलिए गर्मी बहुत थी लेकिन रात को ठंडक हो गई थी... सुबह 5 बजे दिल्ली से नन्दिनी ओर 7बजे  पानीपत से सचिन का आवगमन हुआ। अब हमारी पंचौडी(5 सदस्य) ट्रेन में धमाचौकड़ी मचा रही थी।
अम्बाला में हमारे ग्रुप का एक सदस्य विमल मिलने आया और ढेर सारे खाने के पैकेट थमा गया।

सरोज,सचिन ओर नन्दिनी के लाये पकवानों पर हाथ साफ करते -करते कब कटरा स्टेशन आ गया पता ही नही चला...
 शाम को जब सब कटरा स्टेशन उतरे तो घड़ी में 6 बज रहे थे।
स्टेशन पर करोना नाम के भूत की तफ्तीश चल रही थी ..करीब 1 घण्टे बाद सब भूतों को पछाड़कर हम स्टेशन से बाहर निकले।

यहां ग्रुप के 2 ओर सदस्य नितिन ओर रोमेशजी जुड़ गए...सबका काफिला एक होटल में रूका, फ्रेश होकर हमारा काफिला दो भागों में बट गया 1 जो घोड़े से जा रहे थे और दूसरे जो पैदल जा रहे थे।

काफिला नम्बर एक:--
मैं ओर सचिन।
हम दोनों घोड़े से जा रहे थे।
हमने दर्शन ड्योढ़ी पर यात्रा पर्ची की चेकिंग करवाई ओर 1100 ₹ में दो घोड़े अर्ध्यकुवारी तक किये और माता रानी का जयकारा करते- करते रात 10 बजे अर्ध्यकुवारी फतेह कर ली।

अर्ध्यकुवारी पहुँचकर हमने राजमा चावल का भक्षण किया ओर  रूम में आकर लंबी तान लगाकर सो गए। उधर...
काफिला नम्बर 2:--
का 5 सदस्यों वाला ग्रुप रात 8 बजे कटरा से पैदल चलते हुए सुबह 4 बजे भवन के नजदीक पहुँच भी गया। जबकी हम स्वप्नलोक में विचरण कर रहे थे😀 

अचानक सचिन का फोन खड़खडाया..उधर से नितिन ने बोला कि हम भवन पहुंचने वाले हैं तो हमारी नींद रफ़ूचक्कर हो गई ओर हम फटाफट  नहाधोकर बाबूजी बन के बैटरी कार को ढूंढने निकल पड़े। सारा रास्ता सुनसान पड़ा था.. यदाकदा एक आध बन्दर उन्ध रहा था, करीब 1 किलोमीटर चलने के बाद हमको एक इंसान नजर आया जिससे बैट्री गाड़ी का पता पूछा तो मेरे पैरों के नीचे से जमीन खसक गई क्योंकि इतनी मशक्कत के बाद जो मैं 1km चली थी वो बेकार हो गई,मैंने घूरकर सचिन को देखा तो वो हड़बड़ाकर मेरा हाथ पकड़े रिटर्न मुद्रा में चल दिया😀😀

 अब हम वापस उसी रास्ते पर चल रहे थे जिधर से अभी -अभी आये थे। करीब 1km से भी ज्यादा चलने के बाद हम नियत स्थान पर पहुँचे तो पता चला कि बैट्री कार तो 8 बजे चलने वाली है  और अभी 6 बज रहे थे...तो हम बैटरी कार को जय रामजी की बोलकर  दोबारा आधा किलोमीटर ऊपर को चले और घोडों पर सवार हो गए ...लेकिन इन फालतू चीजों में हमारा 2 घण्टा खराब हो गया जिसकी बदौलत हम काफ़िला नम्बर 2 से 2घण्टा पीछे हो गए। इस बार घोड़े पर हमारा 1200 ₹ खर्च हुआ। अब हमारा घोड़ा डगबग-डगबग करते करते भवन की ओर चल दिया।

सुबह 8 बजे जब हम भवन पर पहुँचे तो काफिला नम्बर 2 माता जी के दर्शन कर के हमारा इंतजार 
 कर रहा था। थोड़ी बहस के बाद उनको भेरोबाब के रास्ते में छोड़कर हम माताजी के दर्शन करने लाईन में लग गए।

करीब साढ़े नो बजे हम मातारानी के दर्शनों का लाभ उठाकर बाहर निकले। मन एकदम शांत था अब मेरा यहां आना सार्थक लग रहा था क्योकि मातारानी के  इतने अच्छे दर्शन हुए थे कि मन प्रसन्न था। 
अब पेट में चूहे दौड़ने की बारी आई तो सोचा कुछ खा लिया जाए। वही पास के एक रेस्तरां में बैठकर मैंने फिर से थोड़े राजमा चावल खाये। क्योंकि वहां मिलने वाले छोले भटूरे या तेल में भीगी पूरियो से चावल खाना मुझे ज्यादा अच्छा लगा।
नाश्ता कर के हम क्लार्क रूम की ओर चल दिये.. वहां से समान निकालकर हम वही बैठकर आराम करने लगें कि  काफिला नम्बर 2 का फोन आया कि "हमने भैरोनाथ के दर्शन कर लिए है और अब नीचे उतर रहे हैं।"
अब हमारे सामने ये विकट समस्या उत्पन्न हो गई कि हम भैरो के दर्शन करें या नीचे उतर जाए?
अचानक मेरी नजर हेलिकॉप्टर के बैनर पर गई, नजदीक जाकर पूछा तो टिकिट मिल रही थी। लेकिन तुरंत 1घण्टे के अंदर उड़ान भरनी थी।
अब ,क्या करे, क्या न करे? बड़ी परेशानी थी,क्योकि मैं घोड़े से वापस जाना नहीं चाहती थी 😀 मेरा पूरा शरीर दुख रहा था...घोड़े की लगाम थामे दोनों हथेलीयां दर्द कर रही थी ...सारे रास्ते बूत की तरह बैठी  माता रानी का जाप करती हुई आई थी ...यादगार के लिए एक भी फोटु उतारी नही थी...अब मैं रिस्क नही लेना चाहती थी। तुरंत हम दोनों ने डिसाईट किया कि अब हम सीधे हेलिकॉप्टर से ही वापस जायेगे और तुरंत हमने भैरोनाथ की यात्रा स्थगित कर के 3600 ₹ के 2 टिकिट खरीद लिए। जय माता दी🙏

अब भवन से साँझी छत तक वापस घोड़े पर जाना था, क्योकि पैदल में जा नही सकती थी,तो मरते मरते दिल को तसल्ली दी कि कोई ना, अब तो नीचे ही उतरना हैं।
भवन से हमने वापस सांझीछत तक घोड़े किये यहां भी 800 ₹ में 2 घोड़े हुए।
हेलिकॉप्टर पर चढ़ने से पहले मेरा आधारकार्ड चेक़ हुआ कहीं कोई आतंकी न चढ़ जाए😀😀 और सबसे खतरनाक काम हुआ मेरा मोबाइल छीन लिया दुष्टों ने ☹️😠
मेरे ओर सचिन के मोबाइल उन लोगो ने एक पर्स में रख दिये ओर बोला कि सिक्यूरिटी पर्पज से ऐसा किया जा रहा है। सत्यानाश हो इनका🤦

हम फटाफट हेलिकॉप्टर में सवार हो गए और मिनटों में नीचे आ गए।😍
 बेहद सुखद यात्रा थी हेलिकॉप्टर की,जपनाम!!!
 मैंने कभी सोचा भी नही था कि हेलीकॉप्टर की इतनी मजेदार यात्रा होगी।😂😂
11 बजे हम कटरा में अपने रूम पर आराम कर रहे थे।🤗

दोपहर को काफिला नम्बर 2 आहिस्ता-आहिस्ता एक एक करके आने लगे...सभी थकान से चूर थे और हमारी थकान उतर चुकी थी।
शाम को हमने कटरा बाजार में शॉपिंग की ओर रात को आराम से Ac रूम में सो गए सुबह गाड़ी जो पकड़नी थी😀
इस तरह एक मजेदार धार्मिक यात्रा सबके सहयोग से हंसते खेलते थोड़ा लड़ते -झगड़ते पूरी हुई।
जय माता की🙏



जय माता रानी की 🙏

मंगलवार, 2 अगस्त 2022

सपनों के रंग

सपनों का रंग
~~~~~~~~~★

मैंने सपनों को चुराकर
तकिये के नीचे छुपा रखे है।
तुम अपनी आंखों को मूंदकर
मेरी अँखियों  में समा जाओ,
मैं तुम्हें सपनों की बस्ती में ले चलूंगी 

पूरे चांद के उजाले में,
अपनी बाहों के झूले में
लोरिया गाकर –
तुम्हें झूला झुलाऊंगी।

तब,
तकिये के नीचे रखे अपने सपनों को 
हकीकत का जामा पहनाऊँगी।।

तुम मेरे आग़ोश में अपना सर रख देना,
मैं अपनी उंगलियों से तुम्हारा ललाट सहलाऊंगी
फिर कोमल लबों से उन्हें चूमकर 
अपने प्यार की मोहर लगाउंगी ।

तब तुम मदहोश हो मुझसे लिपट जाना,
और मैं अपनी समस्त लज्जा खोकर 
अमर बेल बन तुममें सिमट जाऊंगी।।

तब तकिये के नीचे रखे अपने सारे सपनों को आजाद कर दूँगी 👻
ओर खुशी के रंग बिखेर तुम्हारी जोगन बन चिल्लाऊंगी___
"मुझे तुमसे मोहब्बत है!
मोहब्बत है !!
मोहब्बत है!!!"

____दर्शन के दिल से💝

शनिवार, 18 जून 2022

अनजान चित्रकार


ये कौन चित्रकार हैं जो ____
पहाड़ों पर फैला रहा हैं
सफेद कोहरा -सा
मैदानों में हरित क्रांति -सी हैं
आसमान से बहती सुकुन की फुहारे
मेरे जिस्म-ओ जां को भिगो रही है।

ये कौन चित्रकार है जो____
हवा का रुख बदल देता हैं
चांदनी रात में सिमटकर
अपने बाजुओं को फैला
नींद के आगोश में 
सारी कायनात को समेटे
भोर की लालिमा में 
दम तोड़ देता हैं।

ये कौन चित्रकार हैं जो_____
नदी का रुख बदल देता है
पत्थर के सीने से लावा बहाकर
गली कूंचों में कीचड़ उड़ेल देता है।

ये कौन चित्रकार हैं जो ____
मांस के एक नन्हे से लोथड़े को दिल बनाकर,
उसमें सैकड़ों अरमान भर देता है ।

ये कौन चित्रकार हैं ____
ये कौन चित्रकार हैं।।।

---दर्शन के दिल से💝

गुरुवार, 23 दिसंबर 2021

पागल बाबा मंदिर, वृन्दावन

"पागल बाबा मंदिर"

इस मंदिर में सबकी इच्छा पूरी होती हैं। ये मान्यता हैं कि भगवान खुद अपने भक्त के लिए गवाही देने आए थे।
कहते है एक गरीब ब्राह्मण ने एक महाजन से पैसे उधार लिए थे । वो हर महीने थोड़ा थोड़ा पैसा महाजन को चुकाता था जब लास्ट क़िस्त बची तो उसको महाजन का एक नोटिस मिला कि उसने अपने पैसे नही चुकाए हैं।
परेशान गरीब ब्राह्मण कचहरी पहुँचा ओर जज को बोला कि उसने तो काफी पैसा चुका दिया है तो जज ने सवाल किया कि "कोई गवाह हैं" ?
तब गरीब ब्राह्मण ने सोचकर बोला कि--" हाँ,मेरे बाँके बिहारी हैं"?
तब कोर्ट से बाँके बिहारी ,वृन्दावन के पते पर नोटिस निकला जिसे ब्राह्मण ने मन्दिर में जाकर भगवान के चरणों मे रख दिया और बोला कि---"आपको गवाह के लिए आना पड़ेगा।" 
हाजरी वाले दिन एक बूढ़ा व्यक्ति कोर्ट में आया और उसने बताया कि ब्राह्मण ने उसके सामने ही सारी रकम दी थी और उसने जो जो तारीख बताई थी उस पर रकम अंकित थी पर नाम फर्जी था।
जज ने ब्राह्मण को निर्दोष बताया ओर उसे छोड़ दिया। पर ब्राह्मण से पूछा कि वो बूढ़ा आदमी कौन था?
ब्राह्मण ने बताया कि वो सर्वस्त्र रहने वाले मेरे बांके बिहारी हैं।
तब वो जज सबकुछ छोड़कर बाँके बिहारी की खोज में निकल पड़ा।
काफी साल भटकने के पश्चात जब वो वापस वृन्दावन आया तो उसका नाम पागल बाबा पड़ गया था।

पागल बाबा मंदिर 10 माले का है और दसवीं मंजिल से सारा वृन्दावन दिखता हैं।
इसकी हर मंजिल पर अलग अलग भोग बनता हैं।
जब मैं यहां पहुँची तो दीवारों पर मैंने कई लोगों की मन्नतें लिखी देखी। तब मैंने खुद अपनी एक मन्नत लिख दी ।मैं ऊपर तो नही चढ़ सकी ।सिर्फ एक मंजिल पर जाकर भगवान कृष्ण के दर्शन किये और प्रसाद ग्रहण किया।



शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

अकेलापन

★अकेलापन ★

मैं अकेली हूँ ? 
कल भी थी --
आज भी हूँ ?
ओर कल भी रहूंगी !!!!
दूर निकलना चाहती हूं ---
तेरी यादों के खंडहर से ?
खुली सांस में जीना चाहती हूँ।
रोज - रोज की पीड़ा से मुक्त होना चाहती हूँ।
थक गई हूँ तेरी सलीब को ढोते हुए,
पिंजर बनकर रह गई हूं।
अब मुक्कमल खामोशी चाहिए।
मुझे आजादी चाहिए।

कहने को तो मैं जिंदा हूं ?
होश भी है मुझको ---
फिर ये भटकाव कैसा ?
क्यों खोजती फिरती हूँ ---
उन अवशेषों को,
जो राख बन चुके है---
फिर भी उम्मीद पर जिंदा हूँ ।

अकेलेपन का ये अहसास,
मुझे महफ़िलों में जाने नही देता
खिलखिलाने नही देता !
मैं हंसना चाहती हूँ ...
गुनगुनाना चाहती हूं...
अपनी पूंजी किसी ओर पर लुटाना चाहती हूं।
काश, की कोई होता ---???
मेरी अधूरी चाहत को पूरा करता ?
काश, कोई होता ...............?

उम्मीद का दामन पकड़े आज भी इंतजार में हूँ !!!

---दर्शन के दिल से

अविरल-मंथन


सावन का आना ...
बिजली का कड़कना,
बारिश का बरसना,
जब तेरी याद के सागर में,
मैं डूब जाती हूँ ।
तब भूचाल आ जाता है ..
तूफान उठता हैं...
ओर ???
ओर मैं हर साल तेरी यादों का मंथन कर,
उनको किनारों पर छोड़ आती हूँ ।
फिर आगे बढ़ जाती हूँ ---------
लेकिन तुम; अपने किनारे तोड़ कर,
मेरी जलधारा बन,
फिर मुझमे मिल जाते हो ।
मैं फिर तुमको अपने में समेटे,
बहती रहती हूँ
निरंतर....
अविरल..
अगले सावन के इंतज़ार में।।

---दर्शन के दिल से @

सोमवार, 2 अगस्त 2021

अवचेतन- मन


★अवचेतन-मन★

"मैंने वो ख़त मेज की दराज़ में बंद कर दिए है ____ !
कभी फुरसत मिली तो फिर से पढूंगी,
तब मेरी आँखें डबडबा जायेगी,
ओर सुनी आंखों से गिरती बूंदे कराह उठेगी,
धुंधले शब्द पुकारेंगे ...
क्या उस समय तुम मेरी आवाज सुनकर आ जाओगे ???

तुम्हारी धुंधली -सी आकृति,
मेरे मानस-पटल पर आज भी अंकित है----!
तुम वैसे ही हो ना ???
दुबले-पतले-मरियल से,
ढीले- ढाले -से लिबास में,
अपने घुंघराले बालों को झटका देते हुये!
ये तुम ही हो ना 🤔

जरा नही बदले😜😜
उस दिन जब तुमने मेरे सम्मुख,
अपने गीले बालों को झटक दिया था !
तो मैं चौक पड़ी थी।
ओर तुम खिलखिला दिये थे ।
तुम्हारी वो मासूम हंसी से,
सारी कायनात झूमने लगी थी,
फिजायें चहकने लगी थी,
मानो सावन की झड़ी लग गई हो,
तब, सावन तो नही था,
पर चैत्र का महीना भी तो नही था!
हा, पहाड़ों पर ठंडक जरुर थी।

तुम्हें याद है ----
जब हम रात को खाना खाकर लौट रहे थे,
तुम मुझे प्यार से निहार रहे थे
ओर मैं___
मैं शर्म से दोहरी हुई जा रही थी🙈

वो पल ! आज सिमट गया है,
कहीं खो गया हैं...
इन कागजों को रंग गया है ।
ये काले स्याह अक्षर, 
आज मेरा मजाक उड़ा रहे  है----
तुमको मुझसे दूर कर के,
मेरी खिल्ली उड़ा रहे है ।

ऐ सुनो ! क्या तुम लौटकर आओगे?😍
वहां से, जहां से कोई वापस नहीं आता😢
आ जाओ ना !!!!😎

#दर्शन के 💝दिल से

सोमवार, 26 जुलाई 2021

मैं ओर मेरा भ्रम

"मैं ओर मेरा भ्रम"

जब भी ख्यालों की खिड़की खोलती हूँ ।
 तो एक तस्वीर मेरे ज़ेहन में उभरती हैं।
मैं दौड़कर उसे गले लगाने की असफल कोशिश करती हूं।
तब, वो मुझे परे थकेलकर मेरी कमजोरियों पर हंसती हैं।

‌मैं नशे के आलम में
‌उसको पुकारती हूँ,
‌पर वो शायद अपने कानों को बन्द कर मेरी आवाज को दूर झटक  अनसुनी कर देती है।
‌तब मैं उसको झिंझोड़कर अपने प्यार का वास्ता देकर कुछ पल के लिए रोक लेती हु।
‌पर वो एक फुंकार मारकर अपने विष का ऐलान कर देती हैं।
‌तब मैं निडर हो, 
उसके सर्फदंस को भोगकर,
 फिर से उसके सानिन्द का रस भोगने के लिए,
उसके इर्द गिर्द मंडराने लगती हूँ।
‌तब वो अपनी बीन निकाल मुझे मदहोश करने लगती हैं।
‌ओर मैं उसकी बीन पर थिरकने लगती हूँ।
‌सर्फदंश से मदहोश हुई मैं उस  स्थिति का रस भोगने लगती हूँ।
‌ओर चटकारे लेते हुए उस जहर को पीने लगती हूँ।
‌ओर तब व्याकुल हो,
 विरह के गीत गाकर,
उस मूर्छित पडी नागिन को पुनः जीवित करने की कोशिश करती हूँ।

इस कोशिश में मैं स्वयं को लहूलुहान कर लेती हूं।
तब! संतुष्टि की मौन स्वीकृति देकर, आशा की एक किरण को अपने पहलू में दबा कर चिर निद्रा  में विलीन हो जाती हूँ।

---दर्शन के दिल से

 

मंगलवार, 25 मई 2021

सफर ओर हमसफ़र

सफर और हमसफ़र
~~~~~~~~~~~~`💝


ट्रेन चलने को ही थी कि अचानक कोई जाना पहचाना-सा चेहरा जनरल बोगी में आ गया... मैं अकेली सफर कर रही थी... सब अजनबी चेहरे थे.. स्लीपर का टिकिट नही मिला तो जनरल डिब्बे में ही बैठना पड़ा...
मगर यहां ऐसे हालात में उससे मिलना...अजीब हालत थी मेरी ...लेकिन जिंदगी में ये पल मेरे लिए एक संजीवनी के समान थे।

जिंदगी भी कमबख्त कभी-कभी अजीब से मोड़ पर ले आती है... ऐसे हालातों से सामना करवा देती है जिसकी कल्पना भी इंसान नही कर पाता।

वो आया और मेरे पास ही खाली पड़ी सीट पर बैठ गया...ना मेरी तरफ देखा,ना पहचानने की कोशिश की... कुछ इंच की दूरी बना कर चुप चाप पास आकर बैठ गया...बाहर सावन की रिमझिम लगी थी...बारिश जोरदार हो रही थी और ट्रेन ने प्लेटफार्म छोड़ दिया था...इस कारण वो कुछ भीगा हुआ लग रहा था..मैने कनखियों से नजर बचा कर उसको देखा....उम्र के इस पड़ाव पर भी कमबख्त वैसा का वैसा ही खूबसूरत था..हां, कुछ भारी हो गया था..मगर इतना ज्यादा भी नही की पहचान भी न सकूं।
फिर उसने जेब से चश्मा निकाला और मोबाइल में लग गया।

चश्मा देख कर मुझे कुछ आश्चर्य हुआ...उम्र का यही एक निशान उस पर नजर आया था कि आंखों पर चश्मा चढ़ गया था...चेहरे पर और सर पे मैने सफेद बाल खोजने की कोशिश की मग़र मुझे नही दिखे। 

मैंने जल्दी से सर पर स्कार्फ बांध लिया...बालों को डाई किए काफी दिन हो गए थे... वैसे भी आलस के कारण आजकल मैंने बालों को रंगना कम कर दिया था.. लेकिन मेरे सर में ज्यादा तो नही पर थोड़े-से बाल सफेद दिख रहे थे।

थोड़ी देर बाद मैं उठकर बाथरूम चली गई... हैंड बैग से फेसवाश निकाला चेहरे को ढंग से धोया फिर शीशे में चेहरे को गौर से देखा; उसको देखकर मेरे चेहरे पर एक अजीब-सी खुशी नाच रही थी...मैने खुश होकर शीशा वापस बैग में रख लिया और अपनी सीट पर आ गई। 

लेकिन ये क्या? वो साहब तो खुद खिड़की के पास मेरी सीट पर अपना आसान लगाए बैठे हुए थे...मुझे आया देख, मेरी तरह देखा भी नही बस बिना देखे ही कहा--- "सॉरी, भाग कर चढ़ा था तो पसीना आ गया था...थोड़ा सुख जाए फिर अपनी जगह पर बैठ जाऊंगा।" 

वह फिर अपने मोबाइल में लग गया... उसने मेरी इच्छा जानने की कोशिश भी नही की...मुझे उसकी यही बात हमेशा बुरी लगती थी...।

 ख़ेर, कुछ भी हो! पर ना जाने क्यों मैं आजतक उसको भूला नही सकी थी...एक वो था जो सिर्फ दस सालों में ही मुझे भूल गया था...फिर मैंने सोचा शायद उसने अभी तक मुझे गौर से देखा नही हो, देखेगा तो जरूर पहचान लेगा..थोड़ी मुटिया गई हूँ...पर इतनी भी नही की वो मेरा चेहरा ही भूल जाये.. मैं ओर उदास हो गई ..जिस शख्स को जीवन में कभी भुला नही पाई उसको मेरा चेहरा ही याद नहीं😔

वो शादीशुदा है...मैं जानती हूँ..मैं भी विवाहिता हूं, मग़र इसका मतलब यह तो नही कि अपने खयालों को, अपने सपनों को जीना ही छोड़ दूं...कितनी तमन्ना थी कि कुछ पल उसके साथ गुजारूं...।

आज वही शख्स मेरे पास बैठा हैं,लेकिन अजनबी बनके😪 वो जिसे स्कूल के टाइम से मैंने दिल में बसा रखा था.. आज भी फेसबुक पर उसकी सारी तस्वीरें छुपकर देखा करती हूं ... उसकी हर कविता, हर शायरी में खुद को खोजा करती हूं...खुद को ही पाती हूँ लेकिन, वह तो आज मुझे पहचान ही नही रहा😔 मैं थोड़ी उदास हो जाती हूँ।

हम में प्यार जैसा कुछ था ये तो पता नही,पर वो हरदम मेरे साथ रहता था..मेरी केयर करता था..मुझे भी उसके बगैर एक मिनट अच्छा नही लगता था...हम दोनों का साथ स्कूल से कालेज तक रहा.. कॉलेज में भी हमदोनों मशहूर थे..हमारे ठहाकों से कॉलेज की सुनी बिरादरियां गूंजती रहती थी.. कोई दिन ऐसा नही जाता था कि हम मिलते न हो...हमेशा हर पार्टी या पिकनिक हम दोनों के बगैर सुनी होती थी।

 फिर कॉलेज छुटा तो मेरी शादी हो गई और वो फ़ौज में चला गया... कोई गिला या शिकवा नहीं था,मैं खुश थी.. फिर सुना कि उसकी भी शादी हो गई...जब भी मायके जाती तो उसकी कुछ न कुछ  खबर मिल ही जाती थी।

बस ऐसे ही जिंदगी गुजरती गई, न कोई मलाल न कोई खुशी।

आधे घण्टे से ऊपर हो गया.. वो आराम से खिड़की के पास मेरी सीट पर बैठा अपने मोबाइल में लगा रहा.. उसने मुझे देखना तो दूर अपना चेहरा तक ऊपर नही किया था😔 सारे मर्द ऐसे ही होते है😠अब मुझे गुस्सा आने लगा था।

लेकिन अब मैं अपने मोबाइल को देखने लगी.. कभी अपने मोबाइल को देखती कभी उसकी तरफ देखती... फेसबुक खोलकर उसकी तस्वीर को भी मिलाया वही था; पक्का वही! शक की कोई गुंजाइश ही नही थी..
 वैसे भी हम महिलाएं किसी को पहचानने में कभी धोखा नही खा सकती...20-30 साल बाद भी सिर्फ आंखों से ही पहचान लेती हैं ☺️

फिर और कुछ वक्त गुजरा लेकिन माहौल वैसा का वैसा ही था मैं बस पहलू बदलती रही और वो तटस्थ अपना मोबाइल में उलझा रहा।

इतने में पता नहीं किधर से अचानक टीटी आ गया... सबसे टिकिट पूछ रहा था। 
मैंने अपना टिकिट दिखा दिया। उससे पूछा तो उसने कहा--" मेरे पास नही है।"
टीटी बोला-- "फाइन लगेगा"
वह बोला--" ok लगा दो"
टीटी बोला---" कहाँ का टिकिट बनाऊं?"
उसने जल्दी से जवाब नही दिया... मेरे हाथों की  तरफ देखने लगा..
मैं कुछ समझी नही। 
उसने मेरे हाथ में थमी टिकिट को गौर से देखा फिर टीटी से बोला--- "कानपुर।"
टीटी ने कानपुर की टिकिट बना दी.. और पैसे लेकर चला गया।

अब वो फिर अपने मोबाइल में तल्लीन हो गया।
मैं आवक -सा उसका चेहरा देखती रही...आखिर मुझसे रहा नही गया... मैंने पूछ ही लिया..."कानपुर में कहाँ रहते हो?"
वह मोबाइल में नजरें गढ़ाए हुए ही बोला-- " कहीँ नही"  
मैं फिर बोली--- "किसी काम से जा रहे हो"
वह बोला---"हां"
अब मैं चुप हो गई...वह अजनबी की तरह बात कर रहा था उसने अपनी गर्दन एक बार भी नहीं उठाई..
मुझे गुस्सा आ गया और मैं चुप हो गई।
कुछ देर चुप रहने के बाद आखिर मैंने पूछ ही लिया--- "वहां शायद आप नौकरी करते हो?"
उसका जवाब था---"नही"?

अब मुझसे रहा नही गया...मैंने हिम्मत कर के पूछा ही लिया---"तो किसी से मिलने जा रहे हो?"

उसका वही संक्षिप्त उत्तर-- "नही"

आखिर उसका जवाब सुनकर मेरी फिर हिम्मत नही हुई कि मैं फिर उससे कुछ पूछूँ ☹️ अजीब आदमी हैं... बिना काम सफर कर रहा था..
मैं भी अपना मुँह फेर कर मोबाइल में लग गई...भाड़ में जा!!😠

काफी देर तक मैंने उससे कुछ नही पूछा...ट्रेन अपनी रफ्तार से भागी जा रही थी और मैं मोबाइल में खोई हुई कोई रोचक कहानी पढ़ रही थी कि अचानक उसकी आवाज़ आई-- "अब ये भी पूछ लो की मैं क्यों जा रहा हूँ कानपुर?"

मैं उछल पड़ी...मेरे मुंह से जल्दी से निकला--- "बताओ, क्यों जा रहे हो?"
फिर अपने ही उतावलेपन पर मुझे शर्म-सी आ गई😀

उसने थोड़ा सा मुस्कराते हुये मुझे देखा और बोला--- " एक पुरानी दोस्त मिल गई थी जो आज अकेले सफर पर जा रही थी.. फौजी आदमी हूँ... सुरक्षा करना मेरा कर्तव्य है... उसको अकेले कैसे जाने देता... इसलिए उसे कानपुर तक छोड़ने जा रहा हूँ। " उसने एक दिलकश मुस्कान बिखेर कर इतनी बातें सहज भाव से बोल दी।

लेकिन उसकी बातें सुनकर मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा...मैं आवक हो उसकी शक्ल देखने लगी...फिर मन के भावों को दबाने का असफल प्रयत्न करते हुए मैंने हिम्मत कर के फिर पूछा-- " कहाँ है वो दोस्त?"
कमबख्त फिर मुस्कराता हुआ बोला--" यहीं ! मेरे पास बैठी है ना"
😲😲😲😲😲

मेरा मुंह खुला का खुला रह गया..
मुझे सबकुछ समझ में आ गया था कि क्यों उसने टिकिट नही लिया? क्योंकि उसे तो पता ही नही था मैं कहाँ जा रही हूं... सिर्फ और सिर्फ मेरे लिए वह दिल्ली से कानपुर का सफर कर रहा था...ओर मैं न जाने क्या -क्या सोचे जा रही थी... खुशी से मेरीआंखों में आंसू आ गए...दिल के भीतर एक गोला-सा बना और फट गया😢 परिणाम में आंखे तो भिगनी ही थी।

वो बोला--- "रो क्यों रही हो?"

मैं बस इतना ही सोच पाई---"तुम मर्दजात ऐसे ही होते हो... कुछ समझ नही सकते"। 

मैंने खुद को संभालते हुए कहा-- "शुक्रिया, मुझे पहचानने के लिए और मेरे लिए इतना टाइम निकालने के लिए"😊
वह बोला---"मैंने तुमको दिल्ली के प्लेटफार्म पर ही देख लिया था...तुम मुझे पहचानोगी या नही, यही सोच रहा था कि ट्रेन का समय हो गया,ओर मैं ट्रेन में घुस गया... प्लेटफार्म पर तुम अकेली घूम रही थी.. मैंने देखा तुम्हारे साथ कोई नही हैं तो मुझे तुमको सुरक्षित घर पहुंचाना ही था... आखिर फौजी हूं और ये मेंर कर्तव्य भी था...।" उसकी रौबदार आवाज़ ओर आवाज़ में अपनापन देखकर मुझे खुशी हुई।☺️ "मैं करती भी क्या ? उनको छुट्टी नही मिल रही थी...और भाई यहां दिल्ली में आकर बस गया... राखी बांधने तो आना ही था।" मैंने अपनी मजबूरी बताई।
"ऐसे भाई को राखी बांधने आई हो जिसको ये भी फिक्र नही कि मेरी बहिन इतना लंबा सफर अकेले कैसे करेगी?" वो थोड़ा गुस्सा हुआ।

" क्या करे, भाई शादी के बाद भाई रहे ही नही, भाभियों के हो गए.. मम्मी पापा जिंदा होते तो ये नोबत ही नही आती...अब तो अपना फर्ज निभाने आ जाती हूँ।" कह कर मैं उदास हो गई।☹️

 "तुम अपनी सुनाओ कैसे हो?" मैंने उदासी छोड़कर पूछा।
"अच्छा हूँ, कट रही है जिंदगी" उसका सटीक जवाब।
"मेरी याद आती थी क्या?" मैंने हिम्मत कर के पूछा ही लिया।
वो चुप हो गया...कुछ नही बोला तो मैं फिर बोली---"सॉरी, यूँ ही पूछ लिया...अब तो हम परिपक्व हो गए हैं ऐसी बातें कर सकते है..."मैंने शर्माते हुए बोला।
वो कुछ नहीं बोला उसने अपनी शर्ट के बाजू की बटन खोली और हाथ में पहना तांबे का कड़ा दिखाया जो मैंने ही फ्रेंडशिप -डे पर उसे दिया था वो बोला, " याद तो नही आती पर कमबख्त ये तेरी याद दिला देता हैं।" ओर वो जोर जोर से हंसने लगा।
😂😂😂

कड़ा देख कर मेरा दिल भी बल्लियों उछलने लगा दिल को बहुत शुकुन मिला... की आज भी मैं उसको याद हूं... फिर मैं हंसकर बोली-- "कभी तुमने सम्पर्क क्यों नही किया?"

वह बोला---" डिस्टर्ब नही करना चाहता था... तुम्हारी अपनी जिंदगी है और मेरी अपनी जिंदगी है।"
उसकी ये बात ठीक थी ,हम दोनों की अपनी अपनी गृहस्थी थी।

फिर सहज हो हम आपस में बातें करने लगे काफी देर बाद मैंने डरते-डरते पूछा---" तुम्हें छू लुँ क्या"?
वो मुस्कुराया ओर बोला--- " पाप लगेगा?"
मैं भी मुस्कुराकर बोली---" नही! छूने से पाप नही लगता।"☺️

फिर हम दोनों पहले की तरह बिंदास बातें करते रहे .. कानपुर तक हाथो को हाथ मैं पकड़े बतियाते रहे दिन दुनिया से बेखर...

ये एक दिन मेरी जिंदगी का एक ऐसा यादगार दिन बन गया जिसे आखरी सांस तक नही भुला पाऊंगी।
वह मुझे सुरक्षित घर छोड़ कर चला गया...रुका नही...बाहर से ही चला गया..उसको अपनी डियूटी पर, जम्मू जो जाना था।

उसके बाद उससे फिर कभी मुलाकात नही हुई ...क्योंकि हम दोनों बातों में इतने मशगूल थे कि हमदोनों ने एक दूसरे के फोन नम्बर ही नही लिए थे। 😪😪😪

हांलांकि हमारे बीच कभी भी वैसा प्यार नहीं था...बस एक पवित्र सा रिश्ता था.. जिसका कोई नाम नही था ...ओर हम दोनों को रिश्तों की गरिमा बनाए रखना अच्छे से आता था। 

कुछ महीनों बाद मैंने अखबार में पढ़ा कि वो देश के लिए शहीद हो गया...क्या गुजरी होगी मुझ पर उस वक्त वर्णन नही कर सकती...मेरी आँखों से दो बूंद गिर गई..शायद ये उसके शुक्राने के एवज में थी या एक पाक रिश्ते को श्रद्धांजलि थी😢
 
फिर लोक लाज के डर से मैं उसके अंतिम दर्शनों पर भी नही जा सकी।

आज उससे मिले एक साल गुजर चुका है.. आज भी रक्षाबन्धन का दूसरा दिन है ओर मैं अकेले ही सफर कर रही हूँ... दिल्ली से कानपुर जा रही हूं। जानबूझकर जनरल डिब्बे का टिकिट लिया है  ताकि फिर से उसे देख सकूं  आज न जाने दिल क्यों आस पाले बैठा है कि आज फिर वो आएगा और पसीना सुखाने के बहाने मेरी बगल में बैठ जाएगा ...लेकिन  ये मेरा भ्रम हैं😢
जाने वाले कभी लौट कर नही आते।

एक सफर वो था जिसमें वो मेरा हमसफ़र था।
एक सफर आज है जिसमें उसकी यादें मेरी हमसफ़र है 😥😥😥

---दर्शन के दिल से