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सोमवार, 11 मई 2026

मेरी जगन्नाथपुरी यात्रा

मेरी जगन्नाथपुरी यात्रा
भाग★6 (अंतिम)



8 फरवरी 2026

4 फरवरी की रात 12:15 पर हमारी ट्रेन LTT रेल्वे स्टेशन बॉम्बे से निकली और हम 6 फरवरी सुबह 12 बजे पूरी पहुँच गए । शाम को हमने श्री जगन्नाथ जी के दर्शन किये । कल हमने पूरी के अन्य मन्दिर देखे थे ...आज हम साक्षी गोपाल मन्दिर गये।
अब आगे.....

साक्षी गोपाल मन्दिर देखकर हम कोणार्क मन्दिर की तरफ चल दिये।रास्ते मे चंद्रभागा बीच पर कुछ देर रुककर हम आगे सूर्य मन्दिर देखने पहुँचे।

सारा मन्दिर टूट गया है फिर भी कुछ अवशेष बाकी है ।नृत्य करती मूर्तिया ओर रथ के चक्र अभी बाकी हैं।

इतिहास:--
ओडिशा के पुरी जिले में चंद्रभागा नदी के तट पर स्थित कोणार्क सूर्य मंदिर (13वीं सदी) वास्तुकला का एक अद्भुत उदाहरण है। राजा नरसिंह देव प्रथम द्वारा निर्मित यह मंदिर सूर्य देव के विशाल रथ के आकार का है, जिसमें 12 जोड़ी पहिये और 7 घोड़े हैं, जो समय को दर्शाते हैं। 1984 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित यह मंदिर अपनी नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है।

लोक मान्यता:--
 पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण के पुत्र सांब ने कुष्ठ रोग से मुक्ति पाने के लिए यहां सूर्य देव की तपस्या की थी। 
यह मंदिर सुबह 6:00 बजे से शाम 8:00 बजे तक खुला रहता है।
भारतीयों के लिए 40रु और विदेशियों के लिए 600 रु टिकिट हैं।

इसका निकटतम हवाई अड्डा भुवनेश्वर 65 किमी दूर हैं।

बहुत भीड़ भाड़ वाले सूर्य मन्दिर को देखने पूरी के मन्दिर के बाद सभी लोग इधर  आते हैं।और देखकर बहुत अचंभित होते है।

 पहियो पर बनी कलाकृतियां देखने लायक है। जब मैं 2018 में आई थी तब इसके काफी हिस्से अच्छे थे पर अब काफी बड़ी साइज़ की प्रतिमाएं गिर गई हैं।

सूर्य मन्दिर में पूजा नही होती है ।
सूर्य मन्दिर देखकर हम वापस पूरी शहर को लौट आये।

कमरे में कुछ देर आराम कर के हम आज पे वाले बीच पर पहुँच गए।

 इस बीच को "ब्लू फ्लैग बीच" का खिताब मिला है। यहाँ 50₹का टिकिट था। टिकिट निकालकर अब हम एक साफ सुथरे बीच पर बैठे थे। कुछ लोग स्नान कर रहे थे और कुछ पतंग उड़ा रहे थे।हम कुछ देर इस मनमोहक दृश्य को देखते रहे।

 यहाँ का सूर्य पानी में नही डूबता है अलग डूबता हैं। अक्सर मैंने सूरज समुद्र के पानी मे डूबते हुए देखे है।यहाँ बात जुदा थी☺️ सूर्यअस्त के बाद हम यहां से चल दिये।

ऑटो वाले ने हमको जगन्नाथ मन्दिर के पूर्वी गेट पर उतार दिया और हम मन्दिर के बाहर से दर्शन कर बाजार से होते हुए अपने होटल वापस लौट गए।

इस तरह मेरी जगन्नाथपुरी की ये यात्रा कम्प्लीट हुई।

जय जगन्नाथ🙏



मेरी जगन्नाथ यात्रा

मेरी जगन्नाथपुरी यात्रा
भाग★5


8 फरवरी 2026

4 फरवरी की रात 12:15 पर हमारी ट्रेन LTT रेल्वे स्टेशन बॉम्बे से निकली और हम 6 फरवरी सुबह 12 बजे पूरी पहुँच गए । शाम को हमने श्री जगन्नाथ जी के दर्शन किये । कल हमने पूरी के अन्य मन्दिर देखे थे ...
अब आगे.....

कल हमने पूरी के अन्य लोकल मन्दिर देखे और आज हम कोणार्क सूर्य मन्दिर देखने निकले है।

कल मैंने एक ड्राइवर को बोलकर एक कैब बुक की थी जो हमको सूर्य मन्दिर ओर साक्षी गोपाल मन्दिर के दर्शन करवा सके।टोटल 2200 सों रु।

सुबह उठकर होटल के रेस्तरां में बढ़िया नाश्ता किया फिर पैदल चौक तक निकल गए।यहाँ तो कार आती नही है सबको 200 मीटर दूर चौक तक जाना होता है।

चौक पर पहुँचकर हम कार में बैठे और आगे का सफर तैय करने लगे।
सबसे पहले हम " साक्षी गोपाल" मन्दिर पहुँचे। इसको "सत्यवादी गोपीनाथ मन्दिर" भी बोलते है। यह मन्दिर पुरी से 20 km दूर है। ये मन्दिर भगवान कृष्ण को समर्पित है।
यहाँ बिल्कुल भीड़ नही थी हमने आराम से दर्शन किये।

यहाँ पंडित लोगो का बहुत आतंक है।पर हमको पहले से पता था तो हम किसी के झांसे में नही आये।
यहाँ का इतिहास इस प्रकार है कि:---
" कहते है कि जगन्नाथ पुरी की यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक भक्त साक्षी गोपाल मंदिर के दर्शन नहीं कर लेते। यह दुनिया के उन दुर्लभ विष्णु मंदिरों में से एक है जहाँ भगवान को प्रसाद के रूप में चावल के बजाय गेहूं (जैसे पूरी या लप्सी) का भोग लगाया जाता है。
मंदिर का निर्माण पारंपरिक कलिंग शैली में किया गया है, जो इसकी भव्यता और ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है।

आंवला नवमी मंदिर का सबसे बड़ा उत्सव है। साल में केवल इसी दिन भक्तों को देवी राधा के चरणों के दर्शन करने का अवसर मिलता है।

पौराणिक कथा:- 
एक वृद्वय ओर एक युवा ब्राह्मण वृंदावन की यात्रा पर गए थे रास्ते मे युवा ब्राह्मण ने वृद्वय ब्राह्मण की बहुत सेवा की जिससे खुश होकर वृद्वय ब्राह्मण ने अपनी इकलौती लड़की की शादी उससे करवाने का वचन दिया था। परन्तु यात्रा खत्म होने के बाद गांव लौटकर आने पर वृद्वय ब्राह्मण अपने वचन से मुकर गया तो दुखी हो युवा ब्राह्मण ने भगवान कृष्ण से गवाही देने की विन्नति की। भगवान उसकी साक्षी यानी कि गवाही देने के लिए तैयार हो गए परन्तु उन्होंने एक शर्त रखी कि –– "तुम आगे-आगे चलना ओर मैं पीछे-पीछे चलूंगा। तुम पीछे मुड़कर मत देखना"
तब भक्त बोला कि–-" प्रभु मुझे कैसे पता चलेगा कि आप पीछे आ रहे हो?"
तब भगवान बोले कि––" मेरे घुधरुओ की आवाज़ तुमको सुनाई देती रहेगी।"
तब ब्राह्मण अपने गांव पहुँचने ही वाला था कि अचानक आवाज़ आनी बन्द हो गई तो धबराकर ब्राह्मण ने पीछे मुड़कर  देख लिया। बस भगवान वही पत्थर के बन गए ।पर उन्होंने वही रुककर ब्राह्मण के सत्य की गवाही दी इसीलिए इस मन्दिर को साक्षी गोपाल मन्दिर बोलते है।

यहाँ पर ब्राह्मण लोग नाम पता लिखकर पैसे लेते है और बोलते है कि आप इस मन्दिर में आये तो उसकी गवाही यही है।परंतु मैंने ऐसा कुछ नही किया हमने भगवान के दर्शन कर लिए यही हमारे लिए काफी है।

यहाँ भगवान के भोग के आटे के लड्डू ओर गुड़ के पकोड़े जैसे कुछ मिलते है जिसे स्थानीय भाषा मे पता नही क्या बोलते है।

उसके बाद हम आगे "रेत की कारीगरी" देखने गए मतलब "सेंड म्यूज़ियम" यहाँ रेती से बहुत सुंदर कलाकारी की गई थी।पर इससे पहले मैं मैसूर का देख चुकी थी तो मुझे ज्यादा पसन्द नही आया।वैसे धूप और गर्मी के कारण कुछ मजा भी नही आ रहा था।अगर शाम को देखा जाय तो जरूर अच्छा लगेगा।

पोस्ट लंबी हो जाने से यही विश्राम देती हूं अगला मन्दिर सूर्य मन्दिर का वर्णन हम नेक्स्ट भाग में करेगे।

जय जगन्नाथ🙏



 

मेरी जगन्नाथ यात्रा

मेरी जगन्नाथपुरी यात्रा
भाग★4



7 फरवरी 2026

4 फरवरी की रात 12:15 पर हमारी ट्रेन LTT रेल्वे स्टेशन बॉम्बे से निकली और हम 6 फरवरी सुबह 12 बजे पूरी पहुँच गए । शाम को हमने श्री जगन्नाथ जी के दर्शन किये । आज हम सुबह से निकले है पूरी के अन्य मन्दिर देखने ...


अब आगे.....
हमने अलारनाथ,बेड़ी हनुमान ओर नरेंद्र तालाब मन्दिर के दर्शन किये थे ।
अगला मन्दिर पुरी से 5-6 km दूरी पर था ।जिसका नाम था " गुप्त वृंदावन" कहते है यहाँ वृंदावन की आध्यात्मिक ऊर्जा मौजूद है इसलिए लोग इसको गुप्त वृंदावन बोलते है वैसे इसको "श्री गौर विहार आश्रम या माता मठ के नाम से भी पुकारते है।"
यह मन्दिर चैतन्य महाप्रभु की साधना से भी जुड़ा हुआ है।
इस मन्दिर में काफी सुंदर पौराणिक दृश्यों से चित्रित सजी मूर्तिया बनी हुई थी।जो देखने मे बहुत सुंदर नजर आ रही थी। एक बड़ा चक्र भी था।मैंने यहाँ पर जीभर कर फोटू खिंचे।
यहाँ भगवानशिव,विष्णु,हनुमान,कृष्ण की ओर चैतन्य महाप्रभु की मनमोहक प्रतिमाएं थी।

यहाँ कई जगह सेल्फी पॉइंट भी बने हुए थे जिधर लोग अपनी तस्वीरे उतार रहे थे।बीच मे बड़ा सा तालाब भी था।


इस मंदिर में टिकिट था । परन्तु सफाई नदारत थी इतने अच्छे मन्दिर का मेंटनेंस न के बराबर था।


इस मन्दिर में थोड़ी भीड़ थी।सबसे पहले हमसे बोला गया कि लंगर चालू है अगर किसी को खाना खाना हो तो जा सकते हो।


हमने भी सुबह नाश्ता किया था फिर कुछ  खाया नही था तो हमको भी भूख लगने लगी थी तो हम उस तरफ चल दिये जिधर बोला गया था।


आगे जाकर देखा तो ये एक छोटा -सा खुला एरिया था जिधर टेबल कुर्सियों पर लोग खाना खा रहे थे ।वातावरण एकदम देशी था। पंडित जैसी वेशभूषा में लोग खाना परोस रहे थे। यहाँ लंगर फ्री नही था,एक आदमी का 80 रु चार्ज था। खाना अनलिमिटेड था जितना खाना हो खाओ। तो मैंने 160 रु के 2 कूपन कटवाए ओर पत्तल लेकर हमदोनो एक खाली टेबल पर बैठ गए।


यहाँ हमको सब्जी,दाल, चावल दिए गए। रोटी नही थी । सब्जी बहुत टेस्टी थी। लास्ट में दी गई मीठी चटनी तो कमाल की थी। खाना स्वादिष्ट था। वैसे भी लंगर का खाना स्वादिष्ट ही होता है।हम दोनों के पेट फुल हो गये थे।  इतना टेस्टी खाना सिर्फ़ 80 रु में काफी सस्ता था पर बाथरूम जाना उतना ही महंगा था😂 हम 10-10 ₹ देकर बाथरूम में फ्रेश हुये।


बाद में हमने सारा मन्दिर देखा जो काफी बड़ा था । हमने काफी इंजॉय किया और ऑटो वाले के बार बार बुलाने पर आखिर मन न होते हुए भी हम मन्दिर से बाहर आ गए।


अब हम आखरी मन्दिर की तरफ चल दिये जो पुरी से 3-4km दूरी पर है। इस मन्दिर को "ओंकारेश्वर" मन्दिर के नाम से जाना जाता है और भगवान शिव को समर्पित है।

 
यहाँ गेट पर नन्दी की विशाल प्रतिमा थी जो भगवान शिव की तरफ मुंह कर के बैठी थी। यहाँ 108 शिवलिंग भी थे।इस मन्दिर में भी बहुत सी प्रतिमाएं थी  और काफी खूबसूरत थी।यहाँ भी एक चक्र था जो काफी बड़ा और काफी भारी था जिसे सब चला रहे थे।मैंने ओर मिस्टर ने भी उस चक्र को घुमाया पर भारी होने से हमसे बरोबर घुमा नही☺️ फिर हम एक हॉल में गए जिधर 108 शिवलिंग बने हुए थे। उनके दर्शन कर भगवान ओंकारेश्वर के दर्शन कर के हम बाहर आ गए।


3 बजे हम वापस होटल में आ गए ।
कुछ देर आराम कर के हम 5 बजे फिर से बाहर निकले और गोल्डन बीच पर पहुँचे। लेकिन आज हम लेट हो गए बीच पर पहुँचे तो अंधेरा हो गया था।मुझे लगा था कि हम सूर्यास्त तक पहुँच जायेगे पर बीच पर अंधेरा हो गया था। हम ने वहाँ गोलगप्पे खाये पर इतने घटिया गोलगप्पे मैंने जिंदगी में कभी नही खाये थे 😅 पुरी प्लेट खाये बगैर ही हम आगे चल दिये।थोड़ी देर दुकानों पर कुछ देखा पर कुछ खास नही था तो हम कुछ देर अंधेरे में घूमकर वापस होटल को चल दिये।


शेष अगले भाग में
जय जगन्नाथ🙏




सोमवार, 30 मार्च 2026

मेरी जगन्नाथपुरी यात्रा

मेरी जगन्नाथपुरी यात्रा
भाग★3
7 फरवरी 2026


4 फरवरी की रात 12:15 पर हमारी ट्रेन LTT रेल्वे स्टेशन बॉम्बे से निकली और हम 6 फरवरी सुबह 12 बजे पूरी पहुँच गए । शाम को हमने श्री जगन्नाथ जी के दर्शन किये । अब आगे.....

आज सुबह उठकर फ्रेश हुए और तैयार होकर हम नीचे रेस्टोरेंट में आ गए।अभी नाश्ता तैयार नही हुआ था ।थोड़ा वेट किया फिर इडली खाकर हम बाहर निकल पड़े।

आज हम लोकल मन्दिरो के दर्शनों को जायेगे जो जरूरी तो नही है फिर भी अगर आपके पास टाइम नही है तो केंसिल कर सकते हो।पर हमको उन स्थानों को भी अपनी यात्रा में शामिल करना चाहिए जब भगवान की  रथयात्रा निकलती है तब वो जिन जिन स्थानों पर जाती है वही स्थान देखने आज हम जा रहे थे।
यहाँ हमने एक ऑटो 1000 रु में किया जो सारे मन्दिर घुमाकर हमको वापस होटल छोड़ेगा।

तो सबसे पहले हम भगवान जगन्नाथजी  के ससुराल वाले मन्दिर में गए जहाँ 10 रु का टिकिट खरीदा। दर्शन कर वापस ऑटो में बैठ गए।
दूसरा मन्दिर "लोकनाथ मन्दिर" है।मान्यता है कि यहाँ भगवान शिव की स्थापना स्वयं श्री राम ने की थी। यह एक अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण शिव मंदिर है।

तीसरा मन्दिर था "बेड़ी हनुमान"।
 हम जब मन्दिर के अंदर गए  तो देखा की यहाँ हनुमानजी बेड़ियों से जकड़े हुए थे । कहते है भगवान जगन्नाथ ने ही इनको बेड़ियां पहनाई थी।ताकि ये कही भाग न सके और मन्दिर की रक्षा समुद्र देवता से करे। 

इसका इतिहास ऐसा है कि,हर साल समुद्र देवता भगवान के चरण छूने आते थे।जिसके कारण काफी विनाश होता था।लोगों के घर डूब जाते थे और सारा सामान बह जाता था। तो भगवान ने हनुमानजी को आदेश दिया कि आप मन्दिर की रक्षा करे और समुद्र देवता को आगे नही आने दे ।"

 परन्तु हनुमान जी को भी भगवान के दर्शन करने थे तो वो तट को छोड़कर मन्दिर में भगवान के दर्शन करने चले गए ओर पीछे से समुद्र देवता भी मन्दिर में पहुँच गए और सारे मन्दिर में पानी-पानी हो गया तो भगवान को क्रोध आ गया उन्होंने गुस्से में उनको जंजीरों से बांध दिया ताकि वो भविष्य में कही भी नही जा सके, ओर तट की रक्षा करे।

कहते है तभी से हनुमानजी तट की रक्षा करते है और फिर मन्दिर में कभी समुद्र देवता का पानी नही आया ।इसलिए यहाँ का तट भी हमेशा शांत रहता है।

अगला मन्दिर था "गुडिचा मन्दिर"। यानी कि भगवान की मौसी का घर। रथयात्रा के दौरान भगवान कृष्ण ,भाई बलराम ओर बहन सुभद्रा यहाँ आते है और  7 दिन विश्राम करते है।
ये मन्दिर कोविट के टाइम से बन्द है इसे अभी तक खोला नही गया है मैंने पूछा तो सिक्युरिटी ने बताया कि मरम्मत का काम चल रहा है।मतलब भविष्य में ये मन्दिर जल्दी खुल जायेगा। वैसे इससे पहले जब मैं यहाँ आई थी तब मैंने अंदर से ये मन्दिर देखा था।

यहाँ से आगे हम "नरेंद्र तालाब" को गए। यहाँ 10₹ का टिकिट कटवाया ।यहाँ भी भगवान रथयात्रा के दौरान आते है और शाम को उनकी भव्य सवारी नाव में निकलती है। तब देखने वालों की भीड़ लग जाती है। कहते है भगवान 7 दिन आराम कर के स्वास्थ्य लाभ लेकर अपने भक्तों को दर्शन देते है। तब भगवान की सवारी नाव में फूलों से सुसज्जित  होकर यहाँ निकलती है।ओर सभी जनता भगवान के दर्शन करती है। सालों से ये कार्यक्रम नियम पूर्वक हो रहा है। नरेंद्र तालाब बहुत खूबसूरत मन्दिर है इसके चारों ओर फैला तालाब बड़ा आकर्षक है। यहाँ काफी लोग नहा भी रहे थे। हम भी कुछ देर यहाँ पर बैठे और ठंडी हवा का आनंद लिया।यहाँ की भींनी-भींनी खुशबू माहौल को काफी सुहावना बना रही थी।

बाहर निकल कर देखा तो एक आदमी गले की मोतियों की मालाएं बेच रहा था ।मैंने जाकर देखा तो सारी मालाएं खूबसूरत थी और सस्ती भी थी तो मैंने अपने लिए ओर बेटियों के लिए कुछ मालाएं खरीदी ।
पोस्ट लंबी होने से अब हम बिदा लेते है।
शेष यात्रा अगले भाग में...
जय जगन्नाथ🙏
  

नरेंद्र तालाब


गुडिचा मन्दिर

बेड़ी हनुमान मन्दिर

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

मेरी जगन्नाथपुरी यात्रा

मेरी जगन्नाथपुरी यात्रा
भाग★2
6 फरवरी 2026




4 फरवरी की रात 12:15 पर हमारी ट्रेन LTT रेल्वे स्टेशन बॉम्बे से निकली और हम 6 फरवरी सुबह 12 बजे पूरी पहुँच गए अब आगे.....


हम अपने होटल आ गए और स्नान कर फ्रेश हुए फिर कुछ समय बाद हम होटल के नीचे बने रेस्टोरेंट में आलू के पराठे  दही के साथ खा रहे थे।


आज जब हम स्टेशन से ऑटो में आये फिर चौकी पर साइकिल रिक्शा पर सवार हुए और हमने अपना होम स्टे का नाम (श्री विष्णु दर्शन हॉलिडे होम) बताया तो रिक्शा वाला हमको "विष्णु दर्शन" नाम की धर्मशाला में ले गया जो मन्दिर के पश्चिमी गेट के सामने बनी थी । पर वो हमारा होम स्टे नही था। हम रिक्शे से उतर गए और अंदर जाकर इन्क्वारी की तो पता चला कि हमारा होटल तो उधर ही था जिधर से हमने रिक्शा लिया था यानी कि मन्दिर के पास में मेन रोड पर ही था।


अब हम वापस वही चल दिये,यहाँ से हमने फिर दूसरा रिक्शा किया और अपने होम स्टे पहुँचे।


हमारा होम स्टे मेन रोड पर ही था जिसका रास्ता अंडर ग्राउंड था। 2 महीने पहले ही मैंने इस होम स्टे को बुक किया था जिसका किराया 1650 रु पर-डे  था। होम स्टे एकदम शानदार था। अंदर एक किचन भी था जिसको हमने यूज नही किया।


अब कमरे में आकर हमने पण्डिजी को फोन किया। इन पंडित जी के बारे में मुझे हमारे ग्रुप "भारत दर्शन" के मेम्बर "विनीत गुप्ता जी" ने बताया था।


पंडितजी ने बोला कि–– "आप थोड़ा आराम करो और शाम को 5 बजे मुझे मन्दिर के पश्चिमी गेट पर मिलो।"
पण्डिजी के इतना कहने पर हम निश्चिंत हो गए और Ac की ठंडी लहरों में खो गए।


2 घण्टे बाद Ac की लहरोँ में खोये हुए हम चोंककर उठ बैठे सोचा कि  Ac में ही रहना था तो यहाँ क्यो आये? चलो बाहर की रौनक देखी जाय।


ओर हम फटाफट गुलफ़ाम बने रूम से बाहर आ गए।

 
बाहर बाजार सजा हुआ था और लोग खरीदारी कर रहे थे ।हम भी बाजार की रौनक देखते हुए आगे बढ़े और एक रिक्शा कर के मन्दिर की तरफ चल दिये। पूरे बाज़ार में बहुत रौनक थी काफी भीड़ मन्दिर की तरफ जा रही थी कुछ लोग मन्दिर से लौट रहे थे कुछ खरीदारी कर रहे थे। बड़ा ही शानदार ओर मनमोहक माहौल था।
हम रिक्शे से मन्दिर के पश्चिमी गेट पर उतरकर अंदर चले गए।कुछ फोटू क्लिक की ओर वही पंडितजी का इंतजार करने लगे।


दूर मन्दिर का ध्वज बदला जा रहा था जिसे पब्लिक देख रही थी और वीडियो बना रही थी। मैंने भी बाहर से ही मन्दिर का वीडियो बनाया।


ठीक 6 बजे पंडित जी आये उन्होंने पहले हमारे जूते ओर मोबाइल जमा करवाये।ये काउंटर मन्दिर के वही बना हुआ था ये मन्दिर की तरफ से ही निशुल्क सेवा होती है ।क्योकि मन्दिर में मोबाइल ले जाना मना है तो काउंटर पर ही जमा करना होता है।

 
मैंने काउंटर पर 2 मोबाइल और हम दोनों के जूते जमा किये। ये एक थैले में रखना होते है और अपना मोबाइल नम्बर बताना होता है जिसे वो लिख लेते है ये प्रक्रिया बहुत सेफ है।  वापसी में आप अपना मोबाइल नम्बर उनको बताओगे तभी आपका फोन मिलेगा।

 
फोन रखकर हम पंडित जी के साथ पश्चिमी गेट से होते हुए मन्दिर के अंदर गए यहाँ काफी भीड़ थी पंडितजी मिस्टर को संभालते हुए,भीड़ से बचाते हुए ठीक जगन्नाथ जी की मूर्ति के समुख ले गए। भगवान का श्रृंगार फूलों से हो रहा था। ये  श्रृंगार उनके भाई कर रहे थे ऐसा वो बोले, कल वो खुद प्रभु के श्रृंगार में उपस्थित थे।


मन्दिर के उस भाग में अत्यंत भीड़ थी पर पंडित जी के साथ हमने सेफली दर्शन किये।

 
पंडित जी हमको सही सलामत उस भीड़ से निकाल लाये ओर एक जगह बैठा दिया।जिधर थोड़ी देर बाद हमारे लिए 2 पत्तल में भगवान का भोग मंगवॉ दिया जिसे हमने बड़ी श्रद्धा से हाथ जोड़कर वही खाया। बहुत ही स्वादिष्ट भोग था।


बाद में हमको समालते हुए पंडित जी मन्दिर के बाहर ले आये।


आज अगर पंडित जी नही होते तो हम दोनों भगवान के दर्शन बिल्कुल नही कर पाते। क्योकि मन्दिर में बहुत भीड़ ओर धक्का-मुक्की हो रही थी।लोगो ने अपने बच्चों को कंधे पर बैठा रखा था जिसके कारण पीछे वालो को दिखाई नही दे रहा था। लोग दर्शन करने के लिए धक्का मार रहे थे।

 इससे तो अच्छा होता अगर मन्दिर ट्रस्ट लाईन में एक-एक श्रद्धालु  को दर्शन करवाता ताकि सभी आराम से दर्शन करते।परन्तु वहाँ व्यवस्था के नाम पर कोई इंतजाम नही था।इसलिए काफी धक्का मुक्की हो रही थी।


बाहर आकर हमने किसी भी मन्दिर में जाकर दर्शन नही किये क्योकि हर मन्दिर में काफी लंबी लाईने थी।
बाहर निकलकर मैंने कुछ दक्षणा मन्दिर के भंडारे में दान की ओर कुछ दक्षणा पंडित जी को  देकर बिदा ली।उन्होंने हमको पूरी का प्ररसादम भी दिया जिसे हम घर लेकर आये ।


बहुत-बहुत धन्यवाद विनीत जी का जिनके द्वारा मुझे पंडित जी मिले और मेरा ये बहु प्रतीक्षित जगन्नाथपुरी का सपना साकार हुआ।

 
इस तरह आज का दिन व्यतीत हुआ ओर भगवान के दर्शन कर के हमारा जीवन धन्य हुआ।

 
शेष अगले एपिसोट र्में....
जय जगन्नाथ🙏





शनिवार, 14 मार्च 2026

मेरी जगन्नाथपुरी यात्रा

मेरी जगन्नाथ पुरी की यात्रा
भाग★1


5 फ़रवरी 2026



भगवान की लीला अपरंपार है। कहते है जब तक उसका बुलावा नही आता आप जरा- सा भी सरक नही सकते।
मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। जब एक ग्रुप के साथ 2025 के दिसम्बर महीने में क्रिसमस पर पुरी जाने का हमने सोचा, तो क्या पता था कि हमारी यात्रा कैसे होगी ? कब होगी?
तब अक्टूम्बर की सुबह ओपनिंग डेट पर रिजर्वेशन करवाने खिड़की पर पहुँचे तो पता चला कि AC की सीनियर सिटीजन की सारी टिकिटे बुक हो चुकी है । सीनियर सिटीजन की सीट ही हम लेते है क्योकि तभी हमको नीचे की बर्थ मिलती है।
अब, हम बगैर रिज़र्वेशन के घर आ गए और जगन्नाथपुरी का प्रोग्राम केंसिल कर दिया। परन्तु मैं हारने वालों में नही हु इसलिए आखरी सांस तक लगी रहती हूं।  मै ऑनलाइन रिजर्वेशन खँगोलने लगी आखिर में मुझे 22 दिसम्बर की ही 3rd Ac की 2 सीट सीनियर सिटीजन की दिख ही गई। मैंने बगैर एक पल गवाये फटाफट दोनों सीट हड़प ली और निश्चिंत हो गई।लगा कोई जंग जीत ली हो।


अब तो मामला फतेह समझो।

अक्टूम्बर में टिकिट करवाकर हम निश्चिंत हो गए। अभी यात्रा को 2 महीने पड़े थे।

परन्तु भगवान का बुलावा आया ही नही था हम कितना भी प्रयास करे पर होता वही है जो ईश्वर की मर्जी।
तो हुआ यू की नवम्बर में अचानक मैंने आँखों की चेकिंग करवाई तो पता चला कि मेरी आँखों मे मोती बिंदु है। ऑपरेशन करवाना पड़ेगा।
अब,जैसे तैसे दिसम्बर आया तो पता चला कि दिसम्बर में नए साल की वजय से पूरी में बहुत भीड़ है जिसके रहते दर्शन काफी मुश्किल से हो रहे है।


अब क्या करे,जाए या न जाये। इस बीच हमने जनवरी में त्रिची जाने का रिजर्वेशन भी करवा रखा था। तो बहुत सोचने के बाद हमने जगन्नाथपुरी का रिजर्वेशन केंसिल करवा लिया और तुरंत 5 फरवरी 2026 का बुकिंग करवा लिया। इस तरह त्रिची की यात्रा के ठीक 10 दिन बाद हम आखिर में जगन्नाथपुरी को चल ही   दिये।


4 फरवरी को रात 12:15 की हमारी गाड़ी थी जो कि 5 फरवरी लग गई थी। पूरी 4 की रात 5 का दिन ओर फिर 5 की रात सफर करते हुए हम 6 फरवरी को सुबह 8 बजे पहुचने वाले थे मगर 4 घण्टे ट्रेन लेट हो गई थी तो हम 12 बजे पूरी के रेलवे स्टेशन पर पहुँचे।

2019 को मैं पहली बार अपनी सहेली के साथ पूरी आई थी ।अभी उस बात को 7 साल हो गए थे और 7 साल में दुनिया ही बदल गई थी।पूरी भी मुझे बदला-बदला दिखाई दिया।
स्टेशन से बैटरी कार द्वारा हम प्लेटफार्म से बाहर आये और 200 रु का ऑटो किया। हम समझे थे कि हम होटल तक पहुँच जायेगे पर यहाँ आकर पता चला कि अब ऑटो मन्दिर से 500 मीटर की दूरी तक ही जाते है आगे की यात्रा बैटरी कार से या साइकिल रिक्शा से पूरी करनी पड़ेगी।


इस तरह हम आखिर जगन्नाथपुरी आ गए ।


शेष अगले एपिसोर्ड में....


 
जय जगन्नाथ🙏

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

महिला -दिवस

सभी कामकाजी महिलाओं को समर्पित 

कैसे कर लेती हो ये सब ...
सुबह सबसे जल्दी उठकर ,
दिनभर की तैयारी करना ...

साफ सफाई!
 किचेन!!
 नाश्ता!!!

 बच्चों का, पति का, बूढ़े माता पिता का,और खुद का भी ....
योगा भी कर लेती हो
सज सँवर भी लेती हो 
और हाँ मोबाइल में अपडेट भी रहती हो....🥰🥰

फिर निकल पड़ती हो अपने ऑफिस अपने काम पर ...
उन पुरुषों की तरह जो उठते हैं देर से, बेड- टी माँगते हैं 
बेड पर.... 

अखबार पढ़ते हैं
 मोबाइल में चैटिंग भी करते हैं....
 फिर निकल पड़ते हैं सेहत के नाम पर वॉकिंग पे ....

ओर फिर निकलते हैं अपने काम पर तुमको झिड़कते हुए,
ताने मारते हुए ....

पर तुम भी तो निकलती हो अपने काम पर ? 
कैसे कर लेती हो ये सब ....।
पहुँचती हो अपने स्कूल अपने ऑफिस,  
जो हो जाये कभी लेट लपेट ...
तो घूरते हैं सब ऐसे, 
मानो कह रहे हों––
"क्यों तुमने की शादी! 
क्यों बच्चे जने!!
क्यों बूढ़े माँ बाप को आश्रय दिया!!!

 क्यों तुमने नौकरी की....
नौकरी की है तो क्या छोड़ दे अपने परिवार को?
अपने सम्मान को?
अपने स्वाभिमान को ?

पर,हँस कर टाल देती हो... उन कातर निगाहों को... जो करते हैं ईर्ष्या... तुम्हारे खुद के सहारे  खड़े होने पर ...
जलते भुंजते रहते हैं... तुम्हारी स्वतंत्रता पर...तुमको मिले अधिकारों पर .....

कैसे मुस्कुरा लेती हो इन सबके बाद भी तुम!

कैसे दिन-भर काम करती हो!
 पूरे मन से.....
नहीं रहना चाहतीं पीछे किसी से ....?

पीछे रह भी नहीं सकतीं हो तुम!  
क्योकि,तुमको शक्ति मिली है उस परमात्मा से, उस शक्ति से, जिसे लोग नारी शक्ति कहते है।🙏 
जय हो नारी शक्ति की।

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महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🏻🙏🏻🙏🏻

सोमवार, 9 मार्च 2026

शिव के 5 तत्वों वाले मन्दिर

तमिलनाडु डायरी ★10
अंतिम भाग


रेनिगुंटा ओर श्री कालहस्ती
शिव के वायु तत्व मन्दिर

22 जनवरी 2026


12 जनवरी को बॉम्बे से चलकर मैं 13 की रात 3 बजे त्रिची पहुँची। हमने श्री रँगनाथ स्वामी,जम्बुकेश्वर मन्दिर, तन्जोवर के ब्राहतेश्वर मन्दिर, कुम्भकोलम, चिदम्बर, कांचीपुर, अरुणाचलन ओर वेल्लोर के मन्दिरों के दर्शन कर के कल हमने तिरुपती के दर्शन किये और आज हम श्रीकालहस्ती मन्दिर के दर्शन करेगे अब आगे:--

कल हमारे साथ जो अनहोनी हुई उसके बाद हमारा मन बहुत खराब था। अब किसी मन्दिर में जाने का हमारा मन हो ही नही रहा था।


ये बात जब मैंने अपने ग्रुप यायावरी में बताई तो हमारे एडमिन सर सौजन्य त्रिपाठी जी ने बोला कि--" जो हुआ सो हुआ,बुरा वक्त टल गया अब सिर्फ 1 मन्दिर रह गया है उसको जरूर पूरा करके आओ। ये कम ही भाग्यशाली लोगो को शिव के पांचों तत्वों के मन्दिरों के एकसाथ दर्शन नसीब होते है। जो आपको हुए है। तो श्रीकालहस्ती मन्दिर जरूर जाओ ।शिव भला करेगा।"


मास्टर जी की नेक सलाह से दिल को तसल्ली हुई और मैंने श्रीकालहस्ती मन्दिर जाने का मन बना लिया।
अब,मिस्टर को आटे में लेना था☺️ क्योकि उनका मन भी बहुत खराब था।लेकिन मेरी दिली इच्छा को देखते हुए वो भी तैयार हो गए।


अब हम सुबह फटाफट तैयार हो सबसे पहले धर्मशाला के पीछे बने गोबिंद धाम मन्दिर गए । जिसमे हम पहले दिन तिरुपति आने के बाद शाम को गए थे पर बहुत भीड़ होने के कारण नही जा सके थे।


कहते है तिरुपति जाने से पहले श्री गोबिंदजी से परमिशन जरूर लेनी चाहिए मतलब यहाँ पहले दर्शन करने चाहिए ताकि सब कुछ कुशल मंगल हो पर उस दिन भीड़ की वजय से हम अंदर नही जा सजे थे। इसीलिए हमारे सारे कामो में विध्न आया हो खेर,...
आज मन्दिर में ज्यादा भीड़ नही थी और हमको आराम से दर्शन हो गए फिर वही एक होटल में हम दोनों ने नाश्ता किया और 1ऑटो किया जो हमको रेनिगुंटा छोड़ दे।


तिरुपति से रेनिगुंटा की दूरी 10-12 km है जो 20 मिनिट में तैय हो जाती है और ऑटो का किराया 300 रु होता है।


हमको ऑटो वाला पहले एक होटल में ले गया जहां 1 हजार रु में हमने 1दिन के लिए 1रूम लिया और सारा सामान उसमे रखकर थोड़ा फ्रेश हुए और फिर आगे श्रीकालहस्ती मन्दिर को चल दिए।


श्री कालहस्ती मन्दिर शिव का वायु तत्व मन्दिर है।
रेनिगुंटा से श्रीकालहस्ती मन्दिर की दूरी 30 km है जो आधे घण्टे में पूरी हो जाती है।


इतिहास:--
आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में तिरुपति के पास स्थित श्री कालहस्ती मन्दिर स्वर्णमुखी नदी के तट पर एक प्रसिद्ध शिव मंदिर है, जो अपनी 'वायु लिंगम' (पंचभूत स्थल) के लिए जाना जाता है। यह मंदिर 2000 वर्षों से अधिक पुराना है और 'दक्षिण काशी' या 'दक्षिण कैलाश' कहलाता है। यहाँ राहु-केतु पूजा और कालसर्प दोष निवारण के लिए विशेष पूजा की जाती है, और यह मंदिर ग्रहण के समय भी खुला रहता है।

 
मंदिर में कन्नप्पा की कहानी प्रसिद्ध है, जिन्होंने शिव की आँखों की रक्षा के लिए अपनी आँखें अर्पित कर दी थीं, जिसके बाद शिव ने उन्हें मोक्ष दिया था। इस मन्दिर का उल्लेख शिव पुराण और स्कंदपुराण में भी मिलता है।


हम ऑटो से 30 मिनिट में अपने आखरी पंचतत्व मन्दिर में पहुँच गए। श्रीकालहस्ती मन्दिर  स्वम्भू है।ऑटो वाला बहुत ही अच्छा आदमी था उसने हमको स्पेशल रास्ते से मन्दिर में प्रवेश दिला दिया।सारे कर्मचारी बहुत ही सहयोग वाले थे सबने हमको आगे से शार्टकट रास्ते से जाने दिया।वैसे भी मन्दिर में भीड़ नही थी पर रास्ता काफी लंबा था ।हम शार्टकट रास्ते से जल्दी ही मन्दिर के करीब पहुँच गए।


मन्दिर के अंदर लगे दीपक से ही रोशनी हो रही थी। उसी के प्रकाश में हमने लिंग के दर्शन किये हालांकि दिखा कुछ नही क्योकि फूलों से महादेव का श्रृंगार हो रहा था। वैसे भी कहते है यहाँ के लिंग को पुजारी भी हाथ नही लगाते है।


अंदर माता का मन्दिर भी था जिसके दर्शन कर के हम बाहर आ गए।
कुछ देर बाद हमारा ऑटो हमको ले रेनिगुटा को चल दिया।


इस तरह मेरी कभी खुशी कभी गम वाली यात्रा की समाप्ति हुई।मुझे खुशी है कि मैंने इस यात्रा में शिव के पांचों तत्वों वाले मन्दिर, श्री हरि के मन्दिर, माँ लक्ष्मी के मन्दिर ओर तिरुपति बालाजी के दर्शनों का लाभ उठाया।


जीवन मे जो कुछ भी घटित होता है सब ईश्वर की मर्जी से ही होता है।

ॐ नमो शिवाय🙏


समाप्त🙏







बुधवार, 4 मार्च 2026

शिव के 5 तत्वों वाले मन्दिर

तमिलनाडु डायरी ★8
तिरुपति
20 जनवरी 2026


12 जनवरी को बॉम्बे से चलकर मैं 13 की रात 3 बजे त्रिची पहुँची। हमने श्री रँगनाथ स्वामी,जम्बुकेश्वर मन्दिर, तन्जोवर के ब्राहतेश्वर मन्दिर, कुम्भकोलम, चिदम्बर, कांचीपुर, अरुणाचलन ओर वेल्लोर के मन्दिरों के दर्शन कर तिरुपतो को चल दिये...अब आगे:--

वेल्लूर से तिरुपति 108km है जो 2 घण्टे में हम पहुँच गए। हम सीधे तिरुपति में एक धर्मशाला पहुँचे। सामान रख थोड़ा फ्रेश होकर पीछे भगवान कृष्ण के मन्दिर चल दिए।परन्तु यहाँ अधिक भीड़ थो तो सोचा कल दर्शन करेगे। ओर खाना खाकर so गए।

सुबह 4 बजे टोकन लेने के लिए निकलने लगे तो रुकमा बोली कि मिस्टर की तबियत बहुत खराब है मैं फ्लाइट से इंदौर जा रही हु।तुम लोग मन्दिर चले जाओ।


अचानक परिस्थिति बदल गई। मैं थोड़ा धबरा गई।क्या करूँ क्या न कर।फिर सोचकर हम दोनों टोकन लेने चल दिये।पर खिड़की खुली नही थी कब खुलेगी कोई पता नही था।किसी ने बोला कि ऊपर चले जाओ फ्री की लाइन में 2-3घण्टे में नम्बर आ जायेगा। और हम बगैर टोकन के आगे चल दिये और यही गलती हमको बहुत महंगी पड़ी।

मैं वापस धर्मशाला आई और रुकमा से परामर्श किया और सुबह साढ़े 7 बजे तिरुपति से टैक्सी लेकर तिरुमला को चल दी ।लगेज था तो टेक्सी की जो 800 रु में हुई। 
तिरुमला में इंट्री हुई तो हमारे सामान की जांच हुई वो करवाकर हम वापस कार में बैठे। आगे एक बड़े गेट से हमारी इंट्री हुई और गरुड़ महाराज हाथ जोड़े हमारा स्वागत कर रहे थे।
आगे काफी भीड़ मिली लोग काफी मात्रा में इधर-उधर घूम रहे थे कुछ छावं में जमीन पर भी बैठे हुए थे।अच्छी खासी भीड़ थी कार वाले ने  हमको एक बिल्डिंग के पास उतारा और हाथ से इशारा कर उधर जाने का बोला हमने सामान उतारा ओर जिधर हमको रूम मिलना था  उधर चल दिये।

एक खिड़की पर पहुँचकर हमने एक फार्म भरा ओर रूम बुकिंग में 3 घण्टे का  वेटिंग बताया। हम वहीं एक जगह बैठ गए। सामने ही स्लाइड चल रही थी ठीक 12:15 को हमारे टोकन नम्बर की स्लाइड आई और हमको पास की बिल्डग में कमरा मिल गया। सारा समान रूम में रखा ओर मोबाईल  चप्पल भी रूम में रखकर हम उधर चल दिये जिधर मन्दिर था। 
150 रु जीप वाले को दिये उसने एक जगह उतार दिया बोला इधर रिक्वेस्ट करो ड्यूटी अफसर आपको सीनियर सिटीजन वाली लाइन से जाने देगा।लेकिन उसने नही जाने दिया ।क्योकि हमारे पास टोकन नही था।पूरे 2 घण्टे  उसको रिक्वेष्ट करती रही फिर उसने जाने दिया परन्तु अंदर से हमको फिर बाहर धकेल दिया क्योकि हमारे पास टोकन नही था। एक 70 साल का सीनियर आदमी को ऐसे धक्के देना मुझे जरा भी पसन्द नही आया ।यहाँ सब भेड बकरी के समान थे किसी के दिल मे दया नही थी। एक बुजुर्ग जिससे चला नही जा रहा उस पर भी दया नही आई।खेर, गलती हमारी थी हमने टोकन नही लिया था। परन्तु हमको भी इतना पता कीधर था।वरना टोकन लेकर ही आते।

हारकर हम एक अन्य जीप में बैठकर  फ्री की लाइन में गए । सारा रास्ता खाली पड़ा था ओर बहुत लंबा था। उस  लंबे रास्ते से गुजरते हुए हालत पतली ओर पैर कठोर हो गये। हमसे चला भी नही जा रहा था।पूरे 2 घण्टे हम लगातार चलते रहे हालांकि बीच बीच मे बेंचेस लगे हुए थे जिनपर कुछ आराम करते हुए आगे बढ़ते रहे। हमारे सामने बहुत से युवा भागते हुए जा रहे थे। 

जैसे तैसे चलते हुए आखिर 2:15 को हम दोनों केबिन में आये। केबिन की हालत खराब थी बहुत से लोग नीचे चादर बिछाकर लेटे हुए थे। स्लॉट चल रहा  था जिस पर लिखा था ये कम्पार्टमेंट  01 बजे दिनांक 20 को खुलेगा। यानी रात को 1 बजे, हमारा ध्यान इस तरफ अचानक गया । मतलब 11 घण्टे हमको यहाँ बिताने है। हमारी सांस ही रुक गई क्योकि न तो यहाँ कुर्सी थी और न हमारे पास चादर थी। हम नीचे बैठ नही सकते थे 11 घण्टे कैसे निकालेंगे। घबराहट में मिस्टर ने बोला कि हम बाहर चलते है 11 घण्टे कौन बैठेगा। दर्शन करने फिर आएगे।

 अब हम फटाफट गेट पर दौड़े परन्तु तब तक गेट बन्द हो चुका था ।थोड़ी देर आवाज़ देते रहे पर कोई नही आया। वापस अपने स्थान पर आकर बैठ गए।ऐसा लग रहा था । हम इस चक्रविहु में फस गए थे वहां कोई सुनने वाला नही था। अब तो जो होगा देखा जाएगा।ये सोचकर बैठे रहे।
कभी बैठते,कभी खड़े रहते कभी लेट जाते ऐसे ही कई घण्टे गुजारे।ठंड अलग हो गई थी।
समय कट नही रहा था स्क्रीन पर कोई साउथ की धार्मिक फ़िल्म चल रही थी।केबिन में ही खिचड़ी मिल रही थी पर जंग लड़कर मुझे 1 प्लेट मिली।शाम को दूध भी मिला।

करीब रात के साढ़े 11 बजे हमारा केबिन खोला गया और हम सब लोग लंबे कॉरिडोर में चलने लगे।निरंतर 2 घण्टे बगैर रुके हम चलते रहे,चलते रहे। मेरे पैरों में छोले हो गए । ठंड से मेरे पैर सुन्न हो गए। मैंने मौजे पहने थे वो भी स्टाफ़ ने उठवाकर फिंकवा दिए। 

आखिर में इंतजार खत्म हुआ हम सवा 1 बजे भगवान के सामने थे, 1सेकंड दर्शन हुए। वही धन्य समझो। सारी परेशानी दूर हुई।
दर्शन कर के मन प्रसन्न हो गया। परेशानी तो हुई पर अंत भला तो सब भला।

दर्शन करके भी हम 1 घण्टा चलते रहे। आगे लड्डू मिल रहे थे तो उधर लाईन में लग गये।टिकिट पर 1 लड्डू ओर 50 रु के हिसाब से लड्डू मिल रहे थे।अच्छे खासे बड़े बड़े लड्डू थे। मैंने भी सबको देने के लिए 300 रु के 6 लड्डू खरीद लिए।हमारे टोकन पर 2 लड्डू फ्री मिले थे।टोटल 8 लड्डू लेकर हम बाहर निकल गए।

न-न करके भी हमारे दर्शन हो ही गए।चलो कोई न, भगवान ने परीक्षा लेकर ही सही हमको दर्शन दे ही दिए।

लड्डू लेकर हम ने डोसा खाया।मोबाइल था नही इसलिए कोई फोटू नही खींच सकी। 


थोड़ा चलने के बाद हमको एक जीप मिली जो 200 रु लेकर हमको हमारी धर्मशाला तक छोड़ गई। हम कमरे में ऐसे ही सों गए।थकान से गहरी नींद आ गई।

तिरुपति संस्थान के रूम 100 रु के थे। 600 रु एडवांस में जमा करवाये थे जब रूम की चाबी दी तो 500 रु वापस दे दिए। 

हम सुबह उठकर बगैर नहाए हुए ही समान लेकर नीचे तिरुपति आ गए।
आज हम यही रुकेंगे। ओर दूसरे मन्दिर वगेरा देखेगे।
परन्तु आज हमारे साथ एक अनहोनी होनी बाकी थी।

क्रमशः....




 



सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

शिव के 5 तत्वों के मन्दिर

तमिलनाडु डायरी ★
वेल्लोर (तिरुमलाईकोड़ी)
20 जनवरी 2026



12 जनवरी को बॉम्बे से चलकर मैं 13 की रात 3 बजे त्रिची पहुँची। हमने श्री रँगनाथ स्वामी,जम्बुकेश्वर मन्दिर ओर 3दिव्यदेशम मन्दिरो के अलावा तन्जोवर के ब्राहतेश्वर मन्दिर के दर्शन कर के कुम्भकोलम के मन्दिरो के दर्शन कर चिदम्बरम घूमे, चिदम्बर से हम कांचीपुरम के मन्दिरो में गए और फिर अरुणाचलन को चल दिये। अरुणाचलेन ओर कांचीपुरम के मन्दिरो के दर्शन कर अब हम वेल्लोर के मन्दिर चल दिये...अब आगे:--


तिरुवलमलाईकोडाई:--


तरुवन्यमलाई से सुबह नाश्ता कर हम कार से विल्लोर को चल दिये। विल्लोर (तिरुवलममलाईकोडाई)  शहर से ये मन्दिर 10 km अंदर पहाड़ी के पास स्थित है। विल्लोर बहुत अच्छा और काफी बड़ा शहर है।
सहेली के मिस्टर का बुखार कम नही हुआ था तो वेल्लोर के फेमस हास्पिटल में उनको 1 बोतल चढ़ाई।कुछ विटामिन्स भी दिए डॉ बोला कि थकान से बुखार है । उन्होंने थोड़ा आराम किया तो तबियत ठीक हुई।
तबियत ठीक थी ।पर वो चलने की स्थिति में नही थे तो हमको बोला कि तुम लोग मन्दिर में जाओ मैं टेक्सी में आराम करूंगा।


उनको टेक्सी में आराम करने का बोलकर हम सब वैल्लोर की लक्ष्मी माता मन्दिर में दर्शन करने चल दिये।
ये सारा मन्दिर सोने का बना हुआ है।ये  मन्दिर 1500 सौ किलो सोने की शुध्द पतरी से निर्मित है  इसको श्रीपुरम गोल्डन टेम्पल भी बोलते है। इसका निर्माण 2007 में कम्प्लीट हुआ है। वैसे तो ये नया बना हुआ मन्दिर है पर इसके ठीक सामने पुराना मन्दिर भी है।  वैसे तो ये मेरा ओर मिस्टर का देखा हुआ था।मेरी सहेली का भी देखा हुआ था फिर भी इधर से निकल रहे थे तो सोचा कि दर्शन करते चले।


यहाँ से तिरुपति 120 km दूर है और हमको तिरुपति ही जाना था।
यहाँ हमने 100 -100 रु के sr सिटीजन के टिकट निकाले ।पिछली बार तो हम दोनों फ्री में गए थे।


यहाँ भी मोबाइल तो जमा नही किया पर फोटू खींचना सख्त मना था। तो अंदर का कोई फोटू नही खींचा।
बाहर आकर कुछ फोटू जरूर खिंचे।
वापसी का रास्ता प्रसादम तक आता है तो हम ने यही पर देवी का लंगर खाया।बहुत टेस्टी खाना था।


खाना खाकर हम गाड़ी में आ गए और गाड़ी आगे तिरुपति को चल दी।

क्रमशः.