कल की रात बहुत शौख बड़ी रोचक थी .....
आसमां था काला सितारों की बड़ी रौनक थी ..
खुली खिड़की से रौशनी कभी-कभी मुझ पर पड़ती थी ,
हवा के झौंके मेरे अंग को स्पर्श कर के छू जाते थे ..
नींद आँखों से कौसो दूर र्रर्रर थी ...
झांकता हुआ चाँद किसी की याद दिला रहा था ......
किसी की मदहोश आवाज मुझे बेसुध किये जा रही थी ..
वो कोई था जिसकी बांहों में मेरी जन्नत थी ..
वो मेरा खवाब! मेरा प्यार ! मेरा हमदम ! मेरा नसीब था ....
पर वो मुझसे लाखो मील दूर था ...
चाहकर भी मैं उसे छू नहीं पा रही थी ...
नींद आँखों से कौसो दूर र्रर्रर थी ...
वो मेरे साथ तो था ,पर मेरे पास न था ...
उसके होने का एहसास मन को सुकून दे रहा था ..
तन मेरी गिरफ्त से दूर किसी के आगोश में था ..
अनुभूति तो थी--- पर स्पर्श नहीं था ....
हसरते जवां थी और उमंगे बेकाबू थी ....
नींद आंखों से कौसो दूरररर थी .....
तभी कही से अचानक एक आवाज़ आई -----
"जागते रहो "
कोई पास न था ? कोई साथ न था ????
सिर्फ खामोशियाँ थी और मैं थी और मेरे एहसास !


































