मेरे अरमान.. मेरे सपने..


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मंगलवार, 29 जनवरी 2013

पुणे का सफ़र --- भाग 3


  पुणे का सफ़र --- भाग 3
( शिर्डी के साईं बाबा )





" मेरी आवारगी में  कुछ कसूर तुम्हारा भी है दोस्तों !
जब तुम्हारी याद आती है तो घर में अच्छा नहीं लगता-- !! "  

हम तो घुमने  के आदि है भाई ...



शिर्डी  का रेलवे -स्टेशन  


शाम के  4 बज गए अपने पुलिस कमिश्नर दोस्त (अशोक राय  ) से मिलकर हम चल दिए बस स्टेशन की तरफ ...अशोकजी ने हमें अपनी जीप में दो इंस्पेक्टरों के साथ बस- स्टॉप पंहुचा दिया--और अटेंड करने को भी बोल दिया क्योकिं हम को शिर्डी पंहुचने में रात के दस बज जाना था ओर हम दोनों अकेली थी । वैसे  तो शिर्डी में किसी प्रकार का डर नहीं था ..पर हमसे दूर बैठे घर वालों को कौन समझाए ....

बस स्टेशन पहुँचकर हम को शिर्डी की बस में बैठाकर दोनों पुलिस वाले चले गए ...शाम का वक्त था और ठंडी हवाए मन को सुकून दे रही थी ..हम भी ऐ सी बस में बैठे गप्पे मर रहे थे --फिल्म भी चल रही थी "तेज" और बस भी चल रही थी तेज ...रास्ते में कई  बार इंस्पेक्टर सावंत का फोन आता रहा की ...मेडम आप कहाँ तक आई है ..थोडा व़ी आई पी ट्रीटमेंट मिल गया था हा हा हा हा हा ...



 रात को करीब 10 बजे शिर्डी आया ...हमको लेने आये इंस्पेक्टर ने हमे रेलवे स्टेशन  पर बने रिटायरिंग रूम में पंहुचा दिया ...यह रूम भी अशोक जी ने पूना से ही हमारे लिए रिजर्व करवाया था ..किराया था सिर्फ 80 रूपये ...... पूरा रिटायरिंग रूम सुनसान पड़ा था ..क्योकि शिर्डी का यह रेलवे स्टेशन अभी नया ही बना है ...मैने और इंस्पेक्टर ने  रजिस्टर भरा और रूम पर चल दिए ..एक लड़का हमारा सामान रूम तक रख गया ..अब इंस्पेक्टर ने भी जाने की इजाजत चाही और कल  कोई सेवा हो तो याद कीजियेगा कहकर चल दिए .. मैने रूम का मुआवना किया  ..रूम बहुत ही साफ़ सुधरा और बड़ा था ..दो बेड अलग -अलग लगे थे साथ ही डायनिंग टेबल और सोफा रखे थे पास ही टी वी चालू था ...ऐ सी चल रहा था ...मुझे अपने पुलिस इंस्पेक्टर पापा की याद आ गई जिनके ज़माने में हमने ऐसे मज़े खूब किये थे ... खेर, हम फ्रेश हुए और कपडे बदलकर टी वी का प्रोग्राम देखने लगे

"टिन्न ...टिन्न ..टिन्न .. जब रूम की बेल बजी तो हम दोनों की धिग्धी बन गई भला रात के 11 बजे कौन होगा.हम दोनों का डर के मारे बुरा हाल हो रहा था ...रेखा ने कहा तुम पूछो कौन है ? मेरा तो वैसे ही डर के मारे प्राण निकले पड़े थे फिर भी अपने पुलिसिये खून को धिकारते हुए थोडा जोर से बोली -- 'कौन ?'

बाहर से एक लड़के की आवाज आई --"मेडम में हूँ ,आपके लिए चाय लाया हूँ " धत तेरे की ---हम  ख्वामखा डर रहे थे  ..दरवाजे पर एक 12 साल का लड़का खड़ा था  हाथो में ट्रे लिए हुए ..."मेडम साहेब बोल कर गए थे चाय के लिए " अबे तो एक घंटे बाद लाया है ..मैने आँखें दिखाते हुए कहा--- " मेडम दूध नहीं था वो जाकर शहर से लाया हूँ"उसने डरते हुए जवाब दिया । मैने भी उस मासूम को ज्यादा डराना  उचित नहीं समझा क्योकिं वाकई में शहर दूर था ....हमने चाय पी क्योकि उसकी बहुत तलब महसूस हो रही थी ...कुछ देर बाते करते हुए कब नींद आ गई पता ही नहीं चला .....
         
सुबह 8 बजे मेरी नींद खुली ..बाहर निकल कर देखा तो कोई नहीं था सारा रिटायरिंग हॉउस सुनसान पड़ा था मैंने किचन ढूंढ लिया और वहां  दो चाय का आर्डर दे आई ..थोड़ो ही देर में चाय आ गई तो हमारा काम हो गया ..हम दोनों तैयार होकर बाहर आ गए --हमारा सामान हमने वही रख दिया अब हमको शहर जाना था जो यहाँ से करीब 3-4 किलो मीटर था शायद -- हम रेलवे स्टेशन पर चल दिए क्योकि वहां  काफी टेम्पो और रिक्शे खड़े थे ...दो ट्रेन भी खड़ी थी ...हमने मुंबई जाने के लिए स्टेशन पर इनक्वारी  की तो मुंबई की किसी भी ट्रेन में जगह नहीं थी ..और लटककर जाना यानी बिना रिजर्वेशन के जाना मेरी तोहीन  थी ..इसलिए बस से ही मुंबई जायेगे यह सोचने के बाद एक खाली  टेम्पो में बैठ गए किराया था सिर्फ 10 रुपये---लो जी, आने के टाइम तो हम 100 रु देकर आये थे ...पहला चुना लगा ....खेर ,,,


रेलवे रेस्ट हाउस की कुछ झलकियाँ 



 पहुँच गए बाबा के मंदिर :-- यहाँ कई गेट है ...वी आई पी गेट भी है जहाँ से आप जल्दी दर्शन कर  के आ सकते है  --- पर हमें कोई जल्दी नहीं थी ...और हम सीधे -साधे  ढंग से ही दर्शन करना चाहते थे इसलिए इंस्पेक्टर साहेब को सुबह नहीं बुलाया ....
अब हमने प्रसाद ख़रीदा तो लगा दूसरा चुना ..सिर्फ प्रसाद का ही उसने हमारा 495 का बिल बना दिया ..अरे,यह क्या दुकानदार ने न जाने क्या-क्या रख दिया था ...'अरे भाई .साईं ने कभी खीर नहीं खाई तुम उसको पैड़े खिला रहे हो ' हा हा हा हा

बहुत सारा सामान निकल कर फैंका और सिर्फ मुरमुरे और रेवड़ी ली जो साईं को बहुत अजीज थी ..
हमारे मोबाईल और कैमरा वही जमा कर दिए गए क्योकि हमे डरा दिया था की आगे चेक पोस्ट पर चेक हो गया तो वापस आना पड़ेगा ...हमने भी दुकानदार के अंडर में सारी चीज़े सेफ  में  जमा की और ताला लगाकर चाबी अपने अंडर  में की और चल पड़े मंदिर के  अन्दर ....
इस कारण आगे कोई फोटू नहीं है ...


प्रवेश द्वार  नम्बर 3  फेमिली वालो के लिए 



हम 3 नंबर गेट से अन्दर गए जिसे दुकानदार ने कहा था की यहाँ भीड़ नहीं होती पर ऐसा कुछ नहीं था यहाँ काफी भीड़ थी हम भी नंबर लगाकर खड़े रहे ..साइड में बेन्चेस भी लगी थी प्योर स्टेनलेस स्टील की जहाँ आप यदि थक जाये तो बैठ सकते है ..पर मैंने प्रतिज्ञा  की थी की जब तक साईं के दर्शन न होगे मैं बैठुगी नहीं ...हालाकि यह भीष्म प्रतिज्ञा नहीं थी पर अपने राम ने सोचा की खड़े रहते है जब ज्यादा थक जायेगे तो बैठ  जायेगे ...पर 2 घंटे में नंबर आ ही गया और हम अलग -अलग लाईनो से गुजरते रहे ...पहली बार सोचा की गलती की ज्यादा भक्त बनने की  उस इंस्पेक्टर को बुला लेते और रोब से दर्शन करते ....

खेर ,एक बड़े से हाल में आखिर साईं बाबा के दर्शन हो ही गए ....सोने से जड़े हुए साईं बाबा शायद कसमसा रहे थे ..चारो और पुजारियों से धिरे हुए थे और वो सबका लाया हुआ प्रसाद और फूल लगभग फैंक  रहे थे--जिस प्रसाद और फूलो को  मैं पिछले 2 घंटे से हाथो में उठाये हुई थी जिसके कारण मेरा हाथ भी दर्द करने लगा था , उन लोगो ने निर्दयता से फैंक दिया ....खेर, बड़े -बड़े मंदिरों में ऐसी छोटी -छोटी बाते होती  रहती है ....



साईं बाबा का दरबार ( गुगल  बाबा के सोजन्य से )


पर साईं के दर्शन  करते ही मैं सबकुछ भूल गई ...ऐसा लगा किसी और ही दुनियां में आ गई हूँ  ....आँखों से आंसूओ की लड़ी बह रही थी ..और मैं अपनी सुधबुध खो चुकी थी ...एक सेवादार ने जब मेरा हाथ पकड़कर मूर्ति के पास से हटाना चाह तो  मैने उसे कडक आँखों से  ऐसे देखा की वो मुझे छोड़कर दूसरी तरफ चला गया ...मैं  बहुत आस्तिक हूँ ऐसा नहीं है .. न मुझे कभी किसी मंदिर या गुरूद्वारे में जाकर ऐसा कुछ महसूस होता है ..साधारण रूप से मैने हमेशा नार्मल होकर ही भगवान् के दर्शन किये है ,यहाँ भी मैं 2 बार आ चुकी हूँ  पर इस बार पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगा की मैं दुसरे ही लोक में आ गई हूँ  ...आराम से मैं निचे बैठकर जी भरकर  साईं के दर्शन किये ,जब तृप्त हो गई तो वापस चल दी बाहर की और .....


बाबा का असली बहुत पुराना फोटू ( गूगल से  ....


सुबह से कुछ खाया नहीं था ---मेरी आदत है किसी धार्मिक स्थान पर जाती हूँ तो पहले दर्शन करती हूँ  फिर कुछ खाती हूँ ---तो जोरदार भूख लग आई थी हमने सुन रखा था की साईं बाबा का भंडारा होता है तो हम भंडारा ढूँढने लगे ..पता चला की यहाँ से  थोड़ी दूर ही है ...तो हम चल दिए, रास्ते  में  दूकान से  मोबाईल और कैमरा लिया --दूकान वाले को 2-4  गालियाँ दी की हमारी सारी पूजन सामग्री व्यर्थ गई ,पर उसे कोई फर्क नहीं पड़ा उसने हमें देखा तक नहीं ..खेर,

थोड़ी दूर प्रसाद के लड्डू मिल रहे थे ...मोतीचूर के लड्डू देखकर नियत खराब हो गई ..अब लाईन में लग गए ....एक आदमी को 2 ही पैकेट मिल रहे थे 10 रु का एक पैकेट .. पैकेट में सिर्फ 3 लड्डू ! सबको प्रसाद तो देना ही पड़ेगा ..हम इंडियंस की आदत होती है जब भी किसी धार्मिक स्थान में जाओ प्रसाद जरुर खरीदते है ....
मैं  भी तीन बार लाईन में लगी  और 6 पैकेट खरीद लिए ..देशी घी के लड्डू भला इतने सस्ते मिलते है क्या ? वैसे, पिछले दिनों साईं बाबा के यहाँ नकली देशी घी का जो जखीरा मिला था उसे शायद सब जानते है ..पापी पेट का सवाल है भाई ....इसी कारण शायद मैं चोथी बार लाईन में नहीं लगी ...हा हा हा हा

लड्डू लेकर हम चल दिए ..भंडारा ढूँढने ....मंदिर के बाहर काफी अमरुद बेचने वाले खड़े थे ..कई ढेरियाँ बनी हुई थी ..हमने भी 2 ढेरियाँ खरीद ली ..60 रु में ! काफी ताजा अमरुद दिख रहे थे  ....   


ताजा -ताजा अमरुद हमारे मध्य प्रदेश  में इसे जाम भी बोलते है  


पैदल चलते - चलते जान पर बन आई ...ऊपर से इतने अमरुद का बोझ ..लालच के कारण 2 ढेरिया  ले ली जो कम से कम 3 किलो से ज्यादा ही होगी ...ऊपर से गर्मी अलग और भूख  सता रही थी सो अलग--खेर, थोडा चलने के बाद आखिर हमको वो स्थान दिख ही गया .." श्री साईं प्रसादालय" । यह काफी सुंदर और काफी बड़े स्थान में था ..साफ़ सुधरा था ..बीच में बड़ा सा बगीचा भी था पर उसमें किसी को  जाने की इजाजत नहीं थी  साईं बाबा का बड़ा सा लंगर बनाते हुए एक स्टेचू लगा था ...आप भी देखे ...



प्रसादालय के बाहर बड़े से देग में साईं बाबा लंगर तैयार करते हुए 



खुबसूरत  बगीचा  


और यह मैं 

मैं और मेरी सहेली रेखा ...अमरुद और लड्डू ओ से लदे हुए   

हम अन्दर की तरफ चल पड़े ..किसी ने बताया था की यहाँ 10 रु में रसीद कटती  है और खाना मिलता है..हमने काउंटर पर जाकर पूछा तो मालुम हुआ अब यहाँ रसीद नहीं कटती सबको फ्री  में खाना खिलाया जाता है खेर , हम  चल पड़े --अन्दर का हाल काफी बड़ा था करीने से टेबल और कुर्सिय लगी थी ..भीड़ भी नहीं थी जबकि मुझे लगा था की यहाँ नीचे बैठने की व्यवस्था होगी जैसी की आमतौर पर होती है ..हम भी एक टेबल और कुर्सी पर बैठ गए ...वहाँ स्टील की थालीयां पहले से ही  लगी थी उनमें एक- एक खोपरे की बर्फी और नमक व् सिकी हुई लाल मिर्च रखी  हुई थी ...खाना बहुत ही स्वादिष्ट था ....

मैं और रेखा ..खाने का इन्तजार 


लंगर -हाल ...करीने से सजी टेबल -कुर्सी ..कोई भागमभाग नहीं 


साईं का खाना (प्रसाद )


यहाँ हमे उस दिन रोटी ,दाल , काले चने की सब्जी ,  आलू -बेगन  की सब्जी और चावल का लंगर मिला ...खोपरे की बर्फी पहले ही मैं आधी खा चुकी थी -----:)

खान खाने से पेट के साथ ही मन भी तृप्त हो गया था अब हम चल दिए वहां से वापस बाज़ार घूमते हुए अपने रेस्ट हॉउस ..थोडा आराम करने का मन था पर रेखा ने कहा की यही से बॉम्बे की बस पकड़ते है शाम तक पहुँच जायेगे तो उसका यह आइडिया पसंद आया ..हमने वही से  एक ऑटो किया जो हमारा  सामान रेलवे स्टेशन  से लेकर हमें बस अड्डे तक छोड़ दे ....ऑटो ने किराया लिया 150 रु .....तीसरा चुना ..
यहाँ एक बात और हो गई हमारे सारे पैसे ख़त्म हो गए थे अब वापसी का ऐ सी का कितना किराया होगा हमें पता नहीं था हमने तुरंत स्टेट बैंक का ऐ टी एम ढूँढा और पैसे निकलने पहुँचे पर यह क्या यहाँ तो ऐ टी एम ही बंद अब दुसरे बैंक की तरफ दौड़  लगाई पर वो भी बंद ,पता चला की सर्वर ही डाउन है पता नहीं कब ठीक होगा यह था चौथा चुना ....बैंक ने लगा दिया --अब क्या करे ..पूना में जो खरीदारी की थी उस पर गुस्सा आ रहा था --ऐसा ही  एक बार मेरे साथ डलहोजी में हुआ था ....अब हम दोनों ने पर्स खंगोले चोर जेबों से पैसे इक्कठे किये तो 550 रु हुए यानी यदि 250 रु किराया हुआ तो हम आराम से ऐ सी बस में जा सकते है और 50 रु का नाश्ता भी कर सकते है ...


बाज़ार की रौनक     

जय हो साईं बाबा की हमें कोई ऐ सी बस नहीं मिली  ..बस अड्डे पर  उस समय कोई बस थी ही नहीं अचानक एक बस हमारे पास आकर रुकी नान ऐ सी थी मुंबई -मुंबई चिल्ला रहा था हमने तुरंत कंडक्टर से किराया पूछा तो उसने 180 रु बताया ..मुझे तो हैरानी हुई की हमारी परेशानी साईं ने  इतनी जल्दी दूर कैसे कर दी .....जय हो ....हम तुरंत दौड़ कर बस में बैठ गए ...अंधा क्या मांगे दो आँखें हा हा हा हा हा हा  


वापसी ... हमारी शाही बस में ...हा हा हा 


और फिर हमने बस पकड ली ..वापसी के लिए ,जबकि बॉम्बे से पूना का  ऐ सी किराया था 250 रु। और पूना से शिर्डी का 200 रु यानी कुल 450 रु और वापसी में सिर्फ 180 रु। हलकी बूंदाबांदी भी हो रही थी और मौसम भी बड़ा  खुशगवार हो गया था    


वापसी का नजारा 


शिव के लिंग के सामान पहाड़ियां .यहाँ की विशेषता है 


रास्ते में हल्की बूंदाबांदी चालू थी 


रात को 10 बजे हम बॉम्बे पहुँच गए ...सकुशल और नाश्ता भी नहीं किया ...सिर्फ चाय ही पी थी..
साईं की समाधी (गूगल से ...



* जय हो साईं बाबा *





सोमवार, 28 जनवरी 2013

लागी छूटे न



लागी छूटे न 






लागी छूटे न अब तो सनम !
  चाहे जाए जिया ,तेरी कसम !!



पर मै जानती हूँ  तेरे दिल में मै नही हूँ    ?
मेरा प्यार , मेरा अहसास !सब खोखला है 
तू मुझसे प्यार नही करता  ?
 मैं  तेरी आरजू इन आँखों में लिए भटकती रहूंगी 
तुझ से मिलने को अब मैं तरसती रहूंगी 

वो खुशनुमा दिन !
वो खुशनुमा राते !

जब हम मिलकर प्यार किया करते थे 
  वो कदम्ब के पेड़ की छाया....
वो रजनीगन्धा के फ़ूल ...
जूही की मदमस्त खुशबू से सराबोर 
वह तेरे दिल का आँगन ........
जहां तेरी मुस्कुराती तस्वीर मेरे मन को हर्षाती थी !
जहां कभी मैं निशब्द चली आती थी ,
तेरे दिल के दरवाजो को झंकृत कर के 
न शोर !
न कोई कोलाहल !
   
खामोशी से लरज़ते वो तेरे अशआर  
मुझे अंदर तक रौंद गए है....


अब वो बात कहाँ .....

तेरी विरह अग्नि में मै, जल रही हूँ ज़ालिम !
बूंद -बूंद पिघल रही हूँ ज़ालिम !  
इस तपिश से मुझे बचा ले ज़ालिम !

कैसे तुझे  चाहू !
कैसे तुझे पाऊ !
कैसे तुझे देखू !

इस दिल की लगी से मुझे बचा ले यारा !
           इस पीड़ा से मुक्ति दिला दे यारा !!


" दूर है फिर भी दिल के करीब निशाना है तेरा "

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

# चिता की आग #






तुझको अग्नि के हवाले कर के ....
मैं  जड़- सी हो गई हूँ .....
कभी अपनी छाती का लहू पिलाया था  मैने ..
तेरी वो नटखट आँखें ..
वो चेहरे का भोलापन .
 वो प्यारी -सी मुस्कान ?  
वो तोतली जुबान ----
अब खामोश है ...
ठंडा- पन  लिए ..सर्द ...

**************

 मेरा सफ़ेद पडता मुंह  
आँखों से बहती अश्रु धारा 
 बिदा की अंतिम घडी 
तेरे नाम की अंतिम अरदास ...!

*************

मैं स्तब्ध ! आवाक ! तुझे जाते हुए देखती रही ....
होठ  कांपकपाये ..शरीर थरथराया ..
दिमांग शून्य ...???

************

खप्पचियों से बंधा, सफ़ेद कफ़न ....
ये लिबास तो मैने कभी चाहा नहीं था ?
फिर क्यों आज तेरे लिए यही जोड़ा मुकरर हो गया ?

 "राम नाम सत्य  हैं "

अचानक ! इस कर्कश ध्वनी से मेरे कान बजने लगे ..
"अरे , कोई रोको उसे "रॊ- ऒ- ओ- को 
  "यह उम्र है जाने की ....?"

अभी उसने देखा ही किया है ..?
अभी तो उसके दूध के दांत भी नहीं टूटे ..?
और जालिमो ने उसके अंगो के टुकड़े -टुकड़े कर दिए ...?
अभी तो हाथो में मेंहदी भी नहीं लगी ...?
और राक्षसों ने उसे चिता पे लिटा दिया ...?

" कोई रोको उसे ..कोई रोको ..यह उम्र है जाने की ..."






   

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

ऐसी जिन्दगी तो चाही नहीं थी मैनें .....?





साँसों का बंधन /
दिल की कराहें /
काँटों का बिछौना /
ऐसी जिन्दगी तो चाही नहीं थी मैनें .....?

आँखों का रोना /
दिल का तडपना / 
रातो को जगना /
ऐसी जिन्दगी तो चाही नहीं थी मैनें .....?

अपनों से बिछड़ना /
अपनों के लिए रोना /
फिर खुद ही संभलना /
ऐसी जिन्दगी तो  चाही नहीं थी मैनें ......?

कलेजे से लगाना /
फिर दूर हटाना /
खुद के हाथो ही बिजली गिरना /
ऐसी जिन्दगी तो चाही नहीं थी मैनें ...... ?

रस्ते से गुजरना /
आवाजे लगाना /
उसका यू  खिड़की पे आना  /
मुझे तांककर  कतरा जाना /
ऐसी जिन्दगी तो चाही नहीं थी मैनें ....?

अपना बनाना /
हासिल करना /
मोहब्बत जताना /
फिर धोखा खाना /
ऐसी जिन्दगी तो चाही नहीं  थी मैनें .....?

ऐसी जिन्दगी तो चाही नहीं थी मैनें ....?
   

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

नींद आँखों से कौसो दूर थी










कल की  रात बहुत शौख बड़ी रोचक थी .....
आसमां था काला सितारों की बड़ी रौनक थी ..
खुली खिड़की से रौशनी कभी-कभी मुझ पर पड़ती थी ,
हवा के झौंके मेरे अंग को स्पर्श कर के छू जाते थे ..
नींद आँखों से कौसो दूर र्रर्रर थी ...

झांकता हुआ चाँद किसी की याद दिला रहा था  ......
किसी की मदहोश आवाज मुझे बेसुध किये जा रही थी  ..
वो कोई था जिसकी बांहों में मेरी जन्नत थी ..
वो मेरा खवाब! मेरा प्यार ! मेरा हमदम ! मेरा नसीब था ....
पर वो मुझसे लाखो मील दूर था ...
चाहकर भी मैं उसे छू नहीं पा रही थी ...
नींद आँखों से कौसो दूर र्रर्रर थी ...

 वो मेरे साथ तो था ,पर मेरे पास न था ...
 उसके होने का एहसास मन को सुकून दे रहा था  ..
तन मेरी गिरफ्त से दूर किसी के आगोश में था ..
अनुभूति तो थी--- पर स्पर्श नहीं था ....
हसरते जवां थी और उमंगे बेकाबू थी ....
नींद आंखों से कौसो दूरररर  थी .....

तभी कही से अचानक एक आवाज़ आई -----
"जागते रहो "

कोई पास न था ? कोई साथ न था  ????
सिर्फ खामोशियाँ थी और मैं थी और मेरे एहसास !





गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

पुणे क सफ़र -- भाग 2


पुणे क सफ़र -- भाग 2
( आगा खां पैलेस )



आगा खाँ पैलेस   




दगडू शेठ के गणपति देखकर हम चल दिए "आगा खाँ  पैलेस " देखने....यहाँ पहुँचकर हमने 5 रु की टिकिट कटाई ---सारा महल सुनसान पड़ा था ..बहुत ही सुंदर महल था ...और बागीचे के तो क्या कहने ....

आग़ा खां पैलेस के बाहर लगा बोर्ड 



विस्तृत जानकारी 


महल के अन्दर मैं और मेरे पीछे शानदार बागीचा 



इतिहास :---
आगा खान पैलेस पुणे के येरावाड़ा मे स्थित एक ऐतिहासिक भवन है। सुल्तान मुहम्मद शाह आगा खान दिवतीय ने 1892 में बनवाया था। इस भवन में "महात्मा गांधी" को उनके अन्य सहयोगीयो से साथ सन 1940  में बंदी बना कर रखा गया था। कस्तूरबा गांधी का निधन इसी महल में हुआ था। उनकी समाधी भी यहॉ स्थित है। अब यह भवन एक संग्राहलय है।
यह स्मारक ६.५ हेक्टेयर में फैला हुआ है। 1892  में शाह आगा खान तृतीय ने इसे बनवाया था। 1956 तक यह भवन उनका महल रहा। 1969 में,आगा खान चतुर्थ ने इसे भारत सरकार को दान में दे दिया था।महात्मा गांधी की पत्नी कस्तूरबा गांधी और महात्मा जी के सचिव महादेवभाई देसाई ३५ वर्ष तक यहां रहे और इसी प्रवास के दौरान उनकी मृत्यु हुई थी उनकी अस्थियां स्मारक के बागीचे में रखी गई हैं। गांधी जी के जीवन पर एक फोटो-प्रदर्शनी और उनकी व्यक्तिगत उपयोग की वस्तुएं जैसे उनकी चप्पलें और चश्मे यहां रखे गए हैं।





महल के अन्दर गांधी जी  और बा के दैनिक उपयोग की वस्तुए ...




गांधी जी की प्रतिमा एक बालक के साथ खेलते हुए 



कस्तूरबा गांधी 


9 अगस्त 1942 को जब बापू को मुंबई से गिरफ्तार करके यहाँ नजर बंद रखा गया था तो उनके साथ कस्तूर बा गांधी और उनके सचिव मनोहर भाई देसाई भी थे ...यहाँ आकर महज 6 दिन बाद ही मनोहर देसाई जी की  मृत्यु हो गई  थी  ...उनकी याद में यहाँ उनका स्मारक बना है .. 




यह है गांधी जी, कस्तूर बा गांधी, ओर उनके सचिव महादेव भाई  देसाई का स्मारक  

9 अगस्त 1942 को शिवाजी पार्क (मुंबई )से गिरफ्तार करके कस्तूरबा गाँधीजी  को पुणे के इसी आगा खां  पैलेस में रखा गया था जहाँ  22 फरवरी 1944 को उनका देहांत हुआ ..उनका स्मारक भी यहाँ बना है ..गांधी जी की मृत्यु यहाँ नहीं हुई पर उनका स्मारक भी यहाँ बना हुआ है ..



पैलेस के शानदार बगीचे की कुछ तस्वीरे 



अलविदा ..आगा खां  पैलेस 


और इस तरह हम चल दिए आगा खां पैलेस देखकर वापस अपने एक दोस्त के पास ....जहाँ खाना खाकर हमको जाना है   शिर्डी के साईं बाबा के  पास ....तो मिलते है .......

शिर्डी के साईं बाबा के यहाँ ......जारी ----



रविवार, 25 नवंबर 2012

"अद्रश्य डोर "









उसके  और मेरे बींच वो क्या है  जो हम दोनों को जोडती  है ...
एक अद्रश्य डोर है  जो  मजबूती से हमे जकड़े  हुए है ....
वो इसे प्यार नहीं कहता ---
पर यह मेरे प्यार का  एहसास है---  
मैं उसे बेहद प्यार करती हूँ  ---
मैं  इस एहसास को क्या नाम दूँ  ...
समझ नहीं पाती  हूँ ...
वो कहते है न---- ' दिल को दिल से राह होती  है---'
जब भी वो अचानक मेरे ख्यालो की खिड़की खोल कर झांकता  है ...
तो मैं  तन्मयता से उसे  निहारती हूँ --
तब सोचती हूँ की यह क्या है ? जो हमे एक दुसरे से जोड़े हुए है --?
मैं इसे प्यार का नाम देती हूँ --
तब वो दूर खड़ा इसे 'इनकार' का नाम  देकर मानो अपना पल्ला झाड लेता है -- 
 क्यों वो इस 'लौ ' को पहचानता नहीं ----?
या पहचानता तो है पर मानता नहीं ..?
पर इतना जरुर है मेरे बढ़ते कदम उसके इनकार के मोहताज नहीं .......



शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

पुणे का सफ़र भाग 1


पुणे का सफ़र भाग 1



चित्र ...गूगल बाबा से धन्यवाद 



पुणे महाराष्ट्र का दूसरा बड़ा शहर है ....यह महाराष्ट्र की  दो मशहूर नदियों के किनारे बसा हुआ है ...यह  पुणे  जिले का प्रशासकीय मुख्यालय भी है ..पुणे भारत का छटा बड़ा शहर है ..यहाँ अनेक मशहूर शिक्षण संस्थाने है ..इसलिए इसे पूरब का आक्सफोर्ड भी कहा जाता है ...मराठी यहाँ की मुख्य भाषा है ...

26 सितम्बर 2012
मैं और मेरी सहेली रेखा ने पुणे जाने का प्रोग्राम बनाया ..करीब 30 साल से मैं मुंबई में हूँ पर पूना  जाने का कभी प्रोग्राम नहीं बना ...हर साल गणेश उत्सव पर प्रोग्राम बनाती थी पर हमेशा फेल हो जाता था इस बार हम दोनों सहेलियों ने जाने का मन बना ही लिया ..गणेश उत्सव चल रहे थे ...और हम सुबह 11 बजे  दादर से वोल्वो बस पकड़ने चल दिए ....
दादर से हर एक घंटे में ट्रेन भी चलती है पर इस बार बस से  जाने का मन था सो चल दिए ...ट्रेन से जाते तो फायदा होता जनरल टिकिट 60 रु का आ जाता पर वोल्वो का टिकिट था 250 ..लेकिन ऐसी में सफ़र करना था और आराम से करना था सो , जब जाना तो क्या सोचना ...मौसम बहुत खुशगवार था ..बादलो से आकाश भरा हुआ था ...कभी -कभी बूंदा बूंदी भी आ जाती थी ...सूरज महाराज भी आँख -मिचोली खेल रहे थे ....और हम ऐ सी की ठंडी हवा में मदहोश हुए रास्ते की सुंदरता को देखते हुए गप्पे मारते हुए चले जा रहे थे ...टी वी पर अजय देवगन की फिल्म 'तेज' चल रही थी ..कभी फिल्म तो कभी बाहर की द्रश्यावली कब पुणे  आ गया पता ही नहीं चला .... शाम के 4 बज गए थे और हम पुणे के बस स्टेंड शिवनेरी पर खड़े थे ...

  
रास्ते की द्रश्यावली ...दिल को लूटकर  ले जा रही है 




नहा-धोकर  साफ़ सुथरा खड़ा है पहाड़  


पहाड़ो से बहता झरना ..लुभावना द्रश्य ...हिमालय से कम नहीं 

 पुणे का इतिहास :---


 आठवी शताब्दी मे पुणे को 'पुन्नक' नाम से जाना जाता था। शहर का सबसे पुराना वर्णन इ स 758 का है, जब उस काल के राष्ट्रकूट राज मे इसका उल्लेख मिलता है। मध्ययुग काल का एक प्रमाण जंगली महाराज मार्ग पर पाई जाने वाली पातालेश्वर गुफा है, जो आठ्वी सदी की मानी जाती है।


17 वी शताब्दी मे यह शहर निजामशाही, आदिलशाही, मुगल ऐसे विभिन्न राजवंशो का अंग रहा। सतरहवी शताब्दी में शहाजीराजे  भोंसले को निजामशाहा ने पुणे की जमींदारी दी थी। इस जमींदारी मे उनकी पत्नी जिजाबाई ने ई .स1627 में शिवनेरी किले पर शिवाजीराजे  भोंसले को जन्म दिया। शिवाजी महाराज ने अपने साथियों के साथ पुणे परिसर में मराठा साम्राज्य की स्थापना की। इस काल मे पुणे में शिवाजी महाराज का वर्चस्व था। आगे पेशवा के काल में ईस 1749 सातारा  को छत्रपति की गद्दी और राजधानी बना कर पुणे को मराठा साम्राज्य की 'प्रशासकीय राजधानी' बना दी गई। पेशवा के काल में पुणे की काफी तरक्की हुई। ई स 1818 तक पुणे में मराठों का राज्य था।




शिवाजी महाराज 




शाम को हम जैसे ही बस स्टेशन पहुंचे ..हमारी दोस्त दीपा अपनी गाडी लिए हमारा इंतजार कर रही थी ..और हम चल दिए उसके घर कोरेगाँव में ....कोरेगाँव पुणे में बहुत प्रसिध्य है क्योकि यहाँ जगत प्रसिध्य 'ओशो' का आश्रम है ...यहाँ ओशो पार्क भी है ...जहाँ ओशो के अनुयायी आपको प्रेममयी वातावरण में मशगुल दिखाई देगे ...पर मेरा इरादा वहां जाने का हरगिज नहीं था--- 

थोडा सुस्ताने के बाद रात को  हमने पूना  की सड़के नापी ..वहां के  मशहूर  माल में कुछ खरीदारी की ...वहां की मशहूर बेकरी से कुछ खाने के  स्नेक्स ख़रीदे और एक होटल में मस्त बिरयानी का मजा लुटा ...वापस घर आकर सो गए ....

 

दीपा के घर  मैं  

सुबह नाश्ता करके हम चल दिए 'दगडूमल सेठ ' के गणपति देखने ...जिसे देखने हम यहाँ आये थे ..लाइन  काफी लम्बी थी ..पर हम भी कुछ कम नहीं ....आप भी देखे ....


 श्रीमंत दगडू शेठ हलवाई का गणपति :--




दगडूशेठ का गणपति  पंडाल 


गणपति बप्पा विराजमान है 



सामने दगडू शेठ का मंदिर 





दूर से भी गणेश की खुबसूरत कृति 



दगडूमल शेठ के मंदिर के सामने मैं ....और यह शाल मुझे मंदिर से ही मिली ...गणपति की कृपा ..



इस बार जयपुर के हवामहल की कलाकृति बनाई थी ..काफी भीड़ है और लम्बी लाइन भी ..



एक पुराना फोटू दगडू सेठ के गणपति का  ( गूगल से स - सादर ) 


1893 में श्रीमंत दगडू शेठ मिठाई वाले ने गणपति की स्थापना कि थी ...सम्पूर्ण महाराष्ट्र में यह गणेश सबसे एश्वर्य शाली माने जाते है ....इनकी मूर्ति पर 3 करोड़ रुपयों के गहने चढाये जाते है ..जब लोकमान्य तिलक ने सार्वजनिक गणेश उत्सव मनाने  का आव्हान किया तो  यह गणपति भी सार्वजनिक हो गए ...यहाँ के गणेश की मन्नत लोग बाग़ रखते है फिर मन्नत पूरी होने के बाद कुछ जेवर चढाते है ....यह मंदिर एक ट्रस्ट द्वारा चलाया जाता है ...जिसमें कई कार्यक्रम होते है .... 

जेवरो से लदे गणेश ... यह चित्र भी गूगल बाबा  से                  


चलिए अब  यह  पोस्ट यही ख़त्म करती हूँ ....आगे देखिये आगा खान पेलेस .....