ये सब करने में हमको शाम के 6 बज गए ।बारिश भी हो रही थी और शाम भी हो गई थी । पहाड़ों पर जितनी जल्दी सुबह होती है उतनी जल्दी शाम भी हो जाती है खेर, प्रीत को बिदा कर के हम 6 बजे खजियार जाने को निकल पडे । सरदारजी की गाडी थी । उन्होंने मुझे देखा तो बोले- " बीबी को थोड़ी अच्छी आरामदायक गाडी में ले चलता हूँ तुस्सी थोड़ी देर इंतजार करो '' । 'हम इंतजार करने लगे थोड़ी देर बाद ड्राइवर नई इनोवा गाडी लेकर आया और फिर हम आराम से खजियार को निकले। तब तक अँधेरा घिरने लगा था। खजियार का रास्ता बहुत ही सकरा और जंगली था। सरदारजी बता रहे थे की यहाँ शेर चीता है और भालू तो बहुत तादात में है। मैँ थोडा डर रही थी क्योकि रात को पहाड़ पर यात्रा करना मुझे बिलकूल पसन्द नहीं है । मन ही मन वाहेगुरु से अरदास भी कर रही थी की कोई अनहोनी न हो ।खुद को कोस भी रही थी की आज डलहौजी ही रुक जाना था की अचानक कार के सामने एक बच्चा चीता आ गया ।कार की हेडलाइट में मुझे साफ दिखाई दे रहा था उसने बकायदा हमारी कार की तरफ देखा और भाग कर कार के पास होता हुआ निचे उतर गया। डर कर सबकी घिग्गी बन्ध गई । पर वो हमको कोई क्षति पहुँचाये बगैर ही अँधेरे में लोप हो गया। सरदारजी ने बताया की ये कार की लाईट में आते ही भाग जाते है रौशनी से डरते है बेचारे रात को ही घर से निकलते है शिकार की तलाश में । पर मैँ सोच रही थी की वो डर रहा था की हम डर रहे थे हा हा हा हा
. १५ मिनिट बाद हम फ्रेश होकर रूम में गप्पे लड़ा रहे थे, ठीक ९ बजे हमको एक मंदिर में काम करने वाला लड़का खाना खाने का बोलकर चला गया इस मंदिर में सुबह नाश्ता और दोपहर में खाना और रात को भी खाना मिलता है वो भी बिलकुल फ्री ---खाना बहुत ही टेस्टी होता है हम सुबह से भूखे थे हम जब नीचे डायनिंग हॉल में आये तो वहां दिल्ली के किसी कालेज के आर्ट स्टूडेंट लड़के लड़कियां उनके टीचर्स भी खाना खा रहे थे राजमा चावल आलू की सब्जी और मीठी खीर खाने में थी खूब छककर खाना खाया । ठंडी बहुत थी प्लेट खुद ही साफ़ करनी होती है । चाय भी थी मैं तो थक गई थी इसलिए अपने कमरे में सोने आ गई बच्चे प्लेटे साफ़ कर और खूब फोटु उतारकर रूम में आये । रूम में डबल पलंग था और कम्बल और २ गद्दे पड़े थे अलमारी में-----हम कुछ पलंग पर कुछ नीचे आराम से सो गए …।


























