मेरे अरमान.. मेरे सपने..


Click here for Myspace Layouts

गुरुवार, 5 मई 2016

जयपुर की सैर == भाग 2 ( jaipur ki sair == bhag 2 )


जयपुर की सैर ==भाग 2
"कोटा राजस्थान "

( कोटा का रंगारंग स्टेशन )




14 अप्रैल 2016 गुरुवार


कल हम बॉम्बे से 3 सहेलियां निकली थी जयपुर जाने को  'सम्पर्क क्रांति ट्रेन ' से और ये रात कयामत की थी 
आज का दिन हमको कोटा बिताना है  .. 
अब आगे .....
सुबह शोर सुनकर नींद खुली तो देखा इंसानो का लहराता समुन्दर मेरे सामने था  .. मुझे बहुत आश्चर्य हुआ की रात को  ट्रेन में और भी पैसेंजर चढे थे जबकि ये गाडी बॉम्बे से सीधे बड़ोदरा और वहां से कोटा ही रूकती है ....गाडी पहले से ही पैक थी फिर रेल्वे इनको टिकिट देती ही क्यों हैं ..... जहां तक नजर जा रही थी सब सो रहे थे और तो और पास वाले कूपे में तो टॉयलेट के अंदर भी  लोग बैठे थे ... हैं भगवान !
मेरे कूपे में टॉयलेट जाने वाले उडनपुत्र की तरह ऊपर सीटों पर पैर रखकर बड़े मजे से टॉयलेट जा रहे थे और वापस भी आ रहे थे ..... किसी ने भी सोये हुए लोगों को नहीं जगाया ।

अचानक मेरी नजर अपने पास सोई हुई 2 बच्चियों पर पड़ी जो बेख़ौफ़ सोई हुई थी ,दिखने में गरीब और भिखारन सी लग रही थी पास ही उनकी माँ भी बैठी थी जो खुद भी मैली सी साड़ी में थी और बैठे - बैठे ही सो रही थी..... उसके जोरदार खर्राटों से ही शायद मेरी नींद टूटी थी ... अचानक, मुझे अपने सर का ख्याल आया कही रातभर इन लोगो के सर से कुछ जुएं तो ट्रांसफर नहीं हो गई ? यह सोचकर ही मैं  सिहर गई और मेरे सर में एक तेज़ खुजली होने लगी ,जल्दी जल्दी मैं उठकर बैठ गई देखा तो 5 बज रहे थे नजदीक ही मेरा बैग  रखा  हुआ था जो पूरी तरह मेरे हाथ से जकड़ा हुआ था .. रात को सोने से पहले मैंने ही उसको कसकर बांध लिया था  ताकि कोई पार करे तो मेरी नींद खुल जाये ....खेर, वो सही सलामत था मैंने राहत की साँस ली क्योकि उसमें मेरा खज़ाना था मेरे टिकिट ,मेरे एटीएम कार्ड और सबसे बहुमूल्य मेरा पासपोर्ट था । 

 अभी कोटा आने में 2 घण्टे और थे  दोबारा उसी जगह सोने की हिम्मत नहीं हुई पास वाली सीट पर उकडूं बैठी रही जब तक कोटा शहर की फैक्ट्रियां दिखाई नहीं दी।
अल्ज़िरा और मीना को उठाकर हम कोटा के प्लेटफार्म पर उतरे और राहत अली को याद किया हा हा हा हा यानि राहत की साँस ली और सबसे पहले हम तीनो ने ये कसम खाई की आइन्दा कभी सेकण्ड क्लास का सफर नहीं करेगे और यदि करना भी पड़ा तो रिजर्वेशन के बगैर कभी यात्रा नहीं करेगे, ये तो पक्का है।

कोटा मेरा ससुराल हैं यहाँ मेरे काफी रिश्तेदार रहते है ... हम ऑटो पकडकर सीधे घर को चल दिए ,स्टेशन के नजदीक ही हमारा घर है यदि सामान न होता तो पैदल ही पहुँच जाते पर सामान के कारण ऑटो करना पड़ा और फ़ोकट में ५० रू देने पड़े खेर, साढ़े सात बजे हम घर में थे और रात की आपबीती सुना रहे थे । 

घर पहुँचकर नाश्ता किया करारी कचौरी और गरमा गरम जलेबियों का, नाश्ता कर के  दोनों सहेलियां आराम करने ऊपर वाले रुम में चली गई और मैँ अपनों के साथ गुफ़्तगु में तल्लीन हो गई....... 

शाम 5 बजे हम तैयार हो घूमने निकले .... अब  हम सेवन वंडर्स घूमने जा रहे थे क्योकि रात 12 बजे की हमारी ट्रेन थी जयपुर के लिए ,लेकिन धबरने की कोई बात नहीं इस बार हमारा टिकिट कंफर्म हैं  ... 

 वैसे तो कोटा में काफी जगह है देखने को लेकिन हमारे पास टाइम नहीं था। ....  मेरी तो करीब-करीब सारी जगह देखि हुई है पर अगर एक दिन और रुक जाते तो इन लोगो को भी मैं यहाँ का फेमस चंबल गार्डन दिखा देती  .....
तो आपको भी सेवन वंडर्स और कोटा शहर की कुछ तस्वीरें दिखाती  हुं ------->



कोटा का मेरा घर 





ये है सेवन वंडर्स की कुछ कलाकृतियां 




पिरामिड 



 एक शहजादी 


लो जी अमेरिका पहुँच गई 




 मस्ती -- हम तीन 

शाम का नजारा  -- डूबता  सूरज 


 अल्जिरा और मैँ -- 'जो वादा किया वो  निभाना पड़ेगा ' 


अपने घर में कुछ ख़ुशी के पल 





 सेवन वंडर्स -- पीसा की मीनार 

 * आगे के कुछ फोटो गूगल बाबा से  *

 एरोड्रम रोड 


 किशोर सागर (तालाब )




 शहर के बीचों बीच खूबसूरत किशोर सागर और उसमें बना जलमंदिर 
 गेपरनाथ --पहाड़ों के बीच कई फीट निचे भगवान शिव का पुराना  मंदिर यहाँ सीढ़ियों  से जाया जाता है निचे जाकर अद्भुत आनंद की प्राप्ति होती है 


गेपरनाथ मंदिर को जाने वाली सीढियाँ  १९८१ में मैँ स्वयं गई थी तब इतनी पक्की सीढ़ियां नहीं थी 





 कोटा को जोड़ने वाला पहाड़ी दर्रा नाम ---दरा 



राजा महाराजाओं की छतरियां 
(यहाँ उनकी आखरी अंत्येष्टि कर के ये छतरियों का निर्माण करते थे )  



कोटा डेम 


दूर से नजर आ रहा सेवन वंडर्स पार्क

आधारशिला --- सालो से ये पत्थर यू ही हवा में लटका हुआ है



रात १० बजे हम खा पीकर घर वापस लौटे क्योकि १२ बजे हमारी गाडी थी और हम सबसे बिदा लेकर साढ़े ग्यारह बजे ही स्टेशन पहुंच गए  अपनी सीटों के निचे सामान बांधकर आराम से सो गए क्योकि सुबह ५ बजे जयपुर आ जाता है। .....





सोमवार, 2 मई 2016

जयपुर की सैर ==भाग 1 ( jaipur ki sair == 1 )




जयपुर की सैर == भाग 1
" कयामत की रात "




13 अप्रैल 2016 बुधवार  

हम चार सहेलियों ने जयपुर घूमने का प्लान बनाया। मीना चोरे , अल्ज़िरा, मैँ और नीना जो चंडीगड़ से आने वाली थी। दरअसल, हम पुराने ब्लॉगर हरी शर्मा जी की बिटियाँ की शादी में शरीक होने जयपुर जा रहे थे । शादी 16- 17 अप्रैल को भीलवाड़ा में थी । अब किसी भी गाड़ी में रिजर्वेशन नहीं था। तो हमने कोटा से जयपुर जाने का प्लान बनाया, अब हमने 13 को कोटा का रिजर्वेशन करवाया जो कन्फर्म नहीं था पर 1,2,3, वेटिंग था हमने सोचा की एक महीना पड़ा है हो जायेगा पर दिन निकलते रहे और वोटिंग वैसा ही रहा ...
13 का आंकड़ा मनहुश् होता है ऐसा कहा जाता है और हमारे साथ भी ऐसा ही कुछ होने वाला है यह हमको पता नहीं था।
ठीक 1 बजे जब चार्ट कम्प्लीट हुआ तो हमारी सिर्फ एक सीट कंफर्म थी बाकी अभी भी वेटिंग थी।
सोचा TT के हाथ पैर जोड़ लेगे कुछ पहचान से काम चल जायेगा दिल को तसल्ली दे 3 बजे बोरीवली स्टेशन चल दी।
अल्ज़िरा और मीना बान्द्रा टर्मिनस से ही गाड़ी पकड़ने वाली थी ,मैंने भी सोचा की एक सीट तो है जैसे तैसे गप्पे मारते हुए रात निकाल लेंगे ।पर होनी तो होनी थी होकर ही रहेगी ,,,

अब, असली मशक्कत तो अब शुरू होने वाली थी  ....
सेकण्ड क्लास का कूपा खचाखच भरा हुआ था एक सीट पर 3-3 आदमी एक दूसरे पर चढ़े हुए बैठे थे बहुत से लोग गेट के पास ही सामान के साथ पेपर बिछाकर बैठे बतिया रहे थे।
मैंने सेकंड क्लास में सफर बहुत कम किया है  और जब भी किया है वहां रिजर्वेशन के साथ ही किया है ,मेरे लिए ये बहुत ही वेदनापूर्ण सफर होने वाला था।मूड़ अपसेट था। ..

मैं कोई मालदार पार्टी हूँ ऐसा नहीं है साधारण मिडिल क्लास की ही हूँ पर मिस्टर टी टी ई होने से फ्री पास पर सेकण्ड AC में ही सफर किया है जहाँ पास नहीं होता वहां दूसरे टी टी की मेहरबानी से यात्रा हो जाती है, यदि टिकिट से भी यात्रा की है तो वो भी थर्ड AC में ही की है, मुझे सेकण्ड क्लास का खास अनिभव नहीं था।

खेर, बोरीवली से हम तीनो एक सीट पर आराम से बैठकर चल दिए । टी टी आया तो उसको अपने मिस्टर का हवाला देकर कुछ सीट की गुहार लगाई पर उसने अपनी असहमति दिखाई 'आज गाडी बहुत पैक है मैडम कुछ नहीं कर सकता ?

अब ,परेशानियां तो हमसे दो कदम आगे ही चल रही थी क्योकि  हम जिस निचे की साईड वाली सीट पर बैठे थे वो किसी और की थी हमारी तो इकलौती सीट ऊपर की थी हम तीनों ऊपर कैसे बैठे हमने उनसे बहुत विनती की की भाई आप ऊपर बैठ जाओ पर वो मुस्लिम लड़के मानने को तैयार ही नहीं थे आखिर जैसे तैसे हम 2 और वो भी दोनों लड़के एक ही सीट पर ठूसे हुए बैठे रहे । हम जरा भी हिल नहीं पा रहे थे...  हमारे सामने वाली सीट पर बैठे हुऐ तो ड़ेढ़ सयाने थे वो तो हाथ भी नहीं रखने दे रहे थे, अब हम में से एक खड़ा रहता फिर वो बैठ जाता तो दूसरा खड़ा रहता करीब 1 घण्टा ऐसे ही गुजर गया तो सामने बैठी महिला थोड़ी पसीज गई उसने मीना को बोला आप यहाँ बैठ जाओ आंटी ,
अब हम तीनो आराम से बैठ गए।

मैंने फिर सोचा की थर्ड Ac में कोई सीट खाली मिल जाये तो डिफ़रेंस बनाकर ले ले पर कोई फायदा नहीं हुआ सारा थर्ड AC और सेकण्ड AC भी फुल था।ऊपर से उधर चेकिंग भी चल रही थी ।सो में वापस मुंह लटकाकर अपनी सीट पर आ गई।

पहली बार पता चला की बुजुर्ग महिलाओ की कोई इज्जत नहीं करता। कोई अच्छा हो तो बात अलग है। हम वैसे ही बैठे रहे। .. सारा सफर का मज़ा किरकिरा हो गया। .. क्या सोचा था और क्या हो गया।
आखिर कब तक बैठे रहते रात 10 बजे सबका सोने का टाईम हो गया । हमको भी सोना था क्या करते अल्ज़िरा ने कहाँ तुम दोनों ऊपर चढ़कर सो जाओ मैँ निचे सो जाती हूँ पर मैंने कहा तुम चढ़ सकती हो तो चढ़ जाओ मैँ निचे ही सो जाउंगी, क्योकि मैँ ऊपर भी नहीं चढ़ सकती थी। ..
फिर दोनों ऊपर चढ़ गई और मैँ दोनों सीट के निचे अपनी चादर बिछाकर  सो गई या यू  कहिए  सोने का नाटक करने लगी...  बड़ी अजीब सी फीलिंग हो रही थी।

नींद कब आ गई पता ही नहीं चला ।  कहते है नींद तो काँटों पर भी आ जाती है ये मुहावरा आज मेरे साथ सच हुआ क्योकि ,आज कुछ मेरा भी यही हाल था।असली घुमक्कडी हो रही थी। क्यामत की रात थी कैसे गुजरेगी यही सोचते सोचते कब नींद लग गई पता ही नहीं चला...
( फोटू एक भी नहीं है  ऐसी हालत में फोटो मजाक नहीं लगता ) 

शेष अगले अंक में ...

शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

आशापुरी लेक रिसोर्ट


 आशापुरी लेक रिसोर्ट


||तेरी ये निर्मल घाटियां इनमें बंधा है एक समां 
तुम में नहीं कमी, ये भलीवली की सरजमीं ||

* तीर्थ तपोभूमि *
"आशापुरी लेक रिसोर्ट "
एक पिकनिक
---––--------------------------------
सीनियर सिटीजन क्लब ने इस बार की पिकनिक 'निर्मल ध्यान केंद्र तपोभूमि आशापुरी लेक रिसोर्ट विरार (ईस्ट) में रखी ।
मैँ ,मेरी सहेली पूनम और मिस्टर सुबह 7 बजे निकले पिकनिक को, हमको हंड्रेड फ़ीट सड़क (वसई) पर जाना था ।ऑटो कर के जब हम नियत स्थान पर पहुँचे तो वहां 3 बसे खड़ी थी करीब - करीब आधी से ज्यादा भर चुकी थी। हमको पता चला की अब सिर्फ पीछे की सीटे ही खाली बची है इसलिए हम पीछे की सीट पर बैठ गए।हम अक्सर पीछे ही बैठते है।

सब लोगो के आने के बाद गिनती हुई और हमारी बस चल पड़ी ...
बस में ही हमको खाने को पारले G के एक- एक पैकेट और 2- 2 चॉकलेट भी मिली ।हम सब खाते हुए और अंताक्षरी खेलते हुए आगे बढ़ रहे थे ।

शमां बहुत ही खुशगवार था ठंडी ठंडी बियार चल रही थी दूर पहाड़ की तरफ अभी भी कोहरा छाया हुआ था पेड़ हलके हल्के हिलोरे ले रहे थे और बस में सवार सब एक ही स्वर में गा रहे थे-----

"खोया -खोया चाँद खुला आसमां आँखों में सारी रात जायेगी
तुमको भी कैसे नींद आएगी हो हो हो....खोया खोया चाँद...... 

कहने को सब सीनियर सिटीजन थे पर पिकनिक पर सबका हौसला जवानो से कम नहीं था।मुझे हमेशा ही इन सबके साथ पिकनिक जाना अच्छा लगता है।बुढ़ापा तो जैसे इनको छुआ भी नहीं है ।कई लोग तो 80 पार भी कर चुके है।

वसई निकलने के बाद एक मन्दिर के आगे हमारी बस रुकी , काफी बड़ा मन्दिर था और उसमे भिन्न -भिन्न तरह की मूर्तियां लगी हुई थी। हमने वहां कुछ फोटू खिंचे और सबलोग बाथरूम बगैरा से फ्री हुए और वापस बस में सवार हो गए।

   करीब 20  मिनिट  के बाद हमारी बस एक बगीचे के सामने छोटी सी जगह पर आकर रुकी और हम सब उतर गए ,पास ही छोटी सी तानसा नदी  बह रही थी कहते है इसी नदी में स्वामीजी ने समाधि ली थी।  

  यहाँ प्राचीन वृक्षराज  "कदम"  का पेड़ है जिसको कायाकल्प  वृक्ष भी कहते है। इसके 108 फेरे करने से इच्छापूर्ति होती है ।खेर, हमने तो सिर्फ 11 ही फेरे किये और सदा खुश रहने की इच्छा मांगी। 

"पारद शिवलिंग"  का मन्दिर भी है जिसको देखने मात्र से सारे दुःख दूर हो जाते है।
यहाँ रुद्राक्ष   का एक पुराना पेड़ भी है और इसी पेड़ के रुद्राक्षो से यहाँ शिवजी का बड़ा प्यारा -सा मन्दिर बना है।
यहाँ स्वयं भू हनुमानजी और विष्णुजी की प्रतिमाये भी है जो यही की बावड़ी से प्राप्त हुई है।

यहाँ एक ध्यान केंद्र भी है।जहाँ जाकर आप कुछ टाईम ध्यान लगा सकते हैं पर शायद कोई गया नहीं।
नागेश्वर देव यहाँ के प्रहरी है।कहते है जो सच्चे मन से उनको याद करता है तो वो उनको दर्शन भी देते है।
इस तपोभूमि के यज्ञ की आग कभी बुझती नहीं है।

तो हम सभी सीनियर लोग इस तपोभूमि में उतरे और नाश्ता करने चल पड़े भूख तो लग ही रही थी इसलिए सबने स्वादिष्ट पोहे और उपमा का नाश्ता किया और फिर चाय पी।जिनको काफी पीनी थी उन्होंने काफी भी पी ,और कई लोग तो ऐसे भी थे जिनका आज मंगलवार का उपवास था ।उनके लिए आलू फ्राई कर के रखे थे नाश्ते के लिए , कुछ लोग जैन सम्प्रदाय के थे जो कांदा नहीं खाते थे उनके लिए अलग व्यवस्था थी।

नाश्ता कर सब हाथ मुंह धोकर मन्दिर की और चल पड़े जहाँ गुरूजी ने इस मन्दिर का इतिहास और महत्व पर छोटा सा  भाषण दिया फिर हवन किया।हम सबने हवन में अपनी तरफ से भी आहुतियां डाली ।

बाद में पारद शिवलिंग पर अभिषेक किया और कदम के पेड़ पर फेरे भी किये ।कई महिलाये 108 फेरे कर रही थी जो मेरे लिए असम्भव नहीं था। मैंने तो श्रद्धया से हाथ ही जोड़े ।

कुछ देर वहां बिताकर हम पीछे गोशाला चले गए जहाँ हमारे द्वारा लाया हुआ गुड और रोटी गायो को खिलाया।
अब हम निचे की और बने बगीचे में आ गए वहां काफी मात्रा में चारपाइया पड़ी थी हमने भी एक पेड़ के निचे की चारपाई पर अपना कब्जा जमाया और कुछ देर आराम किया।

फिर सभागृह में आकर सबने  मनोरंजन किया गाने और चुटकुलो से समां बन्ध सा गया।
कुछ देर इधर उधर घूमकर हमने टाईम पास किया इतने में खाना भी बन गया और हम सब खाना खाने डायनिंग हाल में आ गए।पहले सारी महिला वर्ग ने खाना खाया फिर पुरुष वर्ग ने शुरू किया।.

खाना काफी स्वादिष्ट था। पेट भर खाने के बाद सब बड़े हाल में पहुँच गए जहाँ आदिवासियों के लिए लाये हुए कपड़ो का वितरण हमारे क्लब के सेकेट्री जोशी जी ने किया। गरीब आदिवासी हमारे लाये कपड़े और खिलौने  पाकर बेहद खुश हुये।

इस काम से निपट कर सब फिर से सभागृह में आ गए जहाँ  फिर से महफ़िल जम गई ।सबने बैठकर आपस में गीत सुनाये ।किसी ने कविता पाठ किया, किसी ने चुटकुले सुनाये, और किसी ने क्विज़ पूछी । थोडा गुरु रविशंकर जी की एक चेली ने योगा के गुर भी सिखाये। और आखिर में सबने हॉउजी खेली ।

5 बजे सबको फिर से चाय मिली ।और साथ ही आश्रम की तरफ से गोमूत्र की शीशी और एक -एक रुद्राक्ष  उपहार स्वरूप मिला जिसे सबने लाईन लगाकर प्यार से लिया और अपनी -अपनी बस में सवार हो गए  ।
वापसी के लिए ।

वापसी में सबके चेहरों पर अभूतपूर्व चमक थी। जो इस बात की घोषणा कर रही थी की आज की पिकनिक कितनी सफल रही सबलोग तरोताजा होकर अपने -अपने घर को बिदा हुए ।

।।जय श्री क्रष्णा।।




रुद्राक्ष से बना शंकर जी का मंदिर 

 


कदम का पेड़ 

मंदिर पर फोटु सेसन 




रास्ते के मंदिर पर फोटु 


अब आराम हो जाये  


मंदिर का इतिहास बताते गुरु जी  


गौ शाला में थोड़ा पुण्य कमा ले 


जोशी जी बच्चो को वितरण करते हुए 




१०८ फेरे लगता हुई महिलायें 


पूनम और  मैं  मटर गस्ती करते हुए 










इंजॉय टाईम 

स्वमिंग एरिया 


नाश्ता 



वितरण करते हुए गुरु जी 





मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

"उदासी "

आज मेरा दिल बहुत उदास है ।
तू नहीं शायद यही बात है ।
आज मेरा दिल बहुत उदास है ।

कभी तुझको प्यार से खत लिखे थे
फिर उन्हें मोड़कर कपड़ो में रखे थे
आज उन्ही खतों के लिए बेकरार हैं
आज मेरा दिल बहुत उदास है।

कभी सहेली के घर का बहाना,
कभी ट्यूशन की क्लास का बहाना,
कभी पिक्चर, कभी नोट्स,कभी यू ही-
अब उन्ही यादों का सहारा है ।
आज मेरा दिल बहुत उदास है।

रात के आखरी पहर तक जागना,
मुझे सीटी बजाकर छत पर बुलाना,
डरते डरते मेरा छत पर आना,
उसी समय पापा का जाग जाना -
आज भी वही पल सुहाना है
आज मेरा दिल बहुत उदास है ।

--- दर्शन कौर *

शनिवार, 19 दिसंबर 2015

मैं तुमसे फिर कब मिलूंगी ?


फिर मिलूंगी कब ????











शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

मनिकरण यात्रा 4

# मणियों की घाटी#
मनिकरण
भाग =4
हम शिमला से कल चले थे रास्ते में  2 बार हमारी कार का टायर पंचर हुआ । रात करीब 11 बजे तक हम मनिकरण पहुंचे अब आगे :-----
सुबह होटल के गरम पानी के कुण्ड में हम सबने स्नान किया और तैयार हो पैदल ही  गुरद्वारे चल दिए  ।इक्का- दुक्का दुकाने ही थी चाय और नाश्ता की ज्यादा होटल वगैरा नहीं थे । हम पहले गुरद्वारा गए तीसरी मंजिल पर बना गुरद्वारा बहुत ही सिम्पल था चारोँ और अनेक देवी देवताओ के फोटु लगे हुए थे हम माथा टेक् कर नीचे आ गए ----
नीचे शिवजी का छोटा सा मन्दिर था वही पास में कुण्ड बना हुआ था जिसमें तेज पानी उबल रहा था चारोँ और रेलिंग भी लगी हुई थी और उस कुण्ड में अनेकों पोटलियाँ बंधी हुई थी जिसमें चावल और आलू लटके हुए थे ।वही पता चला की लोहे के बड़े बड़े हंडो में गुरद्वारे का लंगर भी पक रहा है ।
हमने भी आलू लेकर एक पोटली में लटका दिए 15 मिनट में आलू उबल जायेगे।15 मिनट हमने कुछ फोटु खिंचने में गुजारे और आलू तैयार हो गए ।
अब भूख लगने लगी थी सुबह होटल में सिर्फ बेड टी पी थी तो हम लंगर झकने गुरुद्वारे साहेब के लंगर हॉल चल दिए।आलू भी वही खायेगे।
कहते है मनिकरण आकर यदि गुरद्वारे का लंगर नहीं छक्का तो आनन्द अधूरा रह जायेगा क्योकि यहाँ सारा खाना गर्म पानी की भाप में पकता है
कहते हैं की एक बार जब गुरु नानक जी अपने भ्रमण के दौरान यहाँ आये थे तो शिष्य मर्दाना को भूख लगी तो गुरूजी ने कहा की राशन इक्कठा करो शिष्य राशन ले आये पर आग नहीं थी तो गुरुजी बोले एक पत्थर हटाओ पत्थर हटते ही गरम पानी का स्त्रोत फुट पड़ा जिसमें गुरूजी के कहने पर रोटियां बेल कर डाली गई जो पक कर बाहर आ गई तभी से यहाँ खाना भाप में पकता है।
लेकिन हमने वहां रोटियां भाप में पकती हुई देखी जब पंगत में बैठे तो खाने की इतनी वेरायटी देखकर ढंग रह गए क्योकि हमारी थाली में छोले ,राजमा, आलू की सब्जी,चावल,मीठी खिचड़ी, चने की भाजी और चपाती थी। पेट भर लंगर छक कर हम वहाँ से चल दिए अपने गतांक की और ...
और हम मनाली की और चल पड़े ...



रविवार, 8 नवंबर 2015

#मनिकरण#

# मणियों की घाटी #
मनिकरण -- भाग 3

हम शिमला से कार द्वारा मनाली जा रहे थे रास्ते में मनिकरण के दर्शन भी करने की सोची अब आगे::--
मनिकरण कुल्लू से 45 Km है ।भुंतर इसका नजदीकी एयरपोर्ट हैं । भुंतर के पास ही पार्वती नदी और व्यास नदी का संगम है यही पार्वती नदी का पुल पार्वती घाटी और कुल्लू घाटी को जोड़ता हैं 35 किलोंमीटर का ये विहंगम और खतरनाक रास्ता दिलकश नजरो से भरपूर है।

हम रात को 11 या 12 बजे तक मनिकरण पहुंचे।पुरे मनिकरण में कहीं लाईट नहीं थी अँधेरा ही अँधेरा व्याप्त था। ड्रायवर ने एक होटल में एक रूम दिला दिया 3 पलंग लगे थे सब बगैर कपड़े उतारे ही लेट गए क्योकिं लाइट नहीं थी जागकर भी क्या करते सब सो गए ---

सुबह 8 बजे ड्रायवर ने उठाया की जल्दी दर्शन कर लो ताकि टाईम से निकलकर मनाली पहुँच सके वरना कल जैसा हाल होगा । हम भी कल के वाकिये को याद कर के डर से गए और नहाने चल दिए; नहाने के लिए होटल के अंदर ही कुण्ड बना था जिसमें नलों के द्वारा गर्म पानी और ठंडा पानी आ रहा था नजदीक ही बाल्टी और मग रखा था हम सब कपड़े पहने ही कुण्ड में उतर गए  दोनों पानी के मिलन से पानी ज्यादा गरम नहीं लग रहा था  खूब नहाये सब थकान उतर गई । होटल मालिक ने पहले ही बता दिया था की ज्यादा देर तक मत स्नान करना वरना चक्कर आ जायेगे ।मैँ तो फटाफट निकल कर बाथरूम में चली गई पर मिस्टर और बच्चे देर तक नहाते रहे जिससे उनको चक्कर आने लगे ।

कहते है ये गन्धक का पानी होता है जो अत्यधिक गरम होता है जिसमें चर्मरोगों के उपचार की अद्भुत क्षमता बताई जाती है।
हम सब तैयार हुए गर्मी बहुत लग रही थी पर हवा ठंडी थी । मैंने कमरे की बालकनी में कपड़े सुखाये ताकि जब हम वापस आये तो कपड़े सुख जाये।

फिर हम गुरद्वारे निकल पड़े ।रास्ते भर हमको छोटी छोटी नालियों में से भाप निकलती हुई दिखाई दे रही थी फिर हमने देखा सभी दुकानो पर आग नहीं जल रही है नालियो के जरिये गर्म पानी पहुँच रहा है और भाप में सबकुछ पक रहा है।यहाँ ज्यादा होटल और ढाबे नहीं है।और जो है वो भी साधारण ।

गुरद्वारे में भी गर्म पानी और ठन्डे पानी के कुण्ड बने थे लेडिस और जेन्स के अलग अलग बाथरूम बने थे पानी की मोटी धार भी आ रही थी जिसमें मर्द लोग स्नान कर रहे थे ।पास ही शिवजी का मन्दिर भी हऐ

फिर हम मेन गुरद्वारे में गए जो 3री मंजिल पर था ।
क्रमशः---

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

फिर मिलूंगी कब ???



फिर मिलूंगी कब ???
~~~~~~~~~~~~






मैं तुमसे फिर कब मिलूंगी ?
 कब ! कब ???
जब चन्द्रमा अपनी रश्मियाँ बिखेर रहा होगा तब ।
या जब जुगनु टिमटिमा रहे होंगे ?
या जब रात का धुंधलका छाया होगा ?
या जब दूर सन्नाटे में किसी के रोने की आवाज़ होगी तब ?
या कहीं पास पायल की झंकार  होगी ?
या चूड़ियों की कसमसाहट होगी तब  ?
क्या मैँ तुमसे मिल  पाउंगी ---?


तीसरे पहर की वो अलसाई हुई सुबह ---
उस सुबह में पड़ती ओंस की नन्ही नन्ही बूंदें---
 दूर~~पनघट से आती कुंवारियों की हल्की सी चुहल--
या रात की रानी की बेख़ौफ़ खुशबु ---
 नींद से बोझिल मेरी पलकें और
उस पर सिमटता मेरा आँचल...?
बोलो ! क्या मैं तुमसे तब मिल पाउंगी ..?


सावन की मस्त फुहारों के बीच 
झूलों की ऊँची उड़ानों के साथ
पानी से भीगते दो अरमानों के साथ 
या हवा में तैरते कुछ सवालों के साथ
क्या, तब मैं तुमसे मिल पाउंगी ?


थरथराते होठों के साथ
सैज पर बिखरी कलियों के साथ
मिलन के मधुर गीतों के साथ 
ढ़ोलक पर थिरकती उँगलियों के साथ
या गूँजती शहनाई की लहरियों के साथ
क्या सच में ! मैं तुमसे मिल पाउंगी ----?

इन्हीं उधेड़े हुए कुछ पलो के साथ

 कुछ गुजरी ,कुछ गुजारी यादों के साथ
खामोश गाती ग़ज़लों के साथ 
आँखों से बह निकले तिनकों  के साथ 

कुछ यू ही अलमस्त ख्यालों के साथ
क्या हम फिर मिल पायेगे....

क्या हम मिल पायेगे ...💓 







गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

मणियों की घाटी "मनिकरण"

# मणियो की घाटी #


भाग 2
कल शिमला से चले थे और रात हो गई मनिकरण पहुँचने में अब आगे :--
जैसे ही पहाड़ी पर पंचर हुआ हमारी सबकी नींद खुल गई - हम सब गाडी से उतर गए ...
बियाबनं जंगल सर सर की आवाजें बिलकुल फ़िल्मी स्टाइल में ;नदी का शोर , झिंगरुओ की आवाज़ माहौल को और भी भयानक बना रहे थे । दिल घबरा रहा था -"कहाँ फंस गए "?
उस पर आगे को झुके पहाड़ ,रास्ता भी सीमित ! सचमुच डर तो था पर रोमांच भी कम नहीं था ।पहाड़ी जंगल में फिर दौबारा आना कहाँ होगा ।बच्चे  तो मस्त खेलने लगे ।नीचे बहती पार्वती नदी खूब शोर मचा रही थी ।
ड्रायवर बोल रहा था -"मैडम ,यह पार्वती नदी जितनी दिन में शांत होती है रात में उतनी ही भयानक हो जाती है।"मुझे भी लगा दिन में ये पहाड़ कितने खूबसूरत लगते है और रात में उतने ही भयानक ...
पंचर लग गया था (अब ठीक है ) और हम सब फटाफट चल दिए।
मनिकरण के पास जब पहुंचे तो दूर से ही काफी भाप दिखाई दे रही थी । एकदम अंधकार ! कुछ दिखाई नहीं दे रहा था ।सिर्फ सफ़ेद सफ़ेद धुँआ दिखाई दे रहा था।चारों और अंधकार
ड्रायवर ने बताया शायद लाईट नहीं है शहर में ;आपको कहाँ उतरना है अब अंधकार में कुछ सूझ नहीं रहा था 11बजे ही पूरा शहर सोया हुआ था ।हमने भी उसी को बोला कोई होटल में ले चल वही रुकते है।वो एक होटल में ले गया ।बड़ी मुश्किल से टॉर्च की सहायता से कमरें में पहुंचे  । रात गुजारनी थी सो सब थके हुए फटाफट सो गए।
कल दिन में मनिकरण का वर्णन ...
क्रमशः ---




मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

# मनिकरण #

#मणियों की घाटी#
मनिकरण

भाग 1
हरी भरी घाटियां,कल-कल बहते झरनें, शांत झीलें ,आसमान से होड़ लगाती चोटियां । फूलों की चादर ओढे वादियां और देवदारों से घिरे धने रास्ते ....प्रकृति की अद्भुत कारीगिरी के बीच बसा है देवभूमि हिमाचल प्रदेश का रमणीय तीर्थस्थल --- "मणिकरण "

ऊँचे ऊँचे पर्वतों के बीच बहती पार्वती नदी और व्यास नदी । इन्ही नदियों के बीच बसा है मणिकरण ...
हम 1994 में जब शिमला से मनाली जा रहे थे तो रास्ते में ड्रायवर के कहने पर मणिकरण जाने को तैयार हो गए।तब हमको इसके बारे में खास जानकारी नहीं थी ।सिर्फ ड्रायवर के कहने पर की "वहां आप लोगों का शानदार गुरद्वारा है और गर्म पानी के कुण्ड है।" इतनी जानकारी काफी थी सुबह 11 बजे नाश्ता कर के हम शिमला से निकल पड़े पर मंडी आते आते हमारी कार का पहिया पंचर हो गया । पंचर बनवाने में काफी वक्त निकल गया । सुंदर नगर जब पास से निकला तो दूर बर्फ के पहाड़ दिखाई देने लगे जिन्हें देखकर बच्चे चिल्लाने लगे 'सफ़ेद पहाड़ सफ़ेद पहाड़' नजदीक आये तो लगा ये तो बर्फ के पहाड़ है । उस समय बर्फ देखने का हम सबका पहला मौका था।हलाकि पहाड़ काफी दूर थे पर चोटियां चमक रही थी ।मुझे तो सारी कायनात बड़ी ही रंगीली लग रही थी । ठंडी हवा के थपेड़े दिलों दिमाग को तरो ताज़ा कर रहे थे ।सुंदर नगर अपने नाम को सार्थक कर रहा था। पास ही बहती नदी कल- कल ध्वनि निकालती निरन्तर बह रही थी ।

कार रोककर हमने एक दुकान से कुछ फ्रूट ख़रीदे जो बहुत ही फ्रेश लग रहे थे और वो थे भी फ्रेश ;खाने में भी रस भरे थे कार निरन्तर दौड़ती जा रही थी  उस समय हमने ये कार शिमला से मणिकरण फिर मनाली ,रोहतांग ,ज्वालादेवी होते हुए कालका छोड़ने के लिए 5000 में बुक की थी।

सफ़र बड़ा ही रोमांचक हो गया था रास्ते में कार रोक रोक कर बच्चे किसी पेड़ के गिरे हुए सूखे फूल उठकर रख रहे थे लकड़ी जैसे दिखलाई दे रहे बड़े बड़े फूल बड़े ही खूबसूरत लग रहे थे।इसी कारन रास्ते में ही अँधेरा हो गया ।हम किसी पहाड़ से उत्र रहे थे की फिर गाडी का पहिया पंचर हो गया। घुप अँधेरा !कोई वाहन भी क्रास नहीं हो रहा था और निचे बहती पार्वती नदी का भयानक शोर दिल ही दिल में हम सब डर गए । क्योकि पहाड़ी एरिये में हमारा पहला सफ़र था।बड़ी मुश्किल से टॉर्च के द्वारा पहिया बदला गया और हम करीब 11 बजे मणिकर्ण पहुँचे...
क्रमशः:--