मेरे अरमान.. मेरे सपने..


Click here for Myspace Layouts

सोमवार, 20 जून 2016

जयपुर की सैर == भाग 4 (Jaipur ki sair --bhag 4)

जयपुर की सैर == भाग 4  






तारीख 13 को  हम बॉम्बे से 3 सहेलियां निकली थी जयपुर जाने को  'सम्पर्क क्रांति ट्रेन ' से और वो  रात कयामत की थी। ... 

अब आगे -----



15 अप्रैल 2016


सुबह 4:30 को जब जयपुर स्टेशन के बाहर निकले तो ऑटो की कतारें लगी हुई थी और सबने एक साथ झुण्ड में हल्ला बोल दिया अब ये डिपार्टमेंट अल्ज़िरा को सोप में आराम से जयपुर स्टेशन का मुआयना करने लगी , स्टेशन अच्छा था इतनी सुबह भी गर्दी थी इतने में अलजीरा ने एक ऑटो वाले को 150₹  में जाने को तैयार कर लिया । हम अपना सामान ले चल दिए ... राजाबाग़  की और ...

नीना का मकान भी तीसरे माले पर था और हम सामान लेकर जो ऊपर चढ़े तो , कुछ मत पूछो हमारा हाल ...उफ़ !!!!हम और ऊपर चौथा माला देखने चढ़ गए गोल सीढ़ियों पर ऊपर चढ़ना अपने आप में काफी रोमांचक था ! ऊपर चौथे माले कीबालकनी से  आधा जयपुर दिख रहा था सामने ही रमण्डा होटल और पास ही गुरुद्वारे की गुंमद भी दिख रही थी जहाँ हमने पहले अपना शीश झुकाया। ..... 

दिनभर आराम किया बहुत थक गए थे और रात को चांडाल चौकड़ी की महफ़िल जम गई गाने ,कव्वालियां,अंताक्षरी का दौर चला साथ ही कुछ खाना पीना भी ..न न न न दारू नहीं भाई कोक और वेज खाना क्योकि माताजी के दिन चल रहे है और आज तो नवमी भी थी 2  फ्रेंड जयपुर के मिलने आये हुए थे ...देर रात तक महफ़िल जमी रही फिर हम सो गए ..... 

16 अप्रैल 2016

सुबह देर तक बेफिक्री वाली नींद सोते रहे , आज का दिन फ्री था सो, इतने दिन तक फूल पत्ती खाने से पेट का हाजमा खराब हो गया था तो सबसे पहली शुरुआत अंडो से की 2 -2 मस्त आमलेट पर हाथ साफ़ किये तीसरे की भी इच्छा थी पर उसे कल पर छोड़कर हम चाय पर आ गए और चाय की चुस्कियों के साथ जयपुर टूरिज्म पर ध्यान लगाया ।गूगल खोलकर देखा तो एक बढ़िया प्लान नजर आया जो दोपहर को फ़लाना जगह से लेकर हमको 2 किले जयगढ़ और आमेर का किला दिखाकर रात को डिनर और साथ ही राजस्थानी नृत्य भी , मात्र 450 ₹  में मज़ा आ गया जय हो जयपुर की ...

हमको लगा जयपुर तो बड़ा सस्ता है । हम जाने के लिए रेड्डी होने लगे ।

ठीक टाईम पर हम बताई जगह पर पहुँचे पर यह क्या ! अब, उनका टाईम टेबल चेंज हो गया था । वो विज्ञापन पुराना था ऐसा उन्होंने कहा , नए विज्ञापन के अनुसार अब किले दूर से दिखाते है और रात को डिनर के साथ डांस नहीं होता और पैसे भी 750 ₹ एक मेंबर के ...

हम लोगो 
को बहुत गुस्सा आया ।मैंने 2 -4 सिम्पल गलियां दी और वापस आ गए ,पहले ही दिन मुड़ खराब हो गया था ।जयपुर के नाम से गुस्सा आ रहा था।सबका मूड ऑफ़ हो गया..
इतने में अनिल जो नीना और अब हमारे फ्रेंड थे ,और जिनकी कार में हम यहाँ तक आये थे उनको हमारा खराब मूड अच्छा नहीं लगा वो बोले नो टेंसन  मैँ ले चलता हूँ जयगढ़ बाकी कल देखेगे । वो जयगढ़ का किला दिखाने को तैयार हो गए और हम सब जयगढ़ का किला देखने निकल पड़े।फिर पुराने माहौल ने अपनी जगह बना ली और हम गाने गाते हुए आगे निकल पड़े।

अब हमारे गाईड भी वही थे रास्ते के बाजार, मेन गेट, और जलमहल दिखाते हुए आगे बढ़ते रहे ।
जलमहल में रुकने का बोला तो अनिल बोले आते वक्त रुकेंगे पहले जयगढ़ ...

पर हाय री किस्मत !!! पहाड़ पर गाडी खड़ी हो गई पता चला की इंजन में पानी नहीं है और पानी हमारे पास भी नही था सो, किसी दूसरी गाड़ी से पानी लिया और हम सबने जंगल में मंगल मनाया कुछ फोटू खिंचे यहाँ एक गजब वाकिया हुआ मैँ मोर (पिकॉक के फोटो उतारने थोड़ा जंगल के किनारे गई इतने मेंएक कार वाला चिल्लाने लगा -- '' मैडम ऐसे मत घूमिये यहाँ पेंथर है फौरन कार में ही रहिये और फटाफट ऊपर या निचे उतर जाइये यहाँ रहना खतरे से ख़ाली  नहीं "    शाम का धुंधलका हो गया था और हम सब थोड़ा डर भी गए थे रात होने वाली थी उपर जाने से कोई फायदा नहीं था हम लोग वापस लौट चले। मूड ख़राब हो गया था , वापसी में जलमहल का नजारा देखा पर रात होने के कारण कुछ खास  अच्छा नहीं लगा फिर भी कुछ देर घूमकर कुछ फोटू खीचकर कुछ शॉपिंग कर,पापड़ खाकर दिल को तसल्ली देते हुए अपने घर को वापस चल दिए , भूख लगने लगी थी इसलिए रास्ते के एक चाईनीज रेस्त्रां से वेज ममोज् लिए काफी सस्ते थे सिर्फ 40 ₹ के 12 ममोज् ! हमने 24 ममोज् पैक करवाये और आराम से घर आकर मस्त AC में बैठकर खाये .... 
इस तरह आज घुलामिला दिन रहा।

शेष अगले अंक में ----



गुरद्वारे में नमन 



गोल सीढ़ियाँ 













4  दीवाने जंगल में 

 सुनसान सड़क और मैँ 




जंगल में मंगल 


 गाड़ी ख़राब हो गई 





 जलमहल 



 पापड़ वाली  --- पापड़ खिला 


पीछे जलमहल है .. पर अँधेरा है  



चलिए राम राम सा 









बुधवार, 1 जून 2016

जयपुर की सैर == भाग 3 (Jaipur ki sair --bhag 3)



जयपुर की सैर == भाग 3 



15 अप्रैल 2016 


तारीख 13 को  हम बॉम्बे से 3 सहेलियां निकली थी जयपुर जाने को  'सम्पर्क क्रांति ट्रेन ' से और वो  रात कयामत की थी। ... 

अब आगे -----



चाय ....चाय...चा... य...
गरमा - गरम चाय ....
मसालेदार चाय..
अभी नही तो कभी नहीं ...
चाय..गर्म गर्म चाय ...

इस मीठी आवाज से नींद खुली ,देखा तो हमारी गाडी जयपुर स्टेशन पर खड़ी है....
बाप रे !!!!
हम सब जयपुर पहुँच गए और हमको खबर भी नहीं उफ्फ्फ्फ्फ़....
सब घोड़े बेचकर सो रहे थे और पूरा कूपा खाली था...
ख़ाली तो कोटा से ही था सिर्फ हम ही तीनों दिख रहे थे ।कहाँ परसों नर मुंडो का समुन्दर और कहाँ आज खाली रेगिस्थान ...

कल रात को जब टी टी टिकिट चेक कर के चला गया था गाड़ी चलने को थी की अचानक जोर से कुछ गिरने की आवाज़ आई ,हमारी सीट गेट के पास ही थी मैंने जाकर देखा तो 3 छोटे - छोटे बेग किसी ने बाहर से फेंके थे  गाड़ी धीमी गति से चल दी थी  और अभी प्लेटफार्म पर ही थी .. मैंने देखा, कोई दिखा नहीं अचानक चलती गाड़ी में 2 लड़के और एक लड़की चढ़े , लड़की के मुंह से उफ़ निकला और लड़के अपना सामान उठाने लगे उनमें से एक बोला --" देखा, मैंने बोला था ना गाड़ी मिल जायेगी अपना तो लक ही जोरदार है कभी मेरी गाड़ी छुटी नहीं --" और वो गे गे कर के हँसने लगा....  लड़की बड़बड़ा रही थी ...मुझे लगा अभी थप्पड़ मार देगी लेकिन वो सिर्फ बुरा - सा मुंह बनाकर उसको गालियां देती हुई  अन्दर आ गई.... 

वो तीनों हमारे ही कूपे में आये और हमसे ऊपर वाली सीट पर चढ़ गए ...वो लोग कही एग्जाम देने जा रहे थे ।
फिर उनकी  बातें चटर- पटर होती रही और धीरे धीरे मेरी आँखों में नींद खटर् - खटर्  होने लगी 
...
सुबह उठी तो देखा  वो लोग भी दिखाई नहीं दे रहे थे ,शायद रास्ते  में कही उतर गए थे, अपना सामान देखा तो वो ज्यो का त्यों पडा हुआ था।

मैंने इन दोनों को झिझोड़कर उठाया ,दोनों बेफिक्र सो रही थी  दोनों हड़बड़ा कर उठी और हम तीनो फटाफट नो जयपुर स्टेशन पर उतर गए , जयपुर हमारी सोच से भी ज्यादा ठंडा निकला वैसे इस टाईम सुबह के 4.30 बजे थे और जनरली ये टाईम हर शहर ठंडा ही होता है।

खेर, हम अपना माल मत्था उठाकर सीढ़ियों की तरफ चल दिए ।
पर ये क्या ? 
यहाँ भी इलेक्ट्रॉनिक ऐलिविटर उफ़ !!! अब मैँ क्या करूँ ...

मुझे बहुत चक्कर आते है इन सीढ़ियों में, मैंने आसपास देखा कही और कोई साधारण सीढियाँ नहीं थी अब क्या करुँ ?
अल्ज़िरा और मीना मेरा भी सामान लेकर ऊपर चली गई थी और मैं बेवकूफ की तरह सीढिया देखे जा रही थी लोग आ रहे थे और फटाफट जा रहे थे, कुछ जयपुर की मारवारणे सर ढ़के आई और अपना धाधरा संभालकर फटाफट सीढिया चढ़ गई ...  मुझे बहुत गुस्सा आया ..... आखिर मुम्बईकर कैसे पीछे रह सकता है .... जोश आ गया चक्कर वक्कर भूल सीढियाँ चढ़ने ही वाली थी की उधर से मीना वापस आती हुई दिखी अब तो इज्जत की बात हो गई थी लेकिन उसने कुछ सुना नहीं और  मेरा हाथ पकड़कर धकेलते हुए सीढियाँ चढ़ गई ... लो जी मैँ तो अरामनाल चंगी तरह से सीढियाँ चढ़ गई ...

आगे जाकर क्या देखते है की  राईट साईड पर एक लिफ्ट भी लगी हुई है जो आराम से ऊपर से निचे और निचे से ऊपर आ रही थी और मैँ बेवकूफों की तरह से सबका मुंह देख रही थी फिर हम तीनो जो ठहाका मारकर हंसे की आसपास के लोग देखने लगे ।
इस तरह हमारा जयपुर का शुभारम्भ हुआ ....

 शेष अगले अंक में 







गुरुवार, 5 मई 2016

जयपुर की सैर == भाग 2 ( jaipur ki sair == bhag 2 )


जयपुर की सैर ==भाग 2
"कोटा राजस्थान "

( कोटा का रंगारंग स्टेशन )




14 अप्रैल 2016 गुरुवार


कल हम बॉम्बे से 3 सहेलियां निकली थी जयपुर जाने को  'सम्पर्क क्रांति ट्रेन ' से और ये रात कयामत की थी 
आज का दिन हमको कोटा बिताना है  .. 
अब आगे .....
सुबह शोर सुनकर नींद खुली तो देखा इंसानो का लहराता समुन्दर मेरे सामने था  .. मुझे बहुत आश्चर्य हुआ की रात को  ट्रेन में और भी पैसेंजर चढे थे जबकि ये गाडी बॉम्बे से सीधे बड़ोदरा और वहां से कोटा ही रूकती है ....गाडी पहले से ही पैक थी फिर रेल्वे इनको टिकिट देती ही क्यों हैं ..... जहां तक नजर जा रही थी सब सो रहे थे और तो और पास वाले कूपे में तो टॉयलेट के अंदर भी  लोग बैठे थे ... हैं भगवान !
मेरे कूपे में टॉयलेट जाने वाले उडनपुत्र की तरह ऊपर सीटों पर पैर रखकर बड़े मजे से टॉयलेट जा रहे थे और वापस भी आ रहे थे ..... किसी ने भी सोये हुए लोगों को नहीं जगाया ।

अचानक मेरी नजर अपने पास सोई हुई 2 बच्चियों पर पड़ी जो बेख़ौफ़ सोई हुई थी ,दिखने में गरीब और भिखारन सी लग रही थी पास ही उनकी माँ भी बैठी थी जो खुद भी मैली सी साड़ी में थी और बैठे - बैठे ही सो रही थी..... उसके जोरदार खर्राटों से ही शायद मेरी नींद टूटी थी ... अचानक, मुझे अपने सर का ख्याल आया कही रातभर इन लोगो के सर से कुछ जुएं तो ट्रांसफर नहीं हो गई ? यह सोचकर ही मैं  सिहर गई और मेरे सर में एक तेज़ खुजली होने लगी ,जल्दी जल्दी मैं उठकर बैठ गई देखा तो 5 बज रहे थे नजदीक ही मेरा बैग  रखा  हुआ था जो पूरी तरह मेरे हाथ से जकड़ा हुआ था .. रात को सोने से पहले मैंने ही उसको कसकर बांध लिया था  ताकि कोई पार करे तो मेरी नींद खुल जाये ....खेर, वो सही सलामत था मैंने राहत की साँस ली क्योकि उसमें मेरा खज़ाना था मेरे टिकिट ,मेरे एटीएम कार्ड और सबसे बहुमूल्य मेरा पासपोर्ट था । 

 अभी कोटा आने में 2 घण्टे और थे  दोबारा उसी जगह सोने की हिम्मत नहीं हुई पास वाली सीट पर उकडूं बैठी रही जब तक कोटा शहर की फैक्ट्रियां दिखाई नहीं दी।
अल्ज़िरा और मीना को उठाकर हम कोटा के प्लेटफार्म पर उतरे और राहत अली को याद किया हा हा हा हा यानि राहत की साँस ली और सबसे पहले हम तीनो ने ये कसम खाई की आइन्दा कभी सेकण्ड क्लास का सफर नहीं करेगे और यदि करना भी पड़ा तो रिजर्वेशन के बगैर कभी यात्रा नहीं करेगे, ये तो पक्का है।

कोटा मेरा ससुराल हैं यहाँ मेरे काफी रिश्तेदार रहते है ... हम ऑटो पकडकर सीधे घर को चल दिए ,स्टेशन के नजदीक ही हमारा घर है यदि सामान न होता तो पैदल ही पहुँच जाते पर सामान के कारण ऑटो करना पड़ा और फ़ोकट में ५० रू देने पड़े खेर, साढ़े सात बजे हम घर में थे और रात की आपबीती सुना रहे थे । 

घर पहुँचकर नाश्ता किया करारी कचौरी और गरमा गरम जलेबियों का, नाश्ता कर के  दोनों सहेलियां आराम करने ऊपर वाले रुम में चली गई और मैँ अपनों के साथ गुफ़्तगु में तल्लीन हो गई....... 

शाम 5 बजे हम तैयार हो घूमने निकले .... अब  हम सेवन वंडर्स घूमने जा रहे थे क्योकि रात 12 बजे की हमारी ट्रेन थी जयपुर के लिए ,लेकिन धबरने की कोई बात नहीं इस बार हमारा टिकिट कंफर्म हैं  ... 

 वैसे तो कोटा में काफी जगह है देखने को लेकिन हमारे पास टाइम नहीं था। ....  मेरी तो करीब-करीब सारी जगह देखि हुई है पर अगर एक दिन और रुक जाते तो इन लोगो को भी मैं यहाँ का फेमस चंबल गार्डन दिखा देती  .....
तो आपको भी सेवन वंडर्स और कोटा शहर की कुछ तस्वीरें दिखाती  हुं ------->



कोटा का मेरा घर 





ये है सेवन वंडर्स की कुछ कलाकृतियां 




पिरामिड 



 एक शहजादी 


लो जी अमेरिका पहुँच गई 




 मस्ती -- हम तीन 

शाम का नजारा  -- डूबता  सूरज 


 अल्जिरा और मैँ -- 'जो वादा किया वो  निभाना पड़ेगा ' 


अपने घर में कुछ ख़ुशी के पल 





 सेवन वंडर्स -- पीसा की मीनार 

 * आगे के कुछ फोटो गूगल बाबा से  *

 एरोड्रम रोड 


 किशोर सागर (तालाब )




 शहर के बीचों बीच खूबसूरत किशोर सागर और उसमें बना जलमंदिर 
 गेपरनाथ --पहाड़ों के बीच कई फीट निचे भगवान शिव का पुराना  मंदिर यहाँ सीढ़ियों  से जाया जाता है निचे जाकर अद्भुत आनंद की प्राप्ति होती है 


गेपरनाथ मंदिर को जाने वाली सीढियाँ  १९८१ में मैँ स्वयं गई थी तब इतनी पक्की सीढ़ियां नहीं थी 





 कोटा को जोड़ने वाला पहाड़ी दर्रा नाम ---दरा 



राजा महाराजाओं की छतरियां 
(यहाँ उनकी आखरी अंत्येष्टि कर के ये छतरियों का निर्माण करते थे )  



कोटा डेम 


दूर से नजर आ रहा सेवन वंडर्स पार्क

आधारशिला --- सालो से ये पत्थर यू ही हवा में लटका हुआ है



रात १० बजे हम खा पीकर घर वापस लौटे क्योकि १२ बजे हमारी गाडी थी और हम सबसे बिदा लेकर साढ़े ग्यारह बजे ही स्टेशन पहुंच गए  अपनी सीटों के निचे सामान बांधकर आराम से सो गए क्योकि सुबह ५ बजे जयपुर आ जाता है। .....





सोमवार, 2 मई 2016

जयपुर की सैर ==भाग 1 ( jaipur ki sair == 1 )




जयपुर की सैर == भाग 1
" कयामत की रात "




13 अप्रैल 2016 बुधवार  

हम चार सहेलियों ने जयपुर घूमने का प्लान बनाया। मीना चोरे , अल्ज़िरा, मैँ और नीना जो चंडीगड़ से आने वाली थी। दरअसल, हम पुराने ब्लॉगर हरी शर्मा जी की बिटियाँ की शादी में शरीक होने जयपुर जा रहे थे । शादी 16- 17 अप्रैल को भीलवाड़ा में थी । अब किसी भी गाड़ी में रिजर्वेशन नहीं था। तो हमने कोटा से जयपुर जाने का प्लान बनाया, अब हमने 13 को कोटा का रिजर्वेशन करवाया जो कन्फर्म नहीं था पर 1,2,3, वेटिंग था हमने सोचा की एक महीना पड़ा है हो जायेगा पर दिन निकलते रहे और वोटिंग वैसा ही रहा ...
13 का आंकड़ा मनहुश् होता है ऐसा कहा जाता है और हमारे साथ भी ऐसा ही कुछ होने वाला है यह हमको पता नहीं था।
ठीक 1 बजे जब चार्ट कम्प्लीट हुआ तो हमारी सिर्फ एक सीट कंफर्म थी बाकी अभी भी वेटिंग थी।
सोचा TT के हाथ पैर जोड़ लेगे कुछ पहचान से काम चल जायेगा दिल को तसल्ली दे 3 बजे बोरीवली स्टेशन चल दी।
अल्ज़िरा और मीना बान्द्रा टर्मिनस से ही गाड़ी पकड़ने वाली थी ,मैंने भी सोचा की एक सीट तो है जैसे तैसे गप्पे मारते हुए रात निकाल लेंगे ।पर होनी तो होनी थी होकर ही रहेगी ,,,

अब, असली मशक्कत तो अब शुरू होने वाली थी  ....
सेकण्ड क्लास का कूपा खचाखच भरा हुआ था एक सीट पर 3-3 आदमी एक दूसरे पर चढ़े हुए बैठे थे बहुत से लोग गेट के पास ही सामान के साथ पेपर बिछाकर बैठे बतिया रहे थे।
मैंने सेकंड क्लास में सफर बहुत कम किया है  और जब भी किया है वहां रिजर्वेशन के साथ ही किया है ,मेरे लिए ये बहुत ही वेदनापूर्ण सफर होने वाला था।मूड़ अपसेट था। ..

मैं कोई मालदार पार्टी हूँ ऐसा नहीं है साधारण मिडिल क्लास की ही हूँ पर मिस्टर टी टी ई होने से फ्री पास पर सेकण्ड AC में ही सफर किया है जहाँ पास नहीं होता वहां दूसरे टी टी की मेहरबानी से यात्रा हो जाती है, यदि टिकिट से भी यात्रा की है तो वो भी थर्ड AC में ही की है, मुझे सेकण्ड क्लास का खास अनिभव नहीं था।

खेर, बोरीवली से हम तीनो एक सीट पर आराम से बैठकर चल दिए । टी टी आया तो उसको अपने मिस्टर का हवाला देकर कुछ सीट की गुहार लगाई पर उसने अपनी असहमति दिखाई 'आज गाडी बहुत पैक है मैडम कुछ नहीं कर सकता ?

अब ,परेशानियां तो हमसे दो कदम आगे ही चल रही थी क्योकि  हम जिस निचे की साईड वाली सीट पर बैठे थे वो किसी और की थी हमारी तो इकलौती सीट ऊपर की थी हम तीनों ऊपर कैसे बैठे हमने उनसे बहुत विनती की की भाई आप ऊपर बैठ जाओ पर वो मुस्लिम लड़के मानने को तैयार ही नहीं थे आखिर जैसे तैसे हम 2 और वो भी दोनों लड़के एक ही सीट पर ठूसे हुए बैठे रहे । हम जरा भी हिल नहीं पा रहे थे...  हमारे सामने वाली सीट पर बैठे हुऐ तो ड़ेढ़ सयाने थे वो तो हाथ भी नहीं रखने दे रहे थे, अब हम में से एक खड़ा रहता फिर वो बैठ जाता तो दूसरा खड़ा रहता करीब 1 घण्टा ऐसे ही गुजर गया तो सामने बैठी महिला थोड़ी पसीज गई उसने मीना को बोला आप यहाँ बैठ जाओ आंटी ,
अब हम तीनो आराम से बैठ गए।

मैंने फिर सोचा की थर्ड Ac में कोई सीट खाली मिल जाये तो डिफ़रेंस बनाकर ले ले पर कोई फायदा नहीं हुआ सारा थर्ड AC और सेकण्ड AC भी फुल था।ऊपर से उधर चेकिंग भी चल रही थी ।सो में वापस मुंह लटकाकर अपनी सीट पर आ गई।

पहली बार पता चला की बुजुर्ग महिलाओ की कोई इज्जत नहीं करता। कोई अच्छा हो तो बात अलग है। हम वैसे ही बैठे रहे। .. सारा सफर का मज़ा किरकिरा हो गया। .. क्या सोचा था और क्या हो गया।
आखिर कब तक बैठे रहते रात 10 बजे सबका सोने का टाईम हो गया । हमको भी सोना था क्या करते अल्ज़िरा ने कहाँ तुम दोनों ऊपर चढ़कर सो जाओ मैँ निचे सो जाती हूँ पर मैंने कहा तुम चढ़ सकती हो तो चढ़ जाओ मैँ निचे ही सो जाउंगी, क्योकि मैँ ऊपर भी नहीं चढ़ सकती थी। ..
फिर दोनों ऊपर चढ़ गई और मैँ दोनों सीट के निचे अपनी चादर बिछाकर  सो गई या यू  कहिए  सोने का नाटक करने लगी...  बड़ी अजीब सी फीलिंग हो रही थी।

नींद कब आ गई पता ही नहीं चला ।  कहते है नींद तो काँटों पर भी आ जाती है ये मुहावरा आज मेरे साथ सच हुआ क्योकि ,आज कुछ मेरा भी यही हाल था।असली घुमक्कडी हो रही थी। क्यामत की रात थी कैसे गुजरेगी यही सोचते सोचते कब नींद लग गई पता ही नहीं चला...
( फोटू एक भी नहीं है  ऐसी हालत में फोटो मजाक नहीं लगता ) 

शेष अगले अंक में ...

शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

आशापुरी लेक रिसोर्ट


 आशापुरी लेक रिसोर्ट


||तेरी ये निर्मल घाटियां इनमें बंधा है एक समां 
तुम में नहीं कमी, ये भलीवली की सरजमीं ||

* तीर्थ तपोभूमि *
"आशापुरी लेक रिसोर्ट "
एक पिकनिक
---––--------------------------------
सीनियर सिटीजन क्लब ने इस बार की पिकनिक 'निर्मल ध्यान केंद्र तपोभूमि आशापुरी लेक रिसोर्ट विरार (ईस्ट) में रखी ।
मैँ ,मेरी सहेली पूनम और मिस्टर सुबह 7 बजे निकले पिकनिक को, हमको हंड्रेड फ़ीट सड़क (वसई) पर जाना था ।ऑटो कर के जब हम नियत स्थान पर पहुँचे तो वहां 3 बसे खड़ी थी करीब - करीब आधी से ज्यादा भर चुकी थी। हमको पता चला की अब सिर्फ पीछे की सीटे ही खाली बची है इसलिए हम पीछे की सीट पर बैठ गए।हम अक्सर पीछे ही बैठते है।

सब लोगो के आने के बाद गिनती हुई और हमारी बस चल पड़ी ...
बस में ही हमको खाने को पारले G के एक- एक पैकेट और 2- 2 चॉकलेट भी मिली ।हम सब खाते हुए और अंताक्षरी खेलते हुए आगे बढ़ रहे थे ।

शमां बहुत ही खुशगवार था ठंडी ठंडी बियार चल रही थी दूर पहाड़ की तरफ अभी भी कोहरा छाया हुआ था पेड़ हलके हल्के हिलोरे ले रहे थे और बस में सवार सब एक ही स्वर में गा रहे थे-----

"खोया -खोया चाँद खुला आसमां आँखों में सारी रात जायेगी
तुमको भी कैसे नींद आएगी हो हो हो....खोया खोया चाँद...... 

कहने को सब सीनियर सिटीजन थे पर पिकनिक पर सबका हौसला जवानो से कम नहीं था।मुझे हमेशा ही इन सबके साथ पिकनिक जाना अच्छा लगता है।बुढ़ापा तो जैसे इनको छुआ भी नहीं है ।कई लोग तो 80 पार भी कर चुके है।

वसई निकलने के बाद एक मन्दिर के आगे हमारी बस रुकी , काफी बड़ा मन्दिर था और उसमे भिन्न -भिन्न तरह की मूर्तियां लगी हुई थी। हमने वहां कुछ फोटू खिंचे और सबलोग बाथरूम बगैरा से फ्री हुए और वापस बस में सवार हो गए।

   करीब 20  मिनिट  के बाद हमारी बस एक बगीचे के सामने छोटी सी जगह पर आकर रुकी और हम सब उतर गए ,पास ही छोटी सी तानसा नदी  बह रही थी कहते है इसी नदी में स्वामीजी ने समाधि ली थी।  

  यहाँ प्राचीन वृक्षराज  "कदम"  का पेड़ है जिसको कायाकल्प  वृक्ष भी कहते है। इसके 108 फेरे करने से इच्छापूर्ति होती है ।खेर, हमने तो सिर्फ 11 ही फेरे किये और सदा खुश रहने की इच्छा मांगी। 

"पारद शिवलिंग"  का मन्दिर भी है जिसको देखने मात्र से सारे दुःख दूर हो जाते है।
यहाँ रुद्राक्ष   का एक पुराना पेड़ भी है और इसी पेड़ के रुद्राक्षो से यहाँ शिवजी का बड़ा प्यारा -सा मन्दिर बना है।
यहाँ स्वयं भू हनुमानजी और विष्णुजी की प्रतिमाये भी है जो यही की बावड़ी से प्राप्त हुई है।

यहाँ एक ध्यान केंद्र भी है।जहाँ जाकर आप कुछ टाईम ध्यान लगा सकते हैं पर शायद कोई गया नहीं।
नागेश्वर देव यहाँ के प्रहरी है।कहते है जो सच्चे मन से उनको याद करता है तो वो उनको दर्शन भी देते है।
इस तपोभूमि के यज्ञ की आग कभी बुझती नहीं है।

तो हम सभी सीनियर लोग इस तपोभूमि में उतरे और नाश्ता करने चल पड़े भूख तो लग ही रही थी इसलिए सबने स्वादिष्ट पोहे और उपमा का नाश्ता किया और फिर चाय पी।जिनको काफी पीनी थी उन्होंने काफी भी पी ,और कई लोग तो ऐसे भी थे जिनका आज मंगलवार का उपवास था ।उनके लिए आलू फ्राई कर के रखे थे नाश्ते के लिए , कुछ लोग जैन सम्प्रदाय के थे जो कांदा नहीं खाते थे उनके लिए अलग व्यवस्था थी।

नाश्ता कर सब हाथ मुंह धोकर मन्दिर की और चल पड़े जहाँ गुरूजी ने इस मन्दिर का इतिहास और महत्व पर छोटा सा  भाषण दिया फिर हवन किया।हम सबने हवन में अपनी तरफ से भी आहुतियां डाली ।

बाद में पारद शिवलिंग पर अभिषेक किया और कदम के पेड़ पर फेरे भी किये ।कई महिलाये 108 फेरे कर रही थी जो मेरे लिए असम्भव नहीं था। मैंने तो श्रद्धया से हाथ ही जोड़े ।

कुछ देर वहां बिताकर हम पीछे गोशाला चले गए जहाँ हमारे द्वारा लाया हुआ गुड और रोटी गायो को खिलाया।
अब हम निचे की और बने बगीचे में आ गए वहां काफी मात्रा में चारपाइया पड़ी थी हमने भी एक पेड़ के निचे की चारपाई पर अपना कब्जा जमाया और कुछ देर आराम किया।

फिर सभागृह में आकर सबने  मनोरंजन किया गाने और चुटकुलो से समां बन्ध सा गया।
कुछ देर इधर उधर घूमकर हमने टाईम पास किया इतने में खाना भी बन गया और हम सब खाना खाने डायनिंग हाल में आ गए।पहले सारी महिला वर्ग ने खाना खाया फिर पुरुष वर्ग ने शुरू किया।.

खाना काफी स्वादिष्ट था। पेट भर खाने के बाद सब बड़े हाल में पहुँच गए जहाँ आदिवासियों के लिए लाये हुए कपड़ो का वितरण हमारे क्लब के सेकेट्री जोशी जी ने किया। गरीब आदिवासी हमारे लाये कपड़े और खिलौने  पाकर बेहद खुश हुये।

इस काम से निपट कर सब फिर से सभागृह में आ गए जहाँ  फिर से महफ़िल जम गई ।सबने बैठकर आपस में गीत सुनाये ।किसी ने कविता पाठ किया, किसी ने चुटकुले सुनाये, और किसी ने क्विज़ पूछी । थोडा गुरु रविशंकर जी की एक चेली ने योगा के गुर भी सिखाये। और आखिर में सबने हॉउजी खेली ।

5 बजे सबको फिर से चाय मिली ।और साथ ही आश्रम की तरफ से गोमूत्र की शीशी और एक -एक रुद्राक्ष  उपहार स्वरूप मिला जिसे सबने लाईन लगाकर प्यार से लिया और अपनी -अपनी बस में सवार हो गए  ।
वापसी के लिए ।

वापसी में सबके चेहरों पर अभूतपूर्व चमक थी। जो इस बात की घोषणा कर रही थी की आज की पिकनिक कितनी सफल रही सबलोग तरोताजा होकर अपने -अपने घर को बिदा हुए ।

।।जय श्री क्रष्णा।।




रुद्राक्ष से बना शंकर जी का मंदिर 

 


कदम का पेड़ 

मंदिर पर फोटु सेसन 




रास्ते के मंदिर पर फोटु 


अब आराम हो जाये  


मंदिर का इतिहास बताते गुरु जी  


गौ शाला में थोड़ा पुण्य कमा ले 


जोशी जी बच्चो को वितरण करते हुए 




१०८ फेरे लगता हुई महिलायें 


पूनम और  मैं  मटर गस्ती करते हुए 










इंजॉय टाईम 

स्वमिंग एरिया 


नाश्ता 



वितरण करते हुए गुरु जी 





मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

"उदासी "

आज मेरा दिल बहुत उदास है ।
तू नहीं शायद यही बात है ।
आज मेरा दिल बहुत उदास है ।

कभी तुझको प्यार से खत लिखे थे
फिर उन्हें मोड़कर कपड़ो में रखे थे
आज उन्ही खतों के लिए बेकरार हैं
आज मेरा दिल बहुत उदास है।

कभी सहेली के घर का बहाना,
कभी ट्यूशन की क्लास का बहाना,
कभी पिक्चर, कभी नोट्स,कभी यू ही-
अब उन्ही यादों का सहारा है ।
आज मेरा दिल बहुत उदास है।

रात के आखरी पहर तक जागना,
मुझे सीटी बजाकर छत पर बुलाना,
डरते डरते मेरा छत पर आना,
उसी समय पापा का जाग जाना -
आज भी वही पल सुहाना है
आज मेरा दिल बहुत उदास है ।

--- दर्शन कौर *

शनिवार, 19 दिसंबर 2015

मैं तुमसे फिर कब मिलूंगी ?


फिर मिलूंगी कब ????