मेरे अरमान.. मेरे सपने..


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गुरुवार, 17 मार्च 2011

होली का हुडदंग Holi

 होली का हुडदंग 



(  बुरा न मानो होली है  )

कुंहू -कुंहू  बोले कोयलिया 
हमरे संग होली खेलें सांवरियां !
नीले -पीले और गुलाबी
रंग भरे पिचकारियाँ  !
गाल गुलाबी हो या लाल 
आज रंगे दिलवाली !
बुरा न मानो होली हैं  भाई !
बुरा न मानो होली हैं  ! 
आगे -आगे राधा दौड़े पीछे किशन-मुरारी !   
द्धारका में होली खेलें रुकमनी और गिरधारी !
हुई रंग से लाल चुनरियां ! 
सुभद्रा हुई मतवाली !
बुरा न मानो होली हैं  भाई !
बुरा न मानो होली हैं  ! 


लक्ष्मी आई रम्भा आई !
अपने साथ में तोहफे लाई !
गुझियों की बहार लाई !
पिन्नी और पपड़ी भी लाई ! 
हरे रंग की बर्फी खाकर !
हमने भी क्या घूम मचाई !
बुरा न मानो होली हैं  भाई !
बुरा न मानो होली हैं  !

कंचन और तुलजा ने मिलकर !
ठंडी -ठंडी भांग बनाई !
हमने भी एक पैग चढायां ! 
सर पर मदहोशी हैं  छाई ! 
फिर मीठा खा भांग चढ़ाई !
अब तो खैर , नही हैं  भाई ! 
बुरा न मानो होली हैं  भाई !
बुरा न मानो होली हैं  !


 स्रष्टि ने क्या रूप रचाया !  
फागुन ने क्या रंग जमाया !
सबके दिलो में प्यार समाया !
आज ख़ुशी से दिल भर आया !
रंगो ने सपने सजाए !
इन्द्र धनुष ने रंग दिखाए !
होली ने रंग डाला भाई !
बुरा न मानो होली हैं  भाई !
बुरा न मानो होली हैं  !

(बुरा न मानो होली है )


****************************************
 ** रिमिक्स **   

मेरे ब्लाक के आदरणीय हम सफर आप सबको होली की ढेर सारी शुभ कामनाए ! इस रंगारंग त्यौहार पर मेरा प्यार भरा तोहफा कबुल करे :--      

# बुरा न मानो होली हैं  #




राजीव जी ने रंग जमाया !
अंतर जी ने ब्रश फिराया !
शास्त्री जी ने मल्हार गाया !
केवल राम के मन को भाया !
होली का त्यौहार ये आया !
बुरा न मानो होली हैं  भाई !
बुरा न मानो होली हैं  !

राजेंद्र जी ने राग सुनाया !
प्रभा जी ने ठुमका लगाया !
निर्मला जी ने साथ निभाया !
संगीता जी ने लोरी गाई !
मुकेश जी ने तान लगाई !
राकेश जी ने  'गंगा' बहाई !
सबमें ज्ञान की 'लौ ' जलाई !       
बुरा न मानो होली  हैं भाई !
बुरा न मानो होली हैं  ! 

दुल्हनिया संजय घर आई !
साव जी ने ट्रेन चलाई !
नीरज जी को सीट थमाई !
सुशिल जी ने भांग घुटाई !
सराफे से भांग मंगाई !
सत्यम जी ने भांग चढ़ाई !
अब तो मुश्किल हो गई साईं !
डॉ.साहेब ने चोला बदला !
चित्रों पर है रंग उंडेला !
फोटूग्राफी अपना ली ताई !
बुरा न मानो होली हैं भाई !
बुरा न मानो होली हैं  ! 

लाल -पीले रंगो से रंगकर !
शिखा -शालिनी आई हैं  !
दिव्या जी ने गुझिया तलकर !
सबको दावत दी हैं भाई !
फागुन का महिना जो आया ! 
'मोर' ने अपना नाच दिखाया !
जमाल जी ने  शे'र सुनाया !
पूजा जी ने भजन गाया !
सुरेन्द्र जी के "झंझट" कई !
बुरा न मानो होली हैं  भाई !
बुरा न मानो होली हैं  !

ललित जी अभी से रंग गए !
संतोष जी भी पीछे पड़ गए !
अरविन्द जी भी मगन हो गए !
सुनील जी तटस्थ हो गए !
बोले होली कैसे खेलु !
मैं  तो अकेला हूँ  भाई ! 
कुंवर जी की टोली आई !
अतुल को भी साथ लाई ! 
सबने भांग वही चढ़ाई !
मदहोशी फिर सब पर छाई !
बुरा न मानो होली हैं  भाई !
बुरा न मानो होली हैं  !

वन्दना जी ने गजलें गाई !
मोनिका जी भी पीछे आई !
सदा जी ने फाग उड़ाया !
'हीर' जी का दिल भर आया !
सुषमा जी को टेसू भाया !
राजस्थान की होली न्यारी !
राशी जी को लगे प्यारी ! 
विभा जी को रंगो से यारी !
सबने मिलकर घूम मचाई !
बुरा न मानो होली है भाई !
बुरा न मानो होली है !  
      

(बुरा न मानो होली हैं भाई  )

बुरा न मानो होली है ! यदि किसी की भावनाओं को चोट लगी हो तो दिल से माफ़ी मांगती  हु -- कविता या गीत लिखना मेरे बस की बात नहीं है --बस तुकबंदी कर लेती हु --यदि किसी का नाम रह गया हो तो भी माफ़ करे जितने नाम याद थे लिख दिए -- दिल से होली की बधाई देती हु ...एक बार फिर 'बुरा न मानो होली है भाई..
-----दर्शनकौर





मंगलवार, 15 मार्च 2011

तपोभूमि श्री हेमकुंड साहेब ( 4 )

              
                   गुरु गोविन्द सिंह जी वीर बली |
                   जो ही दुष्टा मार सिआर किआ | 
                   सब जोर और जुलम हटाए दिए |
    सब खलकत नाल  पियार किआ |   


(कलगीधर गुरु गोविन्द सिंह जी महाराज )  


शाम हमने गुरूद्वारे में ही गुजारी --छोटा -सा हाल है गुरूद्वारे का !वेसे ईमारत काफी बड़ी है --रात को हमने लंगर छक कर किया --बड़ी टेस्टी दाल और खीर बनी थी --गुरु साहेब को खीर बड़ी पसंद थी-- इसलिए उनके हर स्थान पर खीर बनती ही है --रात बहुत ठंडी थी --थके इतने थे की यदि मक्खी भी भिनभिनाती तो उड़ाने वाला कोई नही था ---


सुबह ६ बजे ही नींद खुल गई --कमरे में गुरु वाणी का मीठा स्वर गूंज रहा था--कुछ लेडिस तैयार हो गई थी --कुछ हो रही थी --अपुन तो भाई आलसी नंबर वन ! सबसे लास्ट में नंबर लगाते है ताकि कोई पीछे से खट--ख़ट न करे --सब चिल्लाने लगे तो फटाफट नहाने चली गई --अरे बाप रे !!!इतना ठंडा पानी ,मेरे तो होश उड़ गए --मै बम्बईया निवासी गर्मी में भी गरम पानी से नहाने वाली भला इस बर्फ के ताजा पानी से कोन नहाएगा ? मै तो वापस आ गई ,कोई बोला नीचे जाकर गरम पानी ले आओ, अब भला ३माले से कोन नीचे जाकर पानी ऊपर लाएगा--सबको जल्दी थी चड्डा सा. दो बार बुलाकर चले गए थे --सबने धमकाना शुरू कर दिया की हम चले जाएगे फिर अकेले आना -धमकी काम कर गई और मैने नहा लिया --अजी ,नहा क्या लिया सिर्फ ड्रायक्लीन  कर ली यानी दो लोटे डाल लिए वो क्या कहते है -- 'कव्वा स्नान' ! होटल की बड़ी याद आ रही है कम से कम पानी तो गरम मिल जाता--आप लोग जब यहाँ आए तो होटल में ही रुके --

तैयार होकर छोटे बेग में दो दिन के कपडे रक्खे --क्योकि हमारा सामान यही रहेगा --हमे सिर्फ दो ड्रेस ,दो स्वेटर ,गर्म टुओपा,एक बरसाती   (रेन कोट) पहनने के जुते, गुलुकोश का डिब्बा कुछ  ड्रायफ़ूड, शाल इत्यादि |
रखने को कहा गया था -- 

गुरुद्वारा गोविन्द -घाट   :-

गुरुद्वारा गोविन्द -घाट  का पुराना नाम घघरिया गाँव था --संन १९६२ के सितम्बर माह में इस गुरूद्वारे का निर्माण हुआ था --जो १९६५ को सम्पूर्ण हुआ --कहते है की जिस दिन यहाँ अखंड पाठ का भोग पड़ा था उसी दिन रात को गुरु ग्रन्थ साहेब के ऊपर एक ज्योति के दर्शन हुए थे जिसे सारी संगत ने देखा था--               


नीचे आए तो चड्डा सा.मिल गए --नाराज होने लगे बहुत देर हो गई थी सब चले गए थे --हम चुपचाप वहां से खिसक लिए --सीधे गुरूद्वारे गए माथा टेका मन ही मन चोपाई सा. का पाठ किया चाय पी --नाश्ता  कियाऔर दोड़ते हुए घोड़ो के आफिस आ गए --वहां चड्डा सा. खड़े हमारा इन्तजार कर रहे थे --हमको घोड़ो पर सवार किया और विदा किया--की अब हम गोविन्दधाम  ही मिलेगे --घोड़ो का किराया 1600रु.तीन दिन के लिए बुक किया है--पालकी का किराया पूछा तो पता चला की 5000रु. !चलो अपने घोड़े ही भले ; अब हम तीसरे दिन ही यहा पहुंचेगे --यहाँ आपको कपडे घुलवाना हो तो दे सकते है --वापसी में मिल जाएगे --एक कपडे का 20 रु. ---


(पीछे गोविन्द -घाट की इमारत दिखाई दे रही है )

ठंडी बहुत थी --ठंडी -ठंडी हवा से और ठंडी लग रही थी --मै पूरी तरह पेक !घोड़े पर सवार थी मेरे साथ -साथ रेखा चल रही थी --बहुत खुश गवार मोसम था --साथ -साथ अलकनंदा नदी बह रही थी --यहाँ से पहाड़ शुरू होते  है -- 

मै और रेखा दोनों एक -एक घोड़े पर सवार हो गए--साथ में एक आदमी हम दोनों के घोड़ो की रास  पकडे चल रहा था--काफी संगत हाथो में डंडे लिए पैदल  रही थी --जवान और बुड़े  काफी लोग पैदल ही जा रहे थे --इच्छा तो हमारी भी थी पैदल चलने की पर ऊपर घोड़े न मिले तो १३ किलो मीटर का यह खतरनाक रास्ता केसे तेय होता--इसलिए हमने नीचे से ही घोड़े करने में अपनी भलाई समझी --कभी मै आगे कभी रेखा आगे--यू ही करवा बढता गया --धुप निकलने लगी थी --धुंध साफ हो रही थी --  

           
(ऊपर से गोविन्द -घाट का विहंगम द्रश्य ) 


कुछ दूर आए तो यहाँ से दो रास्ते हो जाते है --आगे एक रास्ता लेफ्ट वाला 'फूलो की घाटी ' जाता है --हम राइट वाले रास्ते से आगे बढ़ गए --वापसी में कोशिश करेगे --इच्छा तो बहुत है फूलो की घाटी देखने की --!   

फूलो की घाटी :--

यह घाटी गोविन्द -घाट के बाद शुरू होती है--प्राकृतिक प्रेमी यहअक्सरआते है --कई हेमकुंड यात्री भी वापसी में यहाँ जाते है --इस घाटी में सभी जंगली प्रजाति के फूल है-- सन 1982 को इसे राष्ट्रिय-उधान के रूप में घोषित किया है --यहाँ कई जानवर देखने को मिल जाएगे --
फूलो की घाटी 11000 फीट की उंचाई पर स्थित है और 2 मील तक फेली हुई है --इस फूलो की घाटी पर एक विदेशी महिला मिस जोन्स जो लन्दन के शाही बागीचो की पर्यवेक्षक थी --जो रानीखेत के पादरी की पत्नी मिसेस स्मिथ के साथ सन 1922 में भ्रमण करती हुई पहाड़ी पर चढकर इस घाटी में उतर आई थी --उसे यह जगह इतनी पसंद आई की वो हर साल यहाँ आती रही --एक दिन उसका पैर यही फिसल गया जिसके कारण उसकी म्रत्यु हो गई --
आज भी इस महिला की यहाँ समाधि बनी हुई है --यहाँ 150 फूलो की प्रजातियाँ पाई जाती है --ऐसे फूल संसार में और कही देखने को नही मिलते है --हिमपात के बाद मोसम के बदलते ही फूलो की किस्मे भी बदल जाती है --यहाँ सिर्फ इन फूलो को देखना चाहिए छूने की मनाई है --क्योकि जंगली प्रजाति होने के कारण कोई जहरीला फूल हो सकता है ---


(रास्ते में मिला एक  फूल )


( खुबसूरत फूलो की छटा )


                    ( ओंस में डूबा एक फूल )                         

(सुन्दरता से लजाया हुआ एक फूल )   


(एक और सुन्दरता )


हम काफी आगे निकल आए है --पूरी घाटी पर सूरज चमक रहा है -गर्मी होने लगी हमने स्वेटर उतर कर घोड़े पर रख दिए है-- और प्रकृति का मजा लेने पैदल हाथ में डंडा लिए चल पड़े है-- हमारा घोडा हमसे आगे चल रहा है रास्ते में कई दुकाने है जहां चाय मिलती है -कई लोग आलू के पराठो का मज़ा ले रहे थे --हम भी चाय पीने और पराठा खाने रुक गए -- एक पराठा 30 रु. में साथ में दही और बिसलरी बाटल 20 रु. में, चाय 10 रु.में !खाने का सामान काफी महगा है -- महगा होगा ही सही क्योकि इतनी दूर बेचारे उठाकर लाते है --             


(घोड़े से उतर कर पैदल चलते हुए )
( हवा काफी ठंडी है इसलिए स्कार्फ बाँधा है )

(चाय और आलू का पराठा***क्या बात है )        
( इन्तजार हो रहा है --इन्तजार   का फल मीठा होता है न !! ) 

नाश्ते के बाद हम ने पास बह रही अलकनंदा नदी के मजे लिए --बहुत हुडदंग मचाई -- देखे :-- 

            
(रेसत्रा के पीछे बह रही नदी ) 

(रेखा और मै *** हम साथ -साथ है  ) 
( तेरा साथ है तो फिर क्या कमी है )



नदी का पानी एकदम ठंडा है और सफ़ेद झग है--शोर मचाता हुआ शांति से बह रहा है --थोड़ी देर मस्ती करके वापस घोड़ो पर बैठ गए --रास्ता बड़ा उबड़ -खाबड़ है --एकदम संकरा रास्ता है--आधा कच्चा आधा पक्का रास्ता बना है कई जगह काम चल रहा है --सडक पर रेलीग भी नही है --घोडा जब टर्न लेता है तो जान निकल जाती है क्योकि आगे सिर्फ खाई है और नीचे बहती नदी है --घोड़े बड़े समझदार है फिर भी चोकस होकर बेठना पड़ता है अपना बेलेंस तो बनाना पडेगा --घोड़े सिर्फ पहाडो से निकला पानी ही पीते है --भरा हुआ या बहता हुआ  पानी नही पीते है --
   
रास्ते में कई लोग सेवा कर रहे है --कोई गुलुकोश खिला रहा है तो कोई मेवे बाट रहा है --खट्टी -मीठी गोलिया भी संगत नीचे उतरने वाली बाट रही है यह रास्ता 13 किलोमीटर का है 6  - 7 घंटे लगना है --रास्ते की संगत पाठ करते हुए 'सतनाम वाहेगुरु' का जाप करते हुए ऊपर चढ़ रही है-- कुछ नीचे उतर रहे है --कुछ बुजुर्ग पालकी में सवार होकर पाठ करते हुए ऊपर जा रहे है --वाहेगुरु का जाप वायुमंडल में गूंज रहा है --

हम भी आनंद साहेब का पाठ करते हुए आगे बढ़ रहे है -- रास्ता बहुत खराब   हो चला है --धीरे -धीरे चल रहे है --      


(रास्ता संकरा है और उबड़ -खाबड़ भी है  )

इतने छोटे रास्ते से घोड़े पर निकलना सचमुच कमाल का है-- और जब सामने से दूसरा घोडा आता है तो जान निकल जाती है --पैदल चलने वालो  के लिए यह स्थान स्वर्ग से कम नही है फिर इन रास्तो पर झरने भी निकले रहते है --फोटू ज्यादा खिंच नही सकी हु --क्योकि हाथ में घोड़े की रास पकड़ रखी है --जरा -सा हाथ छुट्टा की गए काम से --
   

(बाबाजी आराम कर रहे है )

नीचे उतर कर रुक -रुक कर सफ़र कर रहे है --साथ ही नदी बह रही है --यहाँ नदी किनारे के पत्थर एकदम सफ़ेद है --नदी में कभी पानी अचानक बढ़ जाता है --बहुत खतरनाक माहोल हे भाई --? 
पहाड़ो के बाद चलते -चलते  एकदम मैदानी एरिया आ गया --बहुत सुन्दर जगह थी --ढेरो फुल खिले थे --यहाँ एक हेलीपेड भी बना है --घोड़े वाले से पूछा तो उसने बताया की यह फारेस्ट वालो का है --काफी सुन्दर लकड़ी के मकान बने हुए थे --ऐसा लगता है  मानो विदेश में आ गऐ  हो --या स्वर्ग में; जेसा फिल्मो में होता है --यहाँ  से ३किलो  मीटर और है गोविन्द धाम -- 

(हेलीपेड )

६ घंटे का कमर तोडू सफ़र तैय करके आखिर हम एक बजे  पंहुच ही गऐ गोविन्द -धाम--कमर का हलवा बन गया था --पेर जमीन पर रक्खे नही जा रहे थे --चला भी नही जा रहा था; मै तो वही बेंच पर बैठ गई--आगे बढ़ने की हिम्मत ही नही थी --पूरा शरीर दर्द कर रहा था --यह घोड़े का सफर !भगवान बचाए !!
गुरूद्वारे के सामने ही हमने होटल लिया-- मेने चड्डा सा. से कह दिया की हमे होटल में ही रहना है -- कोई रहे या न रहे --रेखा और मै रहेगे--हमारी देखा देख सब महिलाए होटल ही चल दि --मै तो होटल आई तो जो सोई की खाना खाने भी नही गई--सब लंगर छकने नीचे चली गई --और मै जो सोई तो शाम के ६बजे ही उठी --
शाम को गुरूद्वारे में दर्शन करने गई --वो पेड़ भी देखा जहां कभी भाई सोहन सिंह जी और भाई मोदन सिंह जी रहते थे --इनकी स्टोरी बाद में --
ठंडी बहुत है --हमें  स्वेटर में भी ठंड लग रही थी --फिर बारिश भी हो गई थी इसलिए पारा और लुड़का हुआ था --हमने बरसाती भी पहन रखी थी --फटाफट दर्शन किए लंगर खाया और रूम में आ गए --               



(गुरुद्वारा गोविन्द -धाम )


रात को बहुत थक गए थे --इसलिए  जल्दी ही सो गए --वेसे भी यहाँ रात ८बजे जनरेटर बंद हो जाते है --अब सुबह ४बजे लाईट आएगी---सुबह जल्दी ६बजे उठने को कहा है--देखते है कब नींद खुलती है --- 


जारी ---  

शनिवार, 12 मार्च 2011

तपोभूमि श्री हेमकुंड साहेब ( ३ )



                         चरन चलो मारग  गोविन्द 
                          मिटे पाप जपिए हर बिन्द      





(तपस्या में लींन पिछले जन्म में दुष्ट -दमन गुरु गोविंदसिंहजी  )



( हाजरा हुजुर श्री  गुरुग्रन्थ साहेबजी ) 




 11 सितम्बेर 2008

सूरज की किरणों से नींद खुली --देखा खिड़की के ऊपर रोशनदान से धूप आ रही थी --पहाडो पर दिन जरा जल्दी निकल आता है --यहाँ की सुबह बहुत खुशगवार होती है --मंद -मंद हवा --धुंध से घिरे पहाड़ --कभी धुप कभी छाया-- आलोकिक द्रश्य होता है --नदी की जोरदार आवाज --हवा मे पेड़ो की सरसराहट बहुत सुंदर नजारा रहता है  --

(गढ़वाल गेस्ट -हाउस के बाहर) 




सुबह  तैयार होकर सामने के होटल में नाश्ता किया --हम सब करीब ५० -६० लोगो का जत्था है जिसमे ज्यादातर लोग पुरे परिवार के साथ आए है --कुछ लोग तो पिछले 10 साल से आ रहे है --वाहेगुरु की मेहर है वाहेगुरु   उन्हें नेमत बक्शे--
   
हमारा तो बुरा हाल है बैठे -बैठे हालत खराब हो रही है --यह बस का सफ़र बड़ा बेकार है-- ट्रेन का सफ़र मुझे बहुत पसंद है --उधर रेखा के साथ -साथ कई लोगो को उलटी हो रही है --सब सफ़र शुरू होने के पहले ही टेबलेट खा लेते है-- मैने एक उपाय बताया, जिसे मेरे पति सफ़र से पहले  इस्तेमाल करते है --

 (  सफ़र शुरू करने के बाद जैसे  से ही उलटी जैसा होने लगे--आप माचिस की एक तीली मुंह में रख ले(मसाले की साईट वाली ) उसे निगले नही बस मुंह में रखना है --जब कुछ खाए तो कुल्ला कर के ही खाए --दुबारा ऐसा हो तो फिर वही ट्रिक इस्तेमाल करे --बहुत बढ़िया उपाय है --आप भी कभी इस्तेमाल करके देखे ---)
  
रास्ते की सुंदर द्रस्यावली देखते हुए हमारी बस पहाड़ो का सीना चीरती हुई आगे बढती  जा रही है --कभी लगता की अब गिरी !अब गिरी ! क्योकि पहाडो पर रेलिग होती नही है-रास्ता छोटा होता है फिर झरने भी सडक पर ही बहते है --सारा माहोल गीला -गीला लगता है सूरज भी नही दिखाई देता है क्योकि पहाडो की वजय से धुप नीचे उतर नही पाती है खेर ,फिर भी माहोल बड़ा रोमांचक रहता है-- जब भी कोई बस क्रास होती तो कलेजा मुंह को आ जाता है --जो पहाडो पर सफ़र कर चुके है उन्हें अच्छी तरह पता होगा --कई बार ऐसे टाइम ही बेलेंस न होने की वजय से दुर्धटनाऐ हो जाती है --सुनने में अक्सर आता है कि फलाना जगह से पहाड़ी से गिरकर बस  खाई में गिरी --खेर, ' जिस को राखे साईया-मार सके न कोई '              

(खतरनाक रास्ता )

(कल -कल की ध्वनी कानो में गूंज रही है
इन वादियों की खुशबु सांसो में घूम रही है )

जोशीमठ पहुँचने से पहले ही हमारी बस खराब हो गई --हमसब नीचे उतर पड़े --और आगे ही पैदल चल पड़े --बड़ा सुहावना शमां था -- 

(नीचे उतरने के बाद माहोल ही रंगीन  था ) 

                       (ये उच्चे परवत, ये दरख़्त, ये नीला आसमान !
                           बेखुदी मे हम तो दूर तलक निकल  आए --)     


(चड्डा आंटी के बेटे और पोती के साथ )
(पीछे इतना सुन्दर झरना है जो सडक पर ही बह रहा है )



(जोशीमठ:-   गूगल चित्र )
      

गाडी ठीक होते ही हम जोशीमठ पहुँच गए --हमारी दूसरी बसे काफी टाइम पहले ही पहुँच गई थी और हमारा इन्तजार कर रही थी ---शाम से पहले हमे गोविन्द -घाट पहुंचना जो है ---

जोशीमठ :-

जोशीमठ वह स्थान है जहां शीतकाल में बद्री-विशाल यहाँ निवास करते है --यह मठ उन चार मठों में से एक है जिसका निर्माण श्री शंकराचार्य ने किया था --यह स्थान अलकनंदा व् घोली गंगा नदी के संगम स्थल से कुछ ऊँचाई पर स्थित है-- यहाँ एक गुरुद्वारा भी है जिसे दुष्ट -दमन गुरुद्वारा कहते है---                                         
(जोशीमठ में हम नही उतरे क्योकि हमारी बस खराब हो जाने से हम लेट हो गए थे --इसलिए तुरंत चल दिए --इस वजय से फोटो नही खीच सकी )

औली:-

जोशीमठ से १६ किलो मीटर की दुरी पर औली नाम का पर्यटक स्थल है --जनवरी से मार्च तक यहाँ बर्फ रहती है --बर्फ ३फिट तक जमी रहती है यहां से आप नंदा देवी ,कामत,और दूनागिरी पर्वतो का आनंद ले सकते है -हम तो जत्थे के साथ थे वरना जरुर जाते --औली बहुत सुन्दर जगह है --बर्फ से  ढके पर्वत और स्कीइग का मज़ा आप औली में ले सकते है --


(औली***चित्र :-गूगल ) 

(औली :- चित्र गूगल )


और अब हम पहुँच गए है --गोविन्द -धाम ! यह हमारा बस से आखरी सफर है --यहाँ से हमारी पैदल यात्रा शुरू होती है --यही से एक रास्ता बद्री नाथ को जाता है --हम पैदल ही चल पड़े --हमारा सामान चड्डा सा. की निगरानी मै पीछे -पीछे आ रहा है --दूर पहाड़ी पर लोग आते -जाते दिखाई दे रहे है --शायद हमे भी उसी पहाड़ी पर चड़ना है--साथ-साथ  अलकनंदा नदी बह रही है --चारो और पहाड़ ही पहाड़ है --शाम घिर आई है --गोविन्द घाट का बाज़ार जगमगा रहा है --दुकाने सजी है --पंथ से सम्बंधित वस्तुए बिक रही है --कुछ होटल भी है --टूरिज्म के आफिस है --और कुछ जड़ी बूटियों की दुकाने भी सजी है -स्वेटर -शाल ,कम्बल की दुकाने भी है --हम गुरूद्वारे चल दिए --हमे वही ठहरना था --   


(गुरुद्वारा गोविन्द -घाट )


हम गुरुद्वारे जा रहे है --सराय में रुकेगे --हमको दुसरे -माले पर रूम मिला --रूम अच्छा है --चार पलंग बिछे है--हम ८ महिलाओं के लिए काफी है --अलमारी में काफी कम्बल रखे है जिसको जितनी जरूरत हे ले सकते है--

  कुछ परिवार होटल में चले गए --वेसे होटल ही ठीक है --पेसे जरुर खर्च होते है --पर सुविधा भी मिल जाती है जो गुरूद्वारे की सराय में मुश्किल है --यह बात मुझे सुबह मालुम पड़ी --

यहाँ हमारे मोबाइल बंद हो गए सिर्फ बी एस एन एल चालू था --हमने STD
बूथ पर जाकर अपनी खेरियत की खबर दी घरवालो को --वेसे यहाँ से लाईट भी आगे नही है ---

कल हम गोविन्द -धाम चलेगे --- 

जारी ---

गुरुवार, 10 मार्च 2011

तपोभूमि श्री हेमकुंड साहेब ( २ )


                      धर्म चलावन संत उबारन !
                      दुष्ट सभन का मूल उपारन ! 



(गुरु गोविन्दसिंह जी यमुना किनारे बेठे हुए )  

      


10 सितम्बर 2008 

रात को ऐसे नींद आई की कुछ पता ही नही चला--सब घोड़े बेचकर सो रहे थे    सुबह कुछ शोर से नींद खुली --पता चला की सब तैयार हो गए है और मुझे जगाने को शोर मचा रहे है --अपुन  तो भाई ,नींद के गुलाम आदमी है बड़ी मिन्नतो से जागते है सो;जेसे तेसे जाग ही पड़ी --कल की थकान अभी तक उतरी नही थी --फिर भी लाचारीवश फटाफट तैयार होने भाग खड़ी हुई--दिल्ली की गर्मी से बेजार हुआ शरीर यहाँ ठंडे पानी से मचल उठा --खूब जी-भर कर नहाई --वापस कमरे  में आई तो सब जा चुके थे --रेखा बेचारी सहेली का धर्म -निभाने रुक गई थी---

हम सबसे पहले लंगर -हाल में गए चाय जो पीना थी--पर वहां पूरी- छोले देखकर नियत खराब हो गई --नाश्ता किया और चल दिए गुरुद्वारा देखने     
      


( गुरुद्वारा पोंटा साहेब )




( पोंटा साहिब यमुना नदी  के  पुल से खीचा चित्र )


( लंगर -हाल का द्रश्य पीछे यमुना नदी )



हम गुरुद्वारा देखने चले गऐ-- यमुना नदी के किनारे बना यह गुरुद्वारा काफी बड़ा है --इतिहासकार बताते है की अक्टूम्बर १६८४ ईस्वी में सिरमोर रियासत के राजा मेदनी प्रकाश ने गुरु गोविन्द सिंह जी को अपनी रियासत में आमंत्रित किया ,उस समय गुरूजी आनंदपुर साहेब में थे ,सिरमोर रियासत की राजधानी नाहन, आन्नदपुर साहिब से पूर्व -दक्षिण दिशा मै १५० किलो मीटर दूर थी -- वे अपने साथ कई विद्वान् ,कवि और ५००सो सशस्त्र सिक्ख सैनिक और परिवार के साथ सन १६८५ मे सिरमोर पहुंचे --सिरमोर का पडोसी राज्य गढ़वाल था (जो आजकल जिला चमोली है )उसके राजा फतहशाह थे -- दोनों रियासतों में आपस में दुश्मनी थी --गुरु जी के प्रयासों से उनमे दोस्ती हुई--फतहशाह गुरूजी के मुरीद हो गए और उन्होंने सिरमोर रियासत में  एक गुरुद्वारा बनाया जिसका नाम पोंटा साहेब रखा गया --यहाँ गुरूजी ने 'जाप साहेब','सवैया ',और 'अकाल-स्तुति 'जेसी काव्य रचनाए लिखी --
   
गुरूजी यहाँ ढाई साल रहे --जिस घर में वो रहते थे वो लकड़ी का बना है  जो आज भी मोजूद है --और वहा 'बीड-साहेब' रखी है --गुरूजी को यहाँ का शांत वातावरण इतना भाता था की सारी-सारी रात कवि- दरबार सजता था --दूर -दूर से कविगण आते थे और अपनी रचनाए सुनाते थे और गुरूजी  कीमती उपहार देकर उनकी होसला -अफजाई करते थे --उनके पुत्र साहबजादे अजितसिंह का जन्म भी इसी पावन-भूमि पर हुआ ---बाद में फिर वे आनंद पुर साहिब लोट गए --

हमारी बस काफी दूर खड़ी थी--हम सब पैदल ही वहाँ चल दिए-- रास्ते में यमुनाजी का पुल पार कर के बस में बेठ गए --आगे की यात्रा के लिए --     

(यमुना नदी का पुल निशा,मै,रेखा और विमला ) 

सुबह १० बजे हम पोंटासाहिब से रवाना हुए --पर्वत- श्रंखलाए शुरू हो गई थी सारा रास्ता आलोकिक सोंदर्य से भरा पड़ा था --ऊँचे -ऊँचे पहाडो की चोटिया जिन्हें देखकर मै आनंद -विभोर हो जाती हु --खुबसुरत झरने --ठंडी हवा के झोके --बलखाते  पहाड़ी रास्ते--खुबसुरत जंगली फूल--और उनसे आती मदहोश कर देने वाली खुशबु --छोटे -छोटे ग़ाव !सर पर लकड़ी का गठर उठाए पहाडीने उनके साथ लम्बे बालो वाले छ्बरिले कुते ! क्या बात है यह एक भुक्त भोगी ही जान सकता हे दिल चाहता हे यही एक झोपड़ी बना कर रहू --कितना सुकून है यहाँ !एक फ़िल्मी गीत याद आ रहा है ---
                " ये हंसी वादियाँ ये खुला आसमा 
                   आ गए हम कहाँ ऐ मेरे साजना  "                 


(मन मोहक द्रस्यावली )


(क्या लुभावना द्रश्य है )


(पोंटा साहेब से श्रीनगर जाते हुए) 

पहाड़ो के ऊपर से देखने पर नीचे का द्रश्य यू प्रतीत होता है--मानो हम स्वर्ग में प्रवेश कर रहे है --(पर --मै स्वर्ग वासी नही --?) रास्ते में  सात प्रयाग आते है केशु ,सोन,देव,रूद्र ,कर्ण ,नन्द प्रयाग और विष्णु प्रयाग---यह प्रयाग अलकनंदा -भागीरथी -मन्दाकिनी और दूसरी नदियों के संगम पर है--हर संगम पर मन्दिर बने हुए है -- पहाड़ी घरो से निकलती सीढियां नीचे नदी के घाटो तक जाती हुई बहुत सुन्दर प्रतीत होती है-- उस पर रस्सी के बने झुला-पुल  जगह -जगह दिखाई देते है सारा द्रश्य स्वपन -सा जान पड़ता है --     


(देव प्रयाग का लुभावना द्रश्य ) 

(देव- प्रयाग अलकनंदा-भागीरथी का संगम --यह वो स्थान है जहां भगवान विष्णु ने बाली से तीन कदम भूमि मांगी थी )
  
अगला पड़ाव था हमारा श्रीनगर !यह श्रीनगर जम्मू -कश्मीर का नही है यह उतराखंड का श्रीनगर है यह शहर अलकनंदा नदी के किनारे बसा है --यह एक प्राचीन शहर है --बद्रीनाथ,केदारनाथ,गंगोत्री ,यमुनोत्री और हेमकुंड साहेब की यात्रा करने वाले तीर्थ यात्री यहाँ विश्राम करते है --यहाँ एक छोटा -सा गुरुद्वारा भी है --कभी गढवाल के पवार राजवंश के राजाओ की श्रीनगर राजधानी हुआ करती थी --इसलिए यह शहर सांस्कृतिक गतिविधियों का  केंद्र भी रहा है--यहाँ कमलेश्वर /सिध्देश्वर मंदिर है जहां असुरो के साथ संग्राम हुआ था तो भगवान विष्णु को शंकर जी ने सुदर्शन चक्र दिया था  

शाम को ५बजे हम श्रीनगर पहुँच गए--यहाँ का गुरुद्वारा बहुत छोटा है इसलिए हम ' गढवाल -विश्रांति गृह' में ठहरे --शाम को फ्रेश होकर गुरूद्वारे गए --वहाँ कीर्तन -शब्द का रस बरस रहा था --हम वही रम गए --    


(शबद का रस बरस रहा है ) 
                 
  रात को लंगर खाया और कुछ देर गप्पेमारी --यहाँ ठंडी बहुत है हमने स्वेटर निकाल लिए है --कुछ जरूरत के कपड़े घोए और पंखे में सूखने डाल     दिए--देर रात नींद आ ही गई--कल गोविन्द -घाट पहुंचना है --

जारी ---           

( यदि कोई गलती हो तो मुझे जरुर बताए :--दर्शन ! ) 

सोमवार, 7 मार्च 2011

तपोभूमि श्री हेमकुंड साहिब ! ( 1 )






( तपोभूमि श्री हेमकुंड साहिब )




    
  (  आज आपको अपनी २००8 की हेमकुंडसाहिब की आलोकिक यात्रा का वर्णन बता रही हु चलिए ---)   


 8 सितम्बर 2008 

आज हम वसई गुरूद्वारे के जत्थे के साथ हेमकुंड साहिब की यात्रा पर निकल रहे हे --मेरे साथ मेरी कुछ सहेलियां है  और उन सबमे विशेष सखी  रेखा है ---

बांद्रा-टर्मिनस से शाम ५बजे हम 'गरीब -रथ 'से दिल्ली के लिए रवाना हुए ..सफ़र बड़ा ही सुहाना था --सब जाने -पहचाने चेहरे थे --हमारे जत्थेदार थे चड्डा सा.,उनकी तरफ से ही खाने-पिने का इंतजाम था --हमने सिर्फ किराया ही अदा किया हे बाकि इंतजाम उनका ही हे  --वो पिछले १० सालो से संगत को हेमकुंड साहेब की यात्रा करवा रहे हे ---


9 सितम्बर 2008 
       
दिन के ११बजे हम दिल्ली पहुंचे --स्टेशन के बाहर ही हमारी तीन बसे खड़ी थी --उसी में सवार हम दिल्ली के निजामुद्दीन गुरुद्वारे पहुंचे --इस गुरूद्वारे का नाम हे 'मजनू का टीला' क्यों हे पता नही ?

( निजामुद्दीन गुरुद्वारा ,दिल्ली ) 



दोपहर १ बजे हम फ्रेश होकर गुरूद्वारे के दर्शन करके ,लंगर खा- पी कर चल पड़े आगे की यात्रा पर --
दिल्ली में बहुत गर्मी हे --गर्मी के कारन कुछ समझ में नही आ रहा है --रास्ते में एक रिसोर्ट पर रुके जहां हमने चाय - नाश्ता किया --कुछ फोटो खिचवाए --
            

(एक रिसोर्ट का चित्र ) 


(रिसोर्ट में बनी एक मूर्ति के साथ मै ) 



रिसोर्ट से हम एक घंटे बाद निकले --बहुत अच्छा था ,थोड़ी गर्मी से राहत मिली --हमारी बस हरिद्वार पहुंची हम थोड़ी देर बाज़ार में  रुके,हमारे जत्थेदार चड्डा सा. को कुछ काम था --वहां से सीधे बस ऋषिकेश पहुची --हम ऋषिकेश गुरूद्वारे पहुंचे --लंगर हमे यही करना था --पर यहाँ  रुके नही फटाफट  लंगर खाया और  चल दिए--अब ऋषिकेश वापसी में रुकेगे--

ऋषिकेश का इतिहास :--

ऋषिकेश को आप हिमालय का प्रवेश द्वार कह सकते है--1360फीट की उचाई पर स्थित यह सबसे पवित्र तीर्थ स्थल है-यहाँ से केदारनाथ,बद्रीनाथ    गंगोत्री -यमुनोत्री,हेमकुंड साहेब   का सीधा रास्ता है --
कहते है की भगवान शिव ने जो जहर समुन्द्र -मंथन में पीया था यह वही स्थान है --श्री राम ने वनवास में इसी स्थान का भ्रमण किया था --तब रस्सी से एक पुल  का निर्माण किया था उसे अपने अनुज लक्ष्मण का नाम दिया और यही  पुल लक्ष्मण -झुला कहलाता है --इसका पुनह निर्माण 1939ई में हुआ --यह झुला 450 फिट लम्बा है और बीच में से हिलता हुआ प्रतीत होता है --इस के नजदीक ही राम -झुला भी है --यहाँ काफी मात्रा   में मंदिर और आश्रम बने हुए है --भोलेनाथ की यहाँ बड़ी -बड़ी प्रतिमाए बनी है ,,,,                                                                    

 अब हमें रात होने से पहले पौंटासाहेब पहुंचना है --आज रात वही रुकने का प्रोग्राम है --आगे पहाड़ों की श्रंखलाए भी  शुरू हो गई--निचे बहती नदिया   और ऊपर हम ! कभी हम नीचे और कभी ऊपर ऊँचे -ऊँचे पहाड़!              




(बस से उतारा चित्र )


(रास्ते के द्रश्य )
  
उतराखंड को भगवान शिव की पहली पसंद कह सकते है --रास्ते की सुन्दर द्रशावली देखते हुए समय का कुछ पता ही नही चलता है-- रात होते ही यह पहाड़ जो दिन की रौशनी में इतने सुन्दर जान पड़ते है रात होते ही भयानक नजर आते है --पहाडो पर दिन के उजाले में ही अपने गतव्य स्थान पर पहुँच जाना चाहिए --रात को सफ़र भी करना ठीक नही है --

अब हम उतराखंड से हिमाचल प्रदेश जा रहे है---
  
हम रात के ११ बजे पौंटा साहेब पहुंचे --हमारी बस को एक किलो मीटर दूर खड़ी कर दी क्यों पता नही ? हमारा सामान बस में ही था --सिर्फ एक ड्रेस रख ली थी सुबह पहनने के लिए --रात को कोई सवारी भी नही मिली इसलिए हम पैदल ही गुरुद्वारे चल दिए --ठंडी हवा के झोके नींद की झपकिया ला रहे थे- ऐसा लग रहा था की कोई यही बिस्तर लगा दे --और हम गहरी नींद में सो जाए --
गुरुद्वारे पहुच कर सबसे पहले सबने लंगर खाया --भूख नही थी फिर भी थोडा -सा खा लिया --बस अब सोने को मिल जाए --हमारे कमरे दूसरी मंजिल पर थे --थकान से सबका बुरा हाल था--आज की जर्नी सबसे लम्बी थी --रेस्ट भी नही मिला था --

कल हम श्रीनगर रुकेगे -

जारी ---