मेरे अरमान.. मेरे सपने..


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गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

समुंदर का मोती







वो  समुंदर का मोती था ...सीप उसका घर था ..
बाहरी  दुनियाँ से वो अनजान था .....
अपने दोस्तों से उसको बहुत प्यार था ...
कुर्बान था वो अपनी दोस्ती पर ,
मस्त मौला बना वो गुनगुनाता रहता था ...
दोस्तों के छिपे खंजर से वो अनजान था ..

एक दिन उसने दोस्तों का असली रूप देखा ..
दिल टूट गया उसका ..
एक भूचाल -सा आ गया उसके जीवन में ..
वो अंदर तक तिडक गया ...
फिर भी वो शांत रहा ...
शांति से निकल गया दूर बहुत दूर ...
इस स्वार्थी दुनिया से परे ...
अपनी छोटी -सी दुनियां में ...
जहाँ वो आज खुश है ...पर -----

"दिल पर लगी चोट कभी -कभी हरी हो  जाती है ..
खून बहने लगता है ...कराहटे निकलने लगती है ..."
                                                


शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012

चेतावनी ..!!!









कीर्ति शर्मा ....https://www.facebook.com/profile.php?id=100004243329104


कल यह मैंनें अपनी फेसबुक वाल पर अपडेट किया था ....


यह औरत ...जो अपने आपको बहुत बड़ा ब्लोग्गर कीर्ति शर्मा बताती हैं ...मुझे कई दिनों से मानसिक यान्त्रना दे रही हैं ...मुझे गंदे मेसेज भेजती हैं ...फेसबुक पर मेरे कमेंट पर गंदे ताने देती हैं ...मुझसे क्या दुश्मनी हैं  पता नहीं ?  इसने कई बार मेरे जी-मेल पर  मेरे बच्चों के जी -मेल पर मेरी इज्ज़त खराब करने की कोशिश की हैं ..इसे; मैं और मेरे दोस्त ब्लाक कर चुके हैं ... फिर भी पता नहीं कैसे मेरी वाल पर आ जाती हैं     


 यह आज फेसबुक पर अपडेट किया है ....

मेरे अजीज दोस्तों ! आप सभी का तहे दिल से धन्यवाद ...यह औरत बाज नहीं आई अपनी हरकतों से इसने रात को मुझे पुरानी किसी पोस्ट पर फिर से गन्दी बाते लिखी .. मेरे दोस्त सुनील खत्री जी ने मुझे सूचित किया और  मैने देखा तो मैने वो पूरी पोस्ट ही डिलीट कर दी ..जहाँ से यह अपना गन्दा काम करती थी ...मेरे बच्चो की वाल पर ! मेरे भतीजे की वाल पर ! इसने मुझे गंदे कमेंट लिखे .....


मेरे कई और दोस्तों ने बताया की यह औरत उनसे भी गलत बाते करती थी  जिसके कारण उन लोगो ने भी इसे डिलीट कर दिया ...मेरे एक दोस्त ने बताया की यह अपने आपको --" डॉ. रूपचंद शास्त्री जी" की छोटी बहु बताती हैं अब क्या सच्चाई है यह तो वो ही जानते है ...वो एक बड़े सम्मानित ब्लोगर हैं और मुझे नहीं लगता की यह बात सच होगी ..यह अपने आप को बहुत बड़ी ब्लोगर भी बताती है जबकि मैने सब जगह देख लिया पर इसका कोई ब्लॉग मुझे नजर नहीं आया ...न फोटू  न कोई और आई डी ? सिर्फ जनम का साल लिखा है 1991 इतनी कम उम्र वाली ऐसे पैतरे नहीं दिखा सकती .. इसीलिए मुझे लगता है की यह कोई बड़ी उम्र का आदमी है जो मुझसे किसी बात का बदला ले रहा है ...अब आप खुद फैसला करे  ...धन्यवाद ! 
यदि इसका कोई ब्लॉग आप किसी ने देखा है तो मुझे बताये ...धन्यवाद !



गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

गुस्ताखी माफ़ ...





दोस्तों !!! काफी दिनों से आपसे दूर रही हु ...कम्प्यूटर  की खराबी की वजय से ....जल्दी ही आपसे मिलूगी .....दर्शन @

रविवार, 26 अगस्त 2012

मैं और मेरे पापा




" मैं और मेरे पापा "

(स्व. सरदार रणजीत सिंध धालीवाल ) 


(यह बात मेरी ही नहीं हम सब की है )

* जब मैं 3 वर्ष की थी तब मैं सोचती थी की :----
 "मेरे पापा दुनियां के सबसे मजबूत और ताकतवर व्यक्ति  हैं...वैसे भी वो पुलिसमेन ही थे ... 

*  जब मैं 6 वर्ष की हुई तब मैंने महसूस किया की :----
"मेरे पापा दुनियां के सबसे ताकतवर इंसान ही नहीं ,समझदार व्यक्ति भी हैं ...

* जब मैं  9 वर्ष की हुई तब मैंने महसूस किया की :----
" मेरे पापा दुनियां के सबसे ज्ञानी आदमी है क्योकि उन्हें हर चीज़ का ज्ञान है  ....

* जब मैं 12 वर्ष की हुई तब मैंने महसूस किया की :----- 
"मेरी सहेलियों के पापा मेरे पापा से ज्यादा समझदार और फ्रेंडली हैं ...

* जब में 15 वर्ष की हुई तब मैंने महसूस किया की :----
" मेरे पापा को दुनियां के साथ चलने के लिए कुछ और ज्ञान की जरुरत हैं ,वो उतने समझदार नहीं है जितना मैं समझती थी ....

* जब मैं 20 वर्ष की हुई तब मुझे महसूस हुआ की :----
मेरे पापा किसी और दुनियां के जीव  हैं और वे मेरी सोच के साथ नहीं चल सकते .....हम दोनों की सोच  में बहुत अंतर है ...

* जब मैं 25 वर्ष की हुई तब मैंने महसूस किया की :----
मुझे किसी भी काम के बारे में अपने पापा से कोई सलाह नहीं लेनी चाहिए, क्योकिं उन्हें मेरे हर काम में कमी निकालने की आदत -सी पड़ गई है ......

*जब मैं 30 वर्ष की हुई, तब मुझे महसूस हुआ की :---
मेरी संगती में रहकर शायद मेरे पापा में कुछ समझ आ गई हैं ...और वो कुछ समझदारी की बाते करने लगे हैं ......

* जब मैं 35 वर्ष की हुई तब मैं महसूस करने लगी की :----
मेरे पापा उतने ना- समझ नहीं है ...मुझको  मेरे पापा से छोटी - मोटी बातों के बारे मैं सलाह  लेने  में कोई हर्ज नहीं है  .... 


* जब मैं 40 वर्ष की हुई ,तब मैंने महसूस किया की :---

मुझे मेरे पापा से कुछ जरुरी मामलो में सलाह-मशवरा ले लेना चाहिए ...वो कुछ समझदार हो गए है ...


* जब मैं 50 वर्ष की हुई, तब मैंने फैसला किया की :---

मुझे अपने पापा की सलाह के बिना कुछ काम नहीं करना चाहिए, क्योकिं अब मुझे यह ज्ञान हो  चुका  था की मेरे पापा दुनियां के सबसे समझदार और सबसे ज्यादा प्यार करने वाले व्यक्ति हैं .....।


* पर इससे पहले की मैं अपने फैसले पर अमल कर पाती , मेरे प्यारे पापा इस दुनियां  को अलविदा कह कर जा चुके थे और मैं अपनी बेवकूफी के रहते उनकी हर सलाह और तजुर्बे से वंचित रह गई थी ...


"आई मिस यू  पापा "

  
मेरे पापा मेरी शादी में फूलो की माला पहनाते हुए   




*कविता में मेरे संवाद महज काल्पनिक है |

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

जिन्दगी मिलेगी नहीं दुबारा





 * जिन्दगी नहीं मिलेगी दुबारा *


जिन्दगी मिलेगी नहीं दुबारा 
 यु ही कट जायेगी बिन सहारा 
  कभी पैसो का जुगाड़ करते हुए ..
 कभी यू ही खाली पेट सोते हुए ...
जिन्दगी यू ही गुजर जायेगी ...

कभी  बेटी की फ़ीस भरते हुए ....
कभी बेटे की जींस सीते हुए....
कभी ख्वाबों को टूटते हुए ...
कभी तारों को गिनते हुए .... 
जिन्दगी यू ही गुजर जाएगी ..... 

कभी एक कतरा धुप को तरसते हुए ...
कभी एक साडी को तकते हुए ...
कभी सोने की चमक से चुंधियाते हुए ...
कभी रात को लट्टू की रौशनी में नहाते हुए ...
जिन्दगी यू ही गुजर जायेगी ....


कभी सड़कों पर दौडती कारों को देखते हुए ...
कभी नन्ही -आँखें साइकिल को तरसते हुए ..
कभी होटलों से ठहाकों को सुनते हुए ...
कभी एक 'वडा - पाव ' खाते हुए ....
जिन्दगी यू ही गुजर जायेगी ....


कभी एक परिवार को खोते हुए ...
कभी आपस में झगड़ते हुए ....
कभी पराया प्यार छिनते हुए ....
कभी अपनों की ही बलि लेते हुए ...
जिन्दगी यू ही गुजर जायेगी ...

कभी दूध के जुगाड़ में रोते हुए ...
कभी हवस की प्यास बुझाते हुए ...
कभी परिवार को पालते हुए ...
कभी चंद नोटों पर नाचते हुए ...
जिन्दगी यू ही गुजर जायेगी ...

कभी रात -भर कपड़ों को  सीते हुए ...
कभी रात- भर पहरा देते हुए ...
कभी अपनों के लिए रोते हुए...
कभी उम्मीदो के लिए तरसते हुए ... 
जिन्दगी यू ही गुजर जायेगी ...

कभी आंसुओ को पीते हुए ....
कभी हंसी को छिपाते हुए ...
कभी गम को ढोते हुए ... 
कभी ख़ुशी में भी रोते हुए ...
जिन्दगी यू ही गुजर जायेगी ...



कुछ इस तरह से गुजर गई  जिन्दगी जैसे ---
                ता -उम्र किसी दुसरे के घर में रहे हो जैसे ----अज्ञात !




शनिवार, 4 अगस्त 2012

जन्मदिन......


जन्मदिन


निक्की का पहला जन्म दिन 
4 मार्च 1990

पंजाबी में निक्की का मतलब होता हें--'छोटा '--हर पंजाबी घरो में एक निककी  या एक निक्कू मिल जाएँगे--
निक्की का २२ वा  जनम दिन हैं ---हमारे पुरे खानदान में वो बहुत लाडली हैं ..पर मुझे याद आ रहा हैं वो दिन जब निक्की इस धरा पर जन्मी भी नही थी ....???
मैं तीसरे बच्चे के एकदम खिलाफ थी --मेरा पूरा परिवार बन चूका था --इसे मैं किसी भी हालत  में नहीं चाहती थी   ..मैने बहुत कोशिश की पर सफल नही हुई --वो कहते है न --'जाको राखे साईयाँ ,मार सके न कोई '--ठीक यही  हाल निक्की के साथ भी हुआ ---???
उसके जनम की मुझे कोई ख़ुशी नहीं हुई --यहाँ तक की मैने उसकी शक्ल भी नही देखी ! अपना मुंह फेर लिया .. डॉ ने बहुत  कहाँ की आप एक नन्ही बेटी की माँ बनी हैं ...पर मुझे अच्छा ही नही लग रहा था ...     
लेकिन ,२दिन बाद एक अजब वाकिया हुआ ..जिसने मेरा मन ही बदल दिया ----   
२ दिन बाद मैं निक्की को लेकर घर आ गई --दिल में कोई ख़ुशी नही थी --मन थोडा उदास था --पर पतिदेव बहुत खुश थे--उनको वैसे भी लडकियों से जरा ज्यादा ही लगाव हैं ..... 

रात को करीब १० बजे निक्की की साँसे उखड़ने लगी --नब्ज बहुत स्लो चल रही थी--हम घबरा गए --तुरंत उसे नर्सिग होम  डॉ के पास लेकर गए --डॉ ने चेक किया और कहा --'आपने इसे कुछ खिला दिया हैं --आप इसे नही चाहती थी न ' ??? मैं  हेरान रह गई --बात तो ठीक थी पर, मैने उसे कुछ नही खिलाया था सिर्फ शहद चटाया था ?मैने उससे  कहा --पर वो मानने  वाली नही थी --  बोली -- 'पुलिस कम्प्लेंट  तो करवानी पड़ेगी हम कुछ नही कर सकते ...'  
 मैने बहुत कहा-पहचान वाली डॉ थी, थोडा पसीजी ! बोली-- 'आप इसे बाम्बे ले जाए बच्चो के सरकारी  हास्पिटल  में ,यहाँ हम कुछ नही कर सकते--मैं चिठ्ठी लिख देती हूँ  ...!' हालाकि मैं  बहुत डर गई थी  और इसी कारण मैने उसे यह नहीं बताया की मैने उसे थोड़ी सी अफीम भी चटाई हैं --हमारे यहाँ रिवाज है की बच्चे को थोड़ी सी अफीम भी चटाते हैं ताकि वो आराम से सो सके और पेट की गंदगी भी निकल सके ...शायद मैने नासमझी में थोडा -सा डोज ज्यादा दे दिया होगा ....
खेर, रात ३ बजे हम वसई से टेक्सी कर ग्रांड रोड स्थित वाडिया हास्पिटल चल पड़े --हमे २ घंटे लग जाना था ....रास्ते भर  उस नन्ही सी जान पर बहुत तरस आता रहा..मेरा हाथ उसकी नब्ज पर ही था और मैं अपने आप को कोस  रही थी की मेरी वजय से इस नन्ही -सी जान पर यह कयामत टूटी हैं ..मैं मन ही मन   भगवान् से अपने किए की माफ़ी मांग रही थी ..मेरी मनहूस इच्छा ये मासूम बच्चा भुगत रहा था --डॉ को तो समझ आ गया था की कुछ खिलाया जरुर हैं ? पर मैं उसे बतला नही सकती थी..? मैं खुद डर गई थी ..उपर से २दिन की जच्चा !  बहुत कमजोरी महसूस कर रही थी ..लेंकिन अपनी कमजोरी को नजरंदाज कर मैं निक्की के प्राणों की भीख मांग रही थी ...माँ की ममता की आखिर जीत हुई ..

हम वाडिया हास्पिटल पहुंचे तब तक सुबह हो चुकी थी ..वो काली अमावस्या की रात बीत चुकी थी ---निक्की भी अब नार्मल साँसे ले रही थी ---शायद अफीम का असर खत्म हो चूका था --हमने OPD में दिखाया तो डॉ बोला यह नार्मल हैं --?आप घर जा सकते हैं ...
 मेरा ख़ुशी का ठिकाना नहीं था ..आँखों में ख़ुशी के आंसू थे --हम वापस घर चल पड़े ...
भगवान् ने मुझे एक करार झटका दिया था ?

मेरी  उसी बेटी का आज  जनम दिन हैं ...निक्की बहुत समझदार और हुशियार लडकी हैं ...हमारे घर की रोंनक और सबकी चाहती ...
   
आज उसको एक कविता रूपी भेट देना चाहती हूँ :--


" एक अजन्मी बेटी की इल्तजा "

ओ माँ मेरी !मुझे कोख मैं न मार 
मुझे देखने दे यह प्यारा संसार 
तेरी गोद में मुझ को रहने दे 
कुछ पल मुझे और जीने दे 
ओ माँ मेरी ..
मुझे तुझ से कुछ और नही लेना हैं 
बेटी होने का अधिकार मुझको देना हैं 
क्यों तू मेरा गला घोट रही हैं
ओ माँ मेरी . ..
तू भी तो एक माँ की जननी हैं 
देखने यह संसार आई हैं 
फिर क्यों मेरा वजूद मिटाने चली है
ओ माँ मेरी ...
मुझे मारकर तुझे क्या मिलेगा !
बेटियां तो होती हैं घर का गहना ! 
 ओ माँ मेरी ...
मारकर मुझ को तू क्या करेगी 
यह दंड तू सारे जनम भरेगी 
इस निठुर समाज के लिए 
तू मुझे यू न उजाड़ 
ओ माँ मेरी ...
अपनी कोख को तू कब्रस्तान न बना 
मुझे इस कब्र में जिन्दा न दफना 
सुन ले मेरी चीख -पुकार 
ओ माँ मेरी ...
यह कैसा समाज है माँ !
यह कैसा रिवाज है माँ !
पुत्र जन्मे तो चाँद चढ़ जाए 
पुत्री जन्मे तो अधियारा घिर आए 
यह कैसा इन्साफ हैं माँ ?
यह कैसा समाज है माँ ?
तू इन कसाइयो में क्यों मिल गई 
ओ माँ मेरी ..
कर ले मेरी मौत से तोबा !
मैरी जिंदगी से गर्व तुझे होगा !!
ओ माँ मेरी ...





पुत्रियों को न  मारो करो  इस बात से तौबा !
क्योकि यह होती  हैं  हमारे घर की शोभा  





रविवार, 22 जुलाई 2012

नैनीताल भाग --11......रोप - वे


नैनीताल भाग --11 

रोप - वे यानी केबल -कार 



"साथ हमारा पल -भर ही सही ...
इस पल जैसा मुक्कमल कोई कल नहीं ..
हो शायद फिर मिलना हमारा कहीं---
तू जो नहीं तो तेरी यादें संग सही ...."




14 मई 2012 

हम तारीख 9 मई से मुंबई से निकले हैं ..आज 14 तारीख है ..हम वापस नैनीताल जा रहे है ..यह नैनीताल -यात्रा की आखरी कड़ी है .....

सुबह शर्माजी की मेड ने हमारे लिए आलू के परांठे बना दिए थे  .. वो तो नीचे अपने बैंक में चले गए थे ..हम परांठे खाकर, तैयार हो नैनीताल को चल दिए ..शर्माजी का धन्यवाद किया इतने बढियां अथिति -सत्कार पर .. यहाँ भी हमें  कोई डायरेक्ट नैनीताल नहीं ले जा रहा था , कोई 3 तो कोई 4 हजार रु माँग रहा था ..फिर मंगल सिंह जी ने अपने एक आदमी को हमारे साथ नैनीताल भेजा रु. 2000 हजार मैं ...मंगल सिंह जी कल के भी पैसे नहीं ले रहे थे ,बड़ी मुश्किल से हमने उन्हें सिर्फ पेट्रोल के 1000 हजार रु. दिए जो की बहुत ही  कम थे ...सब से विदा लेकर हम चल दिए नैनीताल वापस..... 

सुबह हम सोमेश्वर से  निकले तो शाम को 3 बजे  नैनीताल  पंहुँच गए ....रास्ते में एक जगह रुके जहाँ मंगल सिंह जी के आदमियों ने खाना खाया...हम तो सुबह परांठे  खाकर निकले थे .. हमने कुछ नहीं खाया ..रास्ते में मेरा मोबाईल बंद हो गया जिसके कारण मैं  किसी से बात नहीं कर सकी ..नैनीताल में वापसी में शास्त्रीजी से मिलने की इच्छा थी,पर नंबर न होने की वजय से बात नहीं हो पाई .. कमलेश और उनके दोस्त का शुक्रियां अदा नहीं कर  पाई हम नैनीताल में 3 बजे उन्होंने हमें वापस होटल जग्राति छोड़ दिया...हमारा रूम रेडी था ..कल हमने कौसानी से ही बुक करवा लिया था ..हम फटाफट तैयार हुए और चल दिए रोप -वे पर केबल कार में घुमने .....


शाम का समय और बढ़िया नजारा 



मालरोड की शानदार तफरीह  


खड़े है सडक किनारे कोई तो लिफ्ट देगा हा हा हा हा  


केबल -कार यानी रौप -वे जाने का मार्ग 





दूर बहुत दूर से दोनों केबल कारे ..दिखाई दे रही है ..आते हुए और जाते हुए ..

खुबसूरत द्रश्य ..दूर से लिया चित्र 

केबल -कार तक पहुँचने  का मार्ग 


लो ....वो आ गई ...अब हम चलते है इसमें बैठकर ..ऊपर की तरफ 




यह ..उड़न -तश्तरी है ..यानी केबल - कार इसका टिकिट है --बच्चों का 100 रु और बड़ों का 150 रु ..यह स्नो -पाइंट  तक जाती है ...जो 2270 मीटर्स है ...इसमें 10 लोगो के बैठने की व्यवस्था है ....इसका टिकिट  नीचे से ही मिलता है ..वो कहते है की एक घंटा रूककर वापस आ जाए ..पर आप जब तक इच्छा हो वहां धूम सकते है ....कहते है की सीज़न में यहाँ 2-3 दिन तक नंबर नहीं आता ..लोग आते ही यहाँ नंबर लगा लेते है फिर आराम से नैनीताल घूमते है ...और जब नंबर आने वाला होता है तो उन्हें कन्फर्म कर दिया जाता है .. वैसे इस तरह की केबल -कार में हम पहले भी बैठे थे .. 



उडन- तश्तरी  में सवार ..हम दोनों ..बड़ा ही रोमांचकारी सफ़र है ..




उपर से  लिया गया नैनीझील  का व्यूह 


बाहर निकलते हुए ..आप 2-3 घंटे यहाँ धूम सकते है और जब इच्छा हो वापस लौट सकते है 





यहाँ से नैनीझील का बहुत ही सुंदर द्रश्य  दिखाई देता है ..इसी लिए इसे लेक -व्यु कहते है  


लेक- व्यू  से नीचे  का नजारा ..खतरनाक ढलान 


सामने जो छोटा -सा टीला दिख रहा है ...वहां से हिमालय -दर्शन होते है ..पर आज बादलों की वजय से कुछ दू दिखाई नहीं देगा इस कारण मैं ऊपर नहीं चढ़ी ...बच्चें जाकर देख आये ..हम  वही मैंगो शेक पीने  बैठ गए  



सामने जो हैण्डलूम  की दूकान है ..वहाँ से हमने कश्मीरी कढाई  के कुछ सूट  ख़रीदे 



स्नो -व्यू  जाने का  बड़ा गेट ..अंदर बच्चो के खेलने के लिए काफी  खेल  है  



यह है स्नो -व्यू में  एक मंदिर  

मंदिर का पिछला हिस्सा ..यदि मौसम अच्छा  होता तो मेरे पीछे हिमालय- व्यू दिखाई देता ..


खुबसूरत जंगल स्नो -व्यू का ..पर हिमालय दर्शन नहीं हुए 



और अब केबल- कार से वापसी ..नैनीताल शहर का नजारा ..

नीचे उतारते हुए  नैनीझील का द्रश्य और पास ही क्रिकेट का मैदान 


दोपहर  को हम नीचे उतर गए वापसी के लिए  

खुबसूरत यादगार ..चीड के फूलो का गुलदस्ता 

आज ही हमारा वापसी का टिकिट था  .. मन तो वापस जाने का  नहीं था ,इन हसीं वादियों से भला कौन वापस जाना चाहेगा ... हम माल रोड से  वापस अपने होटल में  आ ही रहे थे की एक कार वाले ने हमें कहा की काठगोदाम चलना है क्या ? हमने पैसे पूछे तो उसने कहा 400 रु ...बस हमने 5 बजे आने का कहा और हम खाना खाने चल दिए ...आज रात को 9.30 बजे हमारी गाडी रानीखेत एक्सप्रेस थी ..कुछ शापिंग की ..दोस्तों के लिए उपहार ख़रीदे ..कुछ कपडे ख़रीदे ..और वापसी .....नैनीताल सलाम  फिर दोबारा आयेगे ..क्योकि अभी बहुत कुछ छुट गया है देखने को ...


हमारा ड्रायवर बहुत नेक इंसान था ..वो आराम से हमें लेकर आया ..बातूनी भी बहुत था ...काठगोदाम का ही रहने वाला था ,हमारे पास टाइम बहुत था ..रास्ते में चीड  के फल बहुत गिरे हुए थे उन्हें बच्चे उठा लाये ...तेजपत्ते के पेड से बहुत से ताजा तेजपत्ते तोड़े ...रास्ते के रेस्टोरेंट से चाय -पकोड़े खाते हुए हम काठगोदाम वापस लौट आये .....

काठगोदाम के ऐ. सी. वेटिंग -रूम में ट्रेन का इन्तजार 


" काश, जाते वक्त को हम रोक पाते ....
गुजरे लम्हों को हम जोड़  पाते........ 
कितनी यादें है ऐ 'नैनीताल' जो तुने दी---
 काश, हम जिन्दगी को पीछे मोड़ पाते ....?"



शनिवार, 7 जुलाई 2012

नैनीताल भाग 10 कौसानी 2


नैनीताल भाग 10 -- कौसानी 2 


कौसानी की एक सुबह 


13 मई 2012:--






रात को हम ऐसे सोये की कुछ पता ही नहीं चला ...सुबह जल्दी तो उठना नहीं था क्योकि हमें मालुम था की सूर्योदय तो दिखाई देगा नहीं ?  पर फिर भी पहाड़ पर आओ और सुबह की सैर न करो तो पहाड़ पर आने का क्या मतलब कुछ मज़ा नहीं आता इसलिए सबको उठाया पर कोई उठने को तैयार ही नहीं था आख़िरकार हरिजी को उठाया और चल पड़े पहाड़ घुमने को ...
बहुत ही खुबसूरत नजारा था ..पहाड़ों पर दूर तक सूरज की किरने मचल रही थी ..ठंडी भी बहुत थी मैने तो शाल ले रखा था पर बड़ा ही आन्नद आ रहा था ,अफ़सोस था सिर्फ फोटू का, सेल  डाउन होने के कारण फोटू खिंच नहीं सकी ..मोबाईल से ही कुछ फोटू खिंच पाई ....

कौसानी में लम्बे -लम्बे पेड बहुत ही सुंदर लग रहे थे ..ऊंचे -ऊँचे पहाड़ उस पर लहराते टेढ़े -मेढ़े रास्ते ..जब हम काफी दूर निकल गए तो वापसी के लिए चल पड़े ..अभी मैं पलट ही रही थी की कुछ लाल बंदरो के झुड पेड़ से कूद पड़े ..मैने सोचा की फोटू उतारू पर मोबाईल भी अपनी अंतिम साँसे ले रहा था ...इतने में अचानक एक बन्दर ने  मेरी  पीछे से टांग पकड ली .. 'अरेरेरेरेरे..मैं जोर से चिल्लाई, पर उसने मेरी टांग नहीं छोड़ी ..इतने में हरिजी जो थोडा आगे चल रहे थे पलटकर आए और दूर से एक और आदमी आ रहा था वो भी जोर से चिल्लाया तब उस नटखट बन्दर ने पीछा छोड़ा ...अब, हरिजी कहने लगे आप पर तो हनुमानजी की विशेष कृपा हो गई जी ..मेरा तो डर के मारे बुरा हाल था ..और हंसी भी आ रही थी ..हम  काफी देर तक हँसते रहे ... तब तक दुकाने खुल गई थी हमने एक दुकान में जाकर गरमा गरम चाय पी..और होटल लौट आये ...लाईट आ गई थी ..पहले सेल चार्ज करने रखे ....सारे मोबाईल भी रखे ... 

टेढ़े -मेढ़े  रास्ते 


ऊपर छोटा -सा लाल रंग का जो घर दिख रहा है वो अनाशक्ति आश्रम है 





सुबह का अलसाया चेहरा 


पर इधर आलस का नमो- निशान नहीं .. हमेशा की तरह खुश ..

यह है कविता विष्ट ..होटल की केयर टेकर-कम- रिसेप्शनिष्ट- कम- मालकिन ..हरिजी की इनसे दोस्ती हो गई ....और मेरी भी .... 


होटल  pine  और दूर खड़े बातूनी  हरिजी  ..बातो में मशगुल ...


हरी जी और मैं ----सुबह की सैर के बाद 


कमरे में आकर हम नहा धोकर निचे उतरे --मंगलसिंह जी आ गए थे --हमने सारा सामान  गाडी में रखवाया और नाश्ता करने निचे  रेस्टोरेंट में चल  दिए ...नाश्ता करके करीब 11 बजे हम चल दिए .. पाताल   भुवनेश्वर  देखने ...पाताल भुवनेश्वर  यहाँ से 70 किलो मीटर दूर है ऐसा मंगल सिंह जी ने बताया --हम दोपहर तक पहुँच जाएगे ऐसा उन्होंने बताया ... रास्ते में हमने काफी मस्ती की ..अन्ताक्षरी का दौर चला तो चलता गया ....हरी जी ने कुछ कविताएं सुनाई और मंगलसिंह जी ने वहाँ के गढ़वाली  लोक गीत सुनाये और साथ ही उन गीतों का अर्थ भी समझाया तो शमा बंध गया ...कैसे रास्ता कट गया पता ही नहीं चला .. पर शायद हमारी किस्मत में वहां जाना लिखा ही नहीं था, कैसे ? देखते है ....


यह है गरुड़  एक छोटा सा गाँव --यहाँ सिर्फ S B I बैंक ही है 



इस  जगह का नाम नहीं मालुम पर देखने से बहुत ही सुंदर गाँव लगा तो रुक कर कुछ फोटू खिंचवाए 


बहुत ही सुंदर जगह 


 चौकोड़ी गाँव 



मिस्टर और मंगलसिंह जी खाने में व्यस्त 



3 बजे हम चौकोड़ी गाँव पहुंचे ..कुछ भूख भी लग रही थी और इसके बाद खाना कहीं मिलना ही नहीं था सो,खाना खाने रुक गए  ..खाना ठीक ही था ...कढ़ी -पकौड़ी और चावल ..आन्नद आ गया ...शर्माजी कढ़ी नहीं खाते थे तो उन्होंने आमलेट खाया .. हमें यही 4 बज गए ..आगे की यात्रा के लिए हम फ्रेश होकर निकल पड़े ..चौकड़ी से चलने के बाद हमें पता चला की अभी तो हम आधे रास्ते में ही है और वहां तक पहुँचने में हमें शायद रात हो जायगी और रात को वहां रुकने की कोई जगह नहीं है ..हमें वापस चौकोडी ही आना पड़ेगा रात रुकने के लिए पर चौकोड़ी भी मेरे ख्याल से ज्यादा ठीक जगह नहीं लगी ...यह सब बाते हमको रास्ते में करीब 6 बजे मालुम हुई जब रास्ता बहुत खराब हो गया तो मिस्टर ने वापस चलने को कह दिया ..क्योकि उन्हें उल्टियां होने लगी थी इधर शर्माजी की तबियत भी खराब हो रही  थी और निक्की को भी धबराहट हो रही थी ..तो हम वापसी के लिए चल दिए ....सबकी राजी समझकर मैनें  भी वापसी के लिए हाँ  कर दी  ...

हम वापस लौट चले ..हमारी सबसे बड़ी गलती थी की हम सुबह देर से निकले फिर हमें ठीक से पातळ -भुवनेश्वर  की दुरी का पता नहीं था ..और बार -बार रुकने से टाईम की खराबी हुई जो अलग ..हमारा पूरा दिन खराब हुआ और हमने कुछ नहीं देखा ....खेर ऐसा होता है  ..पर उस दिन हमने बहुत आनन्द किया ...

रात को 10 बजे तक हम वापस शर्माजी के घर सोमेश्वर  आ गए "लौट के बुद्धू घर को आये " ......


सामने के होटल से शर्माजी ने खाना मंगवाया ...मेरा तो थकान से बुरा हाल था ...लेटते ही नींद आ गई ! सुबह और कई स्थानों की यात्रा का प्रोग्राम बनाया... पर बच्चों का मन ख़राब हो चूका था ..सबने एक ही स्वर मैं कहा वापस नैनीताल ही चलेगे ....और हम वापस नैनीताल को चल दिए ....

जारी ...