मेरे अरमान.. मेरे सपने..


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शुक्रवार, 3 मार्च 2017

लवासा ( Lawasa)



लवासा 
महाराष्ट्रा सरकार द्वारा  बनाया हिलस्टेशन 



लवासा (मराठी नाम )

10 -12  -16   पूना 

2 दिसम्बर  को अपनी  बेटी के घर  पूना गई थी पूना  के कई ऐतिहासिक जगह पर घूमकर आखिर में 10 तारीख़  को लवासा घूमने का प्रोग्राम बनाया , दामाद ने अपनी नई आई टेन i 10 गाडी को तेल पानी पिलाया  और हम सुबह नाश्ता करके निकल पड़े लवासा हिलस्टेशन देखने ,,,,,
दिसम्बर का महीना सुबह ठंडी ठंडी हवा में हमारा कारवां बढतारहा ,,,, बॉम्बे के मुकाबले  पूना थोड़ा ठंडा है पर इतना भी नहीं की स्वेटर लादना पड़े सिर्फ एक शा ल से काम  चल गया । 

 लवासा पुणे के पास वरसगांव बांध  / जलाशय के पीछे बाज़ी पासलकर जलाशय के किनारे पश्चिमी घाट में स्थित  है  पुणे से 50 किलो मीटर दूर बसा  है लवासा ।  ये पुणे से 80 मिनिट में पहुंचा जा सकता है । बॉम्बे से ये 180 किलो मीटर के करीब पड़ता  है जो आप 3 घण्टे की दुरी से आराम से पहुँच सकते हो | 

यह शहर वरसगांव बाँध और जलाशय को  चारो  और से घेरने वाली आठ बड़ी बड़ी पहाड़ियों की गोद  में स्थित है बहुत ही सुंदर तरीके से इसको बसाया है आजादी के बाद बना पहला हिल स्टेशन है लवासा;जो महाराष्ट्रा गवर्मेन्ट का ड्रीम प्रोजेक्ट है ।यह प्लान से बना हिल स्टेशन है जो 25 हेक्टर्स मैं फैला है यानि 100 किलो मीटर में फैला है इस पर अब तक  करीब   50 अरब रूपया खर्च हो गया है । और ये अब भी बन रहा है।कहते है ये 2021 में पूर्ण होगा । यहाँ 1000  बंगले और 500 फ्लेट बनकर तैयार है यह प्रोजेक्ट अमेरिकन कम्पनी के साथ  मिलकर हिंदुस्तान कन्ट्रक्शन कम्पनी के द्वारा हो रहा है ।  

इस पर स्वीजरलैंड की तर्ज पर झील, 5 स्टार होटल, सड़क,घर,हॉस्पिटल बनाने का प्लान है  , ऑक्सफोर्ट यूनिवर्सिटी की एक शाखा भी यहाँ खोलने का प्लान है  इस ड्रीम प्रोजेक्ट को सन 2000  में स्वीकृति मिल गई थी फिर इस पर काम शुरू हुआ ये अंग्रेजो के बनाये हिल स्टेशनों जैसा तो नहीं है फिर भी बोम्बे पूना वालो के लिए एक वरदान स्वरूप है ।

यहाँ गेट पर ही पार्किंग चार्ज लिया जाता है जिसे एंट्री फीस भी कह सकते है । 
कार 500 रु 
बाइक 200रु
बस 1000 रु
इसके अलावा और कोई चार्ज नहीं है ।
पार्किंग के बाद करीब 6-7 किलोमीटर चलने के बाद ही मेन सिटी शुरू होती है ।ज्यादा  ऊँचे तो नहीं पर पर्वत और उनकी श्रृंखलाएं मन को मोह लेती है,सुंदर  सड़क और सड़क के किनारे ही क्यारियों में सजावटी  खूबसूरत फूलों के पौधे और एक ही कतार में बने एक ही रंग में रंगे बंगले जो इनकी सुंदरता में चार चांद लगा देते है ।

यहाँ का मेन आकर्षक है एक झील और उसके पास बने सुन्दर घर और उन घरों पर लगाया एक ही कलर ।
झील के पास ही बनी सुन्दर सड़क पर घूमते सैलानी अपनी खुशी आप ही बखानते नजर आते है ।
झील में दौड़ती नावे और स्पीड बोट पर चहकते बच्चे और युवा  की ख़ुशी साफ झलकती है ।

यहाँ पैदल घूमना भी अपने आपमें कम नहीं है झील से सटी सड़क पर कोई वाहन नहीं आ सकता सिर्फ साईकिल ही आप चला सकते हो जो यहाँ पर महज 200 रुपये में 1घण्टा किराये पर उपलब्ध हो जाती है ।महंगी तो है पर यहाँ के सौंदर्य को तपासने के लिए जरुरी भी है ।

यहाँ झील में एक पूल भी है जो आपको इस तरफ से दूसरी तरफ ले जा सकता है यहाँ हर तरह का खाना उपलब्ध है झील के किनारे थोड़ा महंगा और ऊपर सड़क पर थोड़ा सस्ता और अच्छा है  ।

यहाँ बैंक और ATM  भी है जिससे आप जब चाहे पैसा निकाल सकते है। पब्लिक टॉयलेट भी साफ और काफी बड़े बने है ।  यहाँ रात्रि विश्राम के लिए कम दामो में रूम सर्विस है यदि आप ठहरना चाहे तो ठहर भी सकते है और वापस पूना भी आ सकते है ।और हम अँधेरा होने से पहले ही निकल आये । 
पूना वालो के लिए ये वन डे ऑफर  अच्छा है ।

लवासा की कमिया :---

लवासा अपने आप में अच्छा हिलस्टेशन है पर ये केवल पूना या बॉम्बे से ही सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है  विकसित सड़के होने के बावजूद एक पहाड़ी ईलाके में स्थित होने की वजय से इन सड़को में कुछ जगह खड़ी ढाल है । और हेलीकाप्टर के अलावा निकट भविष्य में कोई हवाई योजना नहीं  बनी है । 
  

गुड़ बाय लवासा और अब देखिये  लवासा के सूंदर फोटू :---



लवासा का एकमात्र दरवाजा यानी एंट्री 



 
बैठने को कुर्सियां बनी है 

 ये मेरा दिल---- दीवाना - मस्ताना 


 झील एकदम साफ़ 



 सफाई इतनी की निचे भी बैठ जाओ 






 सुंदरता बिखरी है 


 झील के बाहर की सड़क और झील पर बने फ्लेट 














 बाज़ार 






लवासा का मानचित्र 



झील के किनारे वाली सड़क पर सैलानी 

 रात का शमा झूमे चँद्रमा 


नोकविहार का आनन्द 


 बंगले 


 सड़क पर दौड़ती ट्रेन 



बंगलो का पिछवाड़ा 


शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

मन्दसौर का पशुपतिनाथ मन्दिर


*मन्दसौर का पशुपतिनाथ मन्दिर*




पशुपतिनाथ भगवान 



आज मैँ  आपको अपने बचपन के शहर मंदसौर ( मध्य प्रदेश ) की सैर करवा रही हूँ :---

मैँ मन्दसौर 4 साल रही हूँ, जब मैँ 9th में थी तब इस शहर में मेरे पापा का ट्रांसफर हुआ था .. मेरे पापा पुलिस डिपार्टमेंट  में थे यहाँ के नई आबादी पुलिस स्टेशन पर अधीक्षक के पद पर कार्यरत थे ।  ,वही  पीछे  हमारा छोटा सा सरकारी बंगला था। .....आजकल  यहाँ पुलिस  हेड क्वार्टर बना हुआ है ।
पुलिस विभाग जिला  मन्दसोर संभाग को माल वाला संभाग कहते है क्योकि यहाँ अफीम की खेती होती है और जब अफीम उगती है तो तस्करी भी होती है ।



1974 में (Ncc कैप्टन ) उस समय के S P पुलिस और केंद्रीय नेता के साथ मैं  



 मध्यप्रदेश जिसे भारत का दिल कहते है ,,,,, यह शहर इसी राज्य का जिला है ..... बड़ा शहर है.....  इसको गेहूं और लहसुन की बड़ी मण्डी के रूप में जाना जाता है । यहाँ प्राकृतिक खनिज सम्पदा भी बहुत है सफ़ेद पेन्सिल स्लेट यहाँ की खनिज सम्पदा है  और पेन्सिल  बनने के कारखाने भी काफी  है । 

यहाँ 2 चीजे  बहुतयात में होती है एक तो लहसुन जिसे सफ़ेद सोना  कहते है और दूसरी  अफीम जिसे काला सोना कहते है .....कई लोग सफ़ेद स्लेट को भी सफ़ेद सोना कहते है  ।
अफ़ीम की खेती करने के लिए  सरकार की परमिशन जरूरी होती है ,जब अफ़ीम के पट्टे सरकार देती  थी तब हमारे स्कूल  की  छुटियां होती थी  (पट्टे  देना मतलब अफीम की खेती  करने की परमिशन देना ) क्योकि स्कूलों में ही लोगों  को पट्टे दिए जाते थे  उसके बगैर खेती करना गैर क़ानूनी  था ........ काफी मात्रा में किसान अपनी बैलगाड़ियों से आते थे तब हम छुट्टियों का मजा लेते थे  ।

 जब खेतों में अफ़ीम के फूल आते थे तो तबियत खुश हो जाती थी। ...क्योकि  रंग बिरंगे फूलों से सारे खेत सज जाते थे ....फूल के बाद उसमे फल लगते थे जिन्हे डोडे कहते है ।  जब डोडे  कच्चे ही रहते है तो उनमें ३ या ४ लाईने खींच देते है जिनसे दूध सा निकलता है और  धीरे धीरे वो दूध जम जाता है ,जब अच्छी तरह से दूध जम  जाता है तो डोडे तोड़ लेते है और उस जमे हुए दूध को निकलते है जो अफीम होती है। ....

उन डोडो में भी खसखस भरी होती है जिसे पोस्तादाना कहते है। . कहते है उन डोडो में भी नशा होता है यदि उनको उबालकर प्रयोग किया जाय  तो काफी नाश आता है ।  ,नशा करने वाले इसका प्रयोग करते है वैसे यदि किसी को दस्त लग जाये तो  इनको  उबालकर पिने से ठीक हो जाते है ।
जिला मन्दसौर यहाँ के फेमस मन्दिर से भी प्रसिध्य है । यह  एक शिव मन्दिर है जिसे पशुपतिनाथ मन्दिर कहते है। वैसे नेपाल में भी पशुपतिनाथ (भगवान शंकर ) का मन्दिर है पर उसमें भगवान शिव की चारमुखी मूर्ति है जबकि यहाँ पर अष्टमुखी मूर्ति है जो की लिंग रूप में स्थापित है। ...


यह मंदिर शिवना नाम की नदी के तट पर बसा है। .... यह मंदिर पश्चिममुखी हैं....   इस मन्दिर की ऊंचाई 101 फिट है ... 90 फ़ीट लम्बा और 30  फ़ीट चौड़ा है।  मन्दिर के शिखर पर 100 किलो वजनी सोने  का कलश है जिस पर 51 तोला सोने का पतरा राजमाता श्रीमती विजयाराजे सिंधियां द्वारा 26 जनवरी 1966 को चढ़ाया  गया था.....  


और यह एक मात्र ऐसा मन्दिर है जहाँ सावन के हर  सोमवार को शिवजी का सर्व मनोकामना सिद्धि अभिषेक होता है जो की विश्व के किसी भी शिव मन्दिर में नहीं होता।

ये शिव मूर्ति 7.5 फिट है और इस मूर्तिपर बाल्यावस्था, युवावस्था, अधेड़ावस्था और वृध्यावस्था की झलक दिखलाई देती है। यहाँ हर साल कार्तिक एकादशी से मार्गशीर्ष कृष्ण पंचमी तक  एक  मेले का आयोजन होता है जहाँ नाना  प्रकार के झूले होते है ।लोग दूर दूर से इस मेले का आनन्द उठाने आते है । 

   
इतिहास :--
इस मूर्ति का इतिहास 75 साल पुराना है  बड़ा ही विचित्र है ...कहते है--- एक धोबी को स्वप्न में भगवान शिव ने दर्शन दिए और कहा की -- ''जिस पत्थर पर तू कपडे धोता है  वो मैँ हूँ ! तू यही मेरी प्राण प्रतिष्ठा करवा दे ।"
 तब धोबी ने सबको अपने स्वप्न की बात बताई तो लोगो ने पहले तो विश्वास नहीं किया पर उसके अडिंग विश्वास को देखते हुए 19 जून 1940 को उस पत्थर को सीधा किया तब ये 1500 साल पुरानी प्रतिमा के दर्शन हुये पर किसी ने स्थापित नहीं किया। ....

21 साल तक ये मूर्ति शिवना नदी के किनारे ज्यो की त्यों पड़ी रही फिर 23 नवम्बर 1961 को चैतन्य आश्रम के स्वामी प्रत्याक्षा्नन्द महाराज ने इस मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करवाई और पशुपतिनाथ नामकरण किया। ....

इस मन्दिर की धारणा यह है की हर बारिश में शिवना नदी अपना प्रचण्ड रूप इख़्तियार कर लेती है और भगवान  पशुपतिनाथ के पैरो को छूने मंदिर तक आती है और उस समय शहर में बाढ़  जैसी स्थिति हो जाती है कई बार तो शहर की गलियो में नावे चलने लगती है  लेकिन भगवान पशुपति के पैर छूकर पानी तुरन्त उतर  जाता है ।  उस समय पुलिस वाले  बेचारे रातदिन लगे रहते है । 





॥ जय महाराज पशुपतिनाथ की जय ॥ 


पैरो को छूती शिवना नदी 




मन्दसौर शहर 
++











अफ़ीम के फूल और डोडे 





अफीम के फूल 




अफीम के डोडे  :--इसमें से खसखस निकलती है जिसे पोस्तदाना भी कहते है 



इन डोडो में चीरा लगाते है और जब इनका दूध पक जाता  है तो वो अफ़ीम बनता है




(सभी फोटो गूगल बाबा के सौजन्य से )










गुरुवार, 26 जनवरी 2017

ओरछा की वीरांगनायें { Orchha ki Virangnaye}





* ओरछा  की वीरांगनायें *







24 दिसम्बर 2016  



झांसी से लेकर ओरछा तक का 18 किलो मीटर का दायरा वीरांगनाओं से भरा पड़ा है । एक तरफ झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई है,तो दूसरी तरफ ओरछा की महारानी गनेश कुँवरी है ।जिनकी कहानियां यहाँ क़े जनमानस में बोलकर गाई जाती है ।

और इसी तरह की वीरांगनाएं हमारे ग्रुप में भी है , कुछ ग्रुप में है कुछ ग्रुप के बाहर की है यानि ग्रुप के पतियों की पत्नियां है और पत्नियां भी ऐसी जो पतियों पर भरोसा कर चल पड़ी -----
" जीवन डोर तुम्ही संग बाँधी ...." इस तर्ज पर ।

और ग्रुप भी कौन - सा व्हॉट्सअप का जिसकी कई बातें झूठी ओर फ़ेक होती है ; पर मजाल है जो एक भी बीबी ने अपने शौहर को इस ग्रुप में आने से मना किया हो ,भले ही बेचारियां रात को चुपचाप  तकियों में सिर फँसाये कनखियों से अपने मियां के होठों पर नाचती मुस्कान देख खीझती नहीं, और न ही झल्लाती है बल्कि,  दिल ही दिल में संतुष्ट होती है की ये कोई सौत नहीं बल्कि ग्रुप मेम्बर की आपसी चुहलबाजी चल रही है ; यही विश्वास ,अपनापन, आपसी समझ ही हमारे ग्रुप की जान है ।
मैं दर्शन कौर सबकी बुआ यानि जगत बुआ:--




जब मुझे पता चला की ओरछा में मिलन समारोह का कार्यक्रम बन रहा है तो मैंने कुछ खास ध्यान नहीं दिया ,(अगर दे देती तो सारे कार्यक्रम का आनंद लेती ) क्योकि ग्रुपवासी आपस में मिलते ही रहते है कइयों से तो मैं भी मिल चुकी थी । फिर ये ओरछा है क्या बला !
कहाँ है ?
किधर है ?
और उस पर दिसम्बर की सर्दी ---
ना ! ना!! बाबा ना ना !!!
मेरा निकलना तो असम्भव ही है ।
पर पहली बार जब फैमिली का जिक्र हुआ तो माथा ठनका !

फैमिली के साथ आने की बात का पता चला तो मन थोड़ा व्याकुल हुआ पर मुझे पता था मेरी फैमिली से कोई न आएगा न मुझ अकेली को आने देगा ?

स्थिति बड़ी डांवाडोल थी ,
मन था, पर कहाँ रुकुंगी ? कैसे  मैनेज  करुँगी ????
लेकिन जब व्यवस्था की डोर पांडे जी के हाथ देखी तो थोड़ा मैं चौकी ---" ओ तेररी की....अब भला मैं क्यों पीछे रहती और गिरते पड़ते आख़िरकार पहुँच ही गई ओरछा ...





और फिर हुआ 40- 45 लोगो का मधुर मिलन  # ओरछा_महामिलन_दिल_से #
जिसकी कई स्मृतियां मानस पटल पर अंकित है और रहेगी जिंदगी - भर।

और उन सबमें प्रमुख है वो महिलाये जो इस ग्रुप में न होते हुये भी सिर्फ अपने पतियों के कहने पर ,उन पर विश्वास कर ओरछा आई और इस महा -मिलन को यादगार बनाया ।
तो अब चलते है अपने असली मकसद पर, हुआ यू की एक दिन मुकेश कुमार पांडे जी (जिन्हें मैं शार्ट में पांडे जी कहती हूँ )  ने बोला की --" बुआजी आप ओरछा आई महिलाओं के बारे में कुछ लिखिये ।" पहले तो समझ नहीं आया क्योकि बहुत सीमित समय के लिए सबसे मिली थी कुछ से तो सिर्फ हैलो मात्र ही हुई थी और इस समागम को अधूरा छोड़ भाग भी गई थी फिर सोचा विचार बढियां है क्यों न प्रयास किया जाये फिर मदद तो इनके पतिदेवो से मिल ही जायेगी☺
तो ओरछा आई हुई महिलाओं का परिचय मेरी नजर से ...

ओरछा महा-मिलान की पहली मंथली ऐनिवर्सरी के अवसर पर .....
ओरछा आने से पहले मैं कुछ ही लोगो से मिली थी इतने मेम्बर्स से एक ही दिन एक ही छत के नीचे मिलना अपने आपमें काफी आश्चर्यजनक था। इस ग्रुप के एडमिन मुकेश भालसे को मैं पहले नहीं जानती थी इस ग्रुप में आने के बाद ही मुकेश को जाना फिर पता चला की इंदौर के नजदीक ही रहते है (अब तो इंदौर ही आ गए ) तो थोड़ा अच्छा लगा उन्ही के जरिये कविता के बारे में पता चला...ओर फिर बातें हुई ।
तो सबसे पहले जिक्र करुँगी हमारे एडमिन मुकेश भालसे साहेब की शोख, चंचल ,खूबसूरत ग्रुप मेंबर ---
कविता भालसे का :---






कविता के पीछे ओरछा की फ़ेमस छतरियां 

कविता को काफी टाईम से जानती थी और मेरे इकलौते जन्म स्थान की होने के कारण थोड़ा ट्चिंग ज्यादा था । फेसबुक पर भी कमेंट चलते रहते थे इसलिए मिलने की इच्छुक थी ,सोचा था कभी इंदौर जाऊंगी तो जरूर मिलूँगी पर सयोंग ओरछा में बन गया ओर जैसा सोचा था उससे काफी अधिक ही मिलनसार कविता को पाया । हंसमुख ,सौम्य,चंचल और मेरी ही तरह फ़ोटू खींचवाने की दीवानी हमारी कवितारानी जिनके पतिदेव मुकेश जी हमारे ग्रुप एडमिन उनकी हर अदा को अपने कैमरे में कैद करने कोे तत्पर ।हमारे ग्रुप के लव बर्ड्स ।
"हम बने तुम बने इक दूजे के लिये"
एकदम फिट गीत ☺☺☺☺


और अब आते है हमारे ग्रुप के दूसरे ग्रुप एडमिन संजय कौशिक की हमसफ़र नीलम कौशिक की तरफ----
नीलम कौशिक :----





संजय से मेरी पहली मुलाकात बॉम्बे में ही उनकी लाई मशहूर घेवर के साथ हुई थी, मुलाकात मीठी तो थी पर सीमित थी। लेकिन ग्रुप में बातचीत हंसीमजाक के जरिये काफी पहचान हो गई थी । सुलझे व्यक्तित्व के मालिक संजय भी तुरन्त उत्तेजित नहीं होते हमेशा शांत होकर ही ग्रुप के किसी मसले का फैसला करते है और हम लोग हमेशा उनको एक वाक्य से खुश करते रहते है -- "ऐसे ही कोई एडमिन नहीं बन जाता --'"

ओरछा में नीलम से मेरी पहली मुलाकात थी । धीर,गम्भीर ,सिम्पल नीलम अपने नाम के अनुसार ही नई थी मतलब नई नवेली ! जब हंसती थी तो खुलकर अपनापन झलकता था ,बेतवा माँ की गोद में जब हल्की हल्की ठंडी बुहार चल रही थी तब कुछ पल साथ बैठने और फ़ोटू खिंचने का मौका मिला था तब लगा ही नहीं की आज पहली बार मिल रहे है वो पल अपने आप में सम्पूर्ण था ।और जब नीलम ने कहा कि वो खुद भी कामकाजी महिला है और न्यायालय जैसी संस्था से जुडी है तो और भी गर्व महसूस हुआ की हमारा ग्रुप अपने आपमें कितना जीनियस है जहाँ एक पत्नी अपने पति के आभासी दोस्तों से मिलने चल दी ...जहाँ मेरे जैसी खूबसूरत लेडी भी थी हा हा हा हा हा
"धन्य है भारत की नारी"।

और अब आते है हमारे तीसरे एडमिन रीतेश गुप्ता के पास, जो मोहब्बत के शहर आगरा से ताल्लुक रखते हैे और अपनी खूबसूरत पत्नी  रश्मी गुप्ता के साथ ओरछा आये थे।
रश्मी गुप्ता :---





रीतेश से तो मैं कई सालों से परिचित थी और काफी अच्छी तरह से जानती भी थी इस ग्रुप में रीतेश ने ही मुझे जोड़ा था और मेरा नाम बुआ फेमस करने वाला भी रीतेश ही है ।

हम दोनों काफी टाईम से एक दूसरे को ब्लॉगिंग के जरिये जानते थे क्योकि हम दोनों ही यात्रा ब्लॉग लिखते थे और सफर के दौरान होने वाले अपने अनुभव एक दूसरे को सुनाते भी थे और सुनते भी थे  ।अपनी आगामी यात्रा के बारे में डिसकस भी करते थे --' मुझे याद है अपनी नैनीताल वाली यात्रा में मुझसे "पाताल भुवनेश्वर" छूट गया था और मैंने रिक्वेस्ट की थी की तुम जरूर जाना रीतेश और मुझे बताना ।वहां रीतेश गए भी और मुझे अनुभव बताये भी । हम फेसबुक पर भी कई स्थानों के बारे में आपस में बातचीत करते रहते थे पर असली साक्षात्कार स्थल बना ओरछा ।

यहाँ रीतेश की पत्नी रश्मी से भी मुलाकात हुई नाजुक- सी दुबली पतली रश्मी एक नजर में ही अपना ध्यान खींचने वाली शख्सियत है ,रीतेश के ब्लॉग में उनके साथ कई यात्रा तस्वीरों में रश्मी को देखा था इसलिए जब ओरछा पहुंची तो हाल में निगाह दौड़ाते वक्त रश्मी को पहचानना कोई बड़ा काम नहीं था , तुरन्त पहचान लिया; और रश्मी भी अपनी आँखों में आदर लिए मिलने आ पहुंची थी ,तब कोई अजनबीपन तो लगा ही नहीं ऐसा लगा मानो बहुत सालो से जानपहचान है। सबकुछ अपना अपना सा लगा था ।और वोही कशिश आज भी हम सबके दिलों में है ।

चलिए गाडी बढ़ाते है और पहुँच जाते है छतीसगढ़ यानी प्रकाश यादव के पास जो अपनी सहचर्या नयना के साथ विराजमान थे ओरछा की उस पावन सरज़मी पर,
नयना यादव :---



प्रकाश से मेरा पहले से कोई परिचय नहीं था सिर्फ ललित के मुंह से एक दो बार नाम सुना था वो भी भूटान यात्रा की बुकिंग के टाईम  पर; पर किसी कारण वश मुझे भूटान का कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा ,प्रकाश हमारे ग्रुप में है मुझे तो यह भी मालूम नहीं था बहुत कम ग्रुप पर आते थे और कम बाते करते थे शायद इसलिए कम जानती थी ,जिस दिन ओरछा आने का हुआ तो ग्रुप पर प्रकाश अपनी फैमिली के साथ आ रहे थे ये मालूम पड़ा फिर उनका फ़ोटू भी देखा अपनी पत्नी और दो बेटियों के साथ तब पता चला था ।

प्रकाश से और नयना से मेरी मुलाकात ओरछा में ही हुई । अपनी चमकती आँखों से मुस्कुराती नयना मुझे हाल में ही दिखाई दी थी पर मैंने उनको पहचाना नहीं था शाम को जब भगवान राजा राम की आरती मैं गये तब परिचय हुआ। और रात को जब परिचय -पार्टी चल रही थी तब पता चला की असल में घुमक्कड़ी ग्रुप तो नयना को ज्वॉइन करना था फ़ालतू में प्रकाश फँस गए  क्योकि असली घुमक्कड़ तो वही थी जिन्होंने अपने मजबूत इरादों से प्रकाश  को भी घुमक्कड़ बना दिया ।

वैसे, पत्नी की बातों में आने वाले पहले शख्स है प्रकाश  वरना कौन घर का सुख छोड़कर कठिन राह अपनाता है घुमक्कड़ी की ☺वैसे उम्दा फोटुग्राफर है प्रकाश।

और अब मिलते है दिल्ली गाज़ियाबाद से आये एक और घुमक्कड़ परिवार से ये है सचिन त्यागी । सचिन हमारे ग्रुप के पुराने मेम्बर है पर उनकी पत्नी आभा ग्रुप की मेम्बर नहीं है ।
आभा त्यागी :-




सचिन से भी मेरी मुलाकात ग्रुप में ही हुई थी उससे पहले मैं उसको नहीं पहचानती थी । हमेशा ग्रुप में सक्रिय रहना और पॉइंट की बातें करना सचिन की आदत है ,ग्रुप मेंबर के साथ सचिन ने  ट्रेकिंग भी काफी की है पर हमारी ये पहली ही मुलाकात थी , सचिन एक अच्छे स्वभाव के मालिक है , आभा से मेरी पहले कोई पहचान नहीं थी शर्मीली, अपने आप में खोई हुई मासूम सी मुस्कान लिए जब सचिन ने परिचय करवाया तो अच्छा लगा , जो पत्नियां पति के कंधे से कंधा मिलाकर साथ देती है मुझे वो पसन्द आती है फिर आभा तो सचिन की सारथी भी थी मतलब ये की  दोनों अपनी कार से ही ओरछा आये थे और वापसी भी उनकी कार से ही थी जब  मेरे  कहने पर की ---' इतना लंबा सफर कार से करना क्या सचिन को कोई परेशानी नहीं हुई ?' तो मुस्कुराते हुए आभा ने कहा--'' आधी दूरी तो मैंने भी नापी है उनके साथ बुआ जी '' सुनकर अच्छा लगा था । अगर दोनों को कार चलाना आता है फिर तो फतेह समझो ...और जब दोनों घुमक्कड़ हो तो क्या कहने ,सोने पर सुहागा ।
मेरे ही साथ वो लोग भी ओरछा से जल्दी ही निकल गए थे क्योकि उन लोगो को  ताजमहल के दीदार जो करने थे।

"बुआ प्रनाम " एक लंबी सी छरछरी सी काया मेरे कदमो में लिपटी हुई थी तो अचानक मैंने सोचा ये कौन है ? शक्ल कुछ जानी पहचानी लगी अरे, ये तो अपनी हेमा है ....


हेमा सिंग ;---








हेमा से भी मेरा यह पहला परिचय था । उसने अभी नया ही हमारा ग्रुप ज्वाइन किया है पर लगता ही नहीं की हेमा ने अभी हाल ही में हमारा ग्रुप ज्वॉइन किया है वो हमारे ग्रुप की सक्रिय सदस्या है । हेमा से ग्रुप में काफी बाते होती रहती है वो अपनी बेटी और बेटे के साथ रांची (झारखंड )से आई थी , हंसमुख हेमा ग्रुप में भी सबको अपनी बातों से खुश करती रहती है और यहाँ अपनी शैतान बेटी के पीछे भागती हुई नजर आई । बार-बार हेमा का ये कहना --' बुआजी आप रांची जरूर आना' मन को छू गया।
और अब सबसे अंत में हमारे मेजमान पांडे जी के गृहमंत्रालय का ज़िक्र न हो तो बात अधूरी ही रह जायेगी ।
निभा पांडे :--







निभा पांडे हमारे मुकेश पांडे जी की खूबसूत बिलौरी आँखों वाली धर्मपत्नी है जो थोड़ी शर्मीली और अपने आप में रहने वाली महिला है पर जब हम सब महिला वर्ग उनसे मिलने उनके सरकारी आवास पर गए तो लगा ही नहीं की वो आज से पहले अज़नबी थी ,बहुत आत्मीयता से सबसे मिली अपने न आने का सबब भी बताया और सबसे न मिलने के लिये माफ़ी भी मांगी । निभा सबको नाम से जानती थी और मुझे तो स्पेशल ही बुआ के नाम से सम्बोधित किया । मतलब ये साफ है की पर्दे क़े पीछे भी वो सक्रिय थी ।और पांडे जी की हर बात से सहमत भी ;

 बहुत छोटा और सीमित मिलन था फिर मिलने का वादा कर हम पांडेजी के घर से निकले क्योकि आज मुझे बॉम्बे के लिए निकलना था और सभी को जंगल में मंगल मनाने जाना था।
इस तरह ये ओरछा महामिलन मेरी तरफ से समापन हुआ क्योकि आज मुझे जाना था मजबूरी थी,  फिर भी अगली  ट्रिप में मिलने का वादा कर सब महिलावर्ग आपस में बिदा हुआ।

सारी महिला मंडल ओरछा मे