मेरे अरमान.. मेरे सपने..


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शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

गुरु नानकदेव जी


गुरु नानकदेव जी
545--प्रकाश -उत्सव 



(गुरु नानक देव जी एक दिव्य ज्योति )





गुरू नानकदेवजी सिख पंथ के प्रथम गुरु कहलाते हैं --आपका जन्म कार्तिक पूर्णमासी के दिन 15 अप्रैल 1469 को पंजाब के तलवंडी नामक गाँव  में हुआ ---( जो आजकल पाकिस्थान  में चला गया हैं --जिसे हम लोग ननकाना- साहेब के नाम से जानते हैं ) आपजी की माताजी का नाम तृप्ता जी था पिताजी कल्याणचंद  एक किसान थे !आपजी की एक बड़ी बहन भी थी जिनका नाम बीबी नानकी जी था !

नानक देवजी ने एक ऐसे समय जनम लिया था जब भारत में कोई शक्तिशाली संगठन नहीं था --विदेशी आक्रमणकारी देश को लुटने में लगे थे --धर्म के नाम पर अंध विश्वास और कर्मकांडो का बोलबाला था ऐसे समय में भाई गुरुदास जी ने लिखा हैं ---

" सतगुरु नानक प्रगटिया,मिटी धुंध जग चानण होआ 
 ज्यूँ कर सूरज निकलया,  तारे छुपे अंधेर पलोआ --!" 
    
( जन्म-उत्सव *** गुरुनानकदेव जी का ) 


नानकदेवजी के जन्म के समय प्रसूति गृह एक अलोकिक ज्योति से भर गया था --शिशु के मस्तक के आसपास तेज प्रकाश फैला हुआ था --चेहरे पर असीम शांति थी --माता -पिता ने  बालक का नाम 'नानक' रखा  


  
(ननकाना साहेब गुरुद्वारा ,   पाकिस्तान )
गुरु नानकदेवजी का जन्म स्थान 


(गुरुद्वारा पंजा साहेब ---पाकिस्थान) 


(अपने हाथ  के पंजे से भारी शिला को रोकते हुए --गुरु नानक देव जी )  
(आज यहाँ पंजा साहेब गुरुद्वारा बना हैं )

(गुरु नानकदेवजी के हाथ का पंजा आज भी  ज्यो का त्यों बना हैं )
गुरुद्वारा --पंजा साहेब 
  
हिन्दू -धर्म के अन्दर ऊँच -नीच का भेदभाव बहुत गहराई  लिए हुए था --जब आपजी ने देखा तो अपने उपदेशो से सामजिक ढांचे को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया --अपनी सरल भाषा मेंसबको समझाया की इंसान एक दूसरेका भाई हैं --ईश्वर सबका परमात्मा हैं ,पिता हैं | फिर एक ही पिता की संतान होने के कारण हम सब सामान हैं -----

"अव्वल अल्लाह नूर उपाया , कुदरत के सब बन्दे !
एक नूर ते सब जग उपज्या ,कौन भले कौन मंदे !! " 

आप महान संत.कवी,दार्शनिक और विचारक थे --अपने उपदेशो को उन्हीने खुद अपने जीवन में अमल किया --उन्होंने वर्गभेद मिटाकर 'लंगर'प्रथा शुरू की जो आज भी कायम हैं | गुरुद्वारों में आज भी जाति- भेद मिटाकर सभी एक ही पंक्तियों में खाना खाते हैं --अपनी यात्राओ के दौरान हर व्यक्ति का आतिथ्य स्वीकार करते थे --
मरदाना जो निम्न जाति के थे आप उन्हें अपना अभिन्न अंश मानते थे और हमेशा 'भाई' कह कर संबिधित करते थे --इस तरह आपने हमेशा भाई चारे की नींव रखी -----




( जाति -भेद मिटाकर एक ही पंक्तियों में लगंर की प्रथा चलने वाले गुरुनानक देव जी )

बचपन से आपजी प्रखर बुध्धि वाले थे --पढने लिखने मैं आपका मन नहीं लगता था --7-8 साल तक ही स्कुल गए फिर अपना सारा समय चिंतन और सत्संग में ही व्यतीत करने लगे --पिताजी ने 19 वर्ष की उम्र में आपकी शादी करवा दी। आपका विवाह मूलराम पटवारी की कन्या सुलक्षणाजी  से हुआ।गुरुद्वारा कंध साहिब- बटाला (गुरुदासपुर) गुरुनानकदेवजी  का यहाँ बीबी सुलक्षणा से 18 वर्ष की आयु में संवत्‌ 1544 की 24वीं जेठ को विवाह हुआ । यहाँ गुरु नानकदेव जी  की विवाह वर्षगाँठ पर प्रतिवर्ष उत्सव का आयोजन होता हैं आपजी के दो पुत्र हुए--भाई श्री चंद जी और भाई लक्ष्मीचंद जी--जिन्होंने बाद में उदासी -मत चलाया---


(यात्रा -के  दौरान भाई मरदाना के साथ )

वैराग जीवन जीने वाले को कहाँ परिवार की जंजीरे रोक पाई हैं --एक रात  नदी में स्नान करते हुए आपको प्रेरणा हुई की उनको ये मोह-माया त्यागकर के संसार में आने का अपना मकसद पूरा करना चाहिए --इसके बाद वो घर लौट कर नहीं गए --अपने ससुर को अपने परिवार की  जुम्मेदारी सौपकर यात्रा पर निकल पड़े --अपने मुसलमान शिष्य मरदाना के साथ सन 1507 में धर्म प्रचार के लिए कई यात्राए की !भारत के हर कोने में उनकी यात्राए होती हुई अफगानिस्तान,अरबदेश ,फारस के कई स्थानों में सम्पन्न हुई --  
   

    


 गुरु  नानकदेव जी सर्वेश्वरवादी थे। मूर्तिपूजा को उन्हांने निरर्थक माना। रूढ़ियों और कुसंस्कारों के विरोध में वे सदैव तीखे रहे। ईश्वर का साक्षात्कार, उनके मतानुसार, बाह्य साधनों से नहीं वरन् आंतरिक साधना से संभव है। उनके दर्शन में वैराग्य तो है ही साथ ही उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थितियों पर भी नजर डाली है। संत साहित्य में गुरु नानकजी  अकेले हैं, जिन्होंने नारी को बड़प्पन दिया है---

"एक दिन बालक नानक को पिताजी ने कुछ पैसे दिए सौदा लाने के लिए --नौकर के साथ जब बालक नानक सौदा लेने जा रहे थे तो रास्ते में  कुछ भूख से पीड़ित साधुओं को बालक नानक  ने उन रुपयों से खाना खिला दिया और लौट आए ,जब पिताजी ने पूछा की सौदा कहाँ हैं तो बालक नानक बोले की आज मैनें   सच्चा सौदा किया हैं "--पिताजी उनके कथन से विस्मय रह गए --

गुरु नानकदेवजी एक अच्छे कवि भी थे। उनके भावुक और कोमल हृदय ने प्रकृति से एकात्म होकर जो अभिव्यक्ति की है, वह निराली है। उनकी भाषा बहते हुए पानी की तरह थी -- जिसमें फारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी, खड़ी बोली, अरबी, संस्कृत, और ब्रजभाषा के शब्द समाए हुए थे --




एक ओंकार 

मूलमंत्र :--  गुरु ग्रन्थ साहेब की वाणी का आरम्भ मूल मन्त्र से होता हैं -यह मूलमंत्र हमें उस परमात्मा की परिभाषा बताता हैं जिसकी सब अलग -अलग रूप में पूजा करते हैं :----




  "एक ओंकार सतनाम करता पुरख निरभऊ निरवैर अकाल मूरत अंजुनी स्वेम्भ गुरु प्रसाद"

एक ओंकार --परमात्मा एक हैं !
सतनाम --परमात्मा का नाम सच्चा हैं !हमेशा रहने वाला हैं !
करता पुरख --वो सब कुछ बनाने वाला हैं !
निरभऊ -- परमात्मा को किसी का डर नहीं हैं !
निरवैर -- परमात्मा को किसी से वैर (दुश्मनी) नहीं हैं !  
अकाल मूरत --परमात्मा का कोई आकार नहीं हैं !
अंजुनी --वह जुनियो (योनियों ) में नहीं पड़ता !न वह पैदा होता हैं ,न मरता हैं !
स्वेम्भ-- उसको किसी ने नहीं बनाया --न पैदा किया हैं वह खुद प्रकाश हुआ हैं !   
गुरु प्रसाद --गुरु की कृपा से परमात्मा सबके ह्रदय में बसता हैं --!




   
(गुरु नानकदेव जी के साथ बाला -मरदाना) 


गुरु नानक देव जी की दस शिक्षाए :---

१.ईश्वर एक हैं !
२.सदैव एक ही ईश्वर की अराधना करो !
३.ईश्वर सब जगह और हर प्राणी में मौजूद हैं !
४.ईश्वर की भक्ति करने वालो को किसी का भी नहीं रहता !
५.ईमानदारी से और मेहनत करके उदरपूर्ति करनी चाहिए !
६.गुर कार्य करने के बारे में न सोचें और न किसी को सताए !
७.सदैव प्रसन्न रहना चाहिए --ईश्वर से सदा अपने लिए क्षमा मंगनी चाहिए !
८.मेहनत और ईमानदारी की कमाई में से जरूरत मंद को भी कुछ देना चाहिए !
९.सभी स्त्री -पुरुष बराबर हैं !
१०.भोजन शरीर को जिंदा रखने के लिए जरूरी हैं पर लोभ -लालच के लिए संग्रहव्रती बुरी हैं !   


जीवन भर धार्मिक यात्राओ के माध्यम से बहुत से लोंगो को सिख -धर्म  का अनुयायी बनाने के बाद गुरु नानकदेवजी ने रावी नदी के तट पर स्थित अपने फार्म पर अपना डेरा जमाया और 70 वर्ष की साधना के पश्चात् सन 1539 ई. में परम ज्योति में विलीन हो गए .....



सभी  चित्र गूगल से *

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

**** गुरु गोविन्द सिंह जी ****



गुरु गोविंदसिंह जी 


जन्म ---22 दिसंबर 1666 ई.  
ज्योति -ज्योत--7 अक्तुम्बर 1708 ई. 

आज के भौतिक युग में अपने बहु संख्यक होने के कारण देश के शासन -प्रशासन  में अपना प्रभुत्व कायम हो जाने के  कारण हमारे वर्तमान शासक गुरु गोविंद सिंह जी और उनके निर्मल खालसा -पंथ के अनगिनत परोपकारो को भूलते जा रहे हैं ---इसका सबसे बड़ा प्रमाण नवम्बर 1984 में उस समय की सताधारी पार्टी द्वारा  पूर्व नियोजित निर्मम सिक्ख  नरसंहार और सिक्ख स्त्रियों को बहुत बड़े स्तर पर अपमानित किए जाने की दुखद धटना क्रम को लेकर देखा जा सकता हैं--इस शासक पार्टी के कुछ नेताओ ने देश की राजधानी दिल्ली  में अपने नेतत्व में हजारो सिक्खों का कत्लेआम कराया --हमारा तथाकथित लोकतांत्रिक सिस्टम तथा इसकी निष्पक्ष  न्यायपालिका आज तक किसी भी दोषी को दंडित नहीं कर सकी  हैं ----????

ऊपर से देश के वर्तमान गुहमंत्री सिक्खों को नवम्बर 84 का सिक्ख कत्लेआम भूल जाने का मशवरा दे  रहे हैं ? यह कैसी  विडंबना हैं ?     
यह श्री गुरु गोविंद सिंह जी और उनके खालसा -पंथ के परोपकारो का  कैसा सिला हैं ??
जिस धर्म की रक्षा के लिए उन्होंने अपने पुरे परिवार का  बलिदान किया --आज उन्ही की बनाई हुई कौम को अपनी पहचान बनाए रखने में कई संकटों का सामना करना पड रहा हैं ---



देश यह सच्चाई भूल चूका है की मात्र ९ बर्ष की आयु में गुरूजी ने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अपने पिता गुरु तेगबहादरजी को बलिदान के लिए प्रेरित किया था ---जब मुग़ल साम्राज्य की फौजे 'करो या मरो' की तर्ज पर हिन्दुओ को मार -मार कर मुसलमान बना रही थी ,तब कश्मीर के ब्राहमण गुरू तेग बहादर जी के दरबार में याचिका लेकर पहुंचे और दया की गुहार लगाईं --अपने धर्म का वास्ता दिया तब गुरूजी ने कहा की ----'जाओ,उनसे कहो की पहले हमारे गुरु  का धर्म परिवर्तित करो --फिर हम अपना धर्म बद्लेगे !'   

इस तरह अपना शीश देने वो दिल्ली चल पड़े --चांदनी -चौक  पर उन्होंने अपना शीश देश और  कौम की खातिर निछावर किया --जहाँ उनका शीश  काटा  था वहां आज गुरुद्वारा( शीशगंज साहेब) बना हैं --




(गुरुद्वारा शीशगंज साहेब , देहली )


( और यह हैं ८४ के दंगो के टाइम जलता हुआ शीशगंज गुरुद्वारा )   




( जुल्म करते मुग़ल सैनिक  और सहते निरह सिक्ख ) 
  
पिता के बलिदान के समय गुरूजी की आयु महज ९  साल की ही थी --इस अल्प आयु में ही गुरूजी ने युध्य  विधा में पारंगत हासिल की --कई लड़ाईयां उन्होंने लड़ी ---आंनदपुर साहिब में अपना ठिकाना बना कर वो अपने आने वाले मुरीदो को कहते थे की मेरे  लिए नजराने लाना हो तो माया  (पैसे )  नहीं शास्त्र और घोड़े लाए --उन्होंने  फौज भी इक्कठा करनी शुरू कर दी --
गुरूजी के  चार बेटे थे --चारो होनहार ---!


( गुरूजी के चारो पुत्र ) 



गुरूजी ने अनेक  लड़ाईयां लडी --उस समय औरंगजेब बादशाह था --शाही सेना ने बहुत उत्पात मचा रखा था --गुरूजी का भंगानी का युध्य ,चमकौर और मुक्तसर का युध्य और आनंद साहेब का युध्य प्रसिध्य हैं ---  चमकौर  की कच्ची गडी में गुरूजी ने ४० सिक्खों की फौज के साथ जिस हिम्मत और दलेरी से दस लाख मुग़ल शाही सेना से टक्कर ली ,ऐसी मिसाल इतिहास में कही नहीं मिलती --       

                   
(युध्य में वीरता से लड़ते गुरु गोविन्द सिंह जी )
चित्र --गुरुद्वारा हजूर साहेब 


(युध्य   का  मैदान --चित्र गुरुद्वारा हजूर साहेब) 

( दोनों साहिबजादों  के  साथ युध्य में जाते हुए---चित्र गुरुद्वारा हजूर साहेब .)


युध्य में  शानदार विजय प्राप्त की पर चमकौर की लड़ाई में गुरूजी के दोनों बड़े पुत्र शहजादा अजीतसिंह और शहजादा जुझार सिंह वीरगति को प्राप्त हुए ---दोनों छोटे पुत्रो को माता गुजरी जी अपने साथ पुराने सेवादार गंगू के घर ले गई --इस सेवादार ने लालच में आकर धोखे से दोनों बालको को कोतवाल को पकडवा दिया --जिसने सरहिंद के सूबेदार वजीर खां के हवाले कर दिया --वजीर खां गुरु जी से बहुत जलता था उसने दोनो छोटे साहिबजादों शहजादे जोरावर सिंह और शहजादे फतेहसिंह  को नीवं में जिन्दा चुनवा दिया -- दोनों बालक बहुत छोटी उम्र में ही शहीद हो गए --माताजी से यह देखा नहीं गया वो स्वर्ग सिधार गऐ------


(दोनों साहिबजादों के साथ माता गुजरीजी  --जंगल -जंगल भटकते हुए) 
चित्र --गुरुद्वारा हुजुर साहेब


( माता गुजरीजी  और दोनों साहेबजादो को  बुर्ज में कैद किया हुआ था ) 
चित्र --गुरुद्वारा हुजुर साहेब 



( जिन्दा दिवार में चुनते हुए छोटे साहिबजादो को )
चित्र --गुरुद्वारा हुजुर साहेब 


(सिक्ख फौजों  को बन्दुक चलाने की तालीम देते हुए दसवे पातशाह )
चित्र --गुरुद्वारा हुजुर साहेब

अपने चारो बच्चो की मौत की खबर सुनकर गुरूजी बहुत क्रोधित हुए -- हैरान और दुखी हो उन्होंने  औरंगजेब  को बहुत लानते दी और दहाड़ते हुए बोले --'क्या हुआ गीदड़ के धोखे से शेर  के चार लाल खो चुके हैं .परन्तु शेर अभी जिन्दा हैं ,जो की बदला लेकर रहेगा "


तब उन्होंने गुस्से में औरंगजेब  को एक चिठ्ठी लिखी --जिसे 'जफरनामा ' कहा गया --यह  पत्र फारसी लिपि में था जफरनामा यानी जीत का पत्र------

"चार मुए तो क्या हुआ 
जीवन कई हजार "


          " यानी मेरे चार बच्चे नहीं हैं तो क्या हुआ --
मेरे चार हजार बच्चे अभी भी जीवित  हैं"

ऐसे वचन कहना हर किसी के बस  की बात नहीं हैं ---उन्होंने औरंगजेब को ललकार कर कहा की --"तेरा कर्म लूटना और धोखा -फरेब हैं पर मेरी राह सच्चाई की हैं  --तुने अपने ही भाईयो का खून पिया हैं --तू जल्लाद हैं"
कहते हैं की औरंगजेब  इस पत्र को पढ़कर खूब तडपा-- उसकी तडप को मीर मुंशी जी कुछ यु लिखते हैं :---

"मुझे अपना पता नहीं गुनाह बहुत किये हैं,
मालुम नहीं किस सज़ा में गिरफ्तार हूँगा !"


तब औरंगजेब गुरूजी से मिलने को तडपने लगा --उसने गुरूजी से मिलने की इच्छा प्रकट की; उस समय औरंगजेब  दक्षिण में मराठो से युध्य कर रहा था--- तब गुरूजी उससे मिलने दक्षिण की और चल पड़े .----


(अपने बच्चो के लिए व्याकुल गुरूजी --जंगलो में भटकते हुए )
  


अभी  गुरूजी राजस्थान ही पहुंचे थे की औरंगजेब  की म्रत्यु का समाचार उन्हें मिला --दक्षिण के छोटे से गाँव खुलताबाद में इस सदी का सबसे बेरहम ज़ालिम बादशाह औरंगजेब का अंत हुआ --

"दो फूल भी मज़ार पे उनके नहीं फलक ,
                        लेकर जमीं जिन्होंने हजारों बनाए बाग़ !"      -अज्ञात 


  अपने जीवनकाल में जिसने अनेक जुल्म ढाए --ऐसे बादशाह का यू  लाचारी में अंत हुआ ..-...हर अत्याचारी का एक न एक दिन अंत होता ही है ---? १९८४  में मारे गए सिक्खों का लहू भी चित्कारेगा --और उन्हें  मारने वाले कभी चैन से नहीं रह पाएगे -- क्योकि इस अदालत के ऊपर भी एक और अदालत हैं--जहाँ इंसाफ होता हैं -----  




( ऐसे होनहार और जुझारू कौम को मेरा सत -सत नमन ) 
मुझे गर्व हैं की मैने इस कौम में जनम लिया 



ऐसे गुरु को बल -बल जावा  





गुरुवार, 27 अक्टूबर 2011

याद....!!!









याद आते हो तो कितने ----
अपने -से लगते हो तुम ----
वर्ना,  हर लम्हां गुजरता हैं   ----
तुम्हारे ख्यालो में ----
चुप -सी आँखों में आज ----
फिर वही सवाल उठा ----
क्या राहत मिलेगी मुझे ----
इन बंद फिजाओ में ----?
खेर, अँधेरे  भी  भले -जीने के लिए ----
गैर, हो जाते हैं  सभी चेहरे उजालो में----
मुस्कुराओ तो भी अच्छा हैं  ----
बेरुखी भी भली तुम्हारी ----
बेअसर हैं  सभी बाते यहाँ मलालो में ----
याद आते हो तो एहसास -ऐ -ख़ुशी मिलती हैं  ----
यूँ तसल्ली भी गिरफ्तार हैं ---
सौ (१००) तालो में----???????   










शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

कशमकश !!!



" मत पूछो ऐ दुनियां वालों कैसे  मेरी  किस्मत फूटी !
अपनों ने ही मेरे बनकर मेरे प्यार की दुनियां लुटी !!"







उनके जाने से मेरे दिल का वो कोना खाली हैं 
जहाँ  सजाई थी मैनें  कभी तेरी इक तस्वीर 
तंग गलियां !सुनी दीवारे ! जंगल में पड़ी इक मज़ार !
यादों का झुरमुट हैं या गुज़रे दिनों की बहार ...

तेरे रहने से इस बे-जान हंसी ने ,
 ठहाकों  का रूप लिया था कभी ,
जमी हुई ओंस ने तब --
 पिधलना शुरू कर दिया था --
बर्फ की मानिंद इस जमी हुई रूह को 
अब, तेरे आगोश का इन्तजार रहेगा ----?

भटकती रही हूँ दर -ब -दर 
तेरे  कदमों  के निशाँ  ढूंढती  हुई 
इस भीड़ में अब कोई मुझे पुकारेगा नहीं---?

कोई गलती नहीं थी फिर भी सज़ा पा रही हूँ मैं ---
तुझसे दिल लगाया क्या यही जुर्म हुआ मुझसे ?

न मैं समझ सकी, न तुम बता सके --
जिन्दगी के ये फलसफे ..उलझकर रह गए 
उलझे हुए तारो को सुलझा सकी नहीं कभी --
इस उलझन में हम कब उलझ गए पता ही नहीं ???   

   



मेरी पेंटिंग --दर्शन !



शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

सपनो का विरोधाभास् !!!










मेरी आँखों में जो सपने पल रहे थे ---
आँख खुलते ही सब मिट्टी में दफन  हो गए ---
मेरे लिए भी थी कभी कुछ पेड़ों की छाँव ---
पर वो कट चुके तेरी नफ़रत की कुल्हाड़ी से --

मेरे दिल के बागीचे  में खिले थे प्यार के चंद फूल --
      कम्व्ख्त! वो भी किसी हसीना के गले का हार बन गए --
मैंने सोचा था आएगी पतझड़ के बाद बहारे कभी --
पर जिन्दगी की रेल-पेल में पतझड़ ही आती रही--

मुझे मिले नहीं कभी हँसते -खेलते -नाचते -गाते कांरवा--
हमेशा मिले वीरान स्टेशन ! सुनसान राहें !बेजान मेहमां --
ले सकी न सांस मैं कभी इन बन्धनों को तोड़कर --
न ये बंधन कभी मेरे गले का हार बन सके --

हर कदम पर तेरी नफरत से सामना हुआ मेरा --
प्यार मिल न सका कभी तेरी गठरियो से मुझे --
अब, तुम कहते हो 'ये नफरत से भरी गठरी  हम ढोए '--
तो तुम ही कहो ----
" कैसे हम उन सपनो को कत्ल करे ?
कैसे हम तुम्हारी नफ़रत को तिलांजलि दे ?
कैसे हम तुम्हारे दिल में प्यार का बीज बोए ?
अब, तुम ही कहो --कैसे हम खुद को दिया वचन तोड़े "?










तुम तो चले गए यह कहकर की-- 'हमे प्यार नहीं तुमसे '
पर मैं कहाँ जाऊ --
तेरे प्यार का श्रृंगार ले कर --
तेरे नाम का सिंदूर लेकर --
तेरी प्रीत की माला पहन कर -- 


इन राहो में अनेक कांटे हैं ,कही भी फूल दिखाई नहीं देते ?
चारो और हाहाकार हैं ,सुकून के दो पल दिखाई नहीं देते ?
क्या बहारे फिर से आएगी ? मगर कब ???
क्या खिजाए अब तो जाएगी ?मगर कब ???  
मौसम बदला ऋतुए बदली ..पर तू न बदल सका ---
राह जोता किए हूँ हर पल आँखों में इन्तजार लिए ... 




          
"देख ले आकर  महकते हुए जख्मो की बहार ! 
मैने  अब तक तेरे गुलशन को सजा रखा हैं !"




शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

मेरे गुरु की नगरी ~ हुजुर साहेब --पार्ट -2





तख़्त श्री सचखंड साहेब  'नांदेड ' 


गुरुद्वारा  संचखंड साहेब  


अन्दर का द्रश्य --यह खालिश सोना हैं 

हम तारीख10 सितम्बर  को  हुजुर साहेब नांदेड की यात्रा पर निकले थे --आज दूसरा दिन हैं ... मेरे साथ मेरी सहेली रेखा हैं ....

"मेरे गुरु की नगरी भाग १ --पढने के लिए यहाँ क्लिक करे "



आज  सुबह  -सुबह  हम फटाफट तैयार हुए --क्योकि आज हमें गुरुद्वारे के दर्शन  करना थे  --कल हम जा नहीं पाए --आज ही हमें दुसरे ५-७ गुरुद्वारों के भी दर्शन करने थे --तो चलते हैं  अंदर -------




अन्दर का द्रश्य ---सुबह की तैयारी चल रही हैं -- सुबह चारो दरवाजे खुल जाते हैं --स्नान कराकर गुरु का अमृत और प्रसाद का वितरण होता हैं --फिर आशा -दी - वार का पाठ होता हैं --जिसे संगत श्रद्धया  से  सुनती हैं --  कीर्तन से सारा माहौल भक्तिमयी हो जाता हैं --- अन्दर महाराज के शास्त्र रखे हैं और उनकी 'कलगी' रखी हैं..जिसे 'आपजी' अपने सर की पगड़ी में सजाते थे --रात को उनके शास्त्रों को संगत को दिखाया जाता हैं ..
    




( किसी  त्यौहार में  दरबार साहेब की रौनक .... चित्र --गूगल )





अन्दर क दरवाजा --गुरुद्वारे में चार दरवाजे हें जो सुबह और शाम को खुलते हैं इसमें किसी को अन्दर जाने की इजाजत नहीं हैं सिर्फ जत्थेदार ही जा सकते हैं -- जिन्होंने सेवा ले रखी हैं --इस समय यहाँ के जत्थेदार सरदार कुलवंत सिंह जी हैं -- जो सेवा में रहते हें--जत्थेदार  जीवन भर शादी नहीं करता ?
ऐसा  क्यो हैं  मुझे नहीं पता ? यहाँ गुरु-- शिष्य  परम्परा हैं ---जो काबिल होता हैं उसी को जत्थेदार बनाया जाता हैं जो अपने जीवन काल तक  सेवा  करता हैं --उसकी म्रत्यु के बाद दूसरा बनता  हैं---  





यह हैं  प्रसाद -घर ---यहाँ आप चाहे जितने का प्रसाद खरीदो आपको उतना ही मिलेगा चाहे आप 100 का खरीदो या 10 रु का --आपको एक समान ही मिलेगा  --


( बड़ा ही सुंदर हाथी -मेरे साथी-- दीपक हैं )


 (यह हैं गुरूद्वारे में जलती अखंड ज्योत )


(यह हैं गुरु  गोविन्द सिंहजी  का असली फोटो )
उनके चेहरे पर एक बड़ा सा मस्सा  हैं 




(यह  हैं  नगाड़ा --जो रात को अरदास के वक्त बजता हैं) 


(अन्दर की खुबसुरत सजावट --दीवारों पर सोने की कारीगरी  )


(और बाहर... दो खुबसूरत महिलाए ) 




यह हैं ऐतिहासिक बावली -- कहते हैं यहाँ रोज आज भी महाराज आकर स्नान करते हें --रात को उनके  कपडे यहाँ रखे जाते हैं जो सुबह गीले मिलते हैं -- ( मैने नहीं देखा ? ) सिर्फ सुना हैं , क्योकि यह सिर्फ सुबह ४बजे ही खुलता हैं संगत के दर्शन हेतु ....बाद में यह बंद रह्ता हैं --- 




(हजूर साहेब में मनाए  जाने वाले त्यौहार) 





(कीर्तन चल रहा हैं ---लंगर साहेब गुरुद्वारे में )



इतिहास :----


अब आपको बताती हूँ गुरु गोविन्दसिंहजी महाराज के  नांदेड आगमन की कथा--गुरूजी पंजाब छोड़कर नांदेड क्यों आए :----


" सचखंड वसे  निरंकार"   

गुरु गोविन्द सिंह जी का सम्पूर्ण जीवन (बचपन छोड़ कर )पंजाब की सरजमी पर व्यतीत हुआ --अंतिम सुनहरी यादे तख्त सचखंड श्री हजूर साहिब को अर्पित हैं भारत के कोने -कोने को अपनी पावन भेट देकर पवित्र किया --अपने माता -पिता  और चारो बच्चो को देश और कौम और धर्म की खातिर न्योछावर करने के बाद उन्होंने  दमदमा साहिब (मालवा देश )में प्रवेश किया --औरंगजेब की मौत के बाद उसके बड़े बेटे बहादुर शाह को दिल्ली के तख्त पर बैठाया जो गुरु जी का मुरीद था -- फिर आपजी दक्षिण दिशा को रवाना हो गए ..

दक्षिण दिशा जाते हुए जब वो नांदेड पहुंचे तो गोदावरी नदी के किनारे बसा यह नगर उन्हें बहुत भाया --यहाँ का  शांत वातावरण उनके मन को सुकून देने वाला था --पर यह इलाका बहुत खराब और बंज़र था  यहाँ की भूमि  उपजाऊ नहीं थी - -पर इस बंज़र भूमि को गुरूजी ने अपनी मधुर वाणी से आलोकिक किया --अपना आखरी समय उन्होंने यही गुज़ारा --संवत १६६५ कार्तिक सुदी  दूज के दिन गुरूजी ने खालसा पंथ को गुरु ग्रन्थ साहिब के चरणों में  सौप  दिया -- और गुरु की गद्धी को ग्रन्थ को सौपकर उस महान ग्रन्थ को गुरु का ख़िताब देकर आगे से गुरु परंपरा को  खत्म किया --जो गुरुग्रन्थ साहिब कहलाता हैं --सारे खालसा -पंथ को उन्होंने आदेश दिया ----

 "आगिया भई अकाल की तबै चलायो पंथ !
  सभ  सीखन  को हुकम हैं गुरु मानिओ ग्रन्थ !
गुरु ग्रन्थ को मानियो प्रगट  गुरां  की देह !
जो प्रभ को मिलबो चहै खोज शब्द मैं  लेह ! "
                                                 (पंथ प्रकाश )
   

(गुरु ग्रन्थ साहेब को गुरतागद्दी  सौपते हुए दशमेश पिता ) 


दसमेश पिताश्री गुरु गोविन्दसिंह जी का नांदेड की सरजमी के लिए  यह फरमान हैं की--- "मैं अपने हर सिक्ख का ६० साल  की आयु तक प्रतीक्षा करूँगा "---इसलिए हर गुरु के सिक्ख का यह फर्ज बनता हैं की वो अपनी भागदौड भरी जिंदगी से कुछ समय निकाल कर  इस स्थान का दर्शन करे और अपना जीवन सफल बनाए ....(शेष ..इतिहास अगली किस्त में )




"चलिए  दोपहर को बागीचे की सुंदरता  में चार चाँद लगाए" 



"तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल हैं
    जहाँ भी जाऊ ये लगता हैं तेरी महफिल हैं " 


(फूल---- आहिस्ता तोड़ो --फूल बड़े नाजुक होते हैं )


(सिर्फ तेरी कमी हैं --इस आशियाने में ?????



( बिन तेरे न इक  'पल' हो 
न बिन तेरे कभी 'कल' हो )


(" कितना हंसी हैं मौसम" ----चांदनी नहीं हैं  तो क्या ...धुप तो हैं ?


शेष अगली कड़ी में जारी ------