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बुधवार, 4 मार्च 2026

शिव के 5 तत्वों वाले मन्दिर

तमिलनाडु डायरी ★8
तिरुपति
20 जनवरी 2026


12 जनवरी को बॉम्बे से चलकर मैं 13 की रात 3 बजे त्रिची पहुँची। हमने श्री रँगनाथ स्वामी,जम्बुकेश्वर मन्दिर, तन्जोवर के ब्राहतेश्वर मन्दिर, कुम्भकोलम, चिदम्बर, कांचीपुर, अरुणाचलन ओर वेल्लोर के मन्दिरों के दर्शन कर तिरुपतो को चल दिये...अब आगे:--

वेल्लूर से तिरुपति 108km है जो 2 घण्टे में हम पहुँच गए। हम सीधे तिरुपति में एक धर्मशाला पहुँचे। सामान रख थोड़ा फ्रेश होकर पीछे भगवान कृष्ण के मन्दिर चल दिए।परन्तु यहाँ अधिक भीड़ थो तो सोचा कल दर्शन करेगे। ओर खाना खाकर so गए।

सुबह 4 बजे टोकन लेने के लिए निकलने लगे तो रुकमा बोली कि मिस्टर की तबियत बहुत खराब है मैं फ्लाइट से इंदौर जा रही हु।तुम लोग मन्दिर चले जाओ।


अचानक परिस्थिति बदल गई। मैं थोड़ा धबरा गई।क्या करूँ क्या न कर।फिर सोचकर हम दोनों टोकन लेने चल दिये।पर खिड़की खुली नही थी कब खुलेगी कोई पता नही था।किसी ने बोला कि ऊपर चले जाओ फ्री की लाइन में 2-3घण्टे में नम्बर आ जायेगा। और हम बगैर टोकन के आगे चल दिये और यही गलती हमको बहुत महंगी पड़ी।

मैं वापस धर्मशाला आई और रुकमा से परामर्श किया और सुबह साढ़े 7 बजे तिरुपति से टैक्सी लेकर तिरुमला को चल दी ।लगेज था तो टेक्सी की जो 800 रु में हुई। 
तिरुमला में इंट्री हुई तो हमारे सामान की जांच हुई वो करवाकर हम वापस कार में बैठे। आगे एक बड़े गेट से हमारी इंट्री हुई और गरुड़ महाराज हाथ जोड़े हमारा स्वागत कर रहे थे।
आगे काफी भीड़ मिली लोग काफी मात्रा में इधर-उधर घूम रहे थे कुछ छावं में जमीन पर भी बैठे हुए थे।अच्छी खासी भीड़ थी कार वाले ने  हमको एक बिल्डिंग के पास उतारा और हाथ से इशारा कर उधर जाने का बोला हमने सामान उतारा ओर जिधर हमको रूम मिलना था  उधर चल दिये।

एक खिड़की पर पहुँचकर हमने एक फार्म भरा ओर रूम बुकिंग में 3 घण्टे का  वेटिंग बताया। हम वहीं एक जगह बैठ गए। सामने ही स्लाइड चल रही थी ठीक 12:15 को हमारे टोकन नम्बर की स्लाइड आई और हमको पास की बिल्डग में कमरा मिल गया। सारा समान रूम में रखा ओर मोबाईल  चप्पल भी रूम में रखकर हम उधर चल दिये जिधर मन्दिर था। 
150 रु जीप वाले को दिये उसने एक जगह उतार दिया बोला इधर रिक्वेस्ट करो ड्यूटी अफसर आपको सीनियर सिटीजन वाली लाइन से जाने देगा।लेकिन उसने नही जाने दिया ।क्योकि हमारे पास टोकन नही था।पूरे 2 घण्टे  उसको रिक्वेष्ट करती रही फिर उसने जाने दिया परन्तु अंदर से हमको फिर बाहर धकेल दिया क्योकि हमारे पास टोकन नही था। एक 70 साल का सीनियर आदमी को ऐसे धक्के देना मुझे जरा भी पसन्द नही आया ।यहाँ सब भेड बकरी के समान थे किसी के दिल मे दया नही थी। एक बुजुर्ग जिससे चला नही जा रहा उस पर भी दया नही आई।खेर, गलती हमारी थी हमने टोकन नही लिया था। परन्तु हमको भी इतना पता कीधर था।वरना टोकन लेकर ही आते।

हारकर हम एक अन्य जीप में बैठकर  फ्री की लाइन में गए । सारा रास्ता खाली पड़ा था ओर बहुत लंबा था। उस  लंबे रास्ते से गुजरते हुए हालत पतली ओर पैर कठोर हो गये। हमसे चला भी नही जा रहा था।पूरे 2 घण्टे हम लगातार चलते रहे हालांकि बीच बीच मे बेंचेस लगे हुए थे जिनपर कुछ आराम करते हुए आगे बढ़ते रहे। हमारे सामने बहुत से युवा भागते हुए जा रहे थे। 

जैसे तैसे चलते हुए आखिर 2:15 को हम दोनों केबिन में आये। केबिन की हालत खराब थी बहुत से लोग नीचे चादर बिछाकर लेटे हुए थे। स्लॉट चल रहा  था जिस पर लिखा था ये कम्पार्टमेंट  01 बजे दिनांक 20 को खुलेगा। यानी रात को 1 बजे, हमारा ध्यान इस तरफ अचानक गया । मतलब 11 घण्टे हमको यहाँ बिताने है। हमारी सांस ही रुक गई क्योकि न तो यहाँ कुर्सी थी और न हमारे पास चादर थी। हम नीचे बैठ नही सकते थे 11 घण्टे कैसे निकालेंगे। घबराहट में मिस्टर ने बोला कि हम बाहर चलते है 11 घण्टे कौन बैठेगा। दर्शन करने फिर आएगे।

 अब हम फटाफट गेट पर दौड़े परन्तु तब तक गेट बन्द हो चुका था ।थोड़ी देर आवाज़ देते रहे पर कोई नही आया। वापस अपने स्थान पर आकर बैठ गए।ऐसा लग रहा था । हम इस चक्रविहु में फस गए थे वहां कोई सुनने वाला नही था। अब तो जो होगा देखा जाएगा।ये सोचकर बैठे रहे।
कभी बैठते,कभी खड़े रहते कभी लेट जाते ऐसे ही कई घण्टे गुजारे।ठंड अलग हो गई थी।
समय कट नही रहा था स्क्रीन पर कोई साउथ की धार्मिक फ़िल्म चल रही थी।केबिन में ही खिचड़ी मिल रही थी पर जंग लड़कर मुझे 1 प्लेट मिली।शाम को दूध भी मिला।

करीब रात के साढ़े 11 बजे हमारा केबिन खोला गया और हम सब लोग लंबे कॉरिडोर में चलने लगे।निरंतर 2 घण्टे बगैर रुके हम चलते रहे,चलते रहे। मेरे पैरों में छोले हो गए । ठंड से मेरे पैर सुन्न हो गए। मैंने मौजे पहने थे वो भी स्टाफ़ ने उठवाकर फिंकवा दिए। 

आखिर में इंतजार खत्म हुआ हम सवा 1 बजे भगवान के सामने थे, 1सेकंड दर्शन हुए। वही धन्य समझो। सारी परेशानी दूर हुई।
दर्शन कर के मन प्रसन्न हो गया। परेशानी तो हुई पर अंत भला तो सब भला।

दर्शन करके भी हम 1 घण्टा चलते रहे। आगे लड्डू मिल रहे थे तो उधर लाईन में लग गये।टिकिट पर 1 लड्डू ओर 50 रु के हिसाब से लड्डू मिल रहे थे।अच्छे खासे बड़े बड़े लड्डू थे। मैंने भी सबको देने के लिए 300 रु के 6 लड्डू खरीद लिए।हमारे टोकन पर 2 लड्डू फ्री मिले थे।टोटल 8 लड्डू लेकर हम बाहर निकल गए।

न-न करके भी हमारे दर्शन हो ही गए।चलो कोई न, भगवान ने परीक्षा लेकर ही सही हमको दर्शन दे ही दिए।

लड्डू लेकर हम ने डोसा खाया।मोबाइल था नही इसलिए कोई फोटू नही खींच सकी। 


थोड़ा चलने के बाद हमको एक जीप मिली जो 200 रु लेकर हमको हमारी धर्मशाला तक छोड़ गई। हम कमरे में ऐसे ही सों गए।थकान से गहरी नींद आ गई।

तिरुपति संस्थान के रूम 100 रु के थे। 600 रु एडवांस में जमा करवाये थे जब रूम की चाबी दी तो 500 रु वापस दे दिए। 

हम सुबह उठकर बगैर नहाए हुए ही समान लेकर नीचे तिरुपति आ गए।
आज हम यही रुकेंगे। ओर दूसरे मन्दिर वगेरा देखेगे।
परन्तु आज हमारे साथ एक अनहोनी होनी बाकी थी।

क्रमशः....




 



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