मेरी जगन्नाथपुरी यात्रा
भाग★2
6 फरवरी 2026
4 फरवरी की रात 12:15 पर हमारी ट्रेन LTT रेल्वे स्टेशन बॉम्बे से निकली और हम 6 फरवरी सुबह 12 बजे पूरी पहुँच गए अब आगे.....
हम अपने होटल आ गए और स्नान कर फ्रेश हुए फिर कुछ समय बाद हम होटल के नीचे बने रेस्टोरेंट में आलू के पराठे दही के साथ खा रहे थे।
आज जब हम स्टेशन से ऑटो में आये फिर चौकी पर साइकिल रिक्शा पर सवार हुए और हमने अपना होम स्टे का नाम (श्री विष्णु दर्शन हॉलिडे होम) बताया तो रिक्शा वाला हमको "विष्णु दर्शन" नाम की धर्मशाला में ले गया जो मन्दिर के पश्चिमी गेट के सामने बनी थी । पर वो हमारा होम स्टे नही था। हम रिक्शे से उतर गए और अंदर जाकर इन्क्वारी की तो पता चला कि हमारा होटल तो उधर ही था जिधर से हमने रिक्शा लिया था यानी कि मन्दिर के पास में मेन रोड पर ही था।
अब हम वापस वही चल दिये,यहाँ से हमने फिर दूसरा रिक्शा किया और अपने होम स्टे पहुँचे।
हमारा होम स्टे मेन रोड पर ही था जिसका रास्ता अंडर ग्राउंड था। 2 महीने पहले ही मैंने इस होम स्टे को बुक किया था जिसका किराया 1650 रु पर-डे था। होम स्टे एकदम शानदार था। अंदर एक किचन भी था जिसको हमने यूज नही किया।
अब कमरे में आकर हमने पण्डिजी को फोन किया। इन पंडित जी के बारे में मुझे हमारे ग्रुप "भारत दर्शन" के मेम्बर "विनीत गुप्ता जी" ने बताया था।
पंडितजी ने बोला कि–– "आप थोड़ा आराम करो और शाम को 5 बजे मुझे मन्दिर के पश्चिमी गेट पर मिलो।"
पण्डिजी के इतना कहने पर हम निश्चिंत हो गए और Ac की ठंडी लहरों में खो गए।
2 घण्टे बाद Ac की लहरोँ में खोये हुए हम चोंककर उठ बैठे सोचा कि Ac में ही रहना था तो यहाँ क्यो आये? चलो बाहर की रौनक देखी जाय।
ओर हम फटाफट गुलफ़ाम बने रूम से बाहर आ गए।
बाहर बाजार सजा हुआ था और लोग खरीदारी कर रहे थे ।हम भी बाजार की रौनक देखते हुए आगे बढ़े और एक रिक्शा कर के मन्दिर की तरफ चल दिये। पूरे बाज़ार में बहुत रौनक थी काफी भीड़ मन्दिर की तरफ जा रही थी कुछ लोग मन्दिर से लौट रहे थे कुछ खरीदारी कर रहे थे। बड़ा ही शानदार ओर मनमोहक माहौल था।
हम रिक्शे से मन्दिर के पश्चिमी गेट पर उतरकर अंदर चले गए।कुछ फोटू क्लिक की ओर वही पंडितजी का इंतजार करने लगे।
दूर मन्दिर का ध्वज बदला जा रहा था जिसे पब्लिक देख रही थी और वीडियो बना रही थी। मैंने भी बाहर से ही मन्दिर का वीडियो बनाया।
ठीक 6 बजे पंडित जी आये उन्होंने पहले हमारे जूते ओर मोबाइल जमा करवाये।ये काउंटर मन्दिर के वही बना हुआ था ये मन्दिर की तरफ से ही निशुल्क सेवा होती है ।क्योकि मन्दिर में मोबाइल ले जाना मना है तो काउंटर पर ही जमा करना होता है।
मैंने काउंटर पर 2 मोबाइल और हम दोनों के जूते जमा किये। ये एक थैले में रखना होते है और अपना मोबाइल नम्बर बताना होता है जिसे वो लिख लेते है ये प्रक्रिया बहुत सेफ है। वापसी में आप अपना मोबाइल नम्बर उनको बताओगे तभी आपका फोन मिलेगा।
फोन रखकर हम पंडित जी के साथ पश्चिमी गेट से होते हुए मन्दिर के अंदर गए यहाँ काफी भीड़ थी पंडितजी मिस्टर को संभालते हुए,भीड़ से बचाते हुए ठीक जगन्नाथ जी की मूर्ति के समुख ले गए। भगवान का श्रृंगार फूलों से हो रहा था। ये श्रृंगार उनके भाई कर रहे थे ऐसा वो बोले, कल वो खुद प्रभु के श्रृंगार में उपस्थित थे।
मन्दिर के उस भाग में अत्यंत भीड़ थी पर पंडित जी के साथ हमने सेफली दर्शन किये।
पंडित जी हमको सही सलामत उस भीड़ से निकाल लाये ओर एक जगह बैठा दिया।जिधर थोड़ी देर बाद हमारे लिए 2 पत्तल में भगवान का भोग मंगवॉ दिया जिसे हमने बड़ी श्रद्धा से हाथ जोड़कर वही खाया। बहुत ही स्वादिष्ट भोग था।
बाद में हमको समालते हुए पंडित जी मन्दिर के बाहर ले आये।
आज अगर पंडित जी नही होते तो हम दोनों भगवान के दर्शन बिल्कुल नही कर पाते। क्योकि मन्दिर में बहुत भीड़ ओर धक्का-मुक्की हो रही थी।लोगो ने अपने बच्चों को कंधे पर बैठा रखा था जिसके कारण पीछे वालो को दिखाई नही दे रहा था। लोग दर्शन करने के लिए धक्का मार रहे थे।
इससे तो अच्छा होता अगर मन्दिर ट्रस्ट लाईन में एक-एक श्रद्धालु को दर्शन करवाता ताकि सभी आराम से दर्शन करते।परन्तु वहाँ व्यवस्था के नाम पर कोई इंतजाम नही था।इसलिए काफी धक्का मुक्की हो रही थी।
बाहर आकर हमने किसी भी मन्दिर में जाकर दर्शन नही किये क्योकि हर मन्दिर में काफी लंबी लाईने थी।
बाहर निकलकर मैंने कुछ दक्षणा मन्दिर के भंडारे में दान की ओर कुछ दक्षणा पंडित जी को देकर बिदा ली।उन्होंने हमको पूरी का प्ररसादम भी दिया जिसे हम घर लेकर आये ।
बहुत-बहुत धन्यवाद विनीत जी का जिनके द्वारा मुझे पंडित जी मिले और मेरा ये बहु प्रतीक्षित जगन्नाथपुरी का सपना साकार हुआ।
इस तरह आज का दिन व्यतीत हुआ ओर भगवान के दर्शन कर के हमारा जीवन धन्य हुआ।
शेष अगले एपिसोट र्में....
जय जगन्नाथ🙏
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें